छठ पूजा – पटना में नहीं रहने की मजबूरी, कुछ यादें..

सुबह सो कर उठा तो सर थोड़ा भारी सा लग रहा था..शायद कल रात युहीं कुछ बातें सोचते सोचते बड़ी देर तक जागा रहा था..कभी इस करवट तो कभी उस करवट..सोने की नाकाम कोशिश करता रहा..प्लेलिस्ट पे जो पाकीजा और बैजू बावरा के गाने चल रहे थे, उन्हें भी बदलने की जहमत नहीं उठाई..रिपीट मोड में गाने चलते रहे…कब नींद आई ये तो याद नहीं..लेकिन रात के एक बजे तक जागता रहा. सुबह छोटे मामा का कॉल आया..कल मैं कुछ काम से अहमदाबाद के लिए निकल रहा हूँ, मामा भी वहीँ रहते हैं इसलिए उन्होंने ये जानने के लिए कॉल किया था की मैं कब और कैसे पहुँच रहा हूँ..बातों बातों में ही उन्होंने वो सवाल कर दिया जिससे आजकल मैं लगातार बचने की कोशिशें करता हूँ….“छठ पूजा में पटना चल रहे हो न…यहीं अहमदाबाद से हम लोगों के साथ चल देना..”    मैंने दबे मन से कहा की नहीं, मैं दीवाली और छठ में पटना नहीं जाऊँगा, छुट्टी की दिक्कत हो रही है ऑफिस में.. (मैं पिछले तीन चार सालों से लगातार दीवाली और छठ में पटना जाते रहा हूँ, और छोटे मामा से भी हर साल दीवाली में ही मुलाकात होती है, छोटे मामा शायद मेरे इस जवाब के लिए तैयार नहीं थे और वो चौंक के पूछे की पटना नहीं चल रहे हो दीवाली में?….मैंने फिर दबे मन से कहा की ऑफिस में छुट्टी नहीं मिलेगी..और फिर जनवरी में कम से कम १ महीने की छुट्टी लेनी भी है, इसलिए इस बार पटना ना जा पाने की मजबूरी है. मामा ने भी हामी भरी और मेरे अहमदाबाद आने के बारे में पूछने लगे..- कब पहुँच रहे हो..कैसे पहुँच रहे हो?
उनसे बात करने के बहुत देर बाद तक सोचता रहा की आजकल मैं इस सवाल से बचने की कोशिश क्यों कर रहा हूँ..जब भी कोई मित्र ये पूछता है की छठ पूजा में घर जा रहा हूँ या नहीं तो ये सवाल को टालने की कोशिश क्यों करता हूँ….दीवाली और छठ में घर नहीं जाना कोई नयी बात तो नहीं है. जब कॉलेज में था तो एक साल भी दीवाली के मौके पे घर नहीं गया..फिर अब जब जॉब कर रहा हूँ, कॉलेज के दिनों से अब तक ज्यादा मैच्युर भी हो गया हूँ..तो फिर इस सवाल से बचने का कोई कारण नहीं बनता..लेकिन फिर भी पिछले कुछ दिनों से यही बात रह रह के दिमाग में चल रही है….दो तीन दिन पहले तक इसी कोशिश में लगा हुआ था की कैसे घर जाने की छुट्टी मिल जाये..कभी दिमाग में आता की अपने टीम मैनेजेर से बोल के क्लाइंट की एक मीटिंग ही रख दूँ दिल्ली या फिर कोल्कता में…लेकिन एक भी डेट फिट नहीं बैठ रही..आने वाले दिनों में कोई मीटिंग भी नहीं, और नाही कंपनी का कोई काम है. हर मुमकिन आईडिया दिमाग में दौड़ लगा चुके हैं, लेकिन कहीं से भी कुछ ऐसा उपाय नहीं दिख रहा की छुट्टी मिल जाये.
पिछले दो दिनों से पटना जाने की बात को लगभग दिमाग से निकाल ही चूका था, लेकिन कल रात से आज सुबह तक और फिर अभी शाम तक ना जाने कितनी बार ये बातें दिमाग में दौड़ लगा चुकी हैं..सुबह मामा से बात करने के बाद प्रशांत के इस पोस्ट को पढ़ा..पटना का जिक्र तो वैसे ही मुझे पुरानी यादों के गलियारों में धकेल देता है,..इस बार छठ पूजा के जिक्र पे और पटना की कई सारी यादों के जिक्र पे दिल और थोड़ा बेचैन हो गया.. ऑफिस में आजकल वैसे ही वर्क प्रेसर अपने चरम पे पहुंचा हुआ है, लेकिन फिर भी दिन भर आज काम ना के बराबर ही किया…दोपहर में लंच टाइम के समय एक दोस्त “शेखर” का कॉल आ गया..अगले महीने की पहली तारीख को वो पटना जा रहा है..इसी बात पे बात करने के लिए उसने कॉल किया था.. मैंने दबे मन से फिर कहा दोस्त, मैं पटना नहीं जा रहा इस बार. ये सुनने के बाद उसके आवाज़ की इक्साइट्मन्ट में कुछ कमी तो आई, लेकिन फिर उसने पटना के प्लान्स के बारे में बताया..एक अरसे के बाद कई दोस्त इस बार पटना में  जमा हो रहे हैं.मैं थोड़ा चिढ़ सा भी रहा था, पता नहीं क्यों? किसपे…थोड़ी देर बात करने के बाद फोन काट दिया…
प्रसाद से भरा सूप,..पिछले साल की तस्वीर 

दिन भर ऑफिस में रह रह कर छठ पूजा के सारे दृश्य आँखों के सामने आ रहे थे…हर साल छठ पूजा में पटना की रौनक एक नयी नवेली दुल्हन की तरह होती है…दीवाली के बाद चित्रगुप्त पूजा और फिर छठ पूजा की तैयारी शुरू जाती…घर के काम इतने की गिनती कम पड़ जाये…छठ पूजा में काम आने वाले हर सामन पूरी तरह पवित्र हों इस बात का खास ध्यान रखा जाता है..एक दफे की बात है,  पूजा का कुछ सामान लेने एक दूकान गया था..वहां एक बुजुर्ग खड़े थे, और वो अपने एक मित्र से छठ पूजा के महत्ता के बारे में बातें कर रहे थे..उनका कहना था की छठ पूजा से पवित्र पर्व और कोई नहीं..हर प्रकार से ये पर्व बेहद निष्ठा और नियम कानून से मनाये जाते हैं….घर की औरत गेहूं धो के छत पे सुखाती हैं…और जब तक गेहूं ना सुख जाये, वहां से कोई हिलता तक नहीं..कारण बस ये की एक चिड़िया तक गेंहूँ जूठा न कर सके..छोटी छोटी बातों का इतना ख्याल रखा जाता है छठ पूजा में, एक भी गलती या नियम उल्लंघन की कोई जगह नहीं होती..एक बार जब उत्सुकता हुई ये जानने की, की छठ पूजा आखिर है क्या..ये हमारा सबसे बड़ा पर्व माना जाता है, लेकिन इसके पीछे भी कुछ न कुछ कहानी जरुर होगी…ये सारी बातें जानने के लिए एक मित्र(जिसे इन सब बातों का बहुत अच्छा ज्ञान है) के पास एक दफे पहुँच गया…पता चला की इस छठ पूजा का रामायण, महाभारत और पुराणों तक में जिक्र है.. सूर्य की पूजा और अर्घ्य दान प्राचीन काल से लोग करते आ रहे हैं, चाहे वो भगवान श्री राम हो या सूर्य पुत्र कर्ण..कहीं पढ़ा था की जब पांडव अपना सब कुछ जुए में हार गए थे तो द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था, और इसी व्रत के फलअनुसान पांडव को अपना राजपाट वापस मिला था…..माना जाता है की छठी मईया(छठ देवी) सूर्य देव की बहन हैं और उन्ही को प्रसन्न करने के लिए लोग ये पर्व करते हैं…सूर्य की पूजा किसी भी नदी या तालाब के पास किया जाता है…सूर्य भगवान को अर्घ्य दिया जाता है इस पर्व में..एक तो डूबते सूर्य को और दूसरे उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.छठ पूजा के आखरी दिन, जब सुबह का अर्घ्य दिया जाता है, तब आखिर में माँ हमें प्रसाद देती है, वो अलग प्रसाद होता है जिसपे बस बेटे या बेटियों का ही हक रहता है, उस प्रसाद का एक नाम होता है, जिसका सही उच्चारण मुझे याद नहीं….लेकिन इस बात से मैंने ये जरूर समझा की कहीं न कहीं ये पर्व संतानों से भी जुड़ा हुआ है..इस बात का प्रमाण मुझे तब मिला जब ये जाना की बहुत से लोग छठ पूजा बाल बच्चों के लिए करते हैं. ये पर्व ऐसा है की घर का कोई भी सदस्य कर सकता है…चार दिन तक ये छठ पर्व चलता है और इन चार दिन जो भी व्रत रख रहा है, उसे पूजा-स्थल के पास ही सोना पड़ता है…प्रसाद भी वहीँ बनता है…सबसे अच्छी बात ये की प्रसाद बनाने के लिए लकड़ी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है..खीर हो चाहे पूरी, सब लकड़ी के चूल्हे पे ही पकता है..इसलिए भी शायद स्वाद खाने का अलग सा लगता है. ये व्रत रखना भी आसान नहीं होता, दिन भर व्रत रख के शाम को पूजा आराधना कर सात्विक खाना खाया जाता है….पूजा के आखरी दिन(शाम के अर्घ्य के दिन) निर्जल व्रत रखा जाता है..पुरे चौबीस घंटे व्रतधारी पानी तक नहीं पीते हैं..

मुझे दिवाली पर्व का कोई शौक नहीं, लेकिन दिवाली के बाद इस छठ पर्व में इतनी उत्सुकता रहती है की क्या कहूँ…शायद इस लिए भी छठ पर्व में घर जाने की बेइंतहा इक्षा रहती है..छठ पूजा का पहला दिन कहलाता है नहाय खाय..इसे इस नाम से मैंने कभी नहीं जाना…हमेशा से इस दिन को मैंने “कद्दू-भात” के नाम से ही जाना..उसके पीछे भी कारण ये है की इस दिन भोजन में सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू-चना दाल की सब्जी ग्रहण किया जाता है..इस दिन खाने का स्वाद अलग तरह का होता है..ऐसा शुद्ध भोजन कर के मन को वैसे ही एक अलग शान्ति मिलती है..जो स्वाद इस खाने का होता है, वैसा शायद ही कहीं और मिले.. छठ पूजा के अगले दिन को वैसे तो लोग खरना के नाम से जानते हैं, लेकिन हम इस दिन को भी अलग नाम से बुलाते हैं – “दलपुरी खीर”..इस दिन शाम में पूजा के बाद प्रसाद में शुद्ध घी से बनी रोटी(जो मुझे अक्सर सूखे पुए जैसी लगती है) और खीर ग्रहण करते हैं..रात के खाने में भी सब यही खाते हैं. मेरी और खीर की दुश्मनी तो बहुत पुरानी है..मैं कभी पसंद नहीं करता खीर खाना..लेकिन खरना के दिन नो-बहाना…प्रसाद है तो खाना ही है.. 🙂 जब पहले छठ पूजा के अवसर पे गाँव जाना होता था, तो हम अधिकाशं खरना के दिन ही पहुँचते थे.(छठ पे गाँव जाना कैसा होता था और क्या क्या मीठी यादें हैं, इसे फिर कभी बताऊंगा..जरुर बताऊंगा)

जिस दिन शाम का अर्घ्य देने की तैयारीं होती है, उस दिन सुबह सबेरे ही हमें काम पर लग जाना होता है..फल लाना, फलों को धोना और सूप सजाना..पिछले तीन चार सालों से फल लाने मैं ही जाता रहा हूँ, तो इस बार ये बात भी दिमाग में आ रही है, की अधिकतर काम या तो पापा को करना पड़ेगा या फिर मामा को..फल लाने से ये मत अंदाजा लगाइए की बस एक थैला उठाया और चल दिया…फलों की सूचि कैसी होती है ये इसी बात से अंदाजा लगा लीजिए की गाड़ी की डिक्की, पिछली सीट..सब फलों से लदे होते हैं..शाम का अर्घ्य लोग पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को देते हैं…तो इस लिए सभी शाम को गंगा घाट या फिर किसी तालाब के लिए निकलते हैं..पटना के जू(Patna Zoo) में भी लोगों की जबरदस्त भीड़ रहती है, हम छठ पूजा में पटना जू ही जाते हैं…सूपों से भरा डाला(बांस से बनी टोकरी जिसमे सारे सूप रखे जाते हैं) सर पे उठा के चलना होता है..इस बात का खास ख्याल रखा जाता है की एक बार जब आप डाला सर पे उठा लेते हैं तो फिर बीच में कहीं भी आप उस डाले को रास्ते पे नहीं रख सकते.. मैं भी डाला उठता हूँ हर साल, ये अलग बात है की थोड़े दूर जाने में ही हमारी हालत खराब हो जाती है, हाथ-पांव जवाब दे देते हैं, लेकिन डाला उठाने में भी अलग ही संतोष मिलता है.. पापा को ऐसा कहते सुनता हूँ की वो जब हमारे उम्र के थे तो डाला सर पे उठा के कई किलोमीटर तक पैदल चले जाते थे…इस बात से थोड़ी शर्म भी आती है की हम थोड़ी दूर जाने में ही हांफ जाते हैं, और वो लोग कितनी दूर तक चले जाते थे.  पटना जू लोगों को एक जगह इकट्ठा देख और सभी छठ व्रतियों को देख बड़ा अच्छा लगता है…किसी भी मनोरम दृश्य जैसा….पूरा माहौल भक्तिरस में डूबा हुआ सा..गरीब-अमीर, बच्चे बूढ़े, स्त्री पुरुष, सब एक जगह जमा हो के सूर्य भगवान की आराधना करते हैं….जब भी छठ पूजा का जिक्र होता है कहीं, सर्वप्रथम वही सुन्दर नज़ारा याद आता है..अगले दिन सुबह के अर्घ्य का हम सब बेसब्री से इंतज़ार करते हैं..वो भी सिर्फ प्रसाद के लालच में.

छठ पूजा की ऐसी ऐसी यादें हैं जिसके लिए लिखने बैठूं तो तीन चार पोस्ट आराम से लिख दूँ..क्या स्कूल, क्या कॉलेज और क्या कोचिंग…हर कुछ पे छठ पूजा का रंग सर चढ़ के बोलता था…पटना के सड़कों पे तरह तरह की दुकानों और पूजा से जुड़ी सामग्रियों की दुकानों की होड़ लगी रहती है..छठ पूजा के कुछ दिन पहले से ही दिल पूरा त्यौहारमय हो जाता है…पटना से भी ज्यादा खूबसूरत यादें तब की हैं जब हम छठ पूजा के अवसर पे गाँव जाते (सिंघौल गाँव, जिला-बेगुसराय)..छठ पे मौके पे एक स्पेशल पोस्ट जरूर लिखूंगा, सभी यादों को समेटने की कोशिश करूँगा उस दिन…इस पोस्ट में भी जो खामियां रह गयी हैं, उसे भी उस दिन समेटने की कोशिश करूँगा….ये पोस्ट जब मैंने लिखना शुरू किया था तो ये बिलकुल नहीं सोचा था की छठ पूजा पे इतनी ज्यादा बातें लिख जाऊँगा..


मेरे जैसे ऐसे कई लोग हैं जो छठ पूजा पे घर-परिवार को बेइन्तहा याद करते हैं…और याद भी क्यों न करें, हम लोगों का सबसे बड़ा-पवित्र और श्रद्धा वाला पर्व जो है..काम काज की ऐसी मजबूरी हो जाती है की दिल से चाहते हुए भी लोग घर-परिवार के साथ पर्व का आनंद नहीं ले पाते..कभी कभी इन सब मजबूरियों के बंधन को तोड़ बाहर आ निकलने का दिल करता है…

पोस्ट के बाद अब एक छठी मैया का गीत सुन लें…ये गीत जब भी मैं सुनता हूँ तो दिल प्रसन्न हो जाता है..

और ये दो तस्वीर पिछले साल की छठ पूजा की,

तस्वीर में मेरी नानी है…सब अर्घ्य दे रहे हैं..

और दूसरी तस्वीर में मैं, डाला सर पे उठाये हुए…..


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  1. क्या कुछ याद दिला गए अभिषेक !
    सोचो ज़रा देश से बहार रह रहे हम लोगों पे क्या बीतती होगी 🙁
    तुम्हारे इस पोस्ट को पढ़ने के बाद पटना में बिताए वो दिन आँखों के सामने से गुजर रहे हैं.
    २००४ में छठ पूजा के दौरान पटना में ही थी.

    दिल से शुक्रिया तुम्हे !

    बहोत कुछ याद आया.

  2. mere ghar mei to hoti nahi chhathh puja lekin aaspas ke logon ko krte dekhaa hay maine….
    bahut acchhi post hai..

    waise agar patna aayen to bataiyega.. hum bhi chhathh mein patna mei hi rahenge..baaki baatein to shekhar ne bata hi din hongi..

  3. @प्रिया भाभी..
    हाँ जी, बात हुई शेखर से, लेकिन मैं पटना नहीं आ रहा…कल अहमदाबाद के लिए जा रहा हूँ और अहमदाबाद से वापस बैंगलोर अगले २६ या २७ तक आऊंगा…

    मुलाकात होगी आप लोगों से…फ़िक्र ना करें…:)

  4. itni vistrit baaten chhat pooja ke baare me…. bahut sunder abhi…. sach me ek se badhkar ek tyohar manaye jate hain hamare desh ke har hisse me…. geet bahut sunder hai… shukriya … lokgeeton ki dhun hi badi pyari hoti hai… chahe kisi bhi bhasha me hon… maine to do baar suna… bahut achha laga…

  5. मजबूरी का नाम ही जिंदगी है, वह वक्त जो हम परिवार के साथ बिताना चाहते हैं पर चाहकर भी नहीं बिता पाते हैं, और न बिता पाने के कारण मन में हमेशा टीस रह जाती है और बहुत दर्द पहुँचाती है, मानसिक संताप पहुँचाती है, पर नौकरी और व्यापार जो न कराये वह कम है, सबकी मजबूरी पैसा है, इसी मजबूरी के कारण अपना घर छोड़कर हम इधर उधर भटकते रहते हैं, पर तब भी हमारा मन हमारे घर के आसपास भटकता रहता है।

    त्यौहार अकेले मनायें, अच्छे से मनायें, दोस्तों के साथ मिलकर या पारिवारिक या ब्लॉगर मित्रों के साथ भी मिलकर मना सकते हैं। मन छोटा न करें, घर से बाहर रहने पर यह सब तो लगा ही रहता है।

    छठ के बारे में बहुत अच्छा लिखा है पहली बार हमने इतने विस्तृत रुप में छठ पूजा को पढ़ा है।

  6. बच्चा अभिषेक ,
    ई काहे के लिए सब पटनैय्या को एके साथ ..दुर्गा पूजा के बाद नॉस्टेल्जिक भायरस का हमला से ग्रस्त काहे होना पडता है ई शोध का विषय है ..अच्छा है अईसे ही तुमको याद आते रहे और तुम धर धर के लिखते रहो …चलो जनवरी में सही ।

  7. abhi – ladaki ya lakadi ?

    jaraa sa dekho ki khana kis par hi bananaa chahiye !

    baaki mujhe to es baare mein kuch pataa hi nahee tha aur aaj aapane saara gyan de diya !

    yar jo man mein aaya hai jimmedaari ke saath kar daalo ….agar jaana hai to jana hai ..delgate yours tasks !!

  8. bahut hi sundar post…sari yaaden tazi kar di…lekin ek baat batau mai in yaado ko ek baar fir se jine ja rhi hun, ja rhi hun mai apne ghar is baar chhat per…aapke liye dukh jarur ho rha hai lekin aaj sabko khub chidhane ka maan kar rha apni beti ki tarah…jaise wo karti hai " la la la la mai to ja rhi hun, khub masti karugi, aap yahi rahna ha ha ha :D"
    please mind mat kariyega, bus kabhi kabhi bachcha ban kisi pal ko jine ka maza hi kuch aur ho jata hai…
    aapke liye prarthna karti hun jald se jald aap bhi patna jaye…

  9. @राम भाई,
    ठीक कर लिया गया है वो..शुक्रिया बताने के लिए 🙂

    @शुभम जी,
    बिलकुल माइंड नहीं किया..मुझे तो ऐसा लगा की अपनी इशिता ने मुझे चिढ़ाया है 🙂
    देखिये इस बार आता तो इशिता से भी मिल लेता…लेकिन चलिए कोई बात नहीं..अगली बार कभी..:)

  10. छठ पूजा की भी याद दिला दी आपने तो. और क्या-क्या याद दिलाएंगे. पोस्ट पढ़ के रील पीछे की ओर घूमने लगता है. एक कमी फिर से महसूस होने लगी है, बीतें दिनों की. हालांकि मेरे घर में छठ पूजा होती तो नहीं है, मगर जमशेदपुर में रहकर इससे कौन अनजाना रह सकता है.पडोसी सब ही बुला-बुला के ले जाते थे.बचपन में हमें छठ पूजा का इंतज़ार इसीलिए भी रहता था कि नदी में उतरने का मौका मिलेगा और ठेकुआ खाने को मिलेगा. 😉

  11. बहुत कुछ याद दिला दिया, अभी
    मेरी दादी छठ करती थीं और हम सब गाँव जाया करते थे. कैसे शाम होते ही पूरा गाँव सूना हो जाता था क्यूंकि हर घर में छठ पूजा होती थी और सबलोग शाम के अर्ध्य के लिए नहर पर चले जाते थे. और उस दिन सबलोग नए कपड़े पहनते थे. चाहे कितने ही गरीब हों.

    हम लड़कियों( महिलाओं 🙂 ) के पास कुछ और यादें हैं…दूसरे दिन सुबह ४ बजे उठ कर व्रत रखने वालों के लिए स्वादिष्ट खाना बनाना और दोपहर में हर घर में प्रसाद देने जाना.

    मम्मी तो पटना में ही करती हैं..पर सालों से नहीं जा पायी. छठ-पूजा के सारे दृश्य आँखों के सामने घूम गए.
    गीत सुन कर तो आनंद आ गया.

  12. अरे बाबू काहे सेंटिया रहे हो? घरवालों को बंगलोर बुला लो और उसे ही पटना बना लो ,,अब देखो हम कब से यह्हीं दिवाली मना रहे हैं..जब लन्दन इंडिया बन सकता है तो बंगलोर पटना क्यों नहीं 🙂
    वैसे छट की जानकारी खूब दी है तुमने मजा आया पढकर.

  13. घर न जा पाने की मजबूरी, वो भी ऐसे समय में..निश्चित ही भावुक कर देती है.

    छठ के बारे में अच्छी जानकारी मिली तुम्हारी पोस्ट से.

  14. बहुत बढिया और विस्‍तृत आलेख लिखा आपने , पर कुछ और जोड देती हूं ..
    गेहूं धोने से पहले उसे पांच बार चुना जाता है ..
    प्रसाद सिर्फ आम की लकडी को जलाकर तैयार किया जाता है ..
    छठ के पहले गांव भर में सभी आटाचक्‍की को धोकर साफ किया जाता है ..
    तालाब नदी तक जानेवाले सभी रास्‍तों को साफ सुथरा किया जाता है ..
    पूजा के लिए उस मौसम में फलने फूलनेवाली एक एक वस्‍तु को सूप में रखा जाता है ..
    प्रसाद को बडे पैमाने पर वितरित किया जाता है ..
    समाज के सभी वर्ग के लोग साथ साथ होते हैं ..
    बहुत अच्‍छा लगा इसके बारे में पढकर ..
    बहुत ही सार्थक त्‍यौहार है ये …

  15. मैं खुद इस बार घर दिवाली में नहीं जा रहा ..घर वाले पुछ रहे हैं आ रहा है ना मैं बोलता हूँ नहीं …छुट्टी भी है लेकिन जाने का कोई मूड नहीं है पता नहीं क्यों….

  16. मुझे याद नही कि कितनी दफे मैं इस पोस्ट पर आया और बिना कुछ लिखे चला गया..

    खैर!! छठ मेरे घर में तो नहीं होता है मगर पटना या बिहार में रहने वाला कौन सा ऐसा इंसान होगा जिसे छठ से लगाव-जुड़ाव ना होगा? है कि नहीं?

  17. @रश्मि दीदी, संगीता जी,
    अच्छा हुआ आप लोगों ने बताया, वो सब मेरे से कहना रह गया था…

    @प्रशांत..
    तुम लिखो न लिखो…तुम पढ़ते हो, ये मैं जानता हूँ भाई….

  18. अभी छठ पूजा का चित्र खोजते खोजते यहाँ पर आ गई|
    तुम्हारा ब्लॉग देखा तो पढ़ने की भी इच्छा हो गई|
    सूप वाला चित्र ले जा रही हूँः)
    बहुत अच्छा लिखा है…
    सभी पर्वों की शुभकामनाएँ!!

  19. बस हल्का-फुल्का सुना भर था इसके बारे में…सामने से देखने का मौक़ा भी नहीं मिला कभी…पर अब तो इतनी जानकारी मिल गयी इस बार, कि बस एक बार इस त्यौहार की मस्ती में शामिल होने की इच्छा बहुत जोर मार रही…:)
    छठ पर्व की शुभकामनाएँ, क्योंकि इसी मौके पर पढ़ रहे इसे…लिखते रहो यूँ ही…|
    कभी-कभी नोस्ताल्जियाने का ऐसा भी अच्छा सा साइड इफ़ेक्ट होता है…:P

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