एक लम्हा

जिन्दगी नाम है कुछ लम्हों का..
और उन में भी वही एक लम्हा 
जिसमे दो बोलती आँखें
चाय की प्याली से जब उठे
तो दिल में डूबें
डूब के दिल में कहें
आज तुम कुछ न कहो
आज मैं कुछ न कहूँ
बस युहीं बैठे रहो
हाथ में हाथ लिए
गम की सौगात लिए..
गर्मी-ए जज़्बात लिए..
कौन जाने कि इस लम्हे में
दूर परबत पे कहीं
बर्फ पिघलने ही लगे..

(कैफी आज़मी की एक गज़ल )

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  1. आज त तुमरा ऊ पोस्ट पढे जो तुम लिंक दिए थे…उस घटना को ओही महसूस कर सकता है, जो थोड़ा पागल हो… चलो जाने दो!
    क़ैफी साहब का ई नज़्म तो कमाल है … सरमाया के पेज नम्बर 202 से… इसको हम क़ैफी साहेब के गहराई वाला आवाज में सुने हैं…इनका कलाम पढने से जादा सुनने में मजा आता था…
    कमाल का कलेक्सन है तुमरा… दिल खुस कर दिए!!

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