कुछ बातें अहमदाबाद ट्रिप के…

अभी परसों ही अहमदाबाद के एक हफ्ते के ट्रिप से वापस आया हूँ…ट्रिप का उद्देश्य बस मुड रेफ्रेशिंग ही था….कुछ दिनों से दफ्तर की मुसीबतें भी बढ़ी हुई हैं…सोच भी कहीं एक जगह कायम नहीं रह पा रही…सोचा की चार पांच दिनों का ब्रेक थोड़ा जरुरी सा हो गया है. दिवाली और छठ पूजा में छुट्टी न मिलना भी पिछले हफ्ते ही फाइनल हो गया था. एक जुरूरी काम भी था अहमदाबाद में..इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए तय किया की अहमदाबाद घूम के आ ही जाऊं. काम का काम और घूमना भी हो जाएगा..काम में सफलता मिले न मिले, कम से कम दिमाग तो रिफ्रेश हो जाएगा और मामा-मामी, जो ना जाने कब से बुला रहे हैं अहमदाबाद, उन्हें भी अच्छा लगेगा. कुछ दिनों के लिए ही सही, घर का सुख तो मिलेगा,घर का  खाना, आराम, और घर की बातें.

ट्रेन से सफर कर रहा था और टिकट भी था “स्लीपर क्लास” का..मौसम इतना सुहाना और मस्त की मौसम से ही प्यार हो गया..ट्रेन सफर में हर बार मेरे साथ दिक्कत ये हो जाती की अगल बगल के लोग अजीब मिलते हैं…फिर चाहे वो स्लीपर क्लास हो या फिर ए.सी…इस बार वैसा कुछ नहीं था, काफी शरीफ और अच्छे लोग बैठे थे आसपास…ज्यादातर राजस्थान के लोगों से ट्रेन भरी हुई थी..एक सहयात्री से थोड़ी बात भी हुई…वो भाई साहब जोधपुर के रहने वाले थे, काफी कुछ उन्होंने बताया अपने शहर के बारे में और राजस्थान के बारे में भी. कैफी आज़मी की दो किताब है मेरे पास…बहुत बार पढ़ चूका हूँ लेकिन फिर भी उनकी नज़्म हर बार ताजगी भर देती है दिल-ओ दिमाग में…हलकी बारिश, एक हाथ में चाय(हालांकि रेलवे की चाय थी :P), और दूसरे हाथ में कैफी आज़मी की किताब…इससे बेहतर और क्या हो सकता था..:) किताब खोलते ही एक नज़्म पे नज़र गयी, बड़ा खूबसूरत सा और प्यारा सा एक नोट उस नज्म के पास मैंने लिख रखा था कभी..एक बहुत बड़ी मुस्कराहट आ गयी चेहरे पे वो नोट देख के…नोट थोड़ा पर्सनल है, तो आप फ़िलहाल वो नज्म ही सुन लें, 🙂

तू खुरशीद है, बादलों में न छुप
तू महताब है , जगमगाना न छोड़

तू शोखी है शोखी, रियायत न कर,
तू बिजली है बिजली, जलाना न छोड़ 

अभी इश्क ने हार मानी नहीं,
अभी इश्क को आजमाना न छोड़..

अहमदाबाद पहुंचा तो वहां भी थोड़ी ब्लॉग्गिंग(दूसरे तरह की) शुरू कर दी..जैसे ही नेट कनेक्ट किया तो पाया की प्रशांत का एक  नया पोस्ट आया हुआ है..अब उसके पोस्ट को न पढूं तो क्या पता, कहीं वो गुस्से में मेरा सर न फोड़ दे..इसलिए बस उसी के पोस्ट पढ़ा..:) मेरी मामी को ब्लोगिंग के बारे में कुछ पता नहीं था..उन्हें मैंने बताया की ब्लोगिंग क्या है और कैसे लोग इसमें अपनी बातें लिखते हैं..प्रशांत की उस पोस्ट को मैंने उन्हें पढ़ के भी सुनाया..उनकी प्रतिक्रिया थी “ये सब लोग इतना अच्छा कैसे लिख लेता है” :).. लगे हाथों मैंने भी अपनी एक दो बेकार सी कविता उन्हें सुना दीं.. :

मेरा सबसे छोटा भाई, आर्यन..मेरे मामा का बेटा.. शरारती तो इतना है की पूछिए मत..एक जगह बैठने का तो नाम ही नहीं लेता…दिन भर उछाल कूद करते रहता है…खैर, बच्चे तो होते ही हैं शरारतों की पोटली… 🙂 
गाड़ी से उसको भी खास लगाव है..बिलकुल मेरी तरह..खिलौने में भी गाड़ियों का ही खजाना है उसके पास…चाहे वो हर डिजाईन, अलग अलग कंपनी की स्पोर्ट्स कार मॉडल हो या फिर किसी भी प्रकार की गाड़ी…बाइक, बस, टैक्सी, ऑटो…हर कुछ का कलेक्सन है उसके पास…और सबसे बड़ी बात ये देखिये, सभी गाड़ी के लोगो उसे इस कदर याद हैं की सड़क पे गाड़ी के लोगो देख गाड़ी पहचान लेता है.. जिस दिन मैं पहुंचा अहमदाबाद, उस दिन शाम में हम घूमने निकले…मैं और आर्यन पीछे वाली सीट पे बैठे थे..वो अचानक से चिल्ला उठा “बी.एम्.डब्लू”, मैंने सोचा की युहीं बोल दिया होगा उसने..पलट के देखा मैंने तो सही में “बी.एम्.डब्लू” बगल से गुजर रही थी…:)
स्पीड की दुनिया का दीवाना अभी से ही है..चाहे खाना खाने में, दूध पीने में जितना भी नखरा करे, कोई कर स्टंट वाली फिल्म दिखा दीजिए उसको, सब भूल जाता है…रविवार को एक फिल्म आ रही थी “टार्जन-द वंडर कार”..ये लड़का पूरी फिल्म बिना पलक झपकाए देखता रहा 🙂 

अहमदाबाद पहुँच के घूमना न हो, ऐसा हो सकता है क्या…घूमना भी हुआ अहमदाबाद, और अच्छे से घूमने हुआ….चाहे वो अहमदाबाद से १७० किलोमीटर दूर स्थित शक्तिपीठ “अम्बा जी” हो या फिर अक्षरधाम.”अम्बा जी” देश के ५१ शक्तिपीठों में से एक है..मामी से सुना था की वहां जो मुराद मांग लो, जरुर पूरी होती है. लोग अटूट आस्था रखते हैं “अम्बा जी” शक्तिपीठ पे..मैंने भी लगे हाथ एक दो मुरादें मांग ही ली..:), लेकिन अफ़सोस ये रहा की कहीं भी फोटोग्राफी नहीं कर पाया..सारे बड़े बड़े मंदिरों और ऐतिहासिक जगहों पे फोटोग्राफी की मनाही थी. इतने सुन्दर और खूबसूरत जगहों पे फोटोग्राफी नहीं कर पाया था तो मन भी दुखी हो गया. जब अक्षरधाम के पास अपनी गाड़ी रुकी, तो मन में यही बात चल रही थी की क्या फायदा अंदर जाने का..जब फोटोज ही नहीं खींचना है तो ;)…फिर सोचा की जब इतनी दूर आया ही हूँ तो देख भी लूँ की अंदर से कैसे दीखता है, तस्वीरों में तो बहुत देखा है अक्षरधाम को…एक जिज्ञासा ये भी थी की यही वो जगह है जहाँ २००२ में आतंकवादियों ने हमला किया था. अक्षरधाम के खूबसूरत गार्डन को देख हर पल लग रहा था की यहाँ की तस्वीरें कितनी अच्छी आती.दिन भर घूम के शाम को हम पहुंचे थे अक्षरधाम, लेकिन वहां की रौनक और खूबसूरती देख ही थकान गायब हो गयी हमारी..:)

अक्षरधाम और अम्बा जी की तस्वीर देखें (गूगल से ली गयी हैं तस्वीरें)

अम्बा जी – मुख्य मंदिर का दृश्य..

अम्बा जी 

अक्षरधाम

अक्षरधाम मंदिर 



…..


(रैंडमनेस इसको कहते हैं, रैंडम पोस्ट..सोचा कुछ, लिखा कुछ…सोचा था एक पोस्ट लिखूंगा “फिर से बच्चा बन जाने का मन”. लेकिन देखिये ये पोस्ट लिख गया…शुरुआत में बिलकुल भी नहीं सोचा था की मैं अहमदाबाद का जिक्र करूँगा, खैर, अब वो पोस्ट अगली  बार 🙂 )

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  1. क्या बात है अभि जी, हम अभी सोच ही रहे थे कि बहुत दिनों आपका एक भी पोस्ट नहीं आया. और देखिये कैसे ये अहमदाबाद ट्रिप निकल आया. आपकी खुशी तो सही है, मगर मुझे लग रहा है कि मैं अब तक घर क्यूँ नहीं गई? 🙁

  2. बहुत अच्छा है…. कुछ समय अपनों के बीच बिता कर आ रहे हैं……भले नेट से लिए हों मंदिर के फोटो देखकर बहुत अच्छा लगा….. ईश्वर से दुआ है की आपकी मांगी गयी दुआए पूरी करे ….

  3. बहुत अच्छा है…. कुछ समय अपनों के बीच बिता कर आ रहे हैं……भले नेट से लिए हों मंदिर के फोटो देखकर बहुत अच्छा लगा….. ईश्वर से दुआ है की आपकी मांगी गयी दुआए पूरी करे ….

  4. अम्बा जी के दर्शन और अक्षरधाम से साथ ही परिवार के साथ ५-६ दिन रहकर अब बिल्कुल नयी स्फ़ूर्ती का अनुभव हो रहा होगा, हालांकि आप मायूस भी होंगे दीवाली और छठ पर घर न जा पाने के कारण, मैं इस दर्द को बहुत अच्छे से समझ सकता हूँ। कोई बात नहीं, कभी न कभी तो अकेले भी मनाना ही पड़ता है। अपने कुछ दोस्तों के साथ उत्साह से दीवाली और छठ मनायें और एक अच्छी सी रिपोर्ट लगायें।

    हमने हमारे चाचाजी को भी ब्लॉगिंग के बारे में बताया था तो बोले "तुम लोगों के पास कितना फ़ालतू समय रहता है, यह लिखने के लिये, हम बोले कि हमें तो केवल १५-२० मिनिट लगते हैं लिखने के लिये" तो वे आश्चर्य करने लगे, फ़िर हमने उन्हें बताया कि यह भी एक समाज है, फ़र्क केवल इतना है कि यह मानसिक धरातल पर है।

  5. @विवेक भईया…

    मेरे एक सीनिअर ने भी मुझसे बिलकुल वही सवाल किया था..:)

    वैसे आपको बस पन्द्रह मिनट लगते हैं पोस्ट लिखने में…मुझे तो ज्यादे लग जाते हैं 🙁

    वैसे मैंने मामी को बोला है की आप भी ब्लॉग्गिंग शुरू कर दें…उन्हें भी लिखने का बहुत शौक है और पढ़ने का भी…वो बता रही थीं…

    इस बार तो ज्यादा टाइम नहीं मिला, अगली बार जब जाऊँगा तो उन्हें भी सिखा दूँगा…और एक ब्लॉग बना दूँगा उनका…:)

  6. मामी को हमरा ब्लॉग नहीं पढवाया… ग़लत बात! चचा नाराज़!
    आर्यन अऊर गाड़ी.. चचा को बच्चा सब से बहुत प्यार है इसलिए फुसला लिए है न! चचा ख़ुश!
    अक्षरधाम का फोटोः दिल्ली का भी एकदम अईसने है…
    अहमदाबाद का सैर पसंद आया… हमरा त छठ का तैयारी हो गया है!! दीवाली के दोसरा दिन रवाना..हफ्ता भर होम स्वीट होम!!

  7. अब हम मुड़ी फोडें चाहे ना फोडें.. चच्चा तो फोदिये देंगे.. 😀

  8. सबसे ऊपर वाला फोटू कहां का है, किस ट्रेन से गये थे, कहां से गये थे; ये भी बताना जरूरी था।
    बढिया पोस्ट।

  9. तुम बहुत मजे किये न.थकन कम हुई न बैंगलोर की?

    अपनी मामी को भी लेते ही आओ, जैसे तुमने मुझसे ब्लॉग शुरू करवाया. उनसे भी करवा ही लो.

    आर्यन बहुत स्वीट है.

  10. धन्यवाद अभी जी आपने मेरे ब्लाग पर आकर मेरा उत्साहवर्धन किया ॰॰॰ मैं बस अभी सीख ही रहा हुं ब्लाग पर कैसे सक्रिय रहा जाये ॰॰॰ आशा है आपका भी मार्गदर्शन मिलता ही रहेगा।
    आपने बहुत ही शानदार चित्रण किया है अहमदाबाद का ॰॰॰॰ मन अहमदाबाद जाने की दिशा में विचार करने लगा था ॰॰॰॰ शुभकामनायें

  11. चलो अच्छा है घूम आये और तस्वीरें भी हमें दिखा दीं बढ़िया वाली एकदम अब तो काम में मन लगेगा न ?:)

  12. जहाँ Photozz लेने की मनाही नहीं थी वहां की तो लेते photo.. 😀 😛 😀
    मैं पूरा पढ़ नहीं सकती. photo देख लिया…..enough 🙂 🙂

  13. .सनामरणत्मक पोस्ट मुझे लिखना भी पसंद है…और पढना तो उस से भी ज्यादा..

    चाय, कैफ़ी आज़मी की नज़्म, बारिश और ट्रेन…वाह…आँखों के आगे नज़ारा घूम गया.

    आर्यन से मिलना अच्छा लगा…बड़ा क्यूट है…:)

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