अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता – ऊँचाई

अटल बिहारी वाजपेयी की किताब “मेरी इक्यावन कवितायें” से ये ली गयी है..ये किताब मैंने साल २००० के पटना पुस्तक मेला से खरीदी थी..पहले मुझे कविता पढ़ने का शौक नहीं था.शायद इसी किताब से मुझे शौक जगा था कविता पढ़ने का.मुझे इस किताब की सभी कवितायें बेहद पसंद हैं.एक कविता यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.


ऊँचाई


ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफन की तरह सफेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिल-खिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनन्दन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।
सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बंटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।जरूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूंट सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे,
कोई कलि न खिले। न वसंत हो, न पतझड़,
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा। 
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।



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  1. सच कहूँ तो मज़ा आ गया..
    वाजपयी जी की पहली कविता पढ़ी है और पढ़ कर ऐसा लग रहा है कि उनकी और भी कविताएँ पढने को मिले…
    कुछ और भी कविताएँ हमारे साथ बाँटें..

    आभार

  2. नत हूँ…तब भी था जब स्वयम् उनके श्रीमुख से सुनी थी यह कविता!!
    मैंने तो पहले भी कहा था और आज भी कहता हूँ कि
    बुलंदी कब तलक इकशख्स के हिस्से में रहती है
    बड़ी ऊँची ईमारत हर समय ख़तरे में रहती है!

  3. ये कविता पहली बार पढ़ रही हूँ मैं.
    अच्छा लगा!!!
    शुक्रिया अभिषेक इसे हमारे साथ बांटने के लिए!!

  4. मेरे प्रभु!मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,गैरों को गले न लगा सकूँ,इतनी रुखाई कभी मत देना।

    awesome this is

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