पाश

युग को पलटने में मसरूफ लोग
बुखार से नहीं मरते
मौत के कंधे पर जाने वालों के लिए
मौत के बाद जिंदगी का सफर शुरू होता है।
 पाश -

पंजाब में जन्मे कवी और क्रांतिकारी अवतार सिंह संधू , जिन्हें सब "पाश" के नाम से जानते हैं, 23 मार्च को ही उनकी हत्या कर दी गयी थी.इनकी लिखी हुई कविता को सब लोगों ने बहुत ही सराहा है और पढ़ा भी है.उनकी लेखनी में एक आक्रोश है और हमें गहराई से सोचने पे मजबूर करती हैं .पाश भगत सिंह के एक अनुयायी भी रहे हैं.भगत सिंह के बारे में वो कहते हैं
" भगत सिंह ने पहली बार पंजाब को जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से बुद्धिवाद की तरफ मोड़ा था. उसी पाश का आज जन्मदिन है"
पाश भगत सिंह से बहुत ही प्रभावित थे.23 मार्च को जब हम भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु कि शहादत को याद करते हैं तो इस दिन पाश को भी याद अवश्य करना चाहिए.





 मेहनत कि लूट 

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी
सबसे खतरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होती

सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना 


सबसे खतरनाक वो आँखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..
जिसकी नजर दुनिया को मोहब्बत से चूमना भुल जाती है
जो  चीजों से उठती अंधेपन कि भाप पर ढुलक जाती है
जो रोजमर्रा के क्रम को पीती हुई 
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे खतरनाक वो दिशा होती है 
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धुप का कोई टुकड़ा 

आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए

कैद करोगे अंधकार में

क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िंदगी
लेकिन मैं हूं
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन
अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इंतज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें

घास

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मुझे क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊंगा
बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी...
दो साल... दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी
यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है
मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूंगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा।


मैं पूछता हूँ 


मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक्त इसी का नाम है
कि घटनाए कुचलती चली जाए
मस्त हाथी की तरह
एक पुरे मनुष्य की चेतना?
कि हर प्रश्न
काम में लगे जिस्म की गलती ही हो?

क्यूं सुना दिया जाता है हर बार
पुराना चुटकूला
क्यूं कहा जाता है कि हम जिन्दा है
जरा सोचो -
कि हममे से कितनो का नाता है
जींदगी जैसी किसी वस्तु के साथ!

रब की वो कैसी रहमत है
जो कनक बोते फटे हुए हाथो-
और मंडी बिच के तख्तपोश पर फैली हुई मास की
उस पिलपली ढेरी पर,
एक ही समय होती है?

आखिर क्यों
बैलो की घंटियाँ
और पानी निकालते ईजंन के शोर अंदर
घिरे हुए चेहरो पर जम गई है
एक चीखतीं ख़ामोशी?

कोन खा जाता है तल कर
मशीन मे चारा डाल रहे
कुतरे हुए अरमानो वाले डोलो की मछलिया?
क्यों गीड़गड़ाता है
मेरे गाव का किसान
एक मामूली से पुलिसऐ के आगे?
कियो किसी दरड़े जाते आदमी के चीकने को
हर वार
कवीता कह दिया जाता है?
मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से