फ़िल्मी बातें

आज दिल बड़ा ही फ़िल्मी हो रहा है, शायद इसलिए भी की पिछले 3 -4  दिनों से कई फिल्मे देख चुका हूँ..वैसे मैं बता दूँ की नयी फ़िल्में तो मुझे पसंद है ही लेकिन पुरानी हिंदी फिल्मो का मैं बेहद शौक़ीन हूँ, और उसमे भी अगर राजेंद्र कुमार-साधना की कोई फिल्म हो तो मजा ही आ जाता है.90  के दशक में भी कुछ बड़ी ही मीठी मीठी फ़िल्में बनी हैं, और मेरे जो भी पसंदीदा कलाकार हैं या तो पुराने फिल्मो से हैं या फिर 90  के दशक के कलाकार.

चलिए अब बता दूँ की मेरी पसंदीदा कलाकार कौन कौन हैं, राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार और संजीव कुमार का  मैं बहुत ही बड़ा फ़ैन हूँ, इनके साथ साथ दिलीप कुमार, भारत भूषण,विश्वजीत,ऋषि कपूर,अमिताभ,महमूद,धर्मेन्द्र,गुरु दत्त,शम्मी कपूर का भी मैं बहुत ही बड़ा फ़ैन रहा हूँ..
पुराने ज़माने की हेरोइन की बातें करें तो सबसे ज्यादा पसंद हैं मुझे साधना और मीना कुमारी हैं….इनके अलावा वहीदा रहमान,लीना चंदवरकर,वैजंतीमाला,सायरा बानो,हेमा मालिनी का मैं बहुत बड़ा फ़ैन हूँ…वैसे तो सभी कलाकार मुझे अच्छे लगते हैं लेकिन जिन लोगों का नाम मैंने लिखा है वो मुझे बेहद ही ज्यादा पसंद हैं.

राजेंद्र कुमार-साधना की जोड़ी मुझे इतने ज्यादा पसंद है की मैंने उनकी तीन  फिल्मे आरज़ू , आप आये बहार आयीं और मेरे महबूब मैंने करीब 15 -20 बार देखी है.एक फिल्म थी राजेंद्र कुमार-मीना कुमारी की “दिल एक मंदिर” जिसमे इन दोनों के अलावा राज कुमार भी थे, अगर आपने वो फिल्म नहीं देखी तो जाइए आज ही सी-डी खरीद के देख लें..लाजवाब फिल्म है…एक और फिल्म है राजेंद्र कुमार-मीना कुमारी की “चिराग कहाँ रौशनी करे” ये फिल्म शायद बहुत लोगों को पता नहीं होगी..उतनी ज्यादा चर्चित फिल्म नहीं है लेकिन बेहतरीन फिल्म है..इसे भी जरूर देखें..हमारे लैपटॉप पे तो जब भी राजेंद्र कुमार का कोई भी गाना बजता है तो हम तो भाई झूम उठते हैं…बात ही कुछ ऐसी है इस कलाकार में, शायद इसलिए इनकी कोई फिल्म जल्दी फ्लॉप नहीं होती थी और लोग इन्हें “जुबली कुमार” के नाम से भी जानते हैं..

फिर मुझे मनोज कुमार और संजीव कुमार की फिल्मे देखने का भी अलग ही शौक है..अब क्या कहें, जितनी बार “पूरब और पश्चिम”, “उपकार”,”शहीद”,”क्रांति” देखता हूँ तो दिल तो देशभक्ति से लोत-पोत हो जाता है.एक अलग सा जज्बा आता है जो बयां नहीं कर सकता मैं..मेरे ख्याल में मनोज कुमार की हर फिल्म एक बहुत ही सशक्त सन्देश देती है..वहीँ संजीव कुमार की अदाकारी भूले नहीं भूलती. कोशिश,खिलौना,आंधी,अर्जुन पंडित,ये है जिंदगी,शोले,अंगूर,त्रिशूल,अनामिका,सतरंज के खिलाडी…ये ऐसे फिल्म हैं जिन्हें मैंने न जाने कितनी बार देखा है..इनमे से बहुत फिल्म मेरे पास हैं भी और बहुत नहीं भी हैं..कोशिश जारी है की मेरे पास इन सब फिल्मो की सी-डी हो….इनमे से सबसे बेहतरीन कलाकारी संजीव कुमार की मुझे कोशिश और खिलौना में लगी..अर्जुन पंडित और आंधी में भी उन्होंने लाजवाब अभिनय किया है…
हिंदी कॉमेडी फिल्मो में मैं बेहतरीन फिल्मे मानता हूँ इन्हें … अंगूर,गोलमाल(अमोल पालेकर वाला),चलती का नाम गाड़ी,पड़ोसन,चुपके चुपके .
इनके अलावा मेरी कुछ पसंदीदा फिल्मे हैं आरती,उपहार, गाईड, गोपी,गीत,बंदिनी,जागृति,प्यासा,मिलन,मधुमती,त्रिशूल, क़र्ज़,मेरा नाम जोकर,मर्द,आनंद,ज़ंजीर,कभी कभी, राम और श्याम, बरसात की एक रात,हकीकत , सौदागर,कानून, दीवार,कटी पतंग, खूबसूरत, कागज़ के फूल, तीसरी कसम, वक़्त,याराना,शराबी…और भी कई फिल्मे हैं लेकिन फ़िलहाल जबान पे नहीं आ रहे….

पुराने डाइरेक्टर की श्रेणी में मेरे सबसे फेवरिट डाइरेक्टर आयेंगे – ऋषिकेश मुखर्जी,मनमोहन देसाई,यश चोप्रा,मनोज कुमार,बलदेव राज चोप्रा,गुरु दत्त,राज कपूर,बिमल रॉय..इनके अलावा भी कुछ डाइरेक्टर मुझे पसंद आते हैं…

नए ज़माने के भी चुनिन्दा नाम ही मुझे अच्छे लगते हैं..गोविंदा की फिल्मे मैं किसी भी मूड में देख सकता हूँ, उनकी हर फिल्म के पीछे कुछ न कुछ अच्छा सा सन्देश जरूर रहता है..अजय देवगन, सन्नी देओल और अक्षय खन्ना मेरे सबसे पसंदीदा एक्टर हैं आज के ज़माने के..इनके अलावा मुझे अनिल कपूर,जैकी श्रॉफ,अनुपम खेर,नसीरुद्दीन शाह,नाना पाटेकर मुझे काफी पसंद हैं….बाकी जो सब की पसंद हैं (तीनो खान) सलमान,आमिर,शाहरुख़..ये भी मुझे अच्छे लगते हैं लेकिन इनका कोई बड़ा फ़ैन नहीं हूँ मैं…आज कल के जितने भी नए कलाकार आये हैं उनमे से मुझे अभय देओल एक पसंद आते हैं..वो अलग अलग तरह के फिल्मे और अर्थपूर्वक फिल्मे कर रहे हैं.

नए ज़माने की कुछ फिल्मे जो मुझे बेहद पसंद हैं वो हैं हीना,हम साथ साथ हैं,हम आपके हैं कौन, विवाह,मैंने प्यार किया,ज़ख्म,तुम बिन, परदेसी बाबु,वीर-ज़ारा,रंग दे बसंती,लेजेंड ऑफ़ भगत सिंह,लम्हे,ताल,विरासत,डोली सजा के रखना,माचिस,सरफ़रोश,बोर्डर,सरकार,नमस्ते लन्दन,दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, घायल,घातक, जीत, ग़दर, मशाल,राम-लक्ष्मण, दामिनी,जिद्दी,गर्दिश,क्रान्तीवीर,दिलवाले,कच्चे धागे, हम दिल दे चुके सनम,गंगाजल…और भी कई नाम हैं इनमे शामिल…

अब बात करें अगर गानों की और संगीत की..संगीतकारों की बात की जाए तो मुझे सबसे ज्यादा पस्नंद हैं शंकर-जयकिशन, आर.डी.बर्मन,एस.डी.बर्मन,खय्याम और जयदेव..इनके अलावा सलिल चौधरी भी पसंद हैं, हालांकि उन्होंने बस कुछ ही फिल्मो में संगीत दिया है लेकिन उनकी कवितायेँ मुझे काफी पसंद आती हैं..
गायकों की अगर बात करें तो मेरे पसंदीदा हैं मुकेश. लेकिन ये भी एक अजब कहानी है की मैं सबको बोलते फिरता हूँ की मेरे पसंदीदा मुकेश हैं, और वैसे जब भी मैं कुछ अच्छा सुनने के मूड में रहता हूँ तो रफ़ी साहेब की याद आ जाती है…तो ये कहना गलत नहीं होगा की रफ़ी साहेब और मुकेश मेरे दो पसंदीदा गायक हैं..किशोर तो हर किसी के फेवरिट हैं..मुझे वैसे हेमंत कुमार,मन्ना डे,शैलेन्द्र,लता जी, आशा जी, सुषमा जी, गीता दत्त भी काफी पसंद हैं. कोई एक गाना कैसे बताऊँ मैं की कौन मेरा सबसे फेवरिट है लेकिन ये बात बिलकुल सही है की मैं ज्यादातर कोशिश करता हूँ पुराने गाने सुनने की…गीतकारों में मुझे सबसे ज्यादा पसंद हैं भरत व्यास,मजरूह सुल्तानपुरी,गुलज़ार और साहिर लुधियानवी.

नए ज़माने के कुछ डाइरेक्टर हैं जो की काफी प्रभावशाली हैं, मेरे सबसे पसंदीदा डाइरेक्टर हैं सूरज बड़जात्या..इनकी सारी फिल्मे मुझे बेहद ही पसंद हैं..इनके अलावा मेरे पसंदीदा डाइरेक्टर हैं राजकुमार संतोषी, श्याम बेनेगल,प्रकाश झा, प्रियदर्शन, डेविड धवन,आदित्य चोप्रा, इम्तिआज़ अली.

नए ज़माने के संगीतकारों के श्रेणी में मैं “जतिन-ललित” का बलाइंड फैन हूँ..गायकों में कुमार सानु,शान,उदित नारायण,कविता कृष्णमूर्ति,श्रेया घोसल का फैन हूँ…मैं अलका याग्नीक का बहुत ही बड़ा फैन हूँ..जतिन-ललित के मुझे लगभग सभी गाने एक से अच्छे लगते हैं..

संगीत की बात चल रही है तो थोडा ग़ज़ल के तरफ भी धयान दें…ग़ुलाम अली, तलत अज़ीज़,जगजीत सिंह मुझे बेहद भाते हैं…भला कौन इनकी दिल और रूह पे छाने वाली ग़ज़लें को न सुने…हम तो बस इनके तरफ खिचे चले आते हैं….

मैं हमेशा से पुराने संगीत की तरफ आकर्षित रहा हूँ.ये मानता भी हूँ की अब हमारे फिल्म जगत में वैसे गाने नहीं लिखे जाते जैसे पहले लिखे जाते थे..अभी कुछ दिन पहले ही एक फिल्म अवार्ड समारोह में जावेद अख्तर साहेब को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया.उन्होंने मंच पे ये साफ़ साफ़ कहा –  “अक्सर मुझसे लोग पूछते हैं की  पहले ज़माने में जो गीत होते थे अब नहीं होते,पहले ज़माने वाली म्यूजिक अलग थी..यहाँ जो लोग खरीदने वाले हैं गीत को वो ये कहते हैं की नहीं अब ऑडीअन्स को वैसे गीत नहीं चाहिए..नए गीत चाहिए लेकिन ऑडीअन्स तो कुछ और कहती है…आज भी लोगों को पुराने गीत क्यों याद हैं..उनमे क्या खूबी थी?..वो बेहतर लिखे हुए थे..मैं समझता हूँ की हमें बेहतर लिखे हुए गीत और बेहतर स्क्रिप्ट की जरूरत है..हमने हर काम में तरक्की कर लिया लेकिन ये काम थोडा पीछे रह गया..” बहुत ही सही कहा जावेद साहेब ने….मैं भी ये कतई नहीं कहूँगा की आज के गीत ख़राब होते हैं या उनमे कुछ बात नहीं होती..कुछ गीतों ने तो मुझे ऐसा छुआ है की मैं क्या कहूं, लेकिन फिर भी ये जरूर कहूँगा की आज के गीत पहले ज़माने के गीतों के मुकाबले में खरे नहीं उतरेंगे…

चलिए बहुत हो गयी फिल्मो की बातें, मेरे मेज पे अभी दो फिल्मे पड़ी हुई हैं “फिर वही दिल लाया हूँ, और झुक गया आसमान” चलता हूँ इन्हें देखने अब…फिर मुलाकात होगी अलगे पोस्ट में….

सायोनारा.. 🙂

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  1. वाह.. आज सिनेमा कि महफ़िल जमी है.. बहुत बढ़िया लिखे हो दोस्त.. वैसे पुरानी फिल्मो का मैं भी शौक़ीन हूँ.. 🙂

  2. थैंक्स भाई..ऐसे ही मन कर गया की फ़िल्मी गप्पें की जाए आज

  3. मेरी भी तुम्हारी तरह ही कुछ कहानी है.मेरे पसंदीदा जोड़े हैं राजकपूर-नर्गिस या फिर दिलीप कुमार-सायरा बानो.
    पुराने हिंदी फिल्मो के सामने कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे 🙂

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