एक खराब दिन

हैदराबाद शुरू से ही मेरा पसंदीदा जगह रहा है.अगर पटना के बाद मुझे कहीं अपनापन महसूस होता है तो वो हैदराबाद है.हर बार जब भी मैं हैदराबाद जाता हूँ, किसी काम से या फिर घुमने,तो हर बार की एक सुखद कहानी होती है.लेकिन इस बार ऐसा नहीं था.
इस बार मैं एक Interview के सिलसिले में हैदराबाद गया था, Interview तो अच्छा हुआ लेकिन उस दौरान मेरा लैपटॉप बैग खो गया.वैसे उस लैपटॉप बैग में मेरा लैपटॉप तो था नहीं लेकिन मेरे कुछ documents और marks-card थे.थोड़ी से मेरी लापरवाही के कारण वो बैग किसी के हाथ लग गया.जिसने भी लिया होगा वो तो ये सोच के वो बैग उठाया होगा की शायद इसमें लैपटॉप मिल जाए।

मैं बहुत दुखी हो गया, इतने महत्वपूर्ण documents जो उस बैग के साथ चले गए.बहुत देर तक उस कंपनी में बैठा रहा, सोचा की शायद अगर किसी ने गलती से मेरा वो बैग लिया हो तो वापस करने आएगा.लेकिन ऐसा हुआ नहीं.दुखी मन से हैदराबाद से वापस आ गया.मैंने सोचा की जो होना था वो तो हो ही गया,अब उसको सोचने से क्या फायदा.Duplicate marks-card निकलवानी परेगी ये सोच के मैं वापस बंगलोर आ गया।

आज सुबह सोचा की चल के पुलिस स्टेशन में एक सिकायत दर्ज करवा दूंगा और फिर सिविल कोर्ट जाके एक affidavit बनवा लूँगा.सुबह सुबह पुलिस स्टेशन पंहुचा, जैसा सोचा था बिलकुल वैसा ही हुआ.पहले तो मुझे १ घंटा उन्होंने बैठाया ये बोल के की साहब अभी नहीं आये हैं.मुझे लगा था की सुबह के १० बज रहे हैं तो पुलिस वाले तो आ ही गए होंगे पुलिस चौकी पे लेकिन नहीं, करीब ११ बजे के लभग सब-इंस्पेक्टर साहब आये.उन्होंने ऐसे ही हलके अंदाज़ में पुछा की क्या क्या खोया.फिर उन्होंने कहा की पहले जाओ जाके एक affidavit बनवा के लेते आओ.मैंने कहा उनको की पहले आप एक कम्प्लेन तो लिख लें,लेकिन उन्हें कहाँ सुनना था, बोले की जाओ जाके सिविल कोर्ट से एक affidavit बनवा के लेते आओ पहले.अब वहां से मैं निकला सिविल कोर्ट के लिए।

अब बंगलोर में मुझे इससे पहले कभी सिविल कोर्ट जाने की जरूरत हुई नहीं, तो मुझे मालूम नहीं था की सिविल कोर्ट है कहाँ.बस इतना पता था की “मजेस्टिक” में जो mysore bank है उसके आसपास कहीं सिविल कोर्ट है.अब उस इलाके से तो मैं सौ बार गुज़र चूका हुआ लेकिन मैंने कभी सिविल कोर्ट देखा नहीं.देखने की जरूरत भी नहीं पारी थी पहले कभी.खैर, खोज-खाज के मैं पंहुचा सिविल कोर्ट.वहां जाके देखा तो मुझे ये समझ में ही नहीं आया पहले की किसके पास जाऊं.इतना विशाल है बैंगलोर का सिविल कोर्ट.शुक्र है बंगलोर में लोग थोडा अच्छा बोलते हैं, एक आंटी जी मिली…उन्होंने मुझे बड़े अच्छे से समझाया की कोर्ट के पीछे चले जाओ.वहां बहुत से हैं जो affidavit बनाते है।

मैं वहां पहुच गया.एक भाईसाहब टाइप-रायटर सामने लिए बैठे हुए थे.उनके आसपास बिलकुल भी भीड़ नहीं थी, तो मैं उनके पास गया और जाके बोला की affidavit बनवाने का है.उन्होंने कहा की जो जो चीज़ें खोयी हैं आपकी उनके बारे में हर कुछ जानकारी एक पेपर में लिख के मुझे दें.फिर करीब आधे घंटे इंतज़ार करने के बाद उसने मुझे affidavit बनवा के दे दी.मैंने जब पुछा की कितने हुए तो उसने बड़े प्यार से कहा सिर्फ ८०० रुपये हुए सर.मैं तो हैरान रह गया.३ affidavit बनवाने के ८०० रुपये.ये कहाँ की शराफत है.थोड़ी देर उससे बहेस की उसके बाद वो ४५० रुपये पे राज़ी हुआ.खैर वहां से मैं चला आया और अब फिर से मुझे पुलिस स्टेशन जाना था।

करीब २ बजे पंहुचा संजयनगर पुलिस स्टेशन.वहां गया तो थोड़ी देर फिर इंतज़ार करना परा.जब सब-इंस्पेक्टर आया वहां तो इस बार उसने मुझे देखते ही पहचान लिया.सुबह भी उसी ने मुझे कोर्ट जाके affidavit बनवाने को कहा था.बड़े गौर से उसने सारे कागजात देखे और फिर कहा मुझे एक और xerox चाहिए.मैं तुरंत वहां बगलवाले xerox दुकान में गया और ३-३ कॉपी निकलवा ली सारे कागजात के.सब को अच्छे से सिलसिलेवार ढंग से stapple कर के मैंने इंस्पेक्टर को दे दिया सारे कागजात.उसने अब मुझसे खुलेआम पैसे मांग डाले.मैं तो सुन के दांग रह गया कैसे उन्होंने पैसे मांगे बस एक रिपोर्ट लिखवाने को.मैंने पुछा उनसे की, सर मैंने तो बस रिपोर्ट लिखवाई है…इस बात के भी पैसे देने परेंगे क्या..उसने हस्ते हुए कहा की शुक्र करें हम इतना ही मांग रहे हैं, दुसरे पुलिस स्टेशन में जाते तो और मांगते.खैर मैंने बड़े ही दबे मन से २०० रुपये निकले और उसे दे दिए।

जब वापस आ रहा था तो ये ही सोच रहा था की लोग बोलते हैं की हमारा राज्य(बिहार) corrupt है.लेकिन जब बंगलोर जैसे विकसित और silicon city of india कहे जाने वाले शहर में भी ऐसा होता है तो हम क्या कहें इस बात पे.

खैर अब तो मुझे अपने सारे marks-card के duplicate कॉपी निकलवाने हैं, जिसमे मुझे काफी दौरना भी परेगा.एक लापरवाही के कारण कितनी परेशानी हो जाती है ये समझ तो पहले से था ही, अब अहसास भी हो गया इस बात का।

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