तुमसे बना मेरा जीवन – पार्ट १

मेरी  जिंदगी में जितना महत्व परिवार वालों का है, उतना ही महत्व दोस्तों का भी है.कुछ ऐसे मित्र हैं जो अब मेरी जिंदगी का एक हिस्सा बन चुके हैं.कुछ ऐसे दोस्त हैं जिनके बिना मेरी जिंदगी बिलकुल अर्थहीन लगेगी.ये पोस्ट उन्ही दोस्तों के नाम है जो मेरी जिंदगी में हर पल शामिल हैं..दूर रह के भी हर पल मेरे साथ हैं और जिनकी दोस्ती मेरे लिए एक सौगात से कम नहीं, सौगात क्या इन दोस्तों की दोस्ती तो मेरी जिंदगी है अब.

जबतक पटना में था, बहुत ही अच्छे दोस्तों का साथ रहा, ऐसे दोस्त जिन्होंने हर कदम मेरा साथ दिया और जो जिन्हें दोस्त कहने में मैं फक्र महसूस करता हूँ.जब इंजीनियरिंग की पढाई के लिए पटना से कर्नाटक जा रहा था तो दिल बहुत उदास था, एक तो घर से दूर और दूसरा की दोस्तों से दूर..खैर, मेरी किस्मत अच्छी रही, वहां भी कुछ ऐसे दोस्त बने जिन्हें मेरी जिंदगी का एक हिस्सा बनते ज्यादा वक्त नहीं लगा.इंजीनियरिंग खत्म कर के जब बैंगलोर आया, तो बिलकुल अकेला पड़ गया, दोस्त सब अलग अलग जगहों पे चले गए, कमाने-खाने का चक्कर कितना बुरा होता है, परिवार-दोस्तों को अलग थलग कर के रख देता है..बैंगलोर में मैं बिलकुल अकेला पड़ गया, शायद ऐसा अकेलापन पहली बार मैंने महसूस किया था.कहने को तो कई लोग थे जो की दोस्त थे लेकिन कभी उनसे वैसी दोस्ती नहीं हो पायी, वैसी दोस्ती होने के लिए दिल के तार बखूबी मिलने चाहिए, जो की कभी मिले ही नहीं…न तो उन लोगों ने कोशिश की मेरी जिंदगी में शामिल होने की और उनके बर्ताव देख न मैंने उन्हें अपने जिंदगी में शामिल होने का मौका दिया..पहला साल बैंगलोर में बड़ा अकेला अकेला सा बीता, फिर पता चला की  इंजीनियरिंग के ही एक मित्र, मेरे सीनिअर बैंगलोर में रह रहे हैं..तो थोड़ा सुकून मिला और समय उनके साथ बीतने लगा…फ़िलहाल इस बड़े शहर में बस एक वही दोस्त हैं मेरे.

मेरे जिंदगी में हमेशा तीन दोस्तों की तिगड़ी ज्यादा अहम रही है.रही.पहले पटना में तीन दोस्तों का दो ग्रुप “मती,प्रभात, मैं” और “दिव्या,शिखा,मैं”..फिर इंजीनियरिंग में एक और तीन दोस्तों की तिगड़ी “अकरम,समित और मैं” . कहीं न कहीं मैं इन तिगड़ी को फिल्म “दिल चाहता है ” के तीन दोस्त किरदारों से जोड़ कर देखता हूँ..मेरे ख्याल से तीनो किरदारों के कैरेक्टर हम दोस्तों के ग्रुप से काफी मिलते जुलते से हैं.शायद इस लिए से भी ये फिल्म “दिल चाहता है” मेरी सबसे पसंदीदा फिल्म में से आती है.

प्रभात

दोस्ती क्या होती है शायद सबसे पहले मैंने प्रभात से ही जाना.बिलकुल प्रैक्टिकल टाइप लड़का है..यारों का यार है.बारहवीं के दिनों में हम घंटों तक बातें करते रहते थे, लगभग हर मामलों पे, हर विषयों पे..जितना हम बातें करते उतना एक दूसरे को और जानने लगते.शायद ही कभी किसी बात पे हमारे बीच मतभेद हुआ हो..हम दोनों के सोचने का तरीका भी लगभग एक जैसा ही है.हम दोनों का ऐकेडमिक कुछ खास अच्छा नहीं चल रहा था, न चाहते हुए भी कुछ न कुछ बाधाएं आ ही जा रही थी पढाई के बीच.मार्क्स-भगवान तो हमेशा हमसे नाराज़ ही रहे..जैसे रेगिस्तान में पानी के लिए लोग तरसते हैं, वैसे ही हम अंकों के लिए तरसते रहे..रास्ते जितने कठिन होते गए हम दोनों के सपने एक के बाद एक टूटते गए..ऐसे समय पे कभी प्रभात ने मेरा हौंसला बढ़ाया और कभी मैंने प्रभात का..


कुछ दोस्त होते हैं जो मुश्किल समय में आपको रोता देख आपको सांत्वना देते हैं, धैर्य बंधाते हैं..और कुछ दोस्त होते हैं जो मुश्किल के समय में आपके पास बैठ, बिना कुछ कहे,बिना कोई बात बोले आपके साथ आपके दुःख के लिए रोते हैं.प्रभात दूसरे वाले कटेगरी में से आता है.कितनी बार मैंने ये महसूस किया है की हम दोनों खामोश बैठे रहते हैं ,बिना कुछ बात किये और बाद में ये एहसास होता है की “दिस वाज द बेस्ट कन्वर्सेशन वी एवर हैड”.हम लोगों ने बहुत पहले से ही जिंदगी को अपने तरह से देखना और समझना शुरू कर दिया था. हर हालात हमने एक से ही देखें हैं..और मैंने बहुत कुछ सीखा भी है प्रभात से..प्रभात जितना जिम्मेदार और सुलझा हुआ है, उतना मैं नहीं हूँ. जब हम पटना में थे, स्कूल में..तब से ही प्रभात बेहद जिम्मेदार लड़का था..मैं उस समय ये भी सोचता था की इतने कम उम्र में भी इसे किस कदर अपनी जिम्मेदारियों का अहसास है. 

प्रभात और मैं

हमारी एक तम्मना थी की हम जहाँ भी रहे, जहाँ भी पढ़ें एक साथ ही रहें..लेकिन हर किसी की हर ख्वाहिश कहाँ पूरी हो पाती है.प्रभात ने अपना ग्रैजूएशन पटना से ही किया और मैं चला गया कर्नाटक.उन दिनों जब छुट्टियाँ होती थी तो ये भी एक खुशी रहती थी की सेमेस्टर छुट्टियों में प्रभात से मिलूँगा.ग्रैजूएशन के बाद प्रभात एम्.सी.ए करने पुणे चला गया, और अभी जॉब भी वहीँ कर रहा है. सबसे ज्यादा दुःख अगर होता है किसी भी बात का तो बस ये सोच के की पिछले ३ सालों में मैं उससे ३-४ बार ही मिल पाया हूँ.अब भी अक्सर जब ज्यादा तनहा पाता हूँ खुद को तो बहुत ज्यादा याद आती है अपने इस दोस्त की.  

मती

प्रभात  और मेरे ग्रुप का तीसरा लड़का और मेरा सबसे अजीज दोस्त – मती. बिलकुल मस्त टाइप लड़का..बिंदास..जिंदगी को खुल के जीने वाला, जिसने अक्सर जिंदगी को अपने शर्तों पे जिया है(ऐसा मुझे लगता है).बहुत से बातों के लिए मैं मती को एक उदाहरण के रूप में देखता हूँ, ये कहना शायद उतना सही नहीं होगा की मती एक आज़ाद लड़का था, हाँ लेकिन ये कह सकता हूँ की जितना घरवालों की बेड़ियाँ, बंदिशें हम लोग पे थीं, मती पे उतनी बंदिशें बिलकुल नहीं थी..फिर भी मती ने कभी अपनी इस छोटी सी आजादी को कभी बिगड़ने का कारण नहीं बनाया.बहुत ही संतुलित लड़का रहा है शुरू से ही, क्या काम करना है और कैसे करना है..सब बातों का ख्याल रखने वाला एक इंसान. एक बार जब मैट्रिक की परीक्षायों में कम नंबर आयें थे इसे तो इसने एक बात कही जो उस समय मुझे बहुत उचित और सही बात लगी थी.., मती ने कहा “की अभिषेक अगर ज्यादा नंबर ले आओ तो कोई भी पूछने वाला नहीं की नंबर कैसे आयें, क्यूँ आये..लेकिन अगर पढाई करो और फिर भी कम अंक आयेंगे तो सब यही बोलकर इल्जाम डालेंगे की इसने पढ़ाई नहीं करी, मेहनत नहीं की. ” ..

इस दोस्त के साथ बिताए हुए दिनों की यादें इतनी मीठी हैं और इतनी ज्यादा हैं की चाह के भी सब बातें बयां नहीं कर सकता.अक्सर मैं और प्रभात मती के घर पहुँच जाते थे , घंटों बातें करते..थोड़ी थोड़ी मीठी नोक-झोंक भी हो जाया करती थी मती और प्रभात के बीच. मुझे इन दोनों की वो मीठी नोक-झोंक इतनी पसंद थी की क्या बताऊँ..दोनों को देख के सोचता था की “दोस्त हों तो ऐसे हों, वरना ना हों” 🙂 ..शायद मैं सबसे ज्यादा यही बात मिस करता हूँ..हम तीनो दोस्तों का मती के घर पे बैठ के बातें करना,बहस करना…बहुत ऐसी बातें याद है मुझे जो शायद मती और प्रभात को याद भी न हों..जैसे एक दिन स्कूल से पहले छुटने के बाद हम मती के घर पहुचें और टी.वि पे “आमदनी अट्ठनी खर्चा रुपईया” फिल्म देखना..या फिर चना दाल का बना हुआ हलवा खाना, या फिर मती के म्यूजिक सिस्टम पे गाना सुनना या फिर उन गानों को रिकॉर्ड करना..ईद के दिन मती के घर जाना और सेवई खाना.वो सब दिन सुनहरे दिन थे, वो अनमोल पल अब बस यादों में कैद होकर रह गए हैं.


एक बहुत ही छोटी सी बात है, दावे के साथ कह सकता हूँ की मती को याद भी नहीं होगा और अगर वो ये पोस्ट पढ़ेगा तो सोचेगा की उसने कब ये बात कही.मेरा जन्मदिन था, उस समय ऐकेडमिक कैरिअर में मैं बहुत झटके खा रहा था और परीक्षा परिणाम भी बहुत जबरदस्त रूप से खराब थे.शाम के वक्त मती और प्रभात आये हुए थे, ऐकेडमिक से ही सम्बंधित कुछ बातें चल रही थी..जब ये दोनों जाने लगे तो मती भाईसाहब ने अचानक रुक के  कहा की “अभिषेक मैं ये समझ नहीं पाता की ऐसा बस तेरे साथ ही क्यों होता है..तू हमसे बहुत ज्यादा डिज़र्विंगहै, ऐसा हमारे साथ होना चाहिए, तेरे साथ क्यों”…? उस वक्त दिल तो किया की बस गले से लगा लूँ अपने इस दोस्त को, लेकिन शायद भावनाएं दिखाने में मैं थोड़ा कमज़ोर रहा हूँ, इसलिए कुछ न कह सका बस मुस्कुरा के रह गया.

पिछले साल जब मैं दिल्ली गया था.

पिछले  साल जब दिल्ली गया था तो बहुत दिनों बाद मती से मुलाकात हुई.एक पूरी शाम मती के साथ बिताई.. बहुत अच्छी शाम रही वो. अगले दिन रात में मेरी ट्रेन थी, एक मित्र के यहाँ रुका हुआ था..दोपहर में मती ने एक छोटा सा प्यारा सा एस.एम्.एस किया, एकदम याद तो नहीं की क्या लिखा था लेकिन ऐसा कुछ मेसेज किया मती ने  “भाई मैंने बहुत दिन बाद इंजॉय किया, बहुत दिनों बाद मजा आया…टेक केयर एंड हैव ए नाईस जर्नी
हलकी सी मुस्कराहट चेहरे पे दौर गयी..जिस मित्र के यहाँ रुका था उसने पुछा -क्या हुआ अभिषेक जी, बड़ा मुस्कुरा रहे हैं…मैंने जवाब दिया “एक दोस्त का प्यार मोबाइल स्क्रीन पे दिख रहा है इसलिए मुस्कराहट है चेहरे पे ” 🙂

आखरी लाइनों में बस यही कहूँगा इन दो दोस्तों से  – I Miss You Buddy. 


[इस पोस्ट का शीषर्क और आईडिया मेरे दोस्त सुदीप ने दिया है, जो अभी कैलिफोर्निया में है. उसने ये भी कहा की उसके बारे में कुछ न लिखूं, क्यूंकि उसे उसकी बड़ाई सुननी ज्यादा पसंद नहीं..खैर ये पोस्ट तो इस श्रृंखला का पहला पोस्ट है, अभी जारी रहेगा ये दोस्ती का सफर..फ़िलहाल पन्द्रह अगस्त की तय्यारी करनी है, 🙂 आप लोग कर रहे हैं न अपनी आज़ादी का जश्न मानाने की तय्यारी 🙂 ]

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  1. ये दोस्ती हम नही तोड़ेंगे …
    बहुत प्यारी दोस्ती के जज्बे से रची पोस्ट ..मुझे भी कुछ बिछड़े दोस्त याद आ गए 🙂 अब मेरा भी मन कर रहा है उनके बारे में लिखने का देखिये कब हो पाता है 🙂

  2. mujhe to aisa lagta hai main tum jitna hi jaanti hun inhe..

    prabhat se jyada baat to nahi hui bt he is super nice 🙂
    aurr mati se to baat hi nai hui. bs tum jo batate the utna hi pta hai.

    bahut hi achha hai yeh post toh. seems bahut miss kar rahe ho in dono ko 🙂

    loved this one 🙂

  3. दिल चाहता हैं कभी ना बीते चमकीले दिन….
    दिल चाहता हैं हम ना रहें कभी यारों के बीन…
    दिन दिन भर हो प्यारी बातें…
    झूमे शामें… गाए रातें…
    मस्ती में रहे डूबा डूबा हमेशा शमा…
    हम को राहों में यूँही मिलती रहें खुशियाँ….

  4. मुझे पटना के दोस्त याद आ गए – मीनू,रश्मि, प्रेरणा…जब हम कदमकुआं में रहते थे 🙂

  5. अभि बेटा!! हमरे दोस्त कहते हैं कि दोस्त मतलब जब दो अस्त हो जाए और एक का उदय हो… एहाँ पर दो का मतलब गिनती वाला दो नहीं अलग अलग ब्यक्ति से है… हमरे लिए त दोस्ती याद करना बहुत जरूरी है, सायद मुनव्वर भाई का सेर हैः
    उम्र होने को है पचास के पार
    कौन है किस जगह पता रखना.
    तुमरा दोस्ती सलामत रहे…

  6. वाह बहुत बढिया मित्र प्रसंग है।

    नागपंचमी की बधाई
    सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाएं-हिन्दी सेवा करते रहें।

    नौजवानों की शहादत-पिज्जा बर्गर-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार और आजादी की वर्षगाँठ

  7. वाह अभिषेक वाह दोस्तों के दोस्त…

    बहुत कुछ याद दिला दिया तुमने यार….

    और बहुत सारी बातें जो दोस्तों के बीच होती हैं, वे दिल और तन मन में बसा रखी हैं।

    कैंसर के रोगियों के लिये गुयाबानो फ़ल किसी चमत्कार से कम नहीं (CANCER KILLER DISCOVERED Guyabano, The Soupsop Fruit)

  8. अब आपके बीच आ चूका है ब्लॉग जगत का नया अवतार http://www.apnivani.com
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    धनयवाद …
    आप की अपनी http://www.apnivani.com

  9. दिल चाहता हैं कभी ना बीते चमकीले दिन….
    दिल चाहता हैं हम ना रहें कभी यारों के बीन…
    दिन दिन भर हो प्यारी बातें…
    झूमे शामें… गाए रातें…
    दिल चाहता है ……………………………………….घर हो या कोई शहर जब छोड़ते हैं तो बहुत से रिश्ते भी साथ छोड़ जाते हैं……

  10. जो तुमको अच्छे से जानता है न…वो बिना बोले भी तुम्हारी हर भावना पहचान लेगा…सो चिंता नहीं करो…| तुम भले खामोश रहो, पर कुछ लोग बहुत साफ़ सुन लेते हैं तुम्हारी ख़ामोशी की भी आवाज़…|
    तुम रिश्तों की कितनी कद्र करते हो, चाहे वो खून से इतर ही हो…ये बहुत अच्छे से जानते हैं सब…|
    प्यारी सी यादों में लिपटी इस पोस्ट के लिए…<3

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