परिवार और मित्र - उनसे जो मुझे सीख मिलती है...

हम अक्सर अपने आस पास, परिवार से या फिर मित्रों से कितने ही ऐसी बातें सीख लेते हैं जो किसी स्कूल में या फिर किसी पढाई के सिलेबस में नहीं रहती.ये छोटी मोटी पर बड़े मतलब वाली बातें रहती हैं.

मैं जब घर पे रहता हूँ तब मम्मी से काफी बातें होती हैं.लगभग हर विषय पे हम बात कर लेते हैं,चाहे फिल्म की बात हो या फिर कुछ और.ऐसी ही बातों बातों में पिछली बार जब मैं पटना में था,तो मेरी माँ ने एक बात कही, वो कुछ खास तो नहीं थी..बहुत बार बहुत किसी के ज़बान से सुनता आया हूँ लेकिन उस दिन वो बातें थोड़ी अलग लग रही थी..पाता नहीं क्यूँ.

मम्मी  से किसी विषय पे बात हो रही थी,वो याद तो नहीं..लेकिन बातों बातों में पैसे का जिक्र उठा था, मम्मी कहने लगी की जिंदगी में सब कुछ पैसा ही नहीं होता, एक हद तक तक पैसे बहुत जरूरी हैं और पैसों का बहुत महत्व है, लेकिन पैसे से बड़ा परिवार होता है.अगर आप पैसा खूब कमा रहे हैं,खूब उन्नति कर रहे हैं और अपने घरवालों के लिए आप वक्त नहीं निकल पा रहे तो उस पैसे का कोई मतलब नहीं बनता..पैसे के पीछे जाना एक हद तक सही है, लेकिन उससे ज्यादा नहीं. घर वाले सुकून से रहे, उन्हें किसी प्रकार की कमी न हो और पैसे की ज्यादा दिक्कत न हो, इसे महत्व देना चाहिए, पर कुछ ऐसे लोग हैं जो पैसे को ही इतना महत्त्व देते हैं की उनके पास परिवार के लिए वक्त ही नहीं.एक दूसरे का हाल-चाल लिए भी ज़माना हो जाता है.
वहीँ एक तरफ अगर आपके परिवार में आपसी सम्बन्ध काफी अच्छे हो,आप एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं और हमेशा एक दूसरे में अपनी खुशी तलाश कर लेते  हैं, ये बहुत अच्छी बात है पर अगर ये सब हों मौजूद और पैसों की थोड़ी किल्लत हो , फिर बहुत ज्यादा समय तक सुख-शान्ति घर में रहना संभव नहीं. प्यार,अपनापन के साथ साथ पैसे का भी महत्त्व होता है एक खुशहाल जिंदगी में.आदमी को बस ये भर सोचना चाहिए की जिंदगी आराम से कट जाए अपने परिवार के साथ हँसते खेलते, पैसों की इतनी ही जरूरत होनी चाहिए.. लेकिन एक तरफ कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने महत्वकांक्षा के पीछे सब कुछ भूल जाते हैं.... माँ का ये कहना भी सही है और कितनी सच्ची बात है ये..शायद मम्मी को ये बात याद नहीं होगी की उन्होंने ऐसा कब कहा, लेकिन मुझे वो बातें याद रही और याद रहेंगी हमेशा..

इसी तरह इस बार के होली में, मैं अपने नानी घर में था.हम होली हमेशा नानी के घर में ही मानते हैं. होली के दिन ही शाम में मेरे पापा और मेरे मौसा कुछ बातें कर रहे थे.मैं वहीँ बैठा हुआ था, फिर एका-एक मैंने गौर किया की पापा और मेरे मौसा दोनों ही हिंदी के कितने शुद्ध शब्दों और गहरे अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं अपनी बातचीत में.पापा और मौसा को तो ये अहसास भी नहीं होगा की मैं उनकी बातों से ज्यादा उनके शब्दों पे ध्यान दे रहा था.शायद वो दोनों मानेंगे भी नहीं की वो इतने अच्छे अच्छे शब्दों का प्रयोग कर रहे थे..वो शब्द तो बस उनके बातचीत में ऐसे ही बाहर आ रहे थे, जिन्हें मैं पकड़ने की कोशिश कर रहा था और ये सोच रहा था बैठे बैठे की अगर ये दोनों कोई कविता या कोई लेख लिखे तो कितने सफल लेखक कहलायेंगे... :) पापा और मौसा शायद इस बात से बिलकुल इनकार कर दें की उन्होंने उतने रचनात्मत शब्दों का प्रयोग किया था बातचीत में.लेकिन सच ये है की उनके लिए वो उतनी ही सामान्य भाषा है जितनी की आज कल के जेनरेसन के लिए "हेल्लो,बाय-बाय,सी यू.." :)


एक मेरा मित्र है समित.वो वैसे तो बहुत मजाकिया टाइप लड़का है लेकिन अंदर से उतना ही अच्छा और नेक इंसान.2008 मेरे लिए कुछ ज्यादा ही बुरा साल था.दिवाली में घर जाना तय हुआ, जिस दिन घर के लिए निकालना था मुझे, उससे बस 2 दिन पहले ही मेरा लैपटॉप चोरी हो गया .मैं तो बहुत ज्यादा दुःख में था, अब फिर से नया लैपटॉप खरीदना परेगा,30-35 हज़ार फिर से लगाना परेगा ये सोच रहा था..जिस दिन घर के लिए निकालना था मुझे, उससे 1 दिन पहले समित के साथ मैं शाम में टहल रहा था.बातों बातों में मैंने कहा, यार मुझे बैंगलोर कुछ रास नहीं आ रहा, ये मेरे लिए बहुत अनलकी शहर है,सोच रहा हूँ दिल्ली चला जाऊं.वहीँ सेटल हो जाऊंगा..ये बातें सुनते ही समित ने कहा "भाई तू क्या सोच रहा है बे..देख शहर कोई लकी या अनलकी नहीं होता...समय सबसे बड़ी चीज़ होती है..अगर वक्त अच्छा रहे तो आदमी कहीं भी रहे, खुशहाल रहेगा, और अगर वक्त बुरा चल रहा हो तो उसे अपने घर में भी चैन नहीं मिल सकता..तुम्हारा समय अभी अच्छा नहीं चल रहा..घबराओ मत, समय हमेशा एक सा नहीं रहता..अच्छे दिन भी आयेंगे.."  समित की ये बातें बिलकुल सच थी, मैं भी अब जब किसी और मित्र को ऐसे ही परेसान देखता हूँ तो वही बातें कहता हूँ जो समित ने कहा था मुझसे...



मैं अपने आप को कोई बहुत अच्छा आदमी नहीं कह सकता, शायद इसलिए की जिस अच्छे आदमी की परिभाषा मेरे दिमाग में मौजूद है, उन शर्तों पे या उन कसौटी पे मैं खुद को खरा नहीं उतार पाता..लेकिन ऐसा भी नहीं की मुझे अपने आप से कोई शिकायत है, मैंने बहुत कुछ सीखा है अपने आस पास के लोगों से, अपने परिवार से , अपने दोस्तों से..और मुझे ये सीखने का सिलसिला अच्छा लगता है इसलिए मेरी कोशिश ये रहती है की ज्यादा से ज्यादा सीख सकूँ...और एक बेहतर इंसान बन सकूँ.बहुत कुछ गलतियाँ भी मेरे से हुई हैं लेकिन एक इंसान अपनी जिंदगी में गलतियाँ न करे ऐसा तो संभव नहीं है. जरूरत है बस उन गलतियों से सीखने की और वैसी गलतियाँ फिर न हो ये बात समझने की.

Comments

  1. Jeevan shiksha to wahi hoti hai! Kaan aur aankhen khuli rahen,to burai dekh kar bhi bhalayi seekh sakte hai!
    Bahut sundar vichar aur shaili!

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  2. sahi kaha aapne.. har insaan se hume kuch seekhne milta hai..
    sab maante hai is baat ko, par aapne ise bade ache tarike me dhala hai :)

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  3. bahut rochak tarike se likhi aapne ye post...achcha laga padha kr...

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  4. हमें दूसरों से हर समय कुछ सीखना चाहिए..आपकी बात बिलकुल सही है अभिषेक जी.
    बहुत ही अच्छा लगा ये पढ़ कर

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  5. sahi kaha kabhi kabhi kuch log milte hain kuch sikhaate hain fir ham wo doosron ke liye sahej lete hain....badi hi sundarta se apni baat rakhi...

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  6. मैं और शिखा साथ साथ पढ़ रहे थे इसे अभी.

    :-)

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  7. जीवन खुली किताब है .. हर वक्‍त हर व्‍यक्ति से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है .. बस सीखने की प्रवृत्ति होनी चाहिए .. हां इंसान से भूल होना तो स्‍वाभाविक है .. उससे भी सीख लेनी चाहिए !!

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  8. स्‍कूल में तो हम शिक्षित होते हैं लेकिन घर-परिवार से हमें ज्ञान प्राप्‍त होता है। यही ज्ञान हमें मनुष्‍य बनाए रखता है। केवल शिक्षित मनुष्‍य तो एक मशीन के समान है जो कमाती है और भोगती है बस। ज्ञान से हम परिवार बनाते हैं और जीवन का सच्‍चा सुख पाते हैं।

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  9. समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता है वत्स.. :)

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