पढ़िए देशी चश्मे से लन्दन डायरी



बड़े दिनों बाद आज हाज़िर हूँ अपनी नयी पोस्ट लेकर. अगर कायदे से देखा जाए तो इस पोस्ट को आने में डेढ़ महीने की देरी हो गयी है. मुझे खुद अब तक विश्वास नहीं हो पा रहा है कि जनवरी में मुझे ये किताब मिली थी और मैंने उसके बारे में अब तक नहीं लिखा था.


क्या है देशी चश्मे से लन्दन डायरी?

देशी चश्मे से लन्दन डायरी”, जैसा कि शीर्षक से प्रतीत भी होता है ये शिखा वार्ष्णेय(जो मेरी शिखा दीदी हैं) के उन आलेखों पर आधारित है जो लन्दन से उन्होंने भारतीय मीडिया के लिए लिखा था. शिखा दी ने अपने इस किताब के माध्यम से अपने लन्दन के अनुभवों की बहुत सी रोचक जानकारियां हमारे सामने प्रस्तुत की हैं

देशी चश्मे से लन्दन डायरी और स्मृतियों में रूस

मैं अगर सच कहूँ, तो मेरी ये पोस्ट किताब का रिव्यु होते हुए भी एक बुक-रिव्यु-पोस्ट नहीं है, क्योंकि अक्सर रिव्यु बड़ा सपाट सा होता है. लेकिन मेरे लिए इस किताब का रिव्यु लिखना एक नॉस्टैल्जिक जर्नी से गुजरने जैसा था. इस किताब को पढ़ना बहुत हद शिखा दी कि पहली किताब “स्मृतियों में रूस” को पढ़ने के एक्सपीरियंस से गुज़ारना था. मुझे आज भी याद है जब पहली बार स्मृतियों में रूस खरीदने मैं डायमंड बुक्स के दफ्तर गया था, और जैसे ही किताब हाथ में आई थी तो जैसे भयानक गूसबम्प मिले थे. बड़ा ही अनोखा एहसास था किताब को हाथ में लेने का और पढ़ने की उत्सुकता ऐसी थी कि किताब खरीदते ही मेट्रो के आधे घंटे के सफ़र में लगभग मैंने किताब पूरी खत्म कर ली थी.

देशी चश्मे से लन्दन डायरी में भी कुछ इसी तरह की उत्सुकता रही थी. इस बार किताब खरीदने पब्लिकेशन हाउस के दफ्तर नहीं जाना पड़ा था, बल्कि घर बैठे ही अमेज़न से किताब मंगवा ली थी मैंने. जिस दिन किताब आई थी, उसी रात इस किताब को पढ़ लिया था लेकिन कुछ परिस्तिथियाँ ऐसी बन गयी कि इस किताब के बारे में कुछ भी लिख नहीं पाया था कहीं.

देखा जाए तो मुझे शिखा दी की पहली किताब स्मृतियों में रूस और देशी चश्मे से लन्दन डायरी में बहुत सी समानताएं दिखी हैं. जहाँ स्मृतियों में रूस में आपको रूस के बारे में बहुत छोटी छोटी बातें और एक्सपीरियंसेज पता चलते हैं वहीं इस किताब में लन्दन और इंग्लैंड के कल्चर और वहाँ के रहन सहन के बारे में जानने को मिलता है. अंतर बस इतना है कि स्मृतियों में रूस शिखा दी के उन दिनों के अनुभवों पर आधारित है जब वो कॉलेज में पढ़ती थी, और ये नयी किताब संभवतः अभी के उनके अनुभवों पर आधारित हैं जब उनके बच्चे कॉलेज में पढ़ रहे हैं. 

सूरज ब्रिटेन के साम्राज्य में ही उदय होता है और अस्त भी 


बहुत कम ऐसी किताबें होती हैं जो बेहद ही सरल और रोजमर्रा की भाषा में किसी शहर और देश के परिवेश के बारे में वहाँ के रहन सहन, लोगों की मानसिकता और क संरचना के बारे में हमें बताती हैं और ये किताब वैसी ही एक किताब है. जैसा कि किताब के शीर्षक से जाहिर होता है कि इस किताब के माध्यम से शिखा दी अपनी नज़रों से हमें अपने आसपास का माहौल और पूरा इंग्लैंड दिखलाती हैं. किताब का हर एक प्रसंग, टॉपिक इतने दिलचस्प तरीके से बयान किया गया है कि अनायास ही आप अगला टॉपिक पढ़ने के लिए उत्सुक हो जायेंगे.

शिखा दी ने देशी चश्मे से लन्दन डायरी को एकदम शुरू से शुरू किया है. मतलब कि पहले प्रसंग में उन्होंने ब्रिटेन के गौरवशाली इतिहास के बारे में एक झलक दिखलाई है और वहां के राजशाही ठाट-बाट के बारे में बताया है. एक समय था जब आर्थिक आधार से इंग्लैंड सबसे मजबूत देश था लेकिन अब वहां की इकॉनमी स्लोडाउन पर है और मंदी का असर वहाँ के बाज़ार में है. लेकिन ऐसे माहौल में भी वहाँ क्वीन इस साल हीरक जयंती मना रही हैं. जहाँ एक तरफ लोगों के जरूरतों के तरफ ध्यान देना चाहिए वहाँ रॉयल सेलिब्रेशन पर खजाने लुटाये जा रहे हैं. इन सब के बीच शिखा दी वहाँ के रॉयल सेटअप से भी हमारी जान-पहचान करवा जाती हैं.

ये किताब बड़े अलग अलग मूड को साथ लेकर चलती है, जहाँ सीरियस मुद्दे भी हैं और वहीं कुछ ऐसे मुद्दे जिनके बारे में आपने सोचा नहीं होता है. जैसे कि अगला टॉपिक इस किताब में आपको लोमड़ी पर मिलता है. चौंक गए न? मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ था शीर्षक देख कर और इस प्रसंग को पढ़ते हुए ये जानकार और भी आश्चर्य हुआ कि जैसे दिल्ली में बंदरों का आतंक है वहाँ लोमड़ी का आतंक है. ये सच में एक गंभीर समस्या है लेकिन मेरे चेहरे पर पता नहीं क्यों इस भाग को पढ़ते हुए चेहरे पर हल्की हँसी चली आई थी.

बढ़ता बाजारवाद और अकेले होते बुजुर्ग 

इस किताब के माध्यम से हमें लन्दन में रह रहे बुजुर्ग-वर्गों के बारे में भी पता चलता है और ये समझ आता है कि उनकी ज़िन्दगी वहाँ बहुत आसन नहीं होती है. उम्र के इस पड़ाव पर आते आते वे अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं. हमारे यहाँ जिस तरह से बुढ़ापे में भी घर भरा होता है, बेटा, बहु, बेटी, दामाद, पोते, पोती सब आसपास मौजूद रहते हैं, वहाँ अधिकतर बूढ़े लोग अकेले ज़िन्दगी बिता रहे हैं. एक उधाहरण के तौर पर शिखा दी अपनी एक पड़ोसी के बारे में बताती हैं जो साल में बस एक बार अपने पोते-पोतियों से मिल पाती हैं और उन्हें खूब याद करती हैं. ये टॉपिक पढ़ते हुए मुझे जाने क्यों हमारे समाज में तेज़ी से हो रहे बदलाव की बात याद हो आई, जिसका जिक्र शिखा दी ने भी किताब में भी किया है कि हम अनजाने में ही वहाँ की ये प्रवृति अपनाते जा रहे हैं और अब हमारे यहाँ के बुजुर्ग भी अकेले होते जा रहे हैं.

किताब में वहाँ के इकॉनमी और बाज़ारों की भी एक झलक देखने को मिलती है. इंग्लैंड अभी मंदी का मार झेल रहा है और इस वजह से वहाँ के युवाओं को दिक्कत तो आ ही रही है, साथ ही साथ वहाँ के स्कूली छात्र-छात्राओं को भी नार्मल स्कूलिंग में भी बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. वहां मंदी का असर तो है लेकिन इसके बावजूद बाजारवाद बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. शिखा दी किताब में बताती हैं कि कैसे वहाँ क्रिसमस के समय पर बाजारवाद अपने चरम पर होता है. लोग गिफ्ट्स और डिस्काउंट पर सामान लेने के लिए दुकानों के बाहर सुबह तीन बजे से लाइन में खड़े होकर दुकान खुलने का इंतजार करते हैं. मंदी के बावजूद इस तरह के बाजारवाद से थोड़ा आश्चर्य तो होता है. शायद मंदी का ही असर हो कि वहाँ बेरोज़गारी भी खूब बढ़ रही है और बढ़ती बेरोजगारी और गिरती इकॉनमी के चलते वहाँ के युवा डिप्रेशन और एंग्जायटी के गिरफ्त में आ रहे हैं.

वैसे सच कहूँ तो इस किताब में ये सब पढ़ते हुए बहुत से लोगों को काफी आश्चर्य हो सकता है क्योंकि बहुत से लोग अब भी इंग्लैंड को एक बेहद स्ट्रोंग और डेवलप्ड देशों की तरह देखते हैं लेकिन उन्हें वहां की कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था के बारे में पता नहीं है. ये किताब बहुत ही सहजता से उन सभी पहलुओं के बारे में हमें जानकरी देती हैं.

इस किताब के माध्यम से ये भी पता चलता है कि वहाँ क्राइम भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं जिसमें मुख्य रूप से टीन-एज क्राइम शामिल हैं. वैसे देखा जाए तो युवाओं में बढ़ता क्राइम असल में सिर्फ इंग्लैंड ही नहीं बल्कि ये हर देश की समस्या है. भारत में भी तो पिछले कुछ सालों में टीनएज क्राइम बहुत ज्यादा बढ़ गया है. ये हर देश के लिए शायद सबसे सीरियस इशू है जिसका हल खोजना बेहद जरूरी है.

इन सब विषयों के अलावा इस किताब में और भी बातें शिखा दी ने कही हैं, जैसे वहाँ के स्कूल के पाठ्यक्रम के बारे में, वहाँ के वीआईपी कल्चर के बारे में भी हमें पता चलता है और ये भी मालूम होता है हमें कि हमारे यहाँ के जैसे ही वहाँ भी मेले लगते हैं और जैसा की हमारे शहरों में आजकल ऑफिस में काम कर रहे लोगों के लिए टिफ़िन सर्विस है, वहाँ भी ये व्यवसाय खूब डिमांड में है. इन सब के साथ एक और मजेदार बात जो मुझे इस किताब के जरिये मालूम हुई वो ये कि लन्दन में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो घोर अन्धविश्वासी हैं. झाड़ फूँक करने वाले बाबाओं की वहाँ भी कमी नहीं है. लाइव इन का भी टॉपिक इस किताब में लिया गया है, ये एक ऐसी टॉपिक है जो आज कल हमारे यहाँ काफी ट्रेंडिंग है. हमारे यहाँ फिल्म विकी डोनर से बहुत से लोगों को शुक्राणुदान के बारे में पता चला है, लेकिन फिर भी अभी इस टॉपिक पर यहाँ खुलापन नहीं है और बहुत बड़ा वर्ग है जो इसे गलत मानता है. लेकिन लन्दन में इस कार्य को लोग परोपकार की दृष्टि से देखते हैं.

शोर ही शोर, एवरी ओर

लन्दन के चुनाव प्रक्रिया के बारे में भी शिखा दी बताती हैं कि कैसे वहाँ चुनावी प्रक्रिया बेहद शान्ति से निपट जाती है, कोई आवाज़ कोई हल्ला हँगामा नहीं, बड़े ही शालीनता से वहाँ की चुनावी प्रक्रिया खत्म होती है. ये शायद एक ऐसी जानकारी है जिसपर बहुत से लोगों को विश्वास नहीं हो पायेगा, क्योंकि हम तो अक्सर चुनावों में लाउडस्पीकरों का शोर, और हर तरफ गज़ब का शोर-शराबा सुनने के आदि हैं.

हमारे देश में तेज़ी से बढ़ता ये ध्वनि प्रदुषण एक बेहद गंभीर समस्या है. चाहे वो इलेक्शन के वक़्त हो, या तेज़ आवाज़ में बजते भजन कीर्तन के गाने या फिर गाड़ियों के हॉर्न का शोर, हर तरफ बस शोर ही शोर है. लन्दन में लेकिन ऐसी हालत नहीं है. शिखा दी बताती हैं कि वहां सड़कों पर गाड़ियाँ चलाते वक़्त लोग हॉर्न नहीं बजाते. बहुत जरूरत पड़ने पर ही वहाँ हॉर्न बजाये जाते हैं, लेकिन यहाँ तो हम जब तक अपने गली से निकलते वक़्त दस बार हॉर्न नहीं बजायेंगे, लगता ही नहीं कि ड्राइविंग हमारी सफल हुई है. इस किताब का ये भाग पढ़ते हुए मुझे बहुत पहले देखी हुई एक डाक्यूमेंट्री विडियो भी याद आई जिसमें एक इटालियन व्यक्ति यही कह रहा है, ऑन इंडियन स्ट्रीट्स, पीपल लव होंकींग फॉर नो रीज़न एट आल.

क्रिसमस, ईद, दिवाली, सेलिब्रेशन और कूल हिंदी 

वैसे अब तक आपको लग रहा होगा कि किताब बस सामाजिक समस्या और आर्थिक समस्या पर ही केन्द्रित है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. जहाँ एक तरफ किताब में ये सब गंभीर मुद्दे बेहद सहजता से कहे गए हैं वहीँ ये किताब वहाँ की ज़िन्दगी को भी दर्शाती है. वहाँ के त्योहारों और सेलिब्रेशन के रंग भी इस किताब में देखने को मिलते हैं. शिखा दी बताती हैं कि कैसे लन्दन हर संस्कृति को अपना लेता है और बाहें खोल कर उसका स्वगात करता है. वहाँ स्कूल और कम्युनिटीज में जैसे क्रिसमस सेलिब्रेट होती है, वैसे ही दिवाली और ईद भी. शिखा दी आगे बताती हैं कैसे वहाँ हमारे त्यौहार जैसे नवरात्री, गरबा, दिवाली बेहद अच्छे तरह से लोग सेलेब्रिट करते हैं. 

शिखा दी किताब में ये भी बताती हैं कि सिर्फ अलग अलग त्यौहार मानाने में ही नहीं बल्कि अलग भाषा की बात हो तो वहाँ भी लन्दन एक उदार शहर है. वो किताब में कहती हैं, लन्दन में रह रहे लगभग हर बच्चा पूरे अधिकार से इंग्लिश के अलावा कम से कम तीन भाषा तो बोल ही सकता हैं. इससे जायदा डाइवर्सिटी का उदाहरण और क्या हो सकता है.



वैसे इस पूरे किताब में जिस एक बात से मेरे चेहरे पर मुस्कान तैरती रही वो थी हमारी भाषा हिंदी के बारे में कही गयी बात. शिखा दी ने कुछ नयी बात नहीं बताई है, उनके ही ब्लॉग और आलेखों के वजह से मुझे ये बात पहले से पता थी कि लन्दन में हिंदी का बहुत सम्मान होता है, शायद जितना हमारे यहाँ होता है उसे कहीं ज्यादा सम्मान.

हमारे यहाँ हिंदी आम तौर पर उपेक्षित रहती है और हिंदी पढ़ने और बोलने वालों को बड़े ही अजीब नज़रों से देखा जाता है जबकि वहाँ ऐसी बात नहीं है. वहाँ के रेडिओ पर भी हिंदी गाने बजते हैं और वहाँ के बच्चों को भी हिंदी की शिक्षा दी जाती है. हमारे देश में जहाँ हिंदी बोलने और पढ़ने वालों को हीन भाव से देखा जाता है वहीँ लन्दन में बच्चे बड़े ही ख़ूबसूरती से हिंदी बोलते हैं. पूरे यूरोप में हिंदी की प्रतियोगिता होती है और वहाँ के बच्चे पूरे लगन से उसमें शिरकत करते हैं. विदेशी बच्चे भी हिंदी सीखना चाह रहे हैं और हमारे यहाँ के बच्चे इस भाषा से भाग रहे हैं. किताब के जरिये हमें ये भी पता चलता है कि हिंदी टीवी सेरिल्स का लन्दन में भी खूब क्रेज है. इस पूरे किताब पर लन्दन में हिंदी के महत्त्व पर शिखा दी ने करीब तीन चार प्रसंग लिखे हैं जो जो बेहद दिलचस्प हैं और जिसे पढ़ते वक़्त आपके चेहरे पर एक मुकुराहत आ जायेगी.

शिखा दी ने किताब में ये भी बताया है कि लन्दन जहाँ एक समय अपने पुस्तकालयों के लिए मशहूर था वहीं अब बदलते समय की वजह से वहाँ के पुस्तकालय की संख्या में भारी गिरवट आ रही है. उसकी प्रमुख वजह है कि आज के युवा किताबों से दूर जा रहे हैं और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की तरफ तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं. हमारे यहाँ भी वैसे तो पुस्तकालयों का बहुत क्रेज शायद कभी नहीं रहा लेकिन जितने भी पुस्तकालय थें वो सभी एक एक कर के बंद हो रहे हैं और लन्दन की तरह यहाँ भी इसकी वजह बदलता वक्त ही है.

लास्ट-वर्ड्स   

देशी चश्मे से लन्दन डायरी को पढ़ते हुए हम वहाँ के रंगों को महसूस कर सकते हैं. रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी को शिखा दी की नज़रों से देखते हैं और पाते हैं कि वहाँ के ज़िन्दगी में और हमारी ज़िन्दगी में बहुत अंतर न होते हुए भी बहुत से बुनियादी फर्क हैं. जिन बातों का मैंने जिक्र किया है उसके अलावा भी किताब में काफी रोचक टॉपिक्स हैं जिसे पढ़ते हुए हमें वहाँ की जीवन शैली, वहाँ की सामाजिक संरचना के बारे में पता चलता है. हम अक्सर इंग्लैंड, अमेरिका और बाकी विदेशी देशों के ट्रेंड को अपनाने की होड़ में लगे रहते हैं, लेकिन इस किताब में वहाँ की बहुत सी अच्छी आदतों और कायदों का जिक्र है जिससे हमें सीख लेनी चाहिए. शिखा दी की ये किताब आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है और कहीं न कहीं हमें एक सीख भी दे जाती है.

महत्वपूर्ण प्रश्न? कितने की है किताब और कहाँ मिलेगी?

अक्सर जितना आप एक बकवास फिल्म देखने में वीकेंड पर खर्च कर देते हैं, उससे सस्ती किताब है जो बेहद काम की है. दो सौ रुपये दाम हैं. थोड़ी महंगी है, लेकिन हर अच्छी चीज़ सस्ती नहीं मिलती भाईसाहब.

इस किताब  को खरीदने के लिए आप अमेज़न पर जा सकते हैं, इस लिंक पर क्लिक करें किताब खरीदने के लिए 







3 comments:

  1. एक प्रॉपर बुक रिव्यु न होते हुए भी बहुत अच्छा लिखा है तुमने...शिखा जी और तुम्हें, दोनों लोग को बहुत बधाई

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  2. यह किसी भी "प्रॉपर" रिव्यू से प्यारा है। शुक्रिया अभि।

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  3. भैया तुम तो ग़ज़ब लिख डाले!! ऐसा कोई बहुत अपना ही लिख सकता है। तुम्हारा प्यार, स्नेह, सम्मान सब झलक रहा। किताब पर भी बहुत बारीकी से लिखा है अभि। मैं भी जल्दी ही लिखूंगी। तुम नम्बर एक हो गए फिलहाल 😊

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

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