आशीष भारती – तुमसे बना मेरा जीवन पार्ट २

एक महानगर में अगर कोई दोस्त, साथी न हो तो अकेलापन महसूस होता है, बहुत काटता है अकेला रहना..लेकिन वहीँ अगर दोस्त और लोग आसपास हों और इंसान फिर भी अपनेआप को अकेला महसूस करे तो फिर क्या किया जाए..शायद ये सबसे बड़ी कशमकश होती है एक इंसान के लिए, की कहाँ जाए तो दिल बहले..कहाँ जाए तो कुछ अच्छा लगे..ऑफिस से घर आना और फिर कुछ पढ़ाई की बातें देख , कुछ गाने सुन, कोई फिल्म देख सो जाना..सुबह फिर से ऑफिस जाना और दिन भर ऑफिस में युहीं इधर उधर करना..क्लाइंट के लिस्ट से नज़र हटा के हर दस मिनट पे फेसबुक, जीमेल, बज्ज चेक करना..बस ये देखने के लिए की कहीं कुछ ऐसा हो की थोड़ा अच्छा लगे..कोई वैसा अपडेट नहीं देख के फिर से वही बोरिंग क्लाइंट के लिस्ट पे नज़र गड़ा देना. अपनी हालत ऐसी अक्सर हो जाया करती है.

अभी  कुछ दिनों पहले ही घर से आया हूँ, अक्सर जब भी घर से आता हूँ तो डेली रूटीन एक दो हफ्ते के लिए तो गड़बड़ा जाता ही है.चाहे घर पे कितने ही कम दिन रहूँ, लेकिन वापस आने के बाद फिर से बैंगलोर के रूटीन में ढलने में मुझे कुछ दिनों का वक्त तो लग ही जाता है. यही देखिये की जब से आया हूँ तब से रोज सोच रहा हूँ की सुबह सुबह जोगिंग के लिए जाऊं, माँ भी हर दिन फोन पे एन्क्वाइअरी कर ही देती है की जोगिंग के लिए जा रहा हूँ या नहीं..मैं डेली ये बोल के टाल दिए जाता हूँ की कल से जाऊँगा :), वैसे कल से जाने का इरादा बनाया है. देखिये कल सुबह क्या होता है :). ऐसा कुछ नहीं की सुबह नींद नहीं टूटती. आम तौर पे सुबह ६ बजे उठ ही जाता हूँ हर दिन, लेकिन उठने के बाद कभी इस मुए लैपटॉप में घुसा रहता हूँ तो कभी कुछ किताबों में. पटना से इस बार फणीश्वर नाथ रेणु  जी की किताबें ले के आया था और २ किताबें हैं कमलेश्वर की, १ किताब शरतचंद्र जी की है. शरतचंद्र जी की “मंझली दीदी” को छोर बाकी सभी पढ़ लिए मैंने..ऐसा पहली बार हो रहा है की इतनी जल्दी जल्दी किताबें खत्म कर रहा हूँ 🙂 ये सब क्या है पता नहीं, लेकिन अभी कुछ दिनों से ऐसा ही चल रहा है. 

आशीष भारती

जब दिल-दिमाग की ऐसी मनोदशा होती है तो आमतौर पे कोई न कोई मित्र जरूर याद आता है जिसके साथ गुजारे हुए दिन दिल में एक याद बन के रह जाती है और फिर उन्ही यादों को याद कर के एक अलग ही खुशी मिलती है.ऐसा ही एक मित्र है अपना “आशीष भारती”. मेरे साथ वो इंजीनियरिंग में था, मेरे बेस्टेस्ट फ्रेंड में से एक..एक बहुत ही स्पेशल दोस्त.. पुरे इंजीनियरिंग में अगर मैंने सबसे ज्यादा किसी से बात की है तो वो यही आशीष है. सुबह अखबार पढ़ना हम दोनों का ही आदत रहा है और फिर अखबार पढ़ने के बाद किसी न किसी बात पे हम जरूर चर्चा करते थे, चाहे फिल्म की बात हो या फिर राजनीति की या फिर खेल की.हम ये सोच के कभी चर्चा नहीं करते थे की आज किसी मुद्दे पे चर्चा करना है, बस बात तो निकल ही जाती थी वैसी कोई न्यूज़ या मामलों से. आशीष को फिल्मों की वैसी कुछ खास जानकारी नहीं थी, लेकिन राजनीति और बाकी मामलो पे उसके जैसी पैनी नज़र मैंने बहुत कम लोगों में देखी. जिंदगी जीने का एक अलग अंदाज़ रहा है उसका, I dont give a damn जैसा ऐटिटूड, लेकिन वहीँ वो बेहद जिम्मेदार और प्रैक्टिकल लड़का रहा है. उसे भावुक या ज्यादा संवेदनशील तो नहीं कह पाऊंगा क्यूंकि उसकी जिंदगी मे हर पल ऐसे ऐसे लोग रहे जिससे उसके भावुकपन में थोड़ी कमी आ गई और ज्यादा सख्त हो गया जिंदगी के प्रति. लेकिन फिर भी मेरे सामने उसका वो भावुक चेहरा कभी दिख भी जाया करता था.


इंजीनियरिंग में आने से पहले वो अपनी  ग्रैजूएशन के दो साल खत्म कर चूका था. और बहुत पहले से ही घर से दूर रह रहा था, होस्टल में..तो उसे ज़माने का हमसे ज्यादा अनुभव था. मैं उसके straight-forwardness का शुरू से फैन रहा हूँ. ज्यादा बोलता नहीं था , लेकिन जब बोलता था जबरदस्त बोलता था और ऐसा बोलता था की सामने बैठे लोग के पास कोई जवाब नहीं होता था.  कुछ गिने चुने लड़कों की ये शिकायत भी थी की आशीष भारती कड़वा  बोलता है कभी कभी, लेकिन बात असल में ये थी की वो लोग को देख के बोलता था, जिसे जैसा सुनाना हो वैसा ही बोलता था, अब चाहे वो किसी को कड़वा लगे या मीठा, इससे उसको कोई मतलब नहीं रहता.स्पष्ट और खरा बोलना उसकी खासियत रही है. दूसरों के साथ जैसा भी रहा हो, मेरे साथ आज तक उसने कभी कड़वी बातें नहीं की. उसके साथ रहना एक अलग अहसास था..कुछ सीखने जैसा..बहुत कुछ सीखा भी मैंने उससे. इंजीनियरिंग में दो टोली थी हमारी , एक तो वो जिसमे मेरे,अकरम जैसे संवेदनशील लोग थे जो अपने सपनो के दुनिया के पीछे रहते थे और रूमानी, कोमल बातें करते थे..वहीँ एक टोली थी आशीष भारती जैसे एक दो लोगों की, जहाँ वास्तविकता रहती थी, एक मचयोरनेस ..जहाँ सपनो की दुनिया की कोई जगह नहीं थी.

भारती शुरू के एक साल बड़ा ही लो-प्रोफाइल रहा कॉलेज में..लेकिन जल्द ही सब भारती को पहचान गए..चाहे मार-पिट की बात हो या फिर कुछ एक मसला..हर मामले में सब भारती की राय जरूर जानना चाहते थे..एक दो बार बहुत ही गर्म मसले पे सबसे पहले कुछ करने की पहल भारती ने ही की…इंजीनियरिंग के आखरी सेमेस्टर तक आते आते भारती की इमेज कुछ ऐसी बन गयी थी की पढ़ाई में भी मस्त और मार-पिट में भी मस्त 😛…हाँ बस एक मामले में ही सबसे पिछड़ा हुआ था -लड़कियों से बात करने के मामले में :P, 

मैं और भारती- साल २००६ 

दोस्त अक्सर दोस्त की बड़ाई करने से नहीं चुकते, लेकिन भारती ऐसा नहीं है, वो अगर किसी व्यक्ति को अच्छा बोल रहा है तो इसका बस येही मतलब है की वो सही मायने में, दिल से उस व्यक्ति की इज्जत करता है.इंजीनियरिंग के दूसरे सेमेस्टर से भारती और मेरी कुछ नजदीकी बढ़ी. जब पहला साल खत्म हुआ और दूसरे साल के लिए हमें नए फ़्लैट में जाना था, तो कुछ और लड़के आ गए हमारे साथ रहने को..लड़कों की अजस्ट्मन्ट प्रोब्लम थोड़ी होने लगी, की कौन कहाँ रहेगा..मैं पहले से ये तय कर चूका था की मैं,अकरम और समित एक साथ रहेंगे, एक ब्लो़क में. भारती के ब्लो़क में एक जगह खाली थी, और सब ने उससे कहा की किसी लड़के को अपने साथ रख लो, सभी की परेशानी खत्म हो जायेगी. इस पर भारती का कहना था की वो किसी को नहीं रख सकता क्यूंकि उसके साथ कोई एडजस्ट नहीं कर पायेगा.फिर उसने कहा की हाँ अगर अभिषेक चाहे तो वो मेरे साथ आ सकता है, उसके अलावा और किसी के साथ मैं एडजस्ट नहीं कर पाऊंगा.ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी की उतने लड़कों में भारती ने मेरे ऊपर भरोसा दिखाया, मैं भी कैसे इनकार कर सकता था, भारती के साथ आ गया.सोचा की समित और अकरम तो रहेंगे बगल वाले ब्लोक में ही तो कोई दिक्कत की बात ही नहीं… इस बात को पता नहीं काम्प्लमेन्ट कहना उचित रहेगा या नहीं लेकिन मेरे लिए ये बात दिल को छूने वाली थी. ऐसी ही एक और बात हुई. शायद हम पांचवे सेमेस्टर में होंगे या छठे सेमेस्टर में..याद नहीं..रात के ग्यारह बज रहे थे और हम अपने फेवरिट होटल रितिका में डिनर कर रहे थे.महफ़िल जमी हुई थी बारह-पन्द्रह दोस्तों की, की अचानक किसी ने एक बात छेड दी, की यहाँ बैठे लड़कों में से सबसे सोफ्ट,सोबर और संवेदनशील कौन है..कई लोगों ने अपनी अपनी बड़ाई की, किसी ने कहा की सबसे सोफ्ट मैं हूँ, मुझसे ज्यादा सोबर और कोई नहीं…भारती से जब पुछा गया तो भारती ने कहा की “मेरे हिसाब से यहाँ पर अभिषेक से ज्यादा सोफ्ट,सोबर और कोई नहीं”. मैं कुछ भी नहीं कह पाया, बस मुस्कुरा के रह गया.

दोस्तों की एक छोटी सी महफ़िल- साल २००५

इंजीनियरिंग  के जब गिन चुन के कुछ दिन ही बाकी रह गए थे..हम तीन चार दोस्त बैठे थे, किसी बात पे अचानक ये बात उठी की यहाँ से निकलने के बाद कौन किसके कोंटेक्ट में रहेगा..जब भारती ने मुझसे पुछा की तुम्हारी कितने लोगों की लिस्ट है, जिसके साथ तुम रहना चाहते हो कोंटेक्ट में..मैंने गिन के कहा की करीब १०-१२ लोग हैं..भारती मेरे तरफ मुस्कुराते हुए देखा और कहा की यार बड़ी लंबी लिस्ट है तेरी…मेरे लिस्ट में तो बस ४-५ लोग हैं. जिसमे एक नाम अभिषेक कुमार का भी है. इस पे इमोसनल होना स्वाभाविक है. 🙂 
भारती  को विश्वास था मुझपे, और मुझे उसपे….इस बात का प्रमाण इसी से लगा लीजिए की जब हम अपने सातवें सेमेस्टर में गए थे तो भारती को एक मोबाइल खरीदनी थी, हम जहाँ रहते थे वो छोटा सा टाउन था, तो कुछ अच्छा मोबाइल/कंप्यूटर/लैपटॉप लेने के लिए या तो हैदराबाद जाना पड़ता था या सोलापुर. हैदराबाद और सोलापुर के बीच में ब्सवकल्याण(हमारा टाउन) है.. दोनों नज़दीक के ही शहर हैं..मैं कुछ काम से सोलापुर जा रहा था..तय ये हुआ की भारती और मैं दोनों साथ साथ जायेंगे..मुझे एक फॉर्म लेनी थी, और भारती को मोबाइल खरीदनी थी. फिर जिस दिन जाना था उसके एक दिन पहले भारती ने कहा यार मैं नहीं जाऊँगा, तू ही मोबाइल खरीद के ले आ. मैंने कहा की यार तुझे मोबाइल खरीदनी है, तू चल या फिर कोई मोडल ही बता दे की कौन सा मोबाइल लाऊं, उसने कहा की तुझे जो भी पसंद वो ले आना..बस..तेरी पसंद अच्छी रहेगी ये मुझे पता है और वो मुझे भी पसंद आयेगी, ये भी पता है 🙂   



एक और मजेदार बात है..अगर आप भारती से पूछियेगा की “तुम्हारी फेवरिट ऐक्ट्रेस कौन है..कौन तुमको सबसे सुन्दर लगती है.” तो उसका जवाब कुछ इस तरह आएगा “अरे यार इतने सारे ऐक्ट्रेस में एक को कैसे चुने…जिसके आगे ऐक्ट्रेस शब्द लग गया तो वही मेरी फेवरिट बन गयी..और सुन्दर तो सब है…अगर सुन्दर नहीं होती तो ऐक्ट्रेस कैसे बनती” 😛…. भारती के साथ बिताए गए हर पल अच्छे थे..चाहे वो साथ बैठ के घंटो तक कंप्यूटर पे विडियो सोंग देखना हो या फिर घंटो तक किसी बात पे चर्चा करना. समय और काम की व्यस्ततता की कारण अभी २ साल हो गए, भारती से मिले हुए. फोन पे बात तो होते रहती है, लेकिन इस दोस्त से मिलने का भी बहुत दिल करता है.ह

दोस्त तुम्हारे साथ गुजारा हुआ पल बहुत याद आता है, तुम याद आते हो.. !! 

(पहले वाला पार्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें – तुमसे बना मेरा जीवन पार्ट १ )

Recent Articles

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर : शिक्षक दिवस पर खास

सुदर्शन पटनायक द्वारा बनाया गया, चित्र उनके ट्विटर से लिया गया आज शिक्षक दिवस है, यह दिन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ....

तीज की कुछ यादें, कुछ अभी की बातें और एक आधुनिक समस्या

इस साल के तीज पर बने पेड़कियेबचपन से ही तीज का पर्व मेरे लिए एक ख़ास पर्व रहा है. सच कहूँ तो उन दिनों इस...

एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना..

बारिश हो रही हो, मौसम सुहाना हो गया हो और ऐसे में अगर कुछ पुराना याद आ जाए तो जाने क्या हो जाता है...

बंद हो गयी भारत की सबसे आइकोनिक कार, जानिये क्यों थी खास और क्या था इतिहास

Photo: CarToqपिछले सप्ताह, अचानक एक खबर आँखों के सामने आई, कि मारुती अपनी गाड़ी जिप्सी का प्रोडक्शन बंद कर रही है. एक लम्बे समय...

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये

यूँ तो साल का सबसे खूबसूरत महिना होता है फरवरी, लेकिन जाने क्यों अजीब व्यस्तताओं और उलझनों में ये महिना बीता. पुस्तक मेला जो...

Related Stories

  1. अच्छा तो आज अपनी तारीफें करने का मन कर रहा है तुम्हारा 🙂 होता है होता है कभी कभी ऐसा भी होता है :).वैसे बड़ी शिद्दत से याद किया है दोस्त को ,बढ़िया लिखाहै .

  2. main tumse kahne hi vali thi ki tumne friends wale series ko aage kyun nahi likha…chalo aaj part 2 aa bhi gaya…ab jaari raakhna………….

    achha laga padh ke…..aur tumhare dost ke baare mein jaankar….aur haan apni thodi badai bhi tumne kar di…thats okay 🙂

  3. पहिले त हमको लगा कि दूगो दोस्त के बारे में पढने को मिलेगा… एगो आसीस अऊर एगो भारती. बाकी देखे कि नहीं आसीसे का नाम आसीस भारती है, त संतोस हुआ कि ई भारती ऊ कबिता वाली नहीं है..
    लेकिन एगो बात अभियो नहीं बुझा रहा है कि जऊन दोस्त लोग के बारे में तुम लिखते हो, ऊ लोग का कोनो रिएक्सन नहीं देखाई देता है…

  4. आशीष जी के व्यक्तित्व से बिना प्रभावित हुये नहीं रहा जा सकता है। स्पष्टवादिता प्रारम्भ में थोड़ी चुभती है पर अन्ततः बहुत सुहाती है।

  5. @चाचा जी, अभी तक तीन दोस्त के बारे में लिखे हैं, और ये तीनो दोस्त ब्लॉग की दुनिया से बहुत दूर हैं..ये जो है आशीष भारती, ये तो इन्टरनेट से भी थोड़ा दूर रहता है..बस मेल चेक करने तक ही इन्टरनेट का प्रयोग करता है..
    वैसे पिछले वाले पार्ट में प्रभात और मती, दोनों की टिप्पणियां मुझे एस.एम्.एस से मिली और फोन पे…

    अभी मैंने भारती को ई-मेल कर के ये लिंक भेजा है, अगर हो पाया तो वो कमेन्ट देगा यहाँ और अगर नहीं दे [पाया तो उसका जो जवाब आएगा ई-मेल पे उसे मैं यहाँ पेस्ट कर दूँगा 🙂

    एक और बात देखिये..
    यहाँ एक कमेन्ट मिलेगा आपको समित नाम के लड़के का…इसके बारे में भी एक पोस्ट लिखा था – http://abhi-cselife.blogspot.com/2010/07/blog-post.html , पोस्ट पे तो इसने कमेन्ट नहीं किया , मुझे फोन किया था जिसे मैंने कमेन्ट के रूप में वाहन पेस्ट किया है..:) मैं खुद अचरज में हूँ की ये समित को क्या हो गया…उसका कमेन्ट कैसे आ गया यहाँ 😛

  6. mjhe to sbse achhi baat wo lagi jo last paragraph mein hai :d :d
    actress wali baat he he
    part 3 mein kaun kaun rahega 😛 ye bhi bata denaa humein
    sweet si post hai yeh

  7. तुम्हारी पोस्ट पढ़ कर तो बाकी सहपाठी…सोच रहें होंगे.."हाय! हमने क्यूँ ना की दोस्ती अभिषेक से" (इसमें सह पाठिनियाँ भी शामिल हैं 🙂 )
    बड़े प्यार से मिलवाते हो अपने दोस्तों से…हमें भी अपने से लगने लगते हैं…'पार्ट अनंत' जारी रहें…:)

  8. 'पार्ट अनंत ' यानि कि अनंत तक जारी रहें…तुम्हारे ढेरो दोस्त बनते रहें और तुम उनपर लिखते रहो…

  9. @रश्मि दी, बड़ा प्यारा आशीर्वाद है आपका 🙂
    और अफ़सोस की इंजीनियरिंग की सह पाठिनियाँ के बारे में नहीं लिख पाऊंगा, क्यूंकि कभी किसी से उस तरह की दोस्ती नहीं हुई…लड़कियों में थोड़ा ऐटिटूड प्रोब्लम था, लेकिन पटना की सह पाठिनियाँ के बारे में अगली पोस्ट में बताऊंगा 🙂

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

नयी प्रकाशित पोस्ट और आलेखों को ईमेल के द्वारा प्राप्त करें