गुलज़ार साहब के साथ कुछ लम्हे - पार्ट ४ (कैलेंडर नज्में)


बेतहाशा घबरा के तुमने 
रौशनी के बदन को मोड़ लिया
मै टेबल पर इक नज़्म पैदा कर रहा था
तुम्हारे चहरे पर ,वो टेबल लेम्प की रौशनी
मेरे लफ्जों को जिंदा करने लगी
तुम्हारे चहरे से नज़्म पोछकर रौशनी ने
मेरे कोरे कागज़ पर उड़ेल कर रख दी


मुझे बेवजह शायर बना रखा है दुनिया ने..



गुलज़ार साहब के फैन हो या फिर उनके भक्त, एक बात सबमे समान है, गुलज़ार साहब की कोई भी नज़्म हो, वो नोट कर लेते हैं..अजी नोट क्या, उसे तो रट लेते हैं.अभी एक दो दिन पहले ऋचा जी का एक पोस्ट पढ़ा, गुलज़ार साहब ने साल २०१० के लिए एक कैलेण्डर नज़्म लिखा, हर महीने के लिए एक अलग नज़्म..ऋचा जी ने तो उसे शेयर कर लिया, अब मैं कहाँ रहने वाला था पीछे, आखिर गुलज़ार साहब के इस सीरीज में उसे न जोड़ा जाये तो फिर मजा कैसे आएगा..तो उनके ब्लॉग से ये नज़्म मैंने उधार ले लिया..


अकबर का लोटा रखा है शीशे की अलमारी में
रना के "चेतक" घोड़े की एक लगाम
जैमल सिंह पर जिस बंदूक से अकबर ने
दाग़ी थी गोली

रखी है !

शिवाजी के हाथ का कब्जा
"त्याग राज" की चौकी, जिस पर बैठ के रोज़
रियाज़ किया करता था वो
"थुन्चन" की लोहे की कलम है
और खड़ाऊँ "तुलसीदास" की
"खिलजी" की पगड़ी का कुल्ला... 
जिन में जान थी, उन सब का देहांत हुआ 
जो चीज़ें बेजान थीं, अब तक ज़िन्दा हैं !

अब देखते हैं हर महीने की खास नज्में, एकदम गुल्जारिश टच में...


जनवरी(कैमरा) 

सर के बल आते थे 
तस्वीर खिंचाने हम से 
मुँह घुमा लेते हैं अब 
सारे ज़माने हम से


फ़रवरी (छाता)

सर पे रखते थे
जहाँ धूप थी, बारिश थी 
घर पे देहलीज़ के बाहर ही 
मुझे छोड़ दिया 

मार्च - (शीशा) 

कुछ नज़र आता नहीं 
इस बात का ग़म है 
अब हमारी आँख में भी 
रौशनी कम है

   
अप्रैल (अलार्म घड़ी) 

कोई आया ही नहीं 
कितना बुलाया हमने 
उम्र भर एक ज़माने को 
जगाया हमने 


मई (बाइस्कोप) 

वो सुरैया और नर्गिस का ज़माना 
सस्ते दिन थे, एक शो का चार आना 
अब न सहगल है, न सहगल सा कोई 
देखना क्या और अब किस को दिखाना



जून - (सर्च लाइट) 

दिल दहल जाता है 
अब भी शाम को 
आठ दस की जब कभी 
गाड़ी गुज़रती है 



जुलाई (टाइप राइटर) 

हर सनीचर, 
जो तुम्हें लिखता था दफ़्तर से 
याद आते हैं 
वो सारे ख़त मुझे



अगस्त  (रेडियो) 

नाम गुम हो जायेगा, 
चेहरा ये बदल जायेगा 
मेरी आवाज़ ही पहचान है, 
गर याद रहे


सितम्बर (ताला) 

सदियों से पहनी रस्मों को 
तोड़ तो सकते हो 
इन तालों को चाभी से 
तुम खोल नहीं सकते !


अक्टूबर (पानदान) 

मुँह में जो बच गया था, 
वो सामान भी गया 
ख़ानदान की निशानी, 
पानदान भी गया 




नवम्बर - (टेलीफ़ोन) 

हम को हटा के जब से 
नई नस्लें आई हैं 
आवाज़ भी बदल गई, 
चेहरे के साथ साथ



दिसम्बर - (माइक) 

मेरे मुँह न लगना 
मैं लोगों से कह दूँगा 
तुम बोलोगे तो 
मैं तुम से ऊँचा बोलूँगा 




इस कैलेंडर को डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें - गुलज़ार कैलेंडर २०१०  

बिना त्रिवेणी के तो गुलज़ार साहब की पोस्ट अधूरी है, तो लीजिए सुनिए त्रिवेणी खुद गुलज़ार साहब के ही आवाज़ में,


आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ 
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!   

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा 

 - ये त्रिवेणी इसी विडियो में गुलज़ार साहब ने कहा है, बाकी कौन सी त्रिवेणी है, उसके लिए आप खुद ही विडियो देखें, मैं नहीं लिखने वाला यहाँ.. :)



इस पोस्ट के पहले के पार्ट्स पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - गुलज़ार साहब के साथ कुछ लम्हे 

Comments

  1. mujhe kavita jyada samajh nahi ati but i loved each n every shayari idhar.

    ReplyDelete
  2. मुझे बेवजह शायर बना रखा है दुनिया ने..

    गुलज़ार साब की इसी अदा के तो कायल हैं हम :) ... और सही कहा आपने उनकी कोई भी नई नज़्म दिखे कही पर भी तो सबसे पहले तो उसे नोट करते हैं और फिर रट लेते हैं... ये गुल्ज़ारियत का धर्म निभाने में पीछे नहीं रहते हम... अब देखिये ये नज़्म भी नोट कर ली... इसे शेयर करने का शुक्रिया :)

    ReplyDelete
  3. बेहद उम्दा प्रस्तुति और आपका आभार्।

    ReplyDelete
  4. लाबाब तस्वीरों के साथ बढ़िया प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  5. बहुत खूब...कविता में गुलजार साहब का सूफियाना अंदाज साफ झलक रहा है।

    ReplyDelete
  6. बहुत सुन्दर, गुलज़ार साहब का अन्दाज़ ही अलग है।

    ReplyDelete
  7. इस पोस्ट के लिए बस
    वाह!! वाह!! वाह!!
    मौन कर जाती हैं ये नज्में....एक नज़्म ही इतनी खुदगर्ज़ हो जाती है कि बार-बार खुद को ही पढवाती रहती है....
    सदियों से पहनी रस्मों को तोड़ तो सकते हो इन तालों को चाभी से तुम खोल नहीं सकते !
    ये ख़ास पसंद आई

    ReplyDelete
  8. गुलज़ार साब का मौसम तो देखा सुना था... जाड़ों की नर्म धूप… या गर्मियों की रात चलने वाली पुरवाई... मगर ये कैलेंडर देखकर मज़ा आ गया. अपने ओ गुरू जी हैं... जो लिख दें गीता हो जाता है!! बहुत बहुत बहुत बहुत अच्छा लगा!!

    ReplyDelete
  9. बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति.....गुलज़ार साहब के तो शब्द और आवाज़
    दोनों की दुनिया कायल है.....

    ReplyDelete
  10. बहुत सुन्दर गुलदस्ता सजाया है अभिषेक !

    ReplyDelete
  11. बहुत अच्छा लेख है...शुक्रिया

    ReplyDelete
  12. bahoot hi achchhi post. guljar sahab ke to hum bhi kayal hai

    ReplyDelete
  13. बहुत खूब .. गुलज़ार साहम अगर बात भी करते हैं तो त्रिवेणी बन जाती है .... गज़ब का संकलन किया है आपने ........ बहुत खूबसूरत एहसास ......
    आपको और आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं ....

    ReplyDelete

Post a Comment

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया