इच्छाओं का खेल

आर्ट ऑफ लिविंग वाले श्री श्री रवि शंकर को तो आप सब जानते ही होंगे. मेरे एक मित्र भी उनके बहुत बड़े अनुयायी हैं, और उनकी बहुत सी बातें बताते रहते हैं. लेकिन मैंने कभी इस मामले में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली. अभी कुछ दिन पहले ही उनकी एक किताब हाथ लगी थी..उस किताब में उन्होंने बहुत सी बातों का जिक्र किया है जैसे ईर्ष्या, प्यार, ईच्छा, आदतें, ज्ञान, शान्ति और भी बहुत कुछ..किताब पूरा पढ़ने का तो मौका मिला नहीं..बस जो भी हल्का फुल्का पढ़ा, उसमे से कुछ बातें यहाँ बताना चाहूँगा.

आपने ये गाना तो सुना ही होगा “चाँद तारे तोड़ लाऊं, सारी दुनिया पर मैं छाऊ..बस इतना सा ख्वाब है..” 
बात भी सही है.हर कोई बहुत कुछ पाना चाहता है, हर किसी की इच्छाएं अंतहीन हैं..संतुष्टी किसी को भी नहीं, चाहे वो सफल व्यक्ति हो या कोई और..हर कोई जिंदगी से बहुत कुछ की उम्मीद लगाये बैठा है. रवि शंकर इंसान के इन्ही सब इच्छाओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं – इच्छाएं खुशी खत्म करती हैं फिर भी सब इसी ईच्छा के पीछे भागते नज़र आते हैं..जब कभी जिंदगी से खुशी जाती है तो अक्सर इसी ईच्छा के कारण ही वो होता है. रवि शंकर की बात भी बहुत सही है. जब हम खुश रहते हैं, मन आनंदित रहता है तो वहां ईच्छा कैसे हो सकती है..जब जिंदगी में आनंद है तो ईच्छा के होने का सवाल ही नहीं उठता..लेकिन फिर भी लोगों को लगता है की उनकी ईच्छा उन्हें खुशी और आनंद के राह पे ले जा रही है..जब की सच्चाई ये है की ईच्छा खुशी की तरफ हमें ले जाने का बस  आभास देती हैं.

इच्छाएं अक्सर दूसरे को देख के ही आती है, मन के भीतर की इच्छाएं बहुत सिमित हैं. हम दूसरे को देख के ही बहुत कुछ पाने की चाह करते हैं. चाहे वो दूसरों की तरक्की देख खुद तरक्की करने की ईच्छा हो या फिर किसी के पास गाड़ी देख उस गाड़ी को खरीदने की ईच्छा. किसी को देख उससे दोस्ती करने और बात करने का दिल करना भी तो एक ईच्छा ही है न..ईच्छा असल में खुद ब खुद आ जाती हैं, बिना किसी से पूछे, बिना बताए..और ये इच्छाएं ही हमेशा से इंसान की सबसे बड़ी दुश्मन रही है..इच्छाएं ही गुनाह भी करवाती हैं और दान भी.  हम जब कष्ट के दिनों में होते हैं या फिर जब हताश और निराश हो जाते हैं और ये तय करते हैं की अब कोई और ईच्छा नहीं करेंगे..ये भी तो एक ईच्छा ही है..ईच्छा की चाह नहीं करना भी तो ईच्छा ही है न. असल में सच यही है की ईच्छा हमें कभी नहीं छोड़ती. हाँ हम उसे कम जरुर कर सकते हैं. ये हमारे हाथ में है.

रवि शंकर एक जगह कहते हैं की “इच्छाओं का समर्पण करते चलो. ईच्छा पकड़ के रखोगे तो फिर शान्ति नहीं पाओगे.वो एक उदाहरण भी देते हैं..जब हम कोई फिल्म देखने सिनेमा हाल में जाते हैं तो गेटकीपर टिकट का आधा हिस्सा फाड़ अपने पास रख लेता है. वहां अगर हम टिकट न दें उसे तो वो भी हमें सिनेमा हॉल के अंदर जाने की इजाजत नहीं देगा..वहां भी हमें टिकट का समर्पण करना पड़ा. एक और उदाहरण देते हैं रवि शंकर, कहते हैं की जब आप कोई कॉलेज में एडमिसन लेने जाते हो तो वहां आपको एक एडमिसन फॉर्म मिलता है, उसे भर आपको वही फॉर्म कॉलेज में दे देना होता है.अगर ये फॉर्म आप अपने पास रखेंगे तो आपको कभी कॉलेज में दाखिला नहीं मिलेगा..दाखिला के लिए ये फॉर्म आपको कॉलेज में जमा करना ही होगा. ऐसी कितनी छोटी छोटी बातें हैं जहाँ समर्पण साफ़ दीखता है. बेहतर यही है की हम भी इच्छाओं का समर्पण करते चले..जितना ज्यादा ईच्छा पकड़ के रखेंगे खुशी से उतने दूर रहेंगे हम और इच्छाएं जितनी कम होंगी , जिंदगी में उतनी शान्ति होगी.

इच्छाएं सुख का कारण हैं, लेकिन बेवजह की इच्छाओं से सुख नहीं मिलता. जब आपको बहुत प्यास लगी हो तो पानी की एक बूंद ही आपको तृप्त कर देती है.सुख मिलता है उस पानी के एक बूँद से ही..लेकिन अगर प्यास न लगे तो वही पानी पीने में उस सुख का एहसास नहीं होता.

रवि शंकर एक बात और कहते हैं की हम अगर कभी सत्य को पानी की ईच्छा करें तो बाकी सभी ईच्छा पीछे छुट जाती है..सत्य पाने की ईच्छा बाकी सब इच्छाओं को दफ़न कर देती है..लेकिन आज हम अपने बाकी इच्छाओं के बोझ तले इतने दब गए हैं की ये हमें ये पता ही नहीं की सत्य तो हमारे अंदर ही है, और हम उसे पाने की ही ईच्छा करते हैं.

ये सब इच्छाओं का कारण बस एक शब्द है “मैं”. मुझे ये चाहिए, मुझे वो चाहिए, मैं ये बनना चाहता हूँ..मैं वो बनना चाहता हूँ. इस “मैं” की इच्छाएं अंतहीन हैं, बेहतर इसी में है की इस “मैं” की इच्छाओं पर थोड़ी रोक लगे. सभी लोग अपने सभी इच्छाओं को दफ़न नहीं कर सकते..ये असंभव है, लेकिन हाँ इच्छाओं को सिमित जरुर कर सकते हैं..समर्पण करते चलो इच्छाओं का..ईच्छा को पकड़ के रखने से शान्ति कभी नहीं मिलेगी.




(इसी किताब में कुछ पंक्तियाँ थीं रवि शंकर की, जिन्हें मैंने नोट कर के रख लिया है..अगली पोस्ट में वो..)

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