जब हम ग्रीटिंग्स कार्ड और चिट्ठी लिखते थे..कुछ पुरानी यादों के नशे में – ५

आज मेरी बहन निमिषा का जन्मदिन है, सुबह जब ऑफिस जा रहा था तो फोन कर के मैंने निमिषा को जन्मदिन की बधाई दी, और फिर कुछ देर तक हमारी बातें हुई. बातों बातों में ही निमिषा ने पूछा मेरे से, भैया, तुम एक दो साल पहले तक मुझे कार्ड भेजते रहे हो न, अब क्यों नहीं भेजते? पूरे रास्ते मैं ये सोचते जा रहा था कि सच में अब मेरे ग्रीटिंग्स कार्ड भेजने की वो आदत कहाँ चली गयी? एक वो दिन थे जब हम न्यू इयर, जन्मदिन, दीवाली, होली के ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदने घंटों बाजारों में घूमते रहते थे, और हर दोस्त रिश्तेदारों को या आसपड़ोस में भी जन्मदिन, त्योहारों पर और नए साल पर उन्हें कार्ड दिया करते थे. अब तो ई-मेल और इस सोशल नेटवर्किंग के ज़माने ने वो आदत बिलकुल छुड़वा ही दी.

ग्रीटिंग्स की जहाँ तक बात है तो उसकी सबसे बड़ी याद जुडी हुई है एक नए साल से दूसरा जन्मदिन से. मुझे याद है नया साल जब भी आता था, उसके 10 दिन पहले से ही हम ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदने निकल जाते थे, लिस्ट बनती थी कि कहाँ कहाँ, किन दोस्तों रिश्तेदारों को कार्ड भेजना है. सभी लोगों के लिए पसंद के स्पेशल, खूबसूरत कार्ड लेने में तो 2-3 दिन लग ही जाते थे. शुरुआत में जब हम स्कूल में थे जब तब छोटी मौसी के साथ ही ज्यादातर जाते थे ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदने..उन दिनों हम अपने नानी घर में रहा करते थे. नए नए डिजाईन वाले कार्ड देखने को मिलते थे. म्यूजिक वाला कार्ड उस समय नया आया था और बाकी लोगों के साथ साथ हमारी पहली पसंद भी वही होती थी. कुछ कार्ड ऐसे भी होते थे जिन्हें खोलो तो अंदर पूरा एक ताजमहल जैसा बना मिलता था. एक से एक आर्टिस्टिक टाइप कार्ड बाज़ार में बिक रहे होते थे. हर के पसंद के अनुसार हम ग्रीटिंग्स खरीदते थे. एक दिन का काम नहीं होता था ये कार्ड खरीदने का, बल्कि दो तीन दिन लग जाते थे हमें कार्ड पसंद कर के उन्हें खरीदने में. बहुत सालों तक हम या तो अपनी दोनों मौसी के साथ जाते बाज़ार या कभी कभी माँ के साथ जाते थे कार्ड खरीदने. फिर बाद के सालों में हम कार्ड लेने खुद ही जाने लगे थे. पटना के बोरिंग रोड एरिया में एक कार्ड का दूकान था आर्चीस गैलेरी. वहां मैं इतने बार जा चूका था कि मेरी दोस्ती हो गयी थी उस आर्चीस गैलेरी के मालिक से, जो काउंटर पर बैठा रहता था. उससे लगभग हमेशा ही बातें होती थी मेरी. आज भी जब जाता हूँ पटना, तो उस दूकान में जरूर जाता हूँ और उससे मिलता जरूर हूँ. वो मुझे देखते ही कहता था, कि आओ भाई, देखो कार्ड के नए स्टॉक आये हैं. 
अब तो ग्रीटिंग्स कार्ड की कोई इक्साईटमेंट ही नहीं रही, लेकिन पहले जैसे ही दिसंबर का आखिरी सप्ताह आता था, हमारे मन में ग्रीटिंग कार्ड खरीदने की अजब बेचैनी हो जाती थी. कार्ड खरीदना ही सिर्फ नहीं होता था न, कार्ड पर तरह तरह के स्केच पेन से उनपर नाम लिखना, कोई एक दो कविता के या गाने के लाइन लिख देना, कुछ चित्र जैसा बना कर कार्ड को सज़ा देना.. मिलाजुलाकर उद्देश्य यही रहता था कि हमारा कार्ड बिलकुल अलग दिखना चाहिए. सुन्दर और अच्छा. कार्ड जिस दिन खरीद कर लाते थे, वो पूरी शाम और दूसरा पूरा दिन तो बस कार्ड को सजाने में ही बीत जाता था. और फिर उन कार्ड को उनके पते पर पोस्ट करना. 
नए साल के आने पर भी हमें इंतज़ार रहता था कि कहाँ कहाँ से कार्ड आते हैं. हम लोग ये जोड़ते थे कि हमने कहाँ कहाँ कार्ड भेजा था और कहाँ से वापस हमें कार्ड मिले हमें, और किसने किस तरह का कार्ड भेजा है. जब पोस्टमैन आता था न्यू इयर के कार्ड लेकर तो उत्साह इस कदर रहता था कार्ड खोल कर देखने का कि कहाँ से किसने भेजा है और कार्ड कैसा है. सिम्पल रहे या खूब डिजाईनदार कार्ड. हमें फर्क नहीं पड़ता था, हम बस ये देख कर खुश होते थे कि सबने याद रखा है और हमें कार्ड भेजा है. अगर किसी ने छोटा सा सन्देश या चिट्ठी उस कार्ड के साथ भेजा होता था तब तो ख़ुशी डबल हो जाती थी. 
नए साल के अलावा कार्ड सबसे ज्यादा जन्मदिन पर भेजे जाते थे. दोस्त भी कार्ड देते और रिश्तेदार भी. मुझे याद है जब भी मुझे बर्थडे पे किसी ने कार्ड दिया था, तो उस कार्ड को मैं 10-15 दिन तक लगभग रोज़ दिन में एक बार तो देखता ही था. सारे कार्ड जो बर्थडे पे मुझे मिलते थे उसे मैं संभाल के रखता था. पर मुझसे ज्यादा संभाल के कार्ड्स को रखती थी मेरी बहन. आज भी उसके पास न जाने कितने पुराने ग्रीटिंग्स कार्ड मौजूद हैं. जब कभी उन कार्ड को देखता हूँ तो बड़ा ही अच्छा महसूस होता है. पुराने दिनों की खुशबु आती है उन कार्ड्स से.
मेरी एक आदत भी थी, मैं अपने पास स्टॉक में दो तीन एक्स्ट्रा कार्ड रखे रहता था, मान लो किसी का जन्मदिन ऐन वक़्त पर याद आया तो? कम से कम एक दो कार्ड तो होने चाहिए न उसे देने के लिए. मोना को भी अगर कभी कार्ड इमरजेंसी में चाहिए होता था तो मेरे पास आती थी.. “भैया, एक कार्ड दे दो न, आज मेरी इस दोस्त का जन्मदिन है..”. 
लेकिन ये सब पहले की बातें हैं, इधर इन पाँच छः में तो ग्रीटिंग्स कार्ड खत्म सा हो गया है. अब तो हाल ये है कि काम काज में फुर्सत कहाँ किसे की कार्ड ख़रीदे और पोस्ट करे. सब के सब ऑरकुट, फेसबुक पर मौजूद हैं. बर्थडे आया तो उन्हें एक-दो स्क्रैप ही कर दिए या फिर फेसबुक के वॉल पे बधाई दे आये. बहुत दिल खुश हुआ तो ब्लॉग पे एक पोस्ट लिख दिए जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए. या अपने फेसबुक पर ही एक लम्बा स्टेट्स लिख डाला उस दोस्त को समर्पित करते हुए. एक फोर्मलिटी से ज्यादा नहीं लगता अब किसी को बर्थडे विश करना. जबकि पहले जन्मदिन की बधाई मिलती थी तो सच में ऐसा लगता था, कि सामने वाला भी उतना ही खुश है हमें जन्मदिन की बधाई देते हुए जितना हम खुश हैं उससे बधाई लेते हुए. बहुत कुछ बदल गया है अब पहले के दिनों से. कभी कभी ये बदलाव बड़ा आर्टिफीसियल सा लगता है.
कार्ड के साथ साथ एक आदत और थी हमारी जिसकी लत हम सब को कार्ड के बहुत पहले से लग चुकी थी, और जो पहले पुराने ज़माने में सन्देश पहुँचाने का एकमात्र जरिया हुआ करता था..चिठ्ठी लिखने की आदत. बचपन में तो जाने कब ये आदत मुझे लगी थी, लेकिन मेरी ये आदत इंजीनियरिंग तक बरक़रार रही थी. 
मुझे सही से याद तो नहीं लेकिन बचपन से ही मैं चिट्ठी लिखते आ रहा हूँ, हाँ, लेकिन जो लम्बे खत होते थे वो लिखने की आदत तब पड़ी जब मेरे छोटे मामा की पहली नौकरी मुंबई में लगी थी. फोन उस वक़्त उतना सस्ता था नहीं, तो हम हर सप्ताह उनको हम चिठ्ठी लिखते थे. मैं और मोना दोनों लिखते थे उनको नियमित चिट्ठी. माँ भी लिखती थी, लेकिन अकसर कहती थी माँ, तुम लिख लो, आखिरी पन्ना जो खाली रहेगा उसमे लिख देंगे हम चिट्ठी. उस चिट्ठी को मामा को पोस्ट करने के बाद से उसका जवाब आने तक कि प्रतीक्षा रहती थी. मामा से बात फोन पर सिर्फ इतवार के दिन ही हो पाती थी, वो इसलिए कि एक तो इतवार छुट्टी का दिन और उस दिन कम पैसे लगते थे एस.टी.डी फोन करने में और ज्यादा देर तक बात होती थी. लेकिन फिर भी फोन पर हर बातें करना कहाँ मुमकिन हो पाता था, तो हम बाकी बातें चिट्ठी में ही लिख देते थे. नानी अगर हमें देख लेती चिट्ठी लिखते हुए तो वो भी कहती, “हमरा तरफ से भी दू गो लाइन जोड़ देहीं तो..” 
मेरी एक आदत थी की चिठ्ठी को बार बार पढ़ने की. चिठ्ठी बार बार पढ़ने में भी एक अलग मजा है. शायद उससे ज्यादा मजा और किसी चीज़ में नहीं. इस ई-मेल में तो बिलकुल भी नहीं. और जो चिट्ठी आप पढ़ रहे हैं, उसे जोर जोर से पढ़ कर घरवालों को सुनाने का भी अपना अलग मज़ा है, बशर्ते वो चिट्ठी पब्लिकी पढ़ी जाने वाली हो, कोई प्रेम पत्र न हो. क्योंकि प्रेम पत्र ऐसे पब्लिकली पढने पर शायद मार भी पड़ सकती है आपको.
चिठ्ठी में अकसर लिखते हुए हम अपनी मासूम चित्रकारी कर दिया करते थे. वैसे चिट्ठी जो हम किसी बहुत करीबी लोगों को या दोस्तों को लिखते थे. ऐसी चिट्ठी लिखने में बड़ा वक्त लगता था. वैसे तो चिट्ठी लिखने में ही बहुत वक़्त लगता था. सोचना पड़ता था कि क्या क्या लिखना है चिट्ठी में, और अकसर ऐसा होता था, कि चिट्ठी पोस्ट करने के बाद हमें याद आता था, अरे ये तो ,लिखना हम भूल ही गए. आज ईमेल का जमाना हो गया है, या ऑरकुट स्क्रैप या फेसबुक के वाल पोस्ट का ज़माना हो गया है. आप जो चाहे तुरंत लिख सकते हैं अपने दोस्तों के वाल पोस्ट पर…अगर कुछ भूल भी जाएँ आप तो बस उस दोस्त के प्रोफाइल को फिर से खोल कर उसे एक और स्क्रैप या वाल पोस्ट कर दीजिये. बात खत्म. पहले अगर कुछ लिखते हुए हम भूल जाते थे, तो इंतजार करना पड़ता था, अच्छा अगली चिट्ठी जब लिखूंगा तब वे बातें उस चिट्ठी में लिख दूंगा. कॉपी के पीछे या किसी कागज़ में लिख कर रख लेते थे, हाँ ये भी लिखना है चिट्ठी में, ताकि चिट्ठी लिखने समय हम वो बात लिखना भूल न जाएँ.
आज ईमेल और मेसेज का ज़माना है, लोग अपने मेसेज में तरह तरह के स्माइली या एक्स्प्रेसन बना कर भेजते हैं, लेकिन ना उस मेसेज को लिखने वाला ना उस मेसेज को पढने वाला उस स्माइली को देखकर वैसे मुस्कुराता होगा, जैसे पहले हम मुस्कुराते थे जब किसी चिट्ठी पर कोई चित्रकारी दिख जाती थी. चिट्ठी पर चित्रकारी मेरी बहुत होती थी. कभी कभी तो जानबूझकर कोई चित्र बनाकर चिट्ठी को सजाता था, तो कभी लिखते वक़्त यूँ ही कि क्या लिखना है चिट्ठी में ये सोचते हुए बेध्यानी में कोई चित्र बन जाता था, जिसे बाद में देखकर खुद ही हँसी आ जाती थी, ये मैंने क्या बना दिया. पढ़ने वाला भी उस चित्र को देखकर मुस्कुरा देता था.
चिट्ठी चाहे कितनी ही छोटी हो या कितनी ही लम्बी, हमेशा पढ़ने पर एक अलग ही आनंद आता था. घर के बाहर कोई डाकिया दिख जाए, तो ये उम्मीद बंध जाती थी कि शायद कोई चिट्ठी आई हो. और यदि आपने कुछ दिन पहले किसी को चिट्ठी लिखा हो तो ये उम्मीद और बंध जाती थी डाकिये को देखकर, कि शायद उस चिट्ठी का जवाब आया हो.
मेरे कुछ दोस्त, मेरी मौसी, मेरे मामा और मेरी बहन की चिठ्ठी मुझे इंजीनियरिंग तक मिले हैं, उसके बाद पापा ने मोबाइल फोन दे दिया तो चिठ्ठी लिखना बंद हो गया. फिर भी कुछ दिन तक चिठ्ठी का सिलसिला चलता रहा, फिर तो ई-मेल और फोन ही बात करने का जरिया बन गए. जब मैं था इंजीनियरिंग में, और मेरी कोई चिठ्ठी आती थी तो उसे तो मैं क्लास में ही ५-६ बार पढ़ लेता था, वापस घर आकर जाने कितनी बार वो चिट्ठी पढ़ता मैं. मेरी जेब में वो चिट्ठी कम से कम दो तीन दिन तक तो टिकती ही थी, चाय दुकान पर अगर अकेला हूँ, तो जेब से चिट्ठी निकाल कर पढ़ लिया, और फिर दिमाग में ये भी सोचने लगा कि इसका जवाब क्या देना है. हर आई चिट्ठियों को मैं सम्हाल कर रखता था. कुछ चिट्ठियां तो अब भी मेरे पास हैं, लेकिन सबसे बड़ा अफोसोस ये है कि फिफ्थ सेमस्टर में घर बदलने के क्रम में मेरा वो चिट्ठियों वाला बैग जाने कहाँ गुम हो गया. हफ़्तों तक मैं उदास रहा था उस बैग के गुम होने पर. 
शायद सबसे देर तक जिनकी चिट्ठी मुझे मिलती रही थी वो थी मेरी बड़ी मौसी. सुधा मौसी. वो अब भी ना तो टेक्नोलोजी को जानती हैं, ना उस वक़्त जानती थी जब तक वो चिट्ठी लिखते रहीं थीं. बाद में उन्होंने भी मोबाइल पर हाल चाल लेना शुरू कर दिया था. सुधा मौसी कि चिठ्ठी लम्बी होती थी और मुझे सबसे ज्यादा मज़ा आता था उनकी चिट्ठी पढ़ने में. सुधा मौसी के साथ साथ जिनकी चिट्ठी मुझे देर तक मिलती रही, शायद इंजीनियरिंग के तीसरे साल तक उनमें, मेरी बहन मोना, मेरी दोस्त शिखा और प्रभात थे. शिखा लन्दन में रहती है, और वो मुझे वहाँ से ईमेल तो करती ही थी उन दिनों, साथ में चिट्ठी भी भेजती थी. दोस्त आश्चर्य करते थे, दो बातों पर सबसे ज्यादा. कि इसे इतनी चिट्ठी आती कैसे है, और दूसरा इसे विदेश से कौन खत भेजता है? हमारे कॉलेज में चिट्ठियां एक शीशे से बंद नोटिस बोर्ड में लगा दी जाती थीं, जिनकी चिट्ठी आई है, वो देख लें और सम्बंधित कॉलेज कर्मचारी से कहें, वो आपको आपकी चिट्ठी निकाल कर देगा. कॉलेज जाने पर मेरा चक्कर एक बार कॉलेज के ऑफिस के बाहर लगे उस नोटिस बोर्ड के तरफ हो जाता था, ये देखने के लिए कि कहीं कोई चिट्ठी तो नहीं आई है मेरी. कितनी ही बार ऐसा हुआ है, कि जब मैं कॉलेज नहीं गया और अगर कोई चिट्ठी आई तो मेरे दोस्त अकरम या समित मेरी चिट्ठियां लेकर आये हैं.
फिल्मों में दिखाते हैं न, कि चिट्ठी पढ़ते वक़्त जिसने चिट्ठी लिखी है, उसका चेहरा चिट्ठी पर बन जाता है और उसकी आवाज़ कहीं बैकग्राउंड में चलने लगती है. सच में ऐसा ही होता था. आप किसी कि चिट्ठी पढ़ रहे होते थे तो लगता था उनका चेहरा आपके आँखों के सामने आ गया है. 
लेकिन आज कल के भागती दौड़ती दुनिया में लोगों के पास वक्त कहाँ है की चिठ्ठी लिखें, ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदने के लिए बाज़ार में वक़्त दें, और फिर उन्हें सज़ा कर तरह तरह के कोट लिखकर जिन्हें भेजना है उन्हें भेजे. 
आज के आधुनिक लोग वक़्त के साथ चलने में यकीन रखते हैं न, इसलिए वे चिट्ठियों को छोड़ अब ज्यादा फ़ास्ट और इफेक्टिव सोशल नेटवर्किंग साइट्स का सहारा लेने लगे हैं, लोग एक दूसरे से हर पल कनेक्टड हैं लेकिन शायद वैसा इमोशनल जुड़ाव अब नहीं है जो चिट्ठी में होता था. एक छोटी सी, एक पन्ने का ख़त भी हमें कैसे उदासी से खींच बाहर ले आता था न. कितने अच्छे दिन थे वे जब हमें लोग चिट्ठी लिखा करते थे. कभी कभी बड़ी शिद्दत से मिस करता हूँ उन दिनों को मैं. बहुत समय तक मैं दोस्तों को अपने तरफ से चिट्ठी लिखता रहा, लेकिन जब जवाब आने बंद हो गए सब के तो मैंने भी छोड़ दिया. दोस्त भी चिट्ठी मिलने पर चिट्ठी का जवाब लिखने के बजाये, एसएमएस कर दिया करते थे, फोन कर दिया करते थे. ये सबसे इरिटेटिंग लगता था, जैसे कोई आपके चिट्ठी का अपमान कर रहा हो. 
काश मिल जाए मुझे फिर कोई जिससे चिट्ठी का वो छुटा हुआ सिलसिला चल निकले फिर से. बड़े मस्त दिन थे वो न जब हम इन छोटी छोटी बातों में भी खुशियाँ ढूंड लिया करते थे.
आई मिस दोज़ ग्रीटिंग्स कार्ड एंड लेटर्स !
ग्रीटिंग्स या चिट्ठियों में लिखने वाले बड़े मजेदार मजेदार कोट होते थे न, और उन कोट को एक कॉपी पर लिख लिया करते थे हम ताकि जब भी किसी को चिट्ठी लिखनी हो या ग्रीटिंग्स लिखना हो तो उन सारे कोट्स में से कोई एक इस्तेमाल कर लें. ये लाइन्स तो शायद आपने भी कभी न कभी इस्तेमाल किया होगा न चिट्ठी लिखने में –
रिवर कैन ड्राइ.. माउन्टन कैन फ्लाइ..यू कैन फॉर्गेट मी…हाउ कैन आई… J


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  1. sirji sabse pehle to aapki behen ko badhaiyan janmdin ki…waise usse achcha wo waqt tha jab ham greetings khud banate the….postcard ko faad faad ke uske ticket jama karte the…:)

  2. दिलीप जी…
    सॉरी मैं वो बात भूल गया बिलकुल…

    वो तो सबसे अच्छे पल थे, जब हम ग्रीटिंग्स कार्ड बनाते थे…उससे बेहतर कोई और याद कैसे हो सकती है…

    वो लिखना भूल गया मैं 🙂

  3. सही याद किया…अब समय बदल गया है.

    बहन निमिषा को जन्म दिवस की बधाई एवं शुभकामनाएँ.

  4. मैं भी बहुत miss करती हूँ किसी को greetings भेजना.
    सच कहा अभिषेक……..Those wer d golden daiz !!
    वो दिन अब नहीं आयेंगे

  5. सचमुच क्या दिन थे वह भी….घंटो समय लगाकर ग्रीटिंग कार्ड खरीदना…उनपर कलात्मक ढंग से सन्देश लिखना…फिर डाक से आने वाले ग्रिनिंग्स कार्ड को खोलने का उत्साह…
    आज के बच्चों को ये बातें किस्से -कहानियों जैसी लगती हैं..
    निमिषा को जन्म दिवस की बधाई एवं शुभकामनाएँ

  6. जाने कितनी बातें याद आ गई तुम्हारी पोस्ट्स से…| उनमे से बहुत कुछ तो तुम्हें पता ही है न…:)
    nostalgic करने वाली पोस्ट है ये….|
    वैसे मुझे अब भी मिलता है ख़त…गाहे-बगाहे…मेरी यादों के खजाने में इजाफा करने के लिए…:) 😀

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