हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

ग़ालिब कि ग़ज़लें – पार्ट २ 

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।


डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ूँ जो जो चश्मे-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले ।


निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।


भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत की दराज़ी का
अगर उस तुर्र:-ए-पुर पेचो-ख़म का पेचो-ख़म निकले


मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाए
हुई सुबह और घर से कान पर धर कर क़लम निकले


हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बाद:-आशामी
फिर आया वह ज़मान: जो जहां में जाम-ए जम निकले


हुई जिनसे तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़े-सितम निकले


मुहब्बत में नही है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले ।


कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

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