पुरसुकून समंदर और दायरा

कैफी आज़मी की ग़ज़लें - पार्ट १

पुरसुकून*  समंदर

ऐ थके हारे समंदर तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं .

साहिलों को तोड़ के बाहर निकलता क्यों नहीं
तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं

तेरे साहिल पर सितम की बस्तियाँ आबाद हैं,
शहर के मेमार* सारे खानमाँ-बरबाद* हैं
ऐसी काली बस्तियों को तू निगलता क्यों नहीं

तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं

तुझ  में लहरें हैं न मौज न शोर..
जुल्म से बेजार दुनिया देखती है तेरी ओर
तू उबलता क्यों नहीं

तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं

ऐ थके हारे समंदर

तू मचलता क्यों नहीं
तू उछलता क्यों नहीं

(*पुरसुकून- शांत . *मेमार - घर बनाने वाले. *खानमाँ-बरबाद - जिनका घर बरबाद हो.)

दायरा 

रोज बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर  वहीँ लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चूका हूँ जिनको
उन्ही दीवारों से टकराता हूँ..
रोज बसते हैं कई शहर नए
रोज धरती में समा जाते हैं .
जलजलों  में थी जरा सी गर्मी
वो  भी अब रोज ही आ जाते हैं..
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धुप,न साया, न *सराब
कितने अरमान हैं किस सहरा में
कौन रखता है मजारों का हिसाब
नब्ज बुझती भी, भड़कती भी है
दिल का मामुल है घबराना भी
रात अँधेरे ने अँधेरे से कहा
एक आदत है जिए जाना भी
*कौस एक रंग की होती है *तुलूअ
एक ही चाल भी पैमाने की
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद
शक्ल क्या हो गयी मैखाने की..


( *सराब-मृगतृष्णा, *कौस-इन्द्रधनुस, *तुलूअ-उदय )

Comments

  1. Aisi rachnaon se ru-bru karane ke liye tahe dil se shukriya! Qaifi mere pasandeeda rachnakar hain..

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  2. शानदार पोस्ट

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  3. तुझ में लहरें हैं न मौज न शोर..
    जुल्म से बेजार दुनिया देखती है तेरी ओर
    तू उबलता क्यों नहीं

    Bahut sundar rachna !

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