किस्मत भी क्या क्या खेल खेलती है,

साल  2000

हम सब उन्हें गोनू  भैया या के नाम से जानते हैं..उनका नाम है ऐसे रवीश झा है. उम्र में करीब 6-7 साल बड़े होंगे मेरे से. मैं केमिस्ट्री पढ़ने जिस कोचिंग(साल २०००) में जाता था..वहीँ बगल में एक छोटी सी दुकान थी उनकी, इलेक्ट्रिकल सामान की. दोस्ती अचानक से हो गयी, कैसे ये याद नहीं. क्यूंकि चंद मुलाकातें ही हुई थी और हम बहुत जल्द अच्छे दोस्त बन गए थे. पढाई देर से शुरू हुई थी उनकी तो उस वक्त ग्रैजूएशन सेकंड इयर में थे लेकिन इंजीनियरिंग पढ़ने की अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे. 

किस्मत ने शायद उनका कभी साथ नहीं दिया. संघर्ष कुछ ज्यादा ही रहा उनके साथ. उन्होंने पहले 3 साल इंजीनियरिंग की तैयारी की, कहीं उन्हें दाखिला नहीं मिल पाया..घर की आर्थिंक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि मैनज्मन्ट फीस से या डोनेशन देकर कोई प्राइवेट कॉलेज में पढ़ सकते. वो खुद भी ऐसा नहीं चाहते थे. मेरिट पर हो जाए कहीं तो पढ़ लेंगे यार, वरना यही सही है. ऐसा कहते थे वो. हम सब ये समझ नहीं पाते थे कि जिस इन्सान को इतनी जानकारी है, उसका इंजीनियरिंग इंट्रेंस क्लिअर क्यों नहीं हो रहा. यहाँ तक कि हम ये कहते थे, गोनू भैया का नहीं हो रहा तो हम लोगों का चांस ही क्या है? 

इंजीनियरिंग परीक्षाओं की तैयारी के चौथे साल में (2000) उनका एक इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में सलेक्शन हुआ..लेकिन किस्मत देखिये, घर की हालात और बुरी होती चली गयी..दूकान भी कुछ खास नहीं चल रही थी...जो पैसे थे जमा थे वो घर के कुछ इमर्जन्सी कामों में खर्च होते गए. पैसे का इन्तेजाम भी नहीं हो पा रहा था.. और शायद लोन भी नहीं ले पाये या लेना नहीं चाहते थे या लोन मिला नहीं.....जो भी हो, पैसे का इन्तेजाम नहीं हो पाया, और वो इंजीनियरिंग में दाखिला नहीं ले पाये. इन सब के अलावा कुछ एक व्यग्तिगत परेशानी भी उन दिनों इनको घेरे रहती थी. इन सब के बावजूद हर शाम जब हमारी कोचिंग की छुट्टी होती थी, वो अपने छोटे से दूकान पे आना कभी नहीं भूलते थे...शाम में उनका दुकान पर रहना तय था. कहते भी थे, कि तुम लोगों के कारण दुकान पर आ जाता हूँ मैं. हमारे साथ हंसी मजाक, गप्पे बिलकुल सामान्य ढंग से करते थे, हमें ज़रा भी आभास नहीं होता कि वो कैसी परेशानियों का सामना कर रहे हैं. 

एक सुबह वो मिले मुझसे, युहीं रास्ते में मिल गए थे.  मुझे काफी परेशान से दिखे वो, लेकिन समझ नहीं पाया था कि माजरा क्या है. बाद में पता चला कि उसी सुबह एड्मिसन लेने कि उनकी रही सही उम्मीद भी खत्म हो गयी थी. उस शाम भी वो दुकान पर आये थे, अपने उसी मस्त अंदाज़ में, मेरे एक दोस्त जिसे पता नहीं था कि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं, वो उनसे पूछ बैठा.. "भैया आपका इंजीनियरिंग कब से शुरू है, अब तो हो भी गया सलेक्शन..कब तक हैं यहाँ?" ... उन्होंने  मुस्कुराते हुए जवाब दिया, कहा "अरे  हम उहाँ चले जायेंगे तो हियाँ ई ग्रैजूएशन कौन कम्प्लीट करेगा रे...इधरे पढेंगे रे.. और तो और ऊ जोन कॉलेज में हुआ है ऊ भी कोनों खास नहीं है रे, पईसवा तो खून की तरह चूस लेता है और पढाई के नाम पे कुच्छो नहीं...हम यहीं रहेंगे रे तुम सब के साथ, तुम सब लइकी को लाइन मारता है न, त जब मार खायेगा हमही न बचायेंगे रे..."  हम सब समझ गए थे, लेकिन हमारा वो दोस्त नहीं समझ पाया था कुछ, वो हसने लगा उनकी बात पर...मैंने बाद में उसे असलियत बताई तो उसे बड़ा अफ़सोस भी हुआ, कि अनजाने में वो कैसा सवाल पूछ बैठा. उस दिन लेकिन भैया जितनी भी कोशिश किये, उनके चेहरे पर उदासी की झलक साफ़ दिख रही थी, उस दिन वो छुपा नहीं पाए अपनी उदासी को...

उस शाम उनके दुकान पर मैं बहुत देर तक बैठा रहा, सभी दोस्त चले गए थे लेकिन मैं वहीँ रहा. बहुत सी ऐसी बातें उन्होंने बताई जिनको सुनकर मैं दंग रह गया. समाज की गंदी सोच और लोगों की गंदी मानसिकता के शिकार थे वो भी, किस तरह से ये बताना थोड़ा मुश्किल होगा, व्यग्तिगत कारण हैं उसके. मैं जब रात में घर लौटा तो बहुत देर तक उस रात मुझे नींद नहीं आई, अपनी ज़िन्दगी के बहुत से पन्ने उन्होंने मेरे सामने खोले थे, और उन्ही बातों में मैं बिल्कुल उलझा हुआ सा था. यकीन करना मुश्किल था कि इतना मस्त मौला इंसान जो मजाक करते फिरता है, कितने संघर्ष के दिन बिता रहा है. कितनी घुटन में वो ज़िन्दगी बिता रहा है, कितनी परेशानियों के बावजूद.


गोनू भैया हम सब के हीरो थे. हम उन्हें अक्सर सेन्टर ऑफ एक्सलन्स कह के बुलाते थे...मैथ्स, फिज़िक्स तो उनके बाएं हाथ का खेल था...मैं ये नहीं कहूँगा की वो जीनिअस थे, लेकिन एक बेहतरीन विद्यार्थी थे उस समय ये पक्के तौर पे कह सकता हूँ...हमने उनसे कितना कुछ सिखा है..हमारी बातचीत भी अक्सर विषय के बारे में होती थी..सलाह देते रहते थे कि कहाँ कहाँ तुम लोग को फॉर्म भरना है, किस किस कॉलेज के लिए ट्राई करना...
हर चीज़ में वो अव्वल रहे, बस एक ही विषय में चूक गए -इंग्लिश.वो बेचारे बहुत कोशिशों के बाद भी सही से इंग्लिश नहीं बोल पाते, अटक जाते थे...तंग आकार उन्होंने अंग्रेजी सीखना बंद कर दिया. और इस कारण उन्हें अच्छी जॉब मिलने में कितनी तकलीफ हुई ये मैं बता नहीं सकता..उतने बेहतरीन विद्यार्थी को कई कंपनी के धक्के खाने पड़े तब जाकर एक छोटी सी जॉब मिली थी उन्हें. 

दो साल बाद हम दोस्तों में से सब कहीं कहीं चले गए, कोई कहीं इंजीनियरिंग करने लगा तो कोई कहीं...सुनने में आया मेरे की ग्रैजूएशन के बाद गुल्लू भैया दिल्ली शिफ्ट हो गए..उनका पटना का दूकान भी बंद हो गया था..आर्थिक स्थिति और खराब हो गयी होगी थी शायद और कुछ पर्सनल सी बातें भी थीं...इसी बीच उनके पिता जी भी बहुत बीमार पड़ गए, जो भी भैया ने पैसे कमाए थे, सब पिताजी के इलाज में लगा दिए, लेकिन बचा नहीं सकें अपने पिताजी जो..

उसी समय के लगभग जब उनसे मेरी फोन पे बात हुई..बहुत दिनों बाद उनसे बात कर रहा था, तो मुझे भी अच्छा लग रहा था और उन्हें भी, उन्होंने कहा की अभिषेक, मैंने सोचा तुम भूल गए होगे...मैंने थोड़ा डांट भी दिया, कहा भैया आपको कैसे भूल सकते हैं......उसके बाद फिर कभी कुछ महीनो में एक दो बार बात कर लेता था, लेकिन फिर बात करना हमारा कम होता गया...जब इंजीनियरिंग खत्म कर के पटना आया तो मेरे एक दोस्त शेखर से मुझे सारी बातें पता चली, की कैसे वो लोग दिल्ली में रह रहे हैं, और दिल्ली जाने पर क्यों मजबूर हो गए थे वो,  जॉब के लिए कितनी परेशानियाँ उठानी पड़ी उनको.अब जाकर थोड़ी बहुत हालात सुधरी है.शेखर ने कहा मुझसे, वो पटना में ही हैं आजकल, मैंने बिना रुके कहा, चल अभी मिलने चलते हैं उनसे. 
शेखर ने बुलाया फोन कर के उन्हें..उन्हें देख मुझे कुछ अजीब सा लगा...बिलकुल दुबले हो गए थे, और रौनक तो चेहरे पे दिख ही नहीं रही थी..ये सोच के मैं और घबरा गया की अगर इनकी ये सुधरी हुई हालात है तो बुरे हालात में क्या हुआ होगा इनका.

उन्हें मैंने हमेशा हँसते हुए देखा था, हमेशा खुश देखा था, लेकिन उस दिन उनके चेहरे पे दूर दूर तक वो मस्ती वो हँसी दिखाई नहीं दे रही थी, हाँ लेकिन बातें वैसी ही मस्ती भरी कर रहे थे. कैसे किसी इंसान को परिस्थितियाँ बदल के रख देती है, उस दिन मैंने देखा था..जो हमेशा गाते मुस्कुराते रहता था वो अब गाना गुनगुनाना भूल गया था. .कविता लिखना मैंने उनसे ही जाना था, उनको कुछ कुछ लिखते रहने की आदत थी, वो बेहतरीन कविता लिखते हैं, लेकिन कभी किसी को उन्होंने दिखाया नहीं.उस दिन उनके पॉकेट डायरी से मुझे एक दोस्त का नंबर लेना था, ऐसे ही डायरी पलट रहा था तो देखा एक कोने पे ऐसा कुछ लिखा था(सही से याद नहीं, शायद ऐसा ही कुछ होगा) " इस जिंदगी से बेहतर कहीं मौत की गोद होगी. ", ये पढ़ के मेरी रूह अंदर तक काँप गयी थी.


आखिरी मुलाकात मेरी उनसे हुई ही २००९ में, जब मैं दिल्ली गया था, और उन्हें फ़ोन किया, वो झट से आ गए थे मेरे पास और अपने घर लेकर चले गए वो. उस रात और अगले दिन उनके पास ही रुका था मैं. सुबह जब हुई तो मैंने पूछा उनसे, भैया आपको काम पे नहीं जाना है? उन्होंने जवाब दिया था...तुम आ गया है रे, अब काम को मारो गोली. जाने कितनी ही बातें उन्होंने उस रात बताई थी मुझे, अपनी ज़िन्दगी के बारे में, अपने संघर्षों के बारे में....और मैं बस सोच रहा था कोई इन्सान इतने संघर्ष के बीच भी कैसे हँसते मुस्कुराते हुए रह सकता है जैसे भैया रह रहे हैं.

दिल्ली में भी उन्हें बेहद तकलीफों का सामना करना पड़ा था, दो परिवार वो चला रहे थे दिल्ली में, और दोनों की देखभाल में उन्होंने अपना सब कुछ लगा दिया था, शादी नहीं की थी उन्होंने.,.पूछा मैंने शादी क्यों नहीं की भैया तो कहते हैं, क्या जरूरत है रे शादी की. अपने मस्ती वाले मूड में कहे वो, "जो लड़की आएगी वो मैकडी और जाने कहाँ कहाँ खाने का प्लान बनाएगी और हम तो उसको नून तेल भात खिलाएंगे...एक्के दिन में भाग जायेगी. ऐसे ही ठीक है रे...." लेकिन मैं समझ गया था कि वो शादी क्यों नहीं किये. 


उनके बारे में तो जाने कितनी और भी बातें हैं जो शायद ब्लॉग पर लिखना मेरे लिए संभव नहीं हो, लेकिन सोचता हूँ तो लगता है इतना टैलेंटेड व्यक्ति इतने अच्छे इन्सान को कैसे कैसे दिन देखने पड़े हैं, और अब भी कितनी तकलीफों से गुज़र रहा है ये इन्सान.

Comments

  1. Man dard se bhar gaya ise padhte samay...pata nahi yah qudrat kaa kaisa nyaay hai?

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  2. बिहार में ऐसा टैलेंट बहुत बरबाद हुआ है...पता नहीं तुम बसिस्ठ नारायन सिंह का नाम सुने हो कि नहीं..एतना काबिल मैथेमेटीशियन कि लेजेंड कह सकते हो...बाकी पागल हो गए अऊर कोई ईलाज नहीं करवाया...
    अऊर एगो बात बोलें...बिस्वास नहीं करोगे...हमहूँ अपना टैलेंट वेस्ट किए हैं... :)

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  3. उदास सा हो गया मन उनके बारे में पढ़ के...भगवान् जाने अच्छे लोगो के साथ ही ऐसा क्यों करते हैं...:(
    सलिल चचा जिन वशिष्ठ नारायण सिंह का नाम लिए हैं, शायद हम कहीं पढ़ चुके हैं उनके बारे में...ठीक से याद नहीं वैसे...|

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