कुछ बातें ऐसे ही

पिछले कुछ दिन मैं पटना में था, मेरी बहन की सगाई थी, इसलिए थोडा ब्लॉग पे वक़्त नहीं दे पा रहा था.सगाई के बाद भी मुझे वक़्त नहीं मिल पाया सही से ऑनलाइन आने का.2-3 दिन पहले अपने इ-मेल पे लोगिन किया तो मेरे कुछ ब्लॉगर मित्र के इ-मेल इन्बोक्स में थे..सबकी येही एक शिकायत थी की मैं पिछले कुछ दिनों से उनके लिखे पोस्ट पे टिप्पणियां नहीं कर रहा अभी जो लोग मेरे कार ब्लॉग को पढ़ना शुरू किये हैं, वो कह रहे थे कुछ नया कार के बारे में पोस्ट करने को…मैंने भी सबसे माफ़ी मांगी और कहा की पिछले 2 -3 दिन से मैं थोडा व्यस्त था, आज से सबके पोस्ट पे टिप्पणियां करूँगा.कुछ मित्र मेरे ऑनलाइन नहीं आने पे भी मुझसे खफा थे.आज सबको फुरसत से इ-मेल किया, अब उनके जवाब का इंतज़ार है.

अभी अपने बहन की सगाई के बाद वापस जब बंगलोर आ रहा था तो, फुरसत मिली कुछ किताबें पढने की.वैसे तो पिछले 2 महीनो से किताबें कोई भी नहीं पढ़ रहा..कुछ कामों में थोडा व्यस्त हो गया था.इस बार जब मैं वापस बंगलोर आ रहा था तो मेरे हाथ में दो किताबें थी..एक तो रेणु जी की एक आदम रात्रि की महक  और दूसरी किताब थी शरतचन्द्र जी की अभागी का स्वर्ग. रेणु जी की ये किताब मेरे बैग में रखी पढ़ी थी, मैंने ध्यान ही नहीं दिया था.वैसे तो मुझे रेणु जी की कहानियों से काफी प्रेम है, लेकिन इस बार शरतचन्द्र जी के इस लघु कथा को पढ़ के भी अच्छा महसूस हुआ, वैसे तो मैंने शरतचन्द्र जी के  2 उपन्यास उस समय ही पढ़ा जब मैंने अपनी इंजीनीयरिंग की पढाई पूरी की थी.आप कह सकते हैं की इंजीनीयरिंग के बाद ही मुझे हिंदी उपन्यासों से थोडा लगाव हुआ है. अभी मुझे बंगलोर में हिंदी किताबों का संग्रह नहीं मिल पता.एक शिकायत ये हमेशा रहती है मेरी की बंगलोर में इतने बड़े बड़े मॉल खुल गए हैं जहाँ देश-विदेश के लगभग हर किताबें आपको मिल जाएगी लेकिन अगर आप हिंदी की किताबों को ढूंढने जायेंगे तो आपको शायद एक भी ढंग की किताबें नहीं मिलने वाली.मेरे घर से थोड़े दूर पे ही एक किताबों का मॉल है रीलाइअन्स टाइमआउट. यहाँ भी वही देखने को मिलता है, आपको हर तरह की किताबें आराम से मिल जाएँगी लेकिन हिंदी किताबें तो देखने को भी नहीं मिलेगी.अभी कुछ दिनों से देख रहा हूँ की कुछ कुछ हिंदी किताबें ये मॉल वालों ने रखना शुरू किया है, लेकिन अधिकतर किताबें या तो बहुत ही साधारण है या फिर बकवास.कुछ ही किताबें हैं जो थोड़ी बहुत अच्छी हैं, लेकिन वो भी बहुत ही कम, 10 -12 अच्छी किताबें ही होंगी मात्र.कभी सोचता भी हूँ की इतने हजारों किताबों के संग्रह में इन्हें हिंदी के कुछ किताबों को रखने की जगह नहीं मिलती क्या? खैर इस मॉल में तो कुछ किताबें हैं भी.अगर आप बंगलोर के ही एक मॉल “फोरम” में चले जाएँ तो वहां भी किताबों का एक जो विशाल दुकान है “लैंडमार्क”, वहां तो आपको हिंदी किताबें ढूंढने से भी नहीं मिलेगी.उन लोगों से मैंने शिकायत भी की थी एक बार, उन्होंने कहा की सर, कुछ किताबें ला रहे हैं हम हिंदी के.अब देखना ये है की वो हिंदी किताबें लाते हैं या नहीं.ऐसा नहीं है मुझे अंग्रेजी के नोवेल से कोई चिढ़ है..मैंने कई नोवेल पढ़े भी हैं और कुछ तो मुझे बहुत ही ज्यादा पसंद हैं.लेकिन हिंदी, जो हमारी मातृभाषा है, उसके साथ ऐसा बर्ताव मुझे समझ नहीं आता.इन लोगों को बस मैं येही कहना चाहूँगा की हिंदी हमारी मातृभाषा है,मात्र एक भाषा नहीं .
 

मुझे उस समय भी बहुत गुस्सा आता है जब आज कल के कुछ लड़के-लड़कियों को हिंदी के आसन आसन शब्द नहीं मालूम होते और अगर वही शब्द आप उन्हें अंग्रेजी में कह दें तो फट से मतलब समझ जायेंगे.ये सही है की अंग्रेजी एक ग्लोबल भाषा है और इसका प्रयोग बहुत ही आवश्यक है, लेकिन हमें अंग्रेजी के चक्कर में हिंदी से मुह नहीं फेरना चाहिए.ये मेरी खुद की सोच है.कुछ मेरे दोस्त मुझसे अक्सर पूछ लेते हैं की यार तुम अंग्रेजी पॉप क्यों नहीं सुनते, अंग्रेजी गाने क्यों नहीं सुनते, वो भी काफी अच्छे बने होते हैं.पर मैं इस मामले पे येही कहता हूँ की यार हिंदी गानों की कमी तो है नहीं, और अगर देखो तो जो हम सोचते हैं, महसूस करते हैं उसे हिंदी संगीत से बेहतर और कौन सा संगीत दर्शा सकता है.अंग्रेजी गाने को मैं भी सुनता हूँ लेकिन सच कहूँ तो अपनी भाषा में इतने ज्यादा अच्छे गाने,ग़ज़ल,शायरी लिखे हुए हैं की उनसे मुझे फुरसत ही नहीं मिलती.

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  2. बिलकुल सही ! वैसे हम भी हिंदी गाने के ही शौक़ीन हैं.पुराने हिंदी गानों की बात ही कुछ और रहती है.

    और रही बात किताबो की, तो मुझे भी दिक्कत तो होती थी, लेकिन मेरे पापा जी हिंदी किताबो के प्रेमी हैं इसलिए मुझे कुछ अच्छी अच्छी किताबें मिल ही जाती हैं उनसे वरना लन्दन में तो पुराने हिंदी सहित्य खोजना बहुत बड़ी बात है

  3. खरीदो और पढ़ो.. बैंगलोर आकर सब छीन ना लिए तो बोलना.. 🙂
    देखो मौका लगा तो अगले हफ्ते वही रहूँगा..

  4. I am commenting you in English on an assumption that you will not consider me as someone who is ashamed or ignorant to the importance of Hindi.
    I am strong supporter of Hindi in my office, that is because I have mostly Telugu-speaking folks around who make me die for listening to my own mother tongue.
    You might not believe me but after around 3 years I am reading in Hindi and honestly loved this!
    Hamari Matribhasha aur aapko mera saadar pranam 🙂

  5. @ गरिमा – मेरे यहाँ तो इसका ठीक उल्टा है.. मैं हिंदी सुन पाता हूँ सिर्फ और सिर्फ अपने कुछ तेलगु मित्रों के कारण ही.. 🙂

  6. @गरिमा जी,
    🙂
    मैं बिलकुल आपको उन लोगों की श्रेणी में नहीं रखूँगा जिन्हें हिंदी पढने में या बोलने में अच्छा नहीं लगता …आपका शुक्रिया आपने मेरे ब्लॉग पे आके टिपण्णी दी….आपकी सोच जान के अच्छा लगा ..मेरे कुछ ऐसे मित्र हैं(मित्र क्या मेरे जूनियर हैं) जिन्हें हिंदी पढने में तकलीफ होती है…तो बस यही सब चीजों से दिल उदास हो जाता है…

    अंग्रेजी के पक्ष में मैं भी हूँ…क्यूंकि इंग्लिश एक ग्लोबल भाषा है, जिसकी बहुत ही ज्यादा अहमियत है…..लेकीन अंग्रेजी के चक्कर में हमें अपनी भाषा को भूलना नहीं चाहिए..

    खैर
    धन्यवाद ब्लॉग पे टिपण्णी देने के लिए 🙂

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