ऐसी आधुनिकता क्यों?किसलिए?


पुरानी चीज़ों से मुझे कुछ ज्यादा लगाव है. फिर चाहे वो पुराने हिन्दीफ़िल्में हों, पुराने गाने, ग़ज़लें या फिर पुराने दिनों की यादें. जल्दी नए रंग में ढलने में मुझे थोड़ा वक़्त लगता है. मेरे जो करीबी लोग हैं जो मुझे जानते हैं वो ये भी जानते हैं कि मुझे पुरानापन से थोड़ा लगाव सा है…नोस्टैल्जिक भी जल्दी हो जाता हूँ….लेकिन वो ये भी जानते हैं कि नयी तकनीक हो या नया संगीत या फिर नयी फिल्म…मैं सब की अपडेटेड जानकारी रखता हूँ. पर कुछ लोगों को कभी कभी ये ग़लतफ़हमी भी हो जाती है कि मैं पुराने ख़यालात वाला एक बहुत ही साधारण सा, नीरस सा व्यक्ति हूँ जिसे काम के अलावा किसी भी अन्य चीज़ों में रुचि नहीं है और जो हर दर्जे तक एक बोरिंग इंसान है.

मेरे ऑफिस में ये ग़लतफ़हमी रखने वालों में से एक लड़की है प्रिया और एक लड़का स्नेहिल, जिनकी ये ग़लतफ़हमी आज ही दूर हुई.. ऑफिस में मैं किसी से पर्सनल बातें शयेर नहीं करता और नाही किसी से वैसी मित्रता है. इसकी कुछ वजह भी है. मैं बस अपने काम से मतलब रखता हूँ और फिर वक्त होते ही चुप चाप ऑफिस से निकल जाता हूँ घर के लिए. बैग में हर वक्त एक दो कवितायों की या गज़लों की किताबें रहती है, जैसे फ़िलहाल बैग में है हरिवंसराय बच्चन जी की “मधुकलश”. जब फ्री टाइम में ऑफिस में किताब पढ़ने लगता हूँ तो आसपास बैठे कुछ लोग बड़े आश्चर्य से मुझे देखते हैं और फिर किताब को देखते हैं. एक बार एक सहकर्मी ने पूछ दिया कि – यार तुम पागल हो, ग्लोबल ज़माना हो गया है और आज भी तुम ये सब पुराने हिन्दी नोवेल, कविताओं में अटके हुए हो..हिन्दी के नॉवेल तो उस ज़माने में लिखे गए थे जब अलग दिन थे, जब वक्त अलग था, सब कुछ अलग था. अब तो उसका प्रैक्टिकल जिंदगी से कोई सरोकार नहीं..?इतने अच्छे अच्छे इंग्लिश के नोवेल हैं, उन्हें पढ़ो..तुम्हे अगर पता नहीं है कि कौन से इंग्लिश नॉवेल पढनी चाहिए तो बोलो मैं हेल्प करूँगा.. एक बार शुरू करो इंग्लिश पढ़ना, ज्यादा भारी भरकम लैंगग्वज नहीं इस्तेमाल होते हैं. कहो तो मैं बताऊँ, कि कौन से नॉवेल पढ़ने चाहिए तुम्हे.?

मैंने थोड़े गुस्से में, थोड़ा प्यार जताते हुए, आँख तरेरते हुए उसे देखा और फिर कहा – का करें भाई, अंग्रेजी में बचपन से कमज़ोर हैं. घरवाले शुरू से इंग्लिश मीडियम स्कूल में ही पढाई करवाएं हैं, जब बारहवीं में था तो उसी वक्त मिल्स एंड बून के करीब १०-१२ नॉवेल पढ़ डाला था, बारहवीं में ही टाइमपास के लिए दस पन्द्रह अंग्रेजी कवितायें भी डायरी में लिख डाला था… इंजीनियरिंग के दिनों में सिडनी शेल्डन, हैरी पॉटर, रोबिन शर्मा, चेतन भगत, किरन देसाई, डैन ब्राउन, मिल्स एंड बून, जेन ऑस्टेन के साथ और भी कई को पढते आया हूँ….पर यार अंग्रेजी बुझाता ही नहीं तो हम का करें…? इसलिए इत्ता नॉवेल पढ़ने के बाद हम सोचे कि अगर अंग्रेजी समझ में नई आ रहा तो हिन्दी ही पढ़ लेते हैं…अब तुम बताओ गलत करते हैं का..?” हमारे प्रिय सहकर्मी मिस्टर स्नेहिल चुप होकर रह गए. कुछ बोलते उनसे बन नहीं रहा था. बगल में ही मिस प्रिया बैठी हुई थी, जो कि कुछ देर पहले गाड़ियों के बारे में कुछ न जानते हुए भी बकवास किये जा रही थीं.., मैंने उससे कहा – “प्रिया यु नो वन थिंग, इन दैट मूवी पोर्श 911gt वाज देर…नॉट दैट एस्टन मार्टिन..एंड निसान जी.टी.आर कैन बीट पोर्श ९११ ईज़ली….एंड वन मोर थिंग…..द बेस्ट एंड परफेक्ट रोड मूवी इन माई व्यू वास “वैनिशिंग पॉइंट’ व्हिच वास रिलीजड इन १९७१ स्टारिंग बैरी न्यूमेन… एंड वाज़ बेस्ड ऑन एग्ज़िस्टेन्शलिज़म, जिसे हिंदी में हम अस्तित्ववाद भी कहते हैं. दोनों एकदम खामोश हो गये ..उन्हें ये अंदाज़ा भी नहीं होगा कि मैं इतनी जानकारियां उन्हें दे दूँगा..

प्रिया ने बस इतना कहा “अभिषेक यु हैव ऑसम नालेज अबाउट कार एंड मूवीज. 🙂

मैंने फिर स्नेहिल से कहा “भाई देखो हिन्दी पढ़ने में कोई बुराई नहीं, बल्कि फक्र की बात है, हिन्दी हमारी मातृभाषा है. अंग्रेजी पढो, खूब पढों लेकिन इस चक्कर में हिन्दी को मत भूलो. मेरी हिन्दी वैसी कोई मजबूत भी नहीं, नाही मैं कुछ साहित्यिक लिख सकता हूँ, उतनी क्षमता नहीं है मुझमे, मगर फिर भी मुझे हिन्दी लिखने और पढ़ने में एक अलग ही मजा आता है, कह सकते हो एक नशा जैसा है. अपने भाषा में बात कर के देखो, बातों के मायने बदल जायेंगे. तुमने देखा होगा मेरा प्रेज़न्टेशन, अगर हमारे मैनेजेर अनुमति दें तो वही प्रेज़न्टेशन मैं हिन्दी में दे के दिखाऊंगा, देखना ज़मीन आसमान का फर्क पड़ता है, क्यूंकि हिन्दी में मैं अंग्रेजी से ज्यादा सहज हूँ, बातों को आसानी से दूसरों तक पंहुचा सकता हूँ और समझा सकता हूँ, और यही एक कारण है कि तुम लोगों से मैं हिन्दी में ही बात करता हूँ. अंग्रेजी में बात करना मुझ थोड़ा बनावटी लगता है. दोस्तों में भी अंग्रेजी में बात करेंगे तो फायदा यार?”

बेचारा स्नेहिल का झटके खाने का आज दिन था, तो वो बस इतना कह के रह गया “बिलकुल सही कह रहे हो यार”

कुछ दिनों पहले मैंने एक पोस्ट में इस बात का जिक्र किया भी था कि कैसे हमारे सो-कॉल्ड मोडर्न जेनरेशन के लोग इस अंग्रेजी की बढ़ती हवा में हिन्दी बिलकुल भूलते जा रहे हैं. मैं ऐसे कितने लोगों को जानता हूँ जो सैकड़ों पुरानी ब्लैक एंड वाइट अंग्रेजी फ़िल्में देख चुके हैं, लेकिन हिन्दी के फिल्मों की कोई जानकारी नहीं है. राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार, बलराज साहनी, प्रदीप, भरत भूषण जैसे एक्टर्स तक को नहीं पहचान सकते, लेकिन अंग्रेजी फिल्मों के हर नए से नए और पुराने से पुराने अभिनेतायों के नाम उनके जबान पर चढ़ा रहता है. मेरे घर के बगल में एक लड़का रहता है, असाम का है…उस लड़के की ऐसी कहानी है की वो हिन्दी का एक लाइन नहीं पढ़ सकता, ब्लॉग पोस्ट अगर पढ़ने कहूँ उसे तो उसे कम से कम १-२ घंटे तो लगेंगे ही उसे. जनाब ये तक नहीं पहचान पाते कि कौन दिलीप कुमार है और कौन शम्मी कपूर और कौन राज कपूर. लेकिन कोई भी पुरानी अंग्रेजी फिल्म दिखा दीजिए, हर अभिनेता/अभिनेत्री का नाम बखूबी बता देंगे साहब जी. कुछ दिन पहले इन्हें और इनके एक मित्र को मैंने अच्छा ख़ासा सुना भी दिया था. बात युहीं चली थी गुरु दत्त और बिमल रॉय के फिल्मों के बारे में, हमारे एक अच्छे मित्र हैं, उनसे ही बातें कर रहा था …वहां ये साहब भी थे और इनके वो मित्र भी. झट से इन्होने कह डाला कि अरे यार वो सब बकवास फिल्म क्यों देखते हो, बिना सर पैर वाली बोरिंग सी. बिना किसी मतलब की….अब हमारे सामने कोई गुरु दत्त और बिमल रॉय के फिल्मों के बारे में ऐसी वैसी बातें करे और हम जाने दें? ऐसा तो हो नहीं सकता. मैंने भी उलट के एक करारा जवाब दिया, “जब हिन्दी समझ में नहीं आती तो हिन्दी फिल्मों के बारे में बोलने का तुम्हे कोई हक नहीं…और जब फिल्म देखने का अक्ल हो जाए, जब ये समझने लगो की फिल्म आखिर होती क्या है, तब फिर से देखना, शायद पसंद आ जाए, और अगर फिर भी इनकी बनाई हुई फ़िल्में पसंद नहीं तो फिर कोई कुँए में जा कर डूब मरो “

ऐसा इन दो लोगों के साथ ही नहीं, कितनों के साथ मैंने देखा है. मैं वही बात फिर से दोहराता हूँ जो मैं पहले भी कह चूका हूँ कि अगर किसी को कुछ नक़ल उतारनी ही है, पश्चिमी सभ्यता की तो बस कपड़ों और स्टाइल की ही नक़ल क्यों? उनकी और भी बहुत सी अच्छी बातें हैं, वो नक़ल क्यों नहीं करते? हर देश की सभ्यता, संस्कृति अलग होती है, खास होती है. हमें बहुत बातें सीखने को मिलती है. हमें पश्चिमी सभ्यतायों से भी अच्छी अच्छी बातें सीखनी चाहिए. हमारे देश में तो वैसे ही सो-काल्ड वेस्टर्न कल्चर को अपनाती लड़कियों के कपडें दिन ब दिन घटते जा रहे हैं,कपड़ों का घटना तो है ही, साथ ही साथ मानसिकता भी घटती जा रही हैं..”लव/प्रेम” का इन्होंने तो पूरा अर्थ ही बदल के रख दिया है. लव आज कल लस्ट से ही मिलता-जुलता शब्द बन कर रह गया है. हम लोग के पीढ़ी के जो लोग हैं, यानी जो हमारे उम्र के लगभग के हैं, उनमें तो फिर भी बहुत शालीनता बची हुई है, लेकिन अभी के जो नए पीढ़ी के युवा आ रहे हैं उनमें से बहुत ऐसे हैं जो अंधापन में आकार पता नहीं किस सभ्यता के पथ पर चल रहे हैं, कौन सी संस्कृति अपना रहे हैं, ये उन्हें खुद को नहीं पता. जो जिम्मेदार माता-पिता हैं वो तो अपने बच्चों को फिर भी सही राह, सही पथ दिखा देते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो अपने “बीजी” कामों से वक्त नहीं निकाल पाते, उन्हें इस बात की फ़िक्र नहीं कि उनके बच्चे किस राह चल रहे हैं. वो राह सही है या गलत?.बच्चों के गलत राह पे जाने में सबसे ज्यादा दोष अगर किसी का है तो वो ऐसे माता-पिता का ही दोष है जो अपने बच्चों के लिए सही तरह से वक्त नहीं निकाल पाते और न कोई टोक-टाक करते हैं. हालत ऐसी हो जाती है कि जब बच्चे हद से ज्यादा बाहर चले जाते हैं और अंत में माता-पिता विवश होकर उन्हें टोकते हैं तो बच्चे उन्हीं माता-पिता के मुंह पे उलटा जवाब देकर अपने माता-पिता को शर्मिंदा कर देते हैं..

आज कल के जेनरेशन को हिन्दी में बात करना पता नहीं किन कारणों से पसंद नहीं है. वो लोग हिन्दी में बात करने वालों को/हिन्दी पढ़ने वालों को एक अजीब हिकारत भरे नज़रों से देखते हैं. वक्त के इस बदलते दौर में परिवार/प्रेम का मतलब तो वो पहले ही बदल चुके हैं. कुछ हमारे बड़ों ने रही सही कसर भी पूरी कर दी इस बात में. कितने ऐसे लोगों को देखता हूँ जो अपने माँ-पिताजी को वृद्धाश्रम में डाल देते हैं. वो ये क्यों भूल जाते हैं कि वो माता-पिता हैं, उनकी जरूरत उन्हें जिंदगी के हर पड़ाव में रहेगी. जो लोग अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में डाल रहे हैं, वो खुद को तो अपने माँ-पिता के सुख से वंचित रख ही रहे हैं, अपने बच्चों को भी दादा-दादी के प्यार और दुलार से वंचित रख रहे हैं. एक बच्चे के लिए दादा-दादी/नाना-नानी के द्वारा पायी गयी सीख/शिक्षा किसी भी स्कूली या कॉलेज की पढ़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.

कुछ महीनों पहले एक लोकल अखबार “बैंगलोर मिरर” में एक आर्टिकल पढ़ा था, जिसमें ये निष्कर्ष निकला था कि आज के अधिकतर युवाओं को ये तक नहीं पता कि सुखदेव और राजगुरु कौन हैं?..जब उनसे पुछा गया की “क्या आप जानते हैं वल्लभ भाई पटेल कौन हैं?” तो जवाब कुछ ऐसा था, जिसे पढ़ मैं स्तब्ध रह गया. जवाब था – “भारत के वर्तमान गृहमंत्री”. एक और छात्र ने तो देश के पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ही बदल दिया, उस छात्र के मुताबिक देश के पहले राष्ट्रपति थें “जवाहर लाल नेहरु” और पहले प्रधानमंत्री थे “लाल बहादुर शास्त्री” . ये दो जवाब किसी भी भारतीय को स्तब्ध कर दे. जब हमारे देश के छात्र , वो भी एक अच्छे कॉलेज के विद्यार्थी की जानकारी अपने देश के इतिहास के बारे में ऐसी है तो फिर आगे क्या उम्मीद की जाए इनसे?
चाहे बुकस्टोर हो या कोई डी.वि.डी की लाइब्रेरी हर जगह हिन्दी से ज्यादा बोलबाला अंग्रेजी का है. आज के युवाओं को देख तो कभी कभी तो ये भी शक होने लगता है कि हमारे देश की भाषा अंग्रेजी है या हिन्दी? किसी भी शहर का कोई भी बुकस्टोर हो, वहां आपको अंग्रेजी की कोई भी क्लासिक और ऐतिहासिक नॉवेल आराम से मिल जायेंगे, लेकिन वहीँ अगर आप खोजने चले हिन्दी के नॉवेल तो आपको निराशा के अलावा और कुछ नहीं मिलने वाला. एक दो नॉवेल चर्चित और अच्छी नॉवेल मिल जाए अगर तो अपनी किस्मत समझीये. बुकस्टोर वाले भी इसके जिम्मेदार हैं, लेकिन अकेले बुक स्टोर वाले ही क्यों? उनकी बात भी सही है, किताब खरीदने वालों में ज्यादा तादाद अंग्रेजी नॉवेल खरीदने वालों की है..मॉल और शॉपिंग प्लाज़ा में जहाँ ये बड़े बड़े बुक स्टोर हैं, वहां खरीदारी करने ज्यादातर हाई-सोसाइइटी के लोग आते हैं जो पता नहीं कबसे अंग्रेजी को ही अपनी सभ्यता, संस्कृति और भाषा मान लिए हैं. सभी हाई-सोसाइइटी के लोगों पे मैं इल्जाम नहीं लगा रहा, बहुत से ऐसे भी हैं जो अपनी सभ्यता जानते हैं और आदर भी करते हैं. जहाँ मैं रह रहा हूँ, वहीँ पास में कुछ नए लड़के रहने आये हैं, उनसे एक दिन ऐसे ही मजाक में मैंने शर्त लगाई, मैंने कहा की देखते हैं तुम्हे १० लेखक/लेखिकायों का नाम पता है या नहीं. उसने एक ही सुर में कम से कम १५-२० लेखक/लेखिकायों के नाम बताये, जिसमें से एक भी हिन्दी के लेखक नहीं थे. फिर मैंने शर्त थोड़ा घुमाया और कहा , तुम मुझे १० हिन्दी के लेखक का नाम बताओ, मैं तुम्हे शाम में आइस-क्रीम खिलाऊंगा..वो बेचारा बस दो नाम बोल सका और वो भी बहुत सोच कर – हरिवंस राय बच्चन और प्रेमचंद. मैं समझ नहीं पा रहा था कि उसकी इस हालात पे दया करूँ या गुस्सा या फिर हँसु?
बात बस इतनी है कि इस आधुनिकता के युग में आज के युवा लोग अजीब से आधुनिकता के हवा के शिकंजे में फंसते जा रहे हैं, हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति विशिष्ट है, इसे संभाल के रखने की बहुत जरूरत है और अगर हमारे युवा ही हमारी संस्कृति को इस कदर अपने पैरों के नीचे कुचलेंगे तो कितने समय तक भारत अपने संस्कृति के लिए जाना जाएगा? ऐसे में तारीफ़ करनी चाहिए कुछ ऐसे लोगों को जो भारत से दूर रह कर भी अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता और अपनी बोली को एक नयी पहचान देने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. अभी शाम में शिखा वार्ष्णेय जी का एक ये लेख पढ़ रहा था , इससे मुझे पता चला कि कैसे सात समंदर पार हिन्दी को बचाने के लिए कितने जतन कर रहे हैं लोग. जबकि वो लोग अपने देश से कितने दूर हैं, फिर भी अपने दिलों में भारत को जिन्दा रखे हुए हैं, और उनकी ये कोशिश हर पल रहती है की अपने भारत की सभ्यता संस्कृति जिन्दा रहे.
ऐसे में मुझे फक्र होता है इस बात का कि मेरे कुछ दोस्त हैं जो देश से बाहर रहकर भी अपने अंदर हिंदुस्तान को हर पल जिंदा रखे हुए हैं. दिव्या वर्मा ,शिखा सिन्हा ,स्तुति पाण्डे..ये ऐसे कुछ दोस्त हैं जो भारत से बाहर रह रहे हैं पर दिल से सौ फीसदी हिन्दुस्तानी, इनकी हर धड़कन ये कहती है की हम भारत के रहने वाले गर्वित भारतीय हैं.
इस आधुनिकता के चक्कर में कहीं ऐसा न हो की इस गाने के कोई मायने ही न रहे …
“ये दुनिया एक दुल्हन…दुल्हन के माथे की बिंदियाँ,

ये मेरा इंडिया..आई लव माई इंडिया…”

“देश..देश की परंपरा, सभ्यता, संस्कृति से बढ़कर कुछ नहीं,

कोई धर्म नहीं, कोई रिश्ते-नाते नहीं..कोई व्यक्ति नहीं..

देश सर्वोपरि है “

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  1. aapne bahut sahi jawab diya apne dost ko.actually i really admire you for your love of the hindi language. it takes guts to be different, esp. in today's age where everyone is just blindly copying others, without any trace of individuality.!

    you should really be proud of yourself and continue doing the things you love and the stuff you want to read. you don't need a dictator in your life. you have the full fundamental right to live your life according to your own rules and wishes.

  2. बहुत अच्छी पोस्ट है …
    असल में समस्या ये नहीं है कि हिंदी आती है या नहीं ..समस्या ये है कि खुद हिंदुस्तानियों को ये कहने में शर्म आती है कि उन्हें हिंदी आती है …
    किसी भी और भाषा या संस्कृति को जानना बहुत अच्छी बात है मेरा खुद का अनुभव है कि जितनी भाषाएँ आप जानते हो उतना ही आसानी से आप अपनी बात कह पाते हो ..परन्तु किसी भी चीज़ के लिए अपनी भाषा का अपमान या त्रिस्कार बहुत दुखद है .और शायद यही वजह है कि सारी और क़ाबलियत होते हुए भी हम आज पश्चिमी देशों से पीछे हैं ..क्योंकि हमें अपना ही मान रखना नहीं आता.

  3. बहुत बढिया व विचारणीय आलेख लिखा है….यह सच है हिन्दी बोलने पढ़ने वालो को छोटा समझा जाता है….असल मे शिक्षा का माहौल ही ऐसा बना दिया गया है..कि सभी अपनी भाषा की बजाय अंग्रेजी की ओर भाग रहे हैं..

  4. यार भाई दिल से निकला हुआ लिखते हो इसलिए बहुत पसंद है लेखनी तुम्हारी !!
    बाकी जो जिसमें कोई प्रतिभा है उसे भाषा का बैरियर रोक ही नहीं सकता …कुछ लोग दिखावा करते हैं और कुछ अंग्रेजी की कॉपी में ना हिंदी वाले रह पाते हैं और न ही अंगरेजी वाले …संतुलित लाइफ या समर्पित अन्द्दाज ही सफल है बाकी के लिए – धोबी का कुत्ता घर का न घाट का !!

  5. एकदम दिल से लिखे हो बचवा अऊर दिल में त हिंदिए है..एही से हम भी बिहरिए में लिखते हैं. अब कोई कुच्छो कहे..हिंदी बोलने में सरमाने का मताब अपना माँ को माँ कहने में सरम..बहुत बढिय..

  6. अच्छी पोस्ट है अभिषेक, बहुत लोगों को सोचने पे विवश करेगी ये पोस्ट !

  7. बिल्कुल सही, क्या प्रवाह है, बेहतरीन, अपने भाव लिख देना ही ब्लॉगर कला है, हम भी अपनी मातृभाषा से जुड़े रहते हैं, जहाँ तक कोशिश होती है, हिन्दी में ही पढ़ते हैं, परंतु आज कल की पीढ़ी जो मुक्तिबोध और प्रसाद के नाम तक नहीं पता है, बहुत दर्द होता है यह सब देखकर।

  8. अभी सर ये प्रोब्लम सिर्फ आपके साथ ही नहीं है हमारे साथ भी है मेरे कई दोस्तों की ये परेशानी की बात है की मैं हिंदी में क्यों लिखता हूँ क्यों मैं हिंदी बुक पढता हूँ…इंक ये मेंतेलती बन गई है की अच्छी चीजें केवल इंग्लिश में ही हो सकती हैं..इस सोच में उनका कोई दोस नहीं डर असल हमारा परिवेश ही ऐसा है जहान एसी सोच होना कोई बड़ी बात नहीं.मैं असर देखता हूँ पार्कों में मम्मी पापा आपस में हिंदी में बात करते हैं और बेटे से इंग्लिश में सोचिये आगे चल कर हिंदी को किस नज़र से देखेगा ?………….कई मेरे फ्रेंड कहते हैं यार तूं अच्छा लिखता है लिख लेकिन इंग्लिश में लिख हिंदी में लिखने से kya hota है ?सोचिये कैसी jabardsti है…………

  9. बहुत ही बढ़िया लिखा है अभिषेक…एकदम दिल से…एक -एक शब्द लगा ,जैसे मेरे ही मन की बात हो….ये सारी बातें मन में सर उठाती रहती हैं…ब्लॉगजगत में तुम जैसे कुछ युवा लोगों को सक्रिय देख बहुत अच्छा लगता है…कि किसी को तो फ़िक्र है हिंदी की.

    मुझे हिंदी के साथ-साथ भाषा की भी चिंता होती है…..जो लोग अंग्रेजी की शान दिखाते हैं…वे भी अच्छी या शुद्ध अंग्रेजी ना तो बोलते हैं ना लिखते हैं…किताबें भी Classics नहीं Best Sellers ही पढ़ते हैं. उनलोगों से भी कभी अंग्रेजी की क्लासिक्स फिल्मों या किताबों के नाम पूछ कर देखना,नहीं बता पाएंगे.

    यही बात क्षेत्रीय भाषाओँ के साथ भी है,मलयालम,मराठी,तमिल वाले भी दुखी हैं कि उनके बच्चे अपनी मातृभाषा नहीं जानते.

    बस यही है..हिंदी विलुप्त तो नहीं हो रही है…पर सिमट जरूर गयी हैं…खासकर बड़े शहरों में.

  10. Kuch samay pahle maine ek article padha tha newspaper me.. ki ajkal Hindi bhasa apni lokpriyata khoti jarahi hai… or kaise ajkal bhartiya, paschimi sabhyata ka andha anusaran kr rahe hain… Lekin Abhishek apka ye Hindi bhasa k liye jo prem hai or hamari sanskriti k liye jo adar bhav hai.. isko dekh kr kon kahega ki Hindi ne apna Charm kho diya.. Cheers for INDIA and its varied culture. There is hardly any culture in the world that is as varied and unique as India. I LUV INDIA.. ye to mere dil me basta hai…
    vry interesting post:)

  11. बाप रे.. गजब का भाषण झाडे हो रे.. गर्दा उड़ा दिए(अंग्रेजी दा लोगों का).. हमारे साथ उल्टा होता है.. आस-पास के लोग मुझे अंग्रेजी दा समझ बैठते हैं, और बात अगर हिंदी की हो तो वे बगलें झाँकने लगते हैं.. 😉

  12. सच में ! बहुत अच्छी दिल से लिखी पोस्ट. और रश्मि दी की बात भी सही है. जो अंगरेजी बोलते भी हैं वो भी इतनी गलत कि पूछो मत और सोचते हैं कि अगले को इम्प्रेस कर लेंगे.
    पर मुझे लगता है कि यदि आप अपनी मातृभाषा को बोलने में फख्र महसूस करते हैं तो आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, एक अलग सी ऊर्जा होती है आपमें.
    बात यही है कि हर एक भाषा सीखो, और अंगरेजी तो ज़रूर सीखो क्योंकि वो तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, पर अपनी भाषा को बोलने में हमेशा फख्र महसूस करो.
    बहुत अच्छा लेख.

  13. wow !!!! कस्सम से…क्या भाषण दिए हो…गज्ज़ब 😛
    लेकिन बहुत सही बात बोले हो !!!!

  14. sach mein gazab ka bhashan hai..:)
    ऐसा एक बार मेरे साथ भी हुआ था कॉलेज में जब मेरे एक सेनियर ने मेरे कमरे में शरतचंद्र जी एक कोई उपन्यास देखकर मुझे अंग्रेजी पढने की सलाह दी थी…
    मुझे उस वक़्त काफी हंसी आई थी (मन में, अब जूनियर होके सामने में तो हंस नहीं सकता था)…
    फिर उन्हें जब पता चला कि मैंने अंग्रेजी स्नातक किया है तो उनका चेहरा देखने लायक था…. शेक्सपियर को बहुत पढ़ा था…अब हिंदी पढना चाहता हूँ दिल से….

  15. बहुत ही बढ़िया पोस्ट है,"अभी जी" आप की इस पोस्ट को पढ़ कर ऐसा लगा आप के और मेरे खयालात कफ़्फ़ी मिलते जुलते हैं॥ मगर आप की कुछ बातें से हम सहमत नहीं है भई 🙂 किसने कहा की आप boring इंसान है हमे तो ऐसा जरा भी नहीं लगता… और रही बात पुरानी चीज़ों की तो भई "old is gold" मगर आप को नहीं लगता की आपने कुछ ज्यादा ही लम्बा लिख डाला है 🙂 देखिये बुरा न मानियेगा जो हमको लगा वही बता रहे है। मगर आपके अनुभव अच्छे लगे मुझे और मेरे अनुभवों से मिलते जुलते भी …शुभकामनायें… लिखते रहिए… पढ़ते रहिए…और संपर्क बनाये रखिये धन्यवाद

  16. ये है बहुत बोरिंग इंसान.. हम गारंटी देते हैं पल्लवी जी.. बहुत साल से जानते हैं इस नालायक को.. मेरी बात मान भी लीजिए.. 🙂

  17. अरे…gazzzzzabbbb…:) तुम ऐसे झाड़ भी सकते हो किसी को…??? पर इसे पढ़ कर कल की हम दोनों की बातचीत याद आ गई…इसी पोस्ट का ज़िक्र किए थे न तुम…??? और btw…ज़रा सामने तो लाना कभी ऐसे लोगो को जो तुम्हें बोरिंग समझते हैं…:P बाकी तो तुम खुद ही समझ जाओ भाई…:) 😛
    पर सच्ची…दिल से लिखी ये पोस्ट दिल तक ही पहुँची है…|
    और प्रशांत…जानते तो हम भी हैं इस नालायक को…:) 😛

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