तुम याद आये

कुछ ऐसे हसीन लम्हे थे वो जो अब वापस नहीं आयेंगे, दिल की पगडंडियों पे अपने निशान छोर गए हैं वो लम्हे, जो ना तो कभी मिटेंगे और न कभी भुलाये जाएंगे. वो ऐसे लम्हे हें, जिन्हें गए तो काफी साल हो गए लेकिन उनकी महक अभी भी ताजा है. वो जब याद आते हें तो एक प्यारी सी, हलकी सी मुस्कराहट आ जाती है चेहरे पे, तो कभी आँखें नम भी हो जाती है..

तन्हाई भी सौ किस्म की होती है, जिसमे से एक किस्म ऐसी होती है जो शुरू में परेसान करती है..कभी रुला भी जाती है, लेकिन फिर यही तन्हाई अच्छी लगने लगती है. खुद को बेहतर समझने का वक्त मिलता है.खुद से दो बातें करने का समय मिलता है. कुछ लोगों की यादें ऐसे ही आ जाती हैं, बिना बुलाए..फिर हद दर्जे तक तरपा जाती हैं…

फिर चाहे वो मेरे शहर की बातें हो, जब जाना था की दोस्ती क्या होती है, जहाँ कुछ ऐसे दोस्त बने जो दोस्ती की मिसाल से कुछ कम नहीं. या फिर बातें हो उस शहर की जहाँ से अपनी एक नयी जिंदगी, कैरिअर की शुरुआत की थी..कुछ ऐसे लोग जिनसे रिश्ता तो दोस्ती का बना था, लेकिन जिंदगी का हिस्सा बनते उन्हें देर नहीं लगा. 
उन्ही लोगों से जुड़े कई ऐसे लम्हे थे जिनसे मेरी जिंदगी बनी थी.

ये प्यारा सा, खूबसूरत सा गीत, कुछ अलग ही एहसास सा दिला जाती हैं. खो सा जाता हूँ कहीं, 
(जावेद अख्तर द्वारा लिखा हुआ, अलका याग्निक द्वारा गया हुआ)

पीले पत्तों का मौसम जा चूका है.,
ज़मीन पे हर तरफ रंग ही रंग हैं..
शोख और दिलकश उजाले आसमान में,
सफ़ेद बादलों की टुकडियां तैर रही हैं,
वादियों में हरे घास की कालीन बिछ गयी हैं.
यही सब कुछ था जब हम मिले थे,
वही सब कुछ है लेकिन तुम नहीं हो..
जब गीत हवाओं ने गायें तुम याद आये..
जब खुसबू के बादल छाये, तुम याद आये..
जब सुबहों ने रंग छलकाएं,तुम याद आये..
जब महके शामों के साये, तुम याद आये..
तुम याद आये..
जब कोई सुनहरा दिन आया,
जब मौसम झूमा गहराया,
जब रुत ने ली एक अंगराई,
जब धुप में नरमी सी आई,
जब रंग नए कलियों को मिले,
जब डाली डाली फूल खिले,
जब फूलों पे भंवरें मंडलायें
तुम याद आये..
जब कोई सुहानी रात आई,
जब सपनो की बारात आई,
जब अम्बर में तारे दमके,
जब आँगन में जुगनू चमके,
जब हुई घनेरी ख़ामोशी,
जब छाई हलकी बेहोसी,
जब रात ने तन मन पिघलाए,
तुम याद आये…
जब गीत हवाओं ने गाये, तुम याद आये,
जब सुबहों ने रंग छलकाए, तुम याद आये..
तुम याद आये..

वैसे तो इस गीत को पहले भी कई बार सुना था..अभी कुछ दिनों पहले जब दिल्ली से घर के लिए चल रहा था, तो रास्ते में ट्रेन पे रात भर आई-पोड पे यही गीत बहुत बजता रहा , सुबह सुबह चार बजे घर पहुंचा लेकिन फिर भी दिलो-दिमाग इस गीत के गिरफ्त में थे..सुबह हलकी हवा की ठंडक में ये गीत कहर ढा रही थी, मानो पुरे शरीर को झकझोर के रख दे, कितना मीठा सा , प्यारा सा गीत है, लेकिन ऐसा गहरा असर…

सोचा की पोस्ट कर ही दूँ….

[ तुमसे बना मेरा जीवन वाले बाकी के भाग कुछ अनचाहे कारणों से समाप्त कर रहा हूँ, हो सके तो कुछ दिनों में फिर से बाकी के दो भाग पोस्ट करूँगा, लेकिन कब होता है ये पता नहीं. फ़िलहाल के लिए वही दो भाग समझिए., ]

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  1. खूबसूरत अहसासों वाली पोस्ट और सुन्दर सा गीत….
    पता नहीं क्यूँ मुझे पोस्ट पढ़ते पढ़ते ये गाना याद आ रहा है.."वो जब याद आए…बहुत याद आए…." सच है ना…:) 🙂

  2. @रश्मि दी,
    सुबह ये गीत, दोपहर में आपकी नयी कहानी, और अब ये गीत जो आपने दिया…
    कितने और सितम?

  3. सलिल जी,
    दर्द ने ही करवट ली होगी..
    उसे फुरसत कहाँ जो इधर देखे!! 🙂

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