कुछ ऐसे यादगार सफर थे वो..वो सफर अब वापस नहीं आयेंगे..

जब मैं स्कूल में था, तो ज्यादातर पटना में ही रहता था.कहीं जाना भी हुआ तो अपने गांव बेगुसराय, वो भी छठ पूजा में.हम तो जैसे साल भर सिर्फ छठ पूजा का ही इंतज़ार करते थे.अभी भी याद है वो दिन.जिस दिन हमें गांव जाना होता था, उस दिन सुबह 4 बजे माँ उठा देती थी.हम 5-6 बजे तक निकल जाया करते थे घर से..पटना की वो सड़के उस दिन कितनी खूबसूरत लगती थी.हम ज्यादातर बस से ही सफर किया करते थे. बेगुसराय जाने में कुछ 4 घंटे लगते हैं, हमें तो वही 4 घंटों में सफर का वो आनंद आता था की क्या कहें..पटना और बेगुसराय के बीच में "बाढ़" एक जगह आता है.वहां बस रुका करती थी एक ढाबे पे, उस ढाबे पे गुलाब जामुन और समोसे मिलते थे, जिनके स्वाद का कोई जवाब नहीं होता.शायद ही अब गुलाब जामुन का वैसा स्वाद कहीं मिल पाता है मुझे.जब गांव पहुचता था, तो बस स्टैंड से घर तक हम रीक्शा से जाया करते थे.गांव की वो सड़के एक अलग सुकून देती थी, एक अलग शान्ति, जिसे लिख पाना आसन नहीं है.

बारहवीं की पढाई के बाद इंजीनियरिंग एंट्रेंस के एक्जाम के लिए कई शहर घुमा, बस घुमा ही..किसी भी बड़े कॉलेज में सेलेक्सन नहीं हुआ..इसी दौरान एक बार लखनऊ जाना हुआ, जहाँ की बातें आप यहाँ पढ़ चुके हैं..
अंत में एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला.बहुत नए लोग से मुलाकात हुई..कुछ बहुत ही अच्छे दोस्त मिले..और सबसे अच्छी रही इंजीनियरिंग के दौरान हमारा हर एक सफर..फिर चाहे वो दुर्गा पूजा में घर आना हो या फिर सेमेस्टर ब्रेक की छुट्टियों में घर वापस आना.

हमारे एक बहुत ही प्रिय मित्र हैं, तन्मय सौरभ..सौरभ जितना ऐक्टिव, एन्थूज़ीऐस्ट और एक मजेदार इंसान शायद ही मैंने फिर कभी देखा, इन सब के साथ साथ वो नम्बर एक फ्लर्ट भी है.उसे लड़कियों के बारे में बातें करने में कितना मजा आता है ये मैं आपको नहीं बता सकता.अभी उसकी शादी हुए भी 1 साल हो गए हैं लेकिन अभी भी वो सुधरा नहीं है,लड़कियों के बारे में तो बात करना अब भी उसे उतना ही पसंद है  ;) 
हमारे सारे सफर में दिल लगाने और मनोरंजन का पूरा भार सौरभ के जिम्मेदार कंधो पे रहता था, जिसे वो बहुत ही अच्छे से निभाता भी था :) मैं और हमारा पूरा कॉलेज सौरभ को "नेता बाबु" के नाम से बुलाते हैं..और हम ही नहीं, हमारे कॉलेज के कुछ टीचर्स भी कभी कभी सौरभ को नेता बाबु कह देते थे 

एक बार का किस्सा याद आ रहा है, हम अपने पहले सेमेस्टर में थे और दुर्गा पूजा के छुट्टियों के बाद अपने कॉलेज जा रहे थे.सारे लड़के(करीब 20 दोस्त) एक ही ट्रेन से एक ही दिन जा रहे थे, तो माहौल कैसा होगा...अजीब ही होगा और क्या :) .. 20 लड़कों में से कन्फर्म रिजर्वेशन बस 5 लड़कों का ही था, और बाकी सारे का वेटिंग लिस्ट में टिकेट था.हमने तय किया की वो पांच सीट पे सबका सारा सामान लाद दिया जायेगा और पूरा सफर बातें करते और मस्ती करते बिताया जायेगा.सफर भी कोई छोटा नहीं था.हमें पटना से सिकंदराबाद जाने में करीब 35 घंटे लगते थे..पुरे सफर के दौरान सौरभ की ऐसी ऐसी हरकते रही, जिसे ब्लॉग पर चाह कर भी नहीं बता पाऊंगा, लेकिन उन हरकतों को हम दोस्त अक्सर याद किया करते हैं और हँसते हैं.उन हरकतों में शामिल था सौरभ के फ्लर्ट होने का प्रमाण..जो भी लड़कियां मौजूद थी हमारे कम्पार्टमेंट में, सबको हमारे ये सौरभ महाशय छेड़ चुके थे और खट्टी-मीठी बहस भी हो गयी थी उन लड़कियों से..वैसे ये तो सौरभ भाई हैं, एक कम्पार्टमेंट क्या, पुरे ट्रेन का मुयायना कर के रखे रहते थे और इनका बस एक ही काम था.. ट्रेन के हर कम्पार्टमेंट(S-1 से लेकर S-12) तक लगातार चक्कर काटना और लड़कियों के पीछे जाना.कई बार तो हम ट्रेन पे सौरभ को खोजने निकल जाया करते थे :D पता चलता था की हमारे सौरभ महाशय हस्तरेखा शास्त्री बने हुए हैं और किसी कम्पार्टमेंट में किसी लड़की का हाथ देख रहे हैं ;)  ट्रेन के अनजान लोगों से भी हमारे सौरभ महाशय की अच्छी दोस्ती हो जाती थी.पुरे सफर में सौरभ 3-4 नए दोस्त तो बना ही लेते थे. :) ये सौरभ की अच्छी आदतों में से एक है..नए दोस्त बनाने की आदत..


एक  बार का किस्सा हुआ ये..,, हम अपने सेवन्थ सेमेस्टर में थे और पटना से सिकंदराबाद के लिए जा रहे थे.पटना रेलवे स्टेशन पे ट्रेन खड़ी थी..हम अपना अपना सामन ट्रेन में रख रहे थे..ट्रेन में हमारे अलावा हमारे बहुत से जुनिअर्स भी थे, कुल मिलकर 45 लड़के रहे होंगे उस ट्रेन में अपने ही कॉलेज के..अभी जैसे ही ट्रेन चली, की कहीं किसी कम्पार्टमेंट में कुछ लड़ाई हो गयी हमारे एक जूनियर में और एक कोई यात्री के बीच..गलती उस यात्री की थी,और वो अपनी गलती मानने के बजाय बहस कर रहा था..हमारे सौरभ उर्फ नेता बाबु कब तक चुप रहते..जाकर उस आदमी से कहे की "भाई साहब आराम से बैठ जाइये आप..पता है आपको इस ट्रेन में 40 इंजिनियर है.  सब का सर घूम गया न तो आपको अच्छा से घुमा देंगे" .. बस फिर क्या था, वो आदमी चुप चाप बैठ गया, शायद अपना सीट भी किसी से एक्सचेंज कर लिया उसने बाद में.. ;) 

हमारे नेता बाबु अगर साथ रहते थे तो हमें ये चिंता नहीं रहती थी की हमारी टिकेट वेटिंग लिस्ट में है या कन्फर्म.अगर टिकेट वेटिंग लिस्ट में रहती थी तो हमारे नेता बाबु के लिए उस टिकेट को कन्फर्म करवाना कोई बड़ी बात नहीं थी.टी-टी को पोटने में तो माहिर हैं. ;)

इन सब के अलावा एक यादगार सफर में से एक वो सफर भी रहा है जब हम अपने आखिरी सेमेस्टर में थे...मुझे mba एंट्रंस के कुछ काम सम्बन्ध से मुझे मुंबई जाना था, मैं पहले मुंबई गया नहीं था तो अपने दोस्त अकरम को राजी किया मुंबई साथ चलने के लिए.अकरम के भैया मुंबई में ही रहते थे, इसलिए भी मैं अकरम के साथ जाना चाह रहा था.हमारे एक और बहुत अच्छे और प्रिय मित्र हैं देवनंदन जी,जिन्हें हम प्यार से देव बाबु कह के बुलाते हैं..वो भी तैयार हो गए साथ चलने के लिए.इस बार बहुत दिनों बाद ऐसा हो रहा था की पटना स्टेशन पे हम बस तीन लोग थे अपने कॉलेज के जो ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे.
खैर, ट्रेन आई और हम अपना अपना सामान लेकर ट्रेन में बैठ गए.उसी समय अकरम ने एक नया मोबाइल ख़रीदा था, नोकिया का n73..ये मोबाइल उस वक्त नयी नयी आई थी मार्केट में और हम बहुत उत्साहित थे ये जानने के लिए की इतने फंक्सन वाले फोन को इस्तेमाल कैसे करते हैं..अब तो पता नहीं कैसे कैसे नए तकनीक के फोन उबलब्ध है मार्केट में..उस समय तो सबसे आधुनिक हम n73 को ही मानते थे.. :) 


सुबह उस दिन तो धुप थी, लेकिन कुछ ही देर बाद मौसम ने ऐसी करवट ली की एका-एक बारिश शुरू हो गयी..पुरे रास्ते बारिश होती रही और मौसम तो ऐसा दिलकश बन गया था की क्या कहें..हम कहीं खो गए थे उस मौसम में..जहाँ अकरम और मैं अपनी दुनिया में खोये हुए थे वहीँ हमारे प्रिय देव बाबु लगे हुए थे फोटोग्राफी और विडियोग्राफी करने में. :) कभी ट्रेन की खिड़की से बाहर आसमान की फोटो ले रहे थे , तो कभी कम्पार्टमेंट में बैठी एक सुन्दर महिला का फोटो निकल रहे थे ;) कुल मिलाकर सफर एक दम मस्त और सुहाना बीत रहा था...मन में तो ये ख्याल भी आ रहा था की वो गाना गया जाए "सुहाना सफर और ये मौसम जवां..हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं" ..  एक जगह ट्रेन बहुत देर रुकी..हम वहां चाय पीने ट्रेन से नीचे उतरे, मौसम इतना दिलकश और उसमे एक कप मस्त चाय, मजा ही आ गया था..हम दूसरे दिन शाम में मुंबई पहुचे..लेकिन कसम से मुझे सफर खत्म होना अच्छा नहीं लग रहा था, दिल तो ये कह रहा था की ये सफर कभी खत्म न हो....

मुंबई पहुच के सबसे पहले मैंने अपना काम खत्म किया और दूसरे दिन मुंबई दर्शन के लिए हम निकल गए..खूब मजे भी किये और घुमा भी मुंबई..मुंबई लोकल ट्रेन का भी मजा लिया मैंने...जिस दिन हमें जाना था, उस दिन शाम में हम गेटवे ओफ इंडिया से वापस आ रहे थे, और शाम को तो मुंबई के ट्रेन में किस कदर भीड़ रहती है वो सबको पता है..इतनी भीड़ देख के मैं थोड़ा घबड़ा गया...ट्रेन पे तो चढ़ नहीं पाया..टैक्सी लेकर वापस आना पड़ा.. ;) 


कुछ यादगार तस्वीरें..
हम तीन दोस्त, मुंबई जाते वक्त ट्रेन में...साल 2007 के शुरुआत में (तारीख याद नहीं )

और  ये मैं, समंदर निकारे बैठा हुआ, कुछ सोचता हुआ...
 

Comments

  1. बेचारा सौरभ.. सारी पोल खोल दी..

    रेलगाड़ी में दोस्तों के साथ लंबा सफर.. वाकई मजेदार होता है.. और रिजर्वेशन नहीं रिजर्वेशन कोई फर्क नहीं पडता..

    मजा आया..

    ReplyDelete
  2. Is safar gatha ne hame bhi ateet ke kayi safar karva diye!Lagta hai,wo din kabhi lautenge nahi...

    ReplyDelete
  3. वाह अभिषेक जी, मजा आ गया पढ़ के !! ये वही सौरभ है न जिनके बारे में आप बात कर रहे थे जब दिल्ली आये थे?

    ReplyDelete
  4. पी.डी. के द्वारा बज पर दिए गए लिंक से यहाँ आयी ... पोस्ट अभी नहीं पढ़ी... ज़रा लंबी है, तो बुकमार्क कर ली है... बाद में पढूंगी. चित्र बहुत अच्छे लगे... प्राकृतिक भी और आप और आपके दोस्तों के भी...

    ReplyDelete
  5. @आराधना जी ,
    आराम से पढ़िए..कोई जल्दी नहीं है ;)
    और वो प्रशान्त को तो मैंने पैसे खिलाये हैं मेरे ब्लॉग का प्रचार करने के लिए ;) इसलिए बज़ पे दिखे आपको लिंक.. :)

    ReplyDelete
  6. हा हा ...मजेदार लेख. ट्रेन का सफ़र हमेशा कुछ खट्टी मीठी यादें दे जाता है. अगर हमारी भारतीय रेल न हो तो न जाने कितने पोस्ट्स को जनम न मिलता.
    बहुत अच्छा अभिषेक! :)

    ReplyDelete
  7. hehehe :) :)
    saurabh ji k baare mein sun chuki hun :d
    and
    i love the pics...fab :)

    ReplyDelete
  8. पढ़ ली आपकी ये पोस्ट ... ये ट्रेन में धमाचौकड़ी मचाने वाले लड़कों से अक्सर मुठभेड़ होती है, जब कभी छुट्टियों के दिनों में इलाहाबाद से दिल्ली आना होता था... गाजियाबाद में बहुत से मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग कालेज हैं... उनके बच्चे अक्सर ग्रुप में मिल जाते थे और न खुद सोते थे, न ट्रेन वालों को सोने देते थे... हमें कभी इतने दोस्तों के साथ यात्रा का अवसर नहीं मिला, पर सोचती हूँ कि कितना मज़ा आता, जो इत्ते सारे दोस्त एक साथ ट्रेन से यात्रा करते... आपकी पोस्ट पढकर मज़ा आया...

    ReplyDelete
  9. हा हा अभिषेक,. मस्त !!

    ReplyDelete
  10. आनंद आ गया पढ़कर !!

    ReplyDelete
  11. बढिया ट्रवलाग लिखे हो गुरु. गज्जब एकदम :) तस्वीरें बढिया लगी.

    ReplyDelete
  12. इतनी बड़ी पोस्ट,प्रशांत ने भेजी थी सो पढ़ना ही था , अच्छा लगा फोटो भी यादगार ,सभाल कर रखें बुढ़े होने के बाद फोटो देख करअभी सेभी आनंदित होगें प्रशांत की और भी बज पर भेजी पोस्ट मिली पर कोई खुला ही नहीं किसी ने कमेंट नही पकड़ा फिर क्या करती थक कर वापस हो ली ..। जै भगवन कप्यूटर कमेंट ले लो .. :)

    ReplyDelete
  13. PD का साइड बिजनेस अच्छा चल रहा है :)

    ReplyDelete

Post a Comment

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया