हरिवंशराय बच्चन की कवितायेँ अमिताभ बच्चन की आवाज़ में

हरिवंशराय बच्चन जी की कवितायेँ तो सभी को एक जैसे ही प्रिय हैं.उनकी कवितायों को अमिताभ बच्चन की आवाज़ में सुने और डाउन्लोड करें.डाउन्लोड लिंक आपको इस पोस्ट में मिल जाएगी.

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।

मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।


एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग इस संसार में
है प्यार जिसमें उस  तरह असमर्थ कातर।
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने?
रात आधी खींच कर मेरी हथेली

एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।



प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अंधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने
पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।



और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ?
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

————–

अंग से मेरे लगा तू अंग ऐसे, आज तू ही बोल मेरे भी गले से।
पाप हो या पुण्‍य हो, मैंने किया है
आज तक कुछ भी नहीं आधे हृदय से,
औ’ न आधी हार से मानी पराजय
औ’ न की तसकीन ही आधी विजय से;

आज मैं संपूर्ण अपने को उठाकर
अवतरित ध्‍वनि-शब्‍द में करने चला हूँ,
अंग से मेरे लगा तू अंग ऐसे, आज तू ही बोल मेरे भी गले से।

और है क्‍या खास मुझमें जो कि अपने
आपको साकार करना चाहता हूँ,
ख़ास यह है, सब तरह की ख़ासियत से
आज मैं इन्‍कार करना चाहता हूँ;

हूँ न सोना, हूँ न चाँदी, हूँ न मूँगा,हूँ न माणिक, हूँ न मोती, हूँ न हीरा,
किंतु मैं आह्वान करने जा रहा हूँ देवता का एक मिट्टी के डले से।
अंग से मेरे लगा तू अंग ऐसे, आज तू ही बोल मेरे भी गले से।

और मेरे देवता भी वे नहीं हैं
जो कि ऊँचे स्‍वर्ग में हैं वास करते,
और जो अपने महत्‍ता छोड़, 

सत्‍ता में किसी का भी नहीं विश्‍वास करते;
देवता मेरे वही हैं जो कि जीवन में पड़े संघर्ष करते, गीत गाते,
मुसकराते और जो छाती बढ़ाते एक होने के लिए हर दिलजले से।
अंग से मेरे लगा तू अंग ऐसे, आज तू ही बोल मेरे भी गले से।

छप चुके मेरी किताबें पूरबी औ’
पच्छिमी-दोनों तरह के अक्षरों में,
औ’ सुने भी जा चुके हैं भाव मेरे
देश औ’ परदेश-दोनों के स्‍वरों में,

पर खुशी से नाचने का पाँव मेरे
उस समय तक हैं नहीं तैयार जबतक,
गीत अपना मैं नहीं सुनता किसी गंगोजमन के तीर फिरते बावलों से।
अंग से मेरे लगा तू अंग ऐसे, आज तू ही बोल मेरे भी गले से।

————–


पाप मेरे वास्ते है नाम लेकर आज भी तुमको बुलाना।
है वही छाती कि जो अपनी तहों में
राज़ कोई हो छिपाए,
जो कि अपनी टीस अपने आप झेले
मत किसीको भी सुनाए,
दर्द जो मेरे लिए था गर्व उसपर
आज मुझको हो रहा है,

पाप मेरे वास्ते है नाम लेकर आज भी तुमको बुलाना।

वह अगस्ती रात मस्ती की, गगन में
चाँद निकला था अधूरा,
किंतु मेरी गोद काले बादलों के
बीच में था चाँद पूरा,
देह-वह भी थी अलग कब-नेह दोनों
एक मिलकर हो गए थे,

वेदनामय है मुझे तो उस घड़ी को याद रखना या भुलाना।
पाप मेरे वास्ते है नाम लेकर आज भी तुमको बुलाना।

हरिवंशराय बच्चन जी की कवितायों को सुनने के लिए नीचे की लिंक को क्लिक करें


(पार्ट 2 की जो कविता है वो डाउनलोड लिंक में उपलब्ध है)

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Part1
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मधुशाला


हरिवंशराय बच्चन जी के प्रतिनिधि कविताओं का संकलन.पढने के लिए और डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें.कवितायेँ PDF फॉर्मेट में हैं.
प्रतिनिधि कवितायेँ – हरिवंशराय बच्चन

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  2. bade din baad tumhare blog pe aai main..bahut achhe achhe post tumne likhe hain…
    aur kaise ho…kabhi humein mail bhi kar diya karo..

    with all my blessings for u
    -sapna

    and this post is awesome

  3. शुक्रिया सपना भाभी..इ-मेल किया था आपको शायद अपने ध्यान नहीं दिया, अब करूँगा..इंडिया आने का इधर कुछ प्लान हो तो बताइयेगा..बाकि बातें इ-मेल पे

  4. बहुत खूब बच्चे , एक नायाब पन्ना अंतर्जाल के लिए , सहेज लिया है आते रहेंगे और सुनते रहेंगे । शुभकामनाएं

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