कुछ पुरानी यादों के नशे में – पार्ट ३

मैं बचपन में जब अपने छोटे मामा और उनके कुछ साथियों को काम्पिटिशन परीक्षायों की तैयारी करते देखता था तो अक्सर ये सोचता था की जब मैं बड़ा होऊंगा तो मुझे भी ऐसे ही मेहनत करनी परेगी…ऐसे ही पढना पड़ेगा.उस समय मैं ये समझ नहीं पता था की मेरे मामा इतना ज्यादा क्यों पढ़ रहें हैं?, वो तो हैं ही इन्टेलिजन्ट और डिग्री भी है उनके पास,तो नौकरी तो आसानी से ही मिल जानी है, फिर इतनी मेहनत क्यों? शायद उस समय मेरे में ये समझ नहीं थी की जिंदगी में तो संघर्ष करना ही पड़ता है.शायद इस बात से मैं थोडा डरा डरा भी रहता था की मुझे भी आगे चल कर इतनी ही मेहनत करनी पड़ेगी..

मैं कोई बहुत इन्टेलिजन्ट या हार्ड-वर्किंग छात्र नहीं रहा स्कूल में, हाँ कभी कभी किसी विषय में अच्छे अंक भी आ जाते थे..लेकीन मेरे घर वालों को हमेशा मुझसे बहुत सी आशाएं रहती थी, जिन्हें मैंने कभी भी पूरा नहीं किया..मेरे औसत पर्फॉर्मन्स के बाद भी घर पे लोगों को मेरे से काफी उम्मीदें थी.
खैर…. परीक्षा परिणामों ने मेरा कभी साथ नहीं दिया, और हर बड़े इम्तिहान में जैसे दसवीं, बारहवीं की परीक्षा में अंक महाराज तो मेरे से कुछ ज्यादा ही खफा रहे…मुझे ऐसा अहसास होने भी लगा की शायद मैं पढाई में अच्छे अंक ले आऊं ये मेरे नसीब में ही नहीं..मैं सोचने लगा की मैंने आखीर गलतियाँ की कहाँ की मेरे अंक कम आयें…जो दोस्त मुझसे पढ़ा करते थे कुछ विषय, उनके बड़े अच्छे अंक आ जाते थे, और ये बातें मुझे अन्दर ही अन्दर खाए जाती थी..मैं थोड़ा इन्ट्रोवर्ट भी हूँ और इस कारण भी शायद मेरे आसपास के लोगों को मेरी इस तकलीफ का पता नहीं चल पता था.वे कुछ दिन जब परीक्षाओं के बुरे परिणाम निकले थे…शायद मेरे जिंदगी के सबसे ज्यादा कठिन दिनों में से थे, इसलिए उन दिनों की हर-एक बात बखूबी याद है मुझे….मेरे मित्र प्रभात, शिखा और दिव्या को ही शायद मैं कुछ कुछ बातें बता पता था.उन दिनों सबसे ज्यादा बातें मैं जिससे शेयर करता था वो थी दिव्या….ये कुछ कुछ मेरे जैसे ही थी, इसलिए इससे दोस्ती हो गयी…वैसे हमारे में बस एक ही फर्क था की दिव्या बड़े अच्छे अंक लाती थी परीक्षायों में..इसने ही, कुछ और दोस्तों के साथ मिलकर मुझे हमेशा ये अहसास दिलाया, मुझे खुद पर विश्वस दिलवाया की मैं भी एक अच्छा छात्र हूँ और मैं आगे चल कर बहुत काबिल बनूँगा..उस समय के मेरे कुछ ख़ास दोस्त जिनसे मैं सारी बातें करता था वो ये तीनो ही थे…दिव्या, शिखा और प्रभात..इन चार लोगों को मेरे पर आज भी उतना ही विश्वास है जितना पहले था, और इस विश्वास का क्या कारन है ये तो मुझे पता नहीं और मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की..

मैंने ये तय कर रखा था की इंजीनियरिंग की पढाई करूँगा..लेकीन बारहवीं में ऐसे पर्फॉर्मन्स के बाद ये सपना एक सपना ही लगने लगा मुझे. कहने को तो मैंने कई सारे इंजीनियरिंग एन्ट्रन्स के फॉर्म भर दिए थे.लेकीन सच्चाई ये रही की मैंने वैसी मेहनत की ही नहीं की मुझे किसी बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज(जैसे IIT ) में दाखिला मिले..जब भी कोई इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की फॉर्म निकलती थी अखबारों में, पापा या मम्मी या फिर कोई मेरे दोस्त मुझे कहते थे, की फॉर्म फिल उप करो…उस समय येही ख्याल आता था की, फिर गए २००-३०० रुपये फॉर्म के पानी में..क्यूंकि कहीं न कहीं मैं ये सोचने लगा था की जब मैं ढंग से बारहवीं की परीक्षा ही नहीं निकाल सकता तो इंजीनियरिंग परीक्षा तो बहुत दूर की बात है.आप कह सकते हैं की मुझे अपने आप से विश्वास ही उठ गया था, पुरे तौर पर मैं ये समझने लगा था की परीक्षाओं में मैं अच्छे अंक नहीं ला सकता…
और फिर कैसे अचानक मेरा दाखिला हुआ ब्सवकल्याण इंजीनियरिंग कॉलेज में.., ये भी एक बड़े संयोग की बात थी…ये बहुत ही छोटा कॉलेज था, मैं खुश इस कारण से था की मैं अब इंजीनियरिंग की पढाई करूँगा..जब इंजीनियरिंग में पहले सेमेस्टर के इन्टर्नल एक्जाम हुए, मुझे हर विषय में अच्छे अंक आये थे..जब मुझे इन्टरनल के अंक मालूम हुए, तो मैं बहुत  भावुक हो गया था…सोचा की एक ज़माने के बाद ऐसे अच्छे अंक नसीब हुए..ये इंजीनियरिंग के चार सालों ने मेरे अन्दर एक गज़ब का विश्वास दिया है की मैं भी कुछ तो अच्छा कर सकता हूँ… और कभी न कभी तो शायद वो दिन आएगा ही जब मेरे घरवालों को सही मायने में मेरे पे फक्र होगा.

मेरे घर में मेरी माँ मुझे अक्सर जेनरल- नोलेज पढाया करती थी.मुझे अच्छे से याद है की एक जेनरल- नोलेज की किताब हुआ करती थी, माँ उस किताब के सारे प्रश्न तो ऐसे चुटकियों में बता दिया करती थी, और मैं हैरान रहता की माँ को इतना सब पता कैसे हैं?.. मैं अपने सारे दोस्तों को ये बड़े गर्व से बताता हूँ की “मेरी माँ की जेनरल- नोलेज मेरे घर में सबसे अच्छी है, और जितना मेरी वो जानती हैं उसका तो शायद 20% भी मुझे मालुम नहीं है”. जब भी मैं ये बात अपने किसी भी दोस्त को बताता तो कहीं न कहीं अन्दर ही अन्दर बहुत गौरवान्वित महसूस करता हूँ… लेकीन ये बात सच है की आज भी मेरी माँ की जेनरल- नोलेज उतनी ही शशक्त और मजबूत है जितना पहले हुआ करती थी..मैं तो ये भी शर्त लगा के कह सकता हूँ की वो आज भी कोई कम्पेटिटिव परीक्षा के एक-दो राउन्ड आराम से निकाल सकती हैं..कभी कभी थोडा सोच में भी पड़ता हूँ मैं,  की एक कंप्यूटर इंजिनियर होते हुए भी मैं कितना कम जानता हूँ अपनी माँ से…वो तो मेरे से बेहद ही अच्छी स्टुडेंट रही होंगी अपने पढाई के दिनों में…शायद इसी लिए मेरी माँ ने अपने जिंदगी में दिए एकमात्र कम्पेटिटिव परीक्षा में ही सफलता हासिल की थी और उनकी नौकरी लग गई थी…और आज भी वो बड़े खूबी से अपना काम कर रही हैं…मेरे मम्मी ये भी कहा करतीं हैं हमेशा की “आज की पढाई प्रणाली बहुत गलत है, इसमें छात्र कोई एक विषय में तो बहुत अच्छे हो जाते हैं लेकीन बाकी के सब विषयों में जीरो, पहले की पढाई में सभी विषयों को सामान रूप से अहमियत दी जाती थी,और इसीलिए पहले के छात्रों की जेनरल- नोलेज भी बहुत सशक्त होती थी. ..” बात बिलकुल सच भी है.

मेरे सारे दोस्तों को, परिवार वालों को ये लगता था हमेशा और लगता भी है की मैं बहुत मेहनत करता हूँ,मेहनती हूँ,इन्टेलिजन्ट हूँ.. पर मुझे तो लगता है की मैंने कभी मेहनत की ही नहीं..जब मैं अपने छोटे मामा की तुलना अपने आप से करता हूँ तो अपने आप पे बहुत शर्मिंदा भी होता हूँ की मैंने शायद कभी गंभीरता से मेहनत नहीं की..जितनी मेहनत उन्होंने की थी, उतनी मेहनत मैं नहीं कर सका…ये पछतावा मेरे अन्दर हमेशा रहेगा, वैसे अब थोडा शांत हूँ अपने कैरीअर को लेके, एक अच्छी जॉब है, जिंदगी में भी एक थोडा ठहराव है लेकीन कहीं न कहीं ये खलिश तो रहती ही है की मैंने अपनों के कुछ सपनो को पूरा नहीं किया..

 (एक नयी सुबह जरूर आएगी, ऐसी सुबह जब मैं अपनों के सारे अरमानो,सपनो को पूरा करूँगा, ये विश्वास है…और भगवान् से प्राथना भी की वो सुबह जल्दी ही आये)



 [इस पोस्ट का श्रेय जाता है प्रशांत के ब्लॉग पोस्ट( दो बजिया बैराग्य) को..प्रशांत का संस्मरण पढके ही मुझे भी लगा की मैं भी कुछ ऐसा आप लोगों के साथ शेयर करूँ…अब लोग मुझे आईडिया चोर कहें तो कहें….हमें कोई फर्क नहीं पड़ता 😛  , वैसे प्रशांत की सहमती मैंने ले ली है और ये भी पता चला की प्रशांत के उस पोस्ट का आईडिया प्रशांत के पिताजी ने उसे दिया, अब अंकल के आईडिया को लेने का तो मैं हकदार हु ही न …. 😀 , और अगर आपको थोड़ी बोरियत महसूस हुई हो इस पोस्ट से तो कृपया तुरंत बताएं…]
 

कुछ  और यादों का पिटारा खोलूँगा अगले पोस्ट में….

फिर  मिलते हैं… 🙂
 

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  1. बहुत दिल से लिखे हो दोस्त.. हर पोस्ट में पहले से अधिक निखार आता जा रहा है.. बस एक अफ़सोस रह गया कि तुम्हारे घर गया था तो आंटी जी से नहीं मिला, सिर्फ अंकल जी से ही मुलाक़ात हुई थी.. 🙁

    एक दफ़े पापाजी को मैंने कहा कि हर रात दो बजे के आस-पास मुझे कुछ अधिक ही दार्शनिक से ख्याल या फिर आप लोगों कि बहुत याद आती है.. उन्होंने हँसते हुए कहा कि दो बजिया बैराग्य होता है तुमको?

    बस वहीं से मैंने ये शीर्षक निकाल लिया.. लिखने का आइडिया मेरा था, पापाजी को क्रेडिट मैं नहीं देने वाला.. 😛

  2. प्रशांत, जैसे तुम्हें रात के दो बजे ये ख्याल आते हैं वैसे ही मुझे शाम में अक्सर ऐसे ख्याल आते हैं या फिर सुबह सुबह… 🙂

  3. आंटी जी की जेनरल- नोलेज इतनी अच्छी है ये मुझे पता नहीं था.बहुत अच्छा लिखा है अभिषेक.बिलकुल दिल से.वैसे हमें यकीन है तुम अपने सपनो को जरूर पाओगे 🙂

  4. वाह ! मेरे दोस्त …जिंदगी की सारी हकीकत बयां …कर दी ,,,बीच में मुझे लगा …..कुछ गलत ना हो जाए …पर अंत में जीत आपकी …आपकी इस प्रस्तुति से मुझे वो बात ध्यान आई जब हनुमान जी अपनी शक्तिया भूल जाते है और जाममंत आकर उन्हें याद दिलाता है ,,,,और फिर वे एक ही छलांग में सारा समुद्र पार कर जाते है ….बस जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव लिखते रहो http://athaah.blogspot.com/2010/05/blog-post_5939.html

  5. chalo acha h tumhhare bayre mein ye sab baatein jangayi………achha lag raha tha jb main padh rahi thi ye post……….next baar india aana hua to aunty ji se milkar hi jaungi main 🙂

  6. वो सुबह कभी तो आएगी …वो सुबह कभी तो आएगी ….
    जरुर आएगी और बहुत जल्द ही आएगी.
    बहुत अच्छा लिखा है.
    और तुम्हारी मम्मी बहुत इंटेलिजेंट हैं इसमें कोई शक नहीं. तभी तो वह बहुत इंटेलिजेंट लोगों की पोस्ट्स पढ़ती हैं 🙂 🙂

  7. बहुत अच्छी पोस्ट…| शिखा जी की बात से सहमत…वो सुबह तो आकर रहेगी…| आंटी जी के बारे में ये एक नई जानकारी पाकर अच्छा लगा…|
    और हाँ, हम भी कुछ इंटेलीजेंट लोगों की पोस्ट्स बहुत शौक से पढ़ते हैं…:P

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