अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पे सभी को बधाई

आज सुबह से ही सोच रहा था की महिला दिवस पे कुछ लिखूं..लेकिन सुबह से छोटे छोटे कामों में दिमाग लगा हुआ था..अभी अपनी एक मित्र “स्नेहा” का ब्लॉग पढ़ रहा था, तो सोचा की मैं भी बधाई दे दूँ सभी महिलाओं को…वैसे तो हम हर साल ये दिन मानते हैं लेकिन इसकी सार्थकता तब होगी जब हर महिला को सम्पुर्ण रूप से आज़ादी मिलेगी, जब एक महिला सर उठा के समाज में रह सके…वैसे तो महिलाओं की समाज में पहले से कहीं अधिक बेहतर हालात हैं,लेकिन अभी भी और बहुत कुछ किया जाना बाकी है….एक औरत की जो तस्वीर होती है प्रेम, स्नेह व मातृत्व के साथ ही शक्तिसंपन्न की मूर्ति, उसे कायम रखने की जरूरत है…बहुत से लोग हैं जो अभी भी औरत को पुरुष के बराबर नहीं समझते,या फिर कुछ ऐसे लोग हैं जो अक्सर किसी न किसी रूप में औरत का अपमान करते हैं, ऐसे लोगों की सोच जब तक नहीं बदलेगी इस महिला दिवस की सार्थकता साबित नहीं हो पायेगी…ऐसे लोग हमेशा ये भुल जाते हैं की औरत के कितने रूप होते हैं, माँ,बहन,बीवी,दोस्त..






ख़ुशी इस बात की है की आज की महिला हर छेत्र में आगे है…चाहे वो खेल-कूद हो,राजनीती हो या फिर कोई भी और छेत्र ..हर जगह महिलाओं ने अपना हुनर दिखाया है…दिन ब दिन महिलाओं की छवि बदलते जा रही है और निखरते जा रही है….अब बस उस दिन का इंतज़ार है जब समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में महिलाओं के नज़रिए को भी महत्वपूर्ण समझा जायेगा…

HAPPY WOMEN’s DAY..!!



CHEERS FOR WOMEN 🙂

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  1. wow 🙂
    bahut accha laga aapka post pdhke.
    accha lgta hai jab ladke aisa kuch likhte hai 🙂
    very nice
    and thnx for mentioning my name 🙂

  2. भाई लिखा तो तुने अच्छा है मगर मैं इस से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ. जिसको जितना मिलता है, उसकी इक्षा और बढ़ने लगाती है. इस्थिति में सुधर हो ये कौन नहीं चाहता. मगर,इस्थिति में सुधर का मतलब आरक्षण ही नहीं होता. विशेष, मेरे ब्लॉग में महिला आरक्षण वाला कॉलम पढना; खुद समझ जाएगा मैं क्या कहना छह रहा हूँ. वैसे महिला दिवस पे मेरी ओर से भी बहुत बधाई.

  3. यार उस बहस में मैं पड़ना नहीं चाहता….और आरक्षण की बात मैंने की भी नहीं…खैर कोई बात नहीं यार..हर कोई हर बात पे सहमत तो नहीं हो सकता न…और वैसे मैंने तुम्हारा ब्लॉग पढ़ा है भाई… 🙂

    @स्नेहा , सुक्रिया 🙂

  4. बहुत अच्छा लिखा है तुमने अभिषेक.
    अच्छा सोच रखते हो,
    काफी कम लड़के हैं जिनकी ऐसी सोच रहती है !

  5. भाई, महिला सशक्तिकरण और स्त्री विमर्श बहुत ही उलझा हुआ मसला है और मेरा अपना मानना है कि मुझमे अभी तक इतनी समझ नहीं है कि इस पर कुछ लिख सकूँ.. हाँ मगर अपनी समझ में हर किसी को इंसान समझ कर परखता हूँ.. चाहे बात पुरुष-स्त्री कि हो या फिर बात अमीर-गरीब कि हो या फिर बात सामजिक संरचना में उंच-नीच कि हो..

    हम कई बाते अपने घर में ही ऐसे करते हैं जो हम यह सोच कर नहीं करते हैं कि उससे किसी महिला को नीचा दिखाने का उपक्रम माने, मगर अगर उसी बात को ध्यान से सोचे तो कहीं न कहीं से वह महिलाओं के अधिकार को मारना होता है.. हम जो भी करते हैं वह अनजाने में करते हैं, और हमें यह गुमान भी नहीं होता है कि हम गलत कर रहे हैं, कारण बस इतना होता है कि हमें बचपन से ही धर्म के नाम पर या संस्कार के नाम पर वह शिक्षा दी गई होती है..

    एक उदाहरण देकर समझाना चाहता हूँ, तुम्हारे ही एक पिछले पोस्ट पर तुमने लिखा था कि तुम लड़कियों को सिगरेट पीते देख अच्छा महसूस नहीं करते हो.. मगर शायद वही तुम्हे लड़कों को सिगरेट पीते देख वही महसूस ना हो.. कारण बस यह है कि बचपन से हमने अपने शहर में कभी ये देखा नहीं था.. चाहे जो भी हो, अनजाने में ही एक तरह का भेदभाव यह भी है..

    मेरे लिखे को अन्यथा मत लेना.. मेरी उस बात को भी याद रखना कि "असहमत होने का मतलब विरोधी होना नहीं होता है".. कभी सोचना इस पर गहराई से..

    हाँ मगर तुम्हारी भावनाओं को मैं अच्छे से समझ रहा हूँ.. और यह गलत बिलकुल नहीं है.. 🙂

  6. भाई मैंने आपके बातों को बिलकुल गलत रूप से नहीं लिया….सभी के विचारों की कद्र करनी चाहिए…आपसे भी बहुत जगह सहमत हूँ….और सही मानिए मैं भी हमेशा से ये मानता आया हूँ कि "असहमत होने का मतलब विरोधी होना नहीं होता है"….क्यूंकि मेरे काफी ऐसे ख़ास मित्र हैं जिनकी बातों से मैं ज्यादा सहमत नहीं रहता लेकिन उनकी बातों की कद्र करता हूँ…

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