तबियत खराब रहे तो घर की याद ज्यादा आती है

वैसे तो घर की याद हमेशा आती है, लेकिन जब तबियत खराब रहे तो घर की बातें याद आने की फ्रीक्वेंसी बढ़ जाती है. जब कॉलेज में था तो अकरम और मैं इस बारे में बात करते रहते थे. वो कहता था की “यार अगर बिमारी को आना है तो उसे एक नोटिस दे देनी चाहिए की जब घर में रहूँ तभी आये, फ़ालतू में ऐसे बिना इन्विटेसन के आकार हमें तंग न करे”    ये बात भी कितनी सही है. हम जैसे लोग जो हमेशा घर से बाहर रहते हैं, बीमार होने पे घर को याद तो करते ही हैं..घर के कम्फोर्ट में बिमारी की सिरीअस्नस भी कम लगती है और घर से बाहर रहने पे छोटी  सी खांसी भी हो जाए तो लगता है की जैसे पहाड़ गिर गया हो सर पे.
अभी कल से अपनी हालत भी थोड़ी खराब चल रही है. कल से ही जबरदस्त सर्दी, बदन दर्द और सर दर्द के गिरफ्त में हूँ. सर्दी से तो मुझे नफरत है, इरिटेट हो जाता हूँ बिलकुल.. बुखार या कुछ और बीमारी रहे तो समझ में आता है, की दावा खा लेने पे राहत मिलती है, लेकिन इस सर्दी का क्या किया जाए? कुछ भी काम में दिल नहीं लगता..खाना भी अच्छा नहीं लगता…मुहँ का स्वाद एक दम फीका हो जाता है.घर पे रहता था तो माँ कम से कम शाम को कुछ कुछ अच्छा बना के देती थी, बिस्तर पे लेटे रहता था और सब कुछ उपलब्ध हो जाता. ऑफिस से आने के बाद माँ अच्छा अच्छा नाश्ता बना कर देती थी…लेकिन अकेले रहने पे वो सब सुख कहाँ से मिलेगा.. यहाँ तो सब कुछ खुद ही करना पड़ता है..घर पे रहता था तो पापा डॉक्टर के पास ले जाते थे, चाहे टेस्ट करवाने हो या फॉर दावा लाना हो…पापा के साथ ही जाता था…यहाँ तो चाहे दावा लाना हो या फिर डॉक्टर से दिखाना हो…तबियत कितनी भी खराब रहे, खुद ही दावा के दूकान तक जाना पड़ता है.सब खुद से ही करना पड़ता है. 

सबसे तकलीफदेह जो बात लगती है वो है खाने की.. जब तबियत सही नहीं लगती तो कुछ भी खाने का मन नहीं करता है.घर पे तो ये एक सुविधा रहती थी की माँ खाने के साथ साथ कुछ एक्स्ट्रा बना देती थी, स्वाद के लिए..जैसे पकोड़े या फिर सेवई या कुछ और…लेकिन अकेले रहने पे ये सब कहाँ से होगा? मन मसोस कर वही मेस का बोरिंग खाना ही खाना पड़ता है..आज सुबह भी नाश्ता वैसे ही मन दाब के किया…ऑफिस से ११ बजे ही वापस आ गया था, दिन भर की छुट्टी ले कर…दोपहर में भूख लगी तो बहुत देर सोचने के बाद ये तय किया की आलू-पराठा खाया जाए..यहाँ तो खाने के लिए भी सोचना पड़ता है की क्या खाया जाए आज? घर में कम से कम इन सब चीज़ों की तो फ़िक्र नहीं रहती है.
कॉलेज में जब था तब एक दफे मेरी तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गयी थी..करीब १ महीने तबियत खराब रही..मैं उस समय चौथे सेमेस्टर में था…लेकिन उन दिनों दोस्तों की फ़ौज रहती थी आसपास…कुछ भी जुरुरत होती थी तो कोई न कोई मदद कर ही देता था..डॉक्टर के पास भी जाना होता था तो आशीष भारती या आशीष हमेशा साथ चलने को तैयार रहता था..यहाँ बैंगलोर में तो जान पहचान के काफी लोग हैं लेकिन दोस्त बस एक दो ही हैं…वो भी अपने कामों में कुछ ज्यादा व्यस्त रहते हैं, तो यहाँ सारा काम अकेले ही करना होता है..अभी कुछ देर पहले ही एक दोस्त से चैटिंग हो रही थी..उसे भी यही कह रहा था की “भाई यहाँ तो ऐसी हालत हो जाती है की तबियत खराब रहने पे कोई झूठे मुहँ तबियत के बारे में पूछता भी नहीं, ज्यादा हुआ तो बस ये कह दिया की अरे दावा ले लीजिए, ठीक हो जाइयेगा” ..घर से फोन आता है तो लगता है की कोई चिंता कर रहा है…घर के लोग तो एक झींक आने पे भी चिंता करते हैं…कुछ दोस्त भी हैं, जिन्हें पता चल जाए की मेरी तबियत सही नहीं तो दिन में हालचाल लेने के लिए कॉल कर ही देते हैं.
मेरी तबियत अक्सर खराब रहती थी बचपन में…कारण रहा ब्रांगकाइटिस..इस चक्कर में पटना का शायद ही कोई ऐसा डॉक्टर बचा होगा जिससे अपनी भेंट नहीं हुई होगी..बड़े से बड़े डॉक्टर से लेकर छोटे से छोटे डॉक्टर तक से अपनी मुलाकात हो चुकी है. कुछ डॉक्टर तो ऐसे भी रहे, जो मुझे पहचान गए थे. 🙂 इस कारण भी घर में मेरा बहुत ख्याल रखा जाता था…नानी, मामा, मामी भी आ जाती थी मिलने के लिए..नानी तो रुक भी जाया करती थी एक दो दिन…तबियत ठीक हो जाती थी तब जाती थी नानी…उन दिनों ऐसा लगता था की सब मिल के मेरा ख्याल रख रहे हैं…शायद उसी ख्याल रखे जाने की आदत कुछ ऐसी बन गयी है की अब भी जब  घर से दूर रहता हूँ तो घर की बहोत याद आती है.

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  1. अभिषेक तुम्हे भी ब्रांगकाइटिस था? मुझे नहीं पता था.

    घर की याद तो आती ही है जब बीमार रहते हैं तो. Get Well Soon 🙂

  2. केतना कहते हैं कि ख्याल रखो करो …मगर तुम छौंडा लोग मानो तब न …बडका कफ़सिरप मार लोग ..एक आध सिप ..न त इहां चले आओ …एकदम चकाचक ईलाज करवाएंगे तुम्हरा ..। वैसे तुम्हरे बात से सौ नहीं दो सौ प्रतिशत सहमत हैं हम भी

  3. बात तो एकदम सही की है …वैसे बीमारी में घर की ही नहीं ..हर मुसीबत में घर और भगवन ज्यादा याद आते हैं 🙂 ये मनुष्य जीव ही ऐसा है 🙂

  4. @प्रीती दी,
    जी हाँ…असल में बचपन से अभी तक बहुत पापड़ बेले हैं इस ब्रांगकाइटिस के चक्कर में… 🙂
    वैसे तुम्हे भी का क्या मतलब?? कोई और भी हमारे ही बिरादरी का है क्या? 😮

  5. @अजय भईया….
    अरे हो…छोटका मोटका बात में अब हम दिल्ली आ जाएँ….हद हो गया..यहाँ १०० रुपिया का दावा खा के ठीक हो जाएंगे और दिल्ली आने जाने में लगेगा हज़ार रुपिया…आप भी न..हद हैं 😉 😛

    @शिखा दी
    सही कहा 🙂

  6. हम्म ये तो है… ऐसे समय में घर की बहुत याद आती है…खासकर माँ की..पर मैं ये बातें करके, तुम्हे और भी घर की याद नहीं दिलाना चाहती…
    हम्म तो आलू पराठे खाए जा रहें हैं…और बीमार भी हो…ऐश हो रही है…:)
    एक चम्मच शहद में थोड़ी सी हल्दी डाल कर दो,तीन बार लिया करो …जरूर फायदा होगा {वैसे माँ ने बताया ही होगा…सोचा मैं भी जरा ज्ञान बघार लूँ :)}
    …और छुट्टी ली है तो फायदा उठाओ…मूवी देखो..गाना सुनो..कम्प्लीट रिलैक्स…अपना ख़याल रखो और जल्दी से ठीक हो जाओ.

  7. अभि बबुआ! तुमरा पोस्ट अबके देखाई दिया है हमरा ब्लॉग फ़ीड पर… तुमरा कमेंट मिलने के साथ ही तुमको जवाब लिखे और हाल चाल पूछे… हम जानते हैं कि परदेस में बीमार पड़ने पर केतना तकलीफ होता है… खैर ई सब सर्दी खाँसी मामूली चीज है, इरिटेट करेगा मगर होता ढीठ है..दवाई खाओगे तो एक हफ्ता में ठीक होगा..नहीं खाओगे तो सात दिन में..बस इसको एंज्वॉय करना सुरू करो, अपने भाग जाएगा.
    वईसे बीमार पड़ने का मजा तब है जब लोग हाल चाल पूछे… चुपचाप बीमार पड़ने में का फायदा.. ठीक किए जो पोस्ट लिख दिए… अब कम से कम लोग हाल तो पूछेगा अऊर बीमार पड़ना वसूल होगा… मजाक एपार्ट! टेक केयर!! जल्दी ठीक हो जाओ तब बंद नाक का अनुभव लिखो!!

    • गज़ब…:)
      .दवाई खाओगे तो एक हफ्ता में ठीक होगा..नहीं खाओगे तो सात दिन में..बस इसको एंज्वॉय करना सुरू करो, अपने भाग जाएगा.
      वईसे बीमार पड़ने का मजा तब है जब लोग हाल चाल पूछे… चुपचाप बीमार पड़ने में का फायदा.. ठीक किए जो पोस्ट लिख दिए… अब कम से कम लोग हाल तो पूछेगा अऊर बीमार पड़ना वसूल होगा…|
      ऐसे कमेंट के आगे हम क्या लिखे चचा…??? कुछ हमारे लिए भी छोड़ देते…|

      सादर,

  8. abhi bhai..

    "यार अगर बिमारी को आना है तो उसे एक नोटिस दे देनी चाहिए की जब घर में रहूँ तभी आये, फ़ालतू में ऐसे बिना इन्विटेसन के आकार हमें तंग न करे"

    ye akram bhai ki kahi baat,apne padhai ke dauran jane hamne bhi kitni baar kaha hoga.

    aapki baat bilkul sahi hay.

  9. वैसे ऊपर चचा को लिख तो दिया कि क्या कमेन्ट करें…पर किए बिना चैन कहाँ…??? 😛
    भाई, बीमारी ही नहीं, बल्कि हर परेशानी बिना इनविटेशन ही आती है…| पर क्या ज़रूरी है कि लापरवाही करते हुए अपने घर के दरवाज़े इन अनचाहे मेहमानों के लिए खुले रखे ही जाएँ…??? और अगर फिर भी आ ही जाएँ, तो ज़रा हिम्मत से हाथ पकड़ कर बाहर निकाल दो रे…:)
    आसपास भी देख लो…कोई तो होगा ही न जो इन्हें बाहर निकालने में अपना हाथ भी देगा ही…:)

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