बस एक लम्हे का झगड़ा था – गुलज़ार साहब के साथ कुछ लम्हे पार्ट ३

एक फिल्म आई थी “दस कहानियां”, फिल्म तो कुछ खास नहीं थी, लेकिन अलग जरूर थी..इस फिल्म में दस अलग अलग कहानियां थी जिसे दस अलग अलग डाइरेक्टर ने डाइरेक्ट किया था. कुछ कहानियां तो मुझे वाकई पसंद आई थी…इसी फिल्म में कुछ नज्में हैं गुलज़ार साहब की, फिल्म की एक नज़्म आप यहाँ पढ़ चुके हैं. इस कड़ी पे पेश है उसी फिल्म के बाकी नज्में, जो शायद आपने पहले सुन रखा हो. अगर नहीं सुन रखा तो सुनिए और भींगते जाईये गुलज़ार की बारिशों में.

बस एक लम्हे का झगड़ा था – दिया मिर्ज़ा की आवाज़ में सुनिए गुलज़ार साहब की ये नज़्म

बस एक लमहे का झगड़ा था..
दर-ओ-दीवार पर ऐसे छनाके से गिरी आवाज़,
जैसे काँच गिरता है…
हर एक शय में गई, उड़ती हुई, जलती हुई किरचियाँ..
नज़र में, बात में, लहज़े में..
सोच और साँस के अंदर,
लहू होना था एक रिश्ते का, सो वो हो गया उस दिन..
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा कर फर्श से उस शब,
किसी ने काट ली नब्ज़ें 
न की आवाज़ तक कुछ भी, 
कि कोई जाग ना जाए..
बस एक लमहे का झगड़ा था..
नसीरुद्दीन शाह ने भी क्या बखूबी से नज़्म पढ़ा है..भगवान और एक शायर के बीच बिछी एक सतरंज की बाजी की बात यहाँ  सुनिए और देखिये कैसे एक शायर भगवान के हर चाल का जवाब कैसे बखूबी दे रहा है.. – 

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने

काले घर में सूरज रख के तुमने शायद सोचा था..
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने इक चिराग जला कर
अपना रास्ता खोल लिया

तुमने एक समंदर हाथ में लेकर मुझ पर ढेल दिया
मैंने नूँह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने, और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया

मेरी खुदी को तुमने चंद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया
मौत की शह देकर तुमने समझा था, अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खोल उतार कर सौंप दिया और रूह बचा ली

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी …

 
रिश्तों पे लिखी ये नज़्म को पढ़ा है  सुधांशु पाण्डे ने

वक़्त वक़्त को जितना गूँध सके हम! गूँध लिया
आटे की मिक़्दार कभी बढ़ भी जाती है
भूख मगर इक हद से आगे बढ़ती नहीं
पेट के मारों की ऐसी ही आदत है-
भर जाए तो दस्तरख़्वान से उठ जाते हैं।
आओ, अब उठ जाएँ दोनों
कोई कचहरी का खूँटा दो इंसानों को
दस्तरख़्वान पे कब तक बाँध के रख सकता है
कानूनी मोहरों से कब रुकते हैं, या कटते हैं रिश्ते
रिश्ते राशन कार्ड नहीं हैं।
नाना  पाटेकर की आवाज़ में ये नज़्म, मेरी सबसे पसंदीदा नज्मों में से है…बीते लम्हों की बातों को याद कर के दिल कैसे अपनी बात कहता है, यहाँ देखिये – 
तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी

इलायची के बहुत पास रखे पत्थर पर
ज़रा सी जल्दी सरक आया करती है छाँव
ज़रा सा और घना हो गया है वो पौधा
मैं थोड़ा थोड़ा वो गमला हटाता रहता हूँ
फकीरा अब भी वहीं मेरी कॉफी देता है
गिलहरियों को बुलाकर खिलाता हूँ बिस्कुट
गिलहरियाँ मुझे शक़ की नज़रों से देखती हैं
वो तेरे हाथों का मस्स जानती होंगी…

कभी कभी जब उतरती हैं चील शाम की छत से
थकी थकी सी ज़रा देर लॉन में रुककर
सफेद और गुलाबी मसूरे के पौधों में घुलने लगती है
कि जैसे बर्फ का टुकड़ा पिघलता जाए विहस्की में
मैं स्कार्फ ….. गले से उतार देता हूँ
तेरे उतारे हुए दिन पहन कर अब भी मैं तेरी महक में कई रोज़ काट देता हूँ

तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी..



और  अब चलते चलते एक त्रिवेणी , 


इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस..
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में..
 
अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा! 

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  1. हाँ ये फिल्म देखि थी मैंने और २-३ कहानियां बहुत अच्छी थीं …
    और नज्में तो बेहतरीन

  2. अभि बाबू!
    पहिला बार कुछ ऐसा लिखे हो तुम जिसको देखकर हमको टोकने का मन करने लगा है. दस कहानियाँ कुछ खास नहीं था, ई कहना गलत है (हम अपना राय नहीं थोप रहे हैं). सबसे पहिले त ऐसन एक्स्पेरिमेंट कोई नहीं किया होगा कि दस अलग कहानी को एक सिनेमा में दस अलग अलग स्टार कास्ट के साथ, दस अलग अलग युनिट के साथ फिल्माए.
    अऊर कहानी भी टाइम पास नहीं था. चाहे गुब्बारे वाला हो, चाहे हिंदू मुस्लिम एकता वाला हो, चाहे पति पत्नी का झूठा रिस्ता वाला हो. जहाँ एगो कहानी एड्स के बैक्ग्राउण्ड में प्रेमकथा का ऊ सीमा को छूता है जहाँ ओ हेनरी का याद आ जाता है अऊर पति पत्नी का धोका वाला कहानी पर जेफरी आर्चर का ट्विस्ट इन द टेल.
    सच पूछो तो गुलज़ार साहब का ई नज़्म तो फिलिम का हिस्सा था भी नहीं. हाँ ई अलग बात है कि सब का सब नज़्म उनका बेहतरीन नज़्म में से एक है.
    खैर, ई हमरा बिचार था. फिर कहेंगे कि थोप नहीं रहे हैं, अपना बिचार. बस एक बार गौर करके देखो.

  3. चाचा जी, फिल्म का ३-४ कहानी मुझे भी बहुत पसंद आई थी, और आपने बिलकुल सही कहा की ऐसा एक्स्पेरिमेंट किसी और ने नहीं किया…ई फिल्म का एगो गाना है "भुला दिया," वो मेरा फेवरिट में से आता है, वैसे फिल्म की ३ कहानी मुझे नहीं अच्छी लगी लेकिन फिर भी इस फिल्म की डी.वी.डी अभी भी मेरे पास राखी है..:) कुछ दिन पहले ही देखा था 🙂

  4. मुझे सभी नज़्म बहुत अच्छे लगे !!
    और वो त्रिवेणी तो बस कमाल ! 🙂

    फिल्म मैंने नहीं देखी, अब देखने का मन कर रहा है 🙂

  5. hello abhi sir !

    this post is just awesome..

    i just made an account here in blogger but m hell confused as how to start.
    u got to help me.
    for that shukriya in advance !

    aur aapne jo link mujhe e-mail kiya hai usey bhi abhi padhna baaki hai.

  6. दस कहानियाँ की सारी की सारी नज्में बहुत ही अच्छी हैं… और सब की सब हमारी फ़ेवरेट… चुनना मुश्किल होता है कौन सी ज़्यादा अच्छी है 🙂
    दस कहानियाँ की कुछ नज्में हमने अपने ब्लॉग पर भी शेयर करी हैं…
    gud to see some of the best ones here… Gulzar sa'ab is just awesome…
    शायद उन्हें पढ़ के हर बार यही कहते हैं 🙂 वैसे पार्ट – २ मिस किया क्या हमने ? अभी चेक करते हैं…
    n if i'm not wrong "वक़्त को जितना गूंध सके हम" is recited by manoj pandey not sudhanshu pandey…

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