कंप्यूटर से दोस्ती की एक सच्ची कहानी

हम आपके हैं कौन फिल्म का एक सीन है, जब निशा(माधुरी दीक्षित) पहली बार अपनी बहन के ससुराल आती है तो रीटा(सहिला चड्डा) उससे पूछती है, तुम क्या पढ़ रही हो? निशा हाथ में क्यू स्टिक पकड़े, पूरे टसन में और ऐटिटूड में जवाब देती है - कंप्यूटर्स!


रीटा चौंक जाती है, "तुम कंप्यूटर्स कर रही हो...वाऊ!", रीटा ऐसे इक्साइटेड हो जाती है जैसे मानो निशा ने कितना बड़ा अचीवमेंट कर लिया हो. वैसे जब ये फिल्म आई थी उन दिनों कंप्यूटर्स पढ़ना सही में एक बड़ी बात थी. हाँ फिल्म अगर आज के परिदृश्य में बनी होती तो संवाद कुछ इस प्रकार होता - 
रीटा - तुम क्या पढ़ रही हो?
निशा - कंप्यूटर्स
रीटा - ठीक है ठीक है!! स्टाइल मारने की जरूरत नहीं. सब लोग यही पढ़ रहे हैं. स्पेसिफिक बताओ...बीसीए? एमसीए? इंजीनियरिंग? डिप्लोमा? या कॉल सेण्टर/बीपीओ के लिए ट्रेनिंग? ह्म्म्म? 

और अब रीटा के आँखों में टसन है. इस सवाल के बाद निशा के चेहरे का एक्सप्रेशन कैसा होगा, इसका अंदाज़ा आप आराम से लगा सकते हैं. 

खैर, मेरी आज की पोस्ट किसी फिल्म के विषय में नहीं है बल्कि इस संवाद में जो विषय है कंप्यूटर्स, उसके बारे में है. पोस्ट लिखते वक़्त फिल्म के संवाद का ये उदाहरण ऐसे ही मजाकिया दिमाग में आ गया, तो लिख दिया.

अब बढ़ते हैं आज की बात की तरफ.

चलिए एक कहानी सुनाता हूँ आपको, मेरी कंप्यूटर से दोस्ती कैसे हुई . सुनने में अजीब लगता है न? कंप्यूटर से दोस्ती? फिर भी सुनिये -  

लोगो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज
मैं छठी क्लास में था जब पहली बार कंप्यूटर के संपर्क में आया था. हमारे सिलेबस में कंप्यूटर लैब का एक पीरियड था जिसमें हमें "लोगो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज" सिखाया जाता था. उन दिनों का हमारा बचपना कह लीजिये कि हमें ना तो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज के महत्त्व का पता था और न कंप्यूटर के महत्त्व का... एक घंटे का कंप्यूटर लैब हमारे लिए फ्री पीरियड होता था, जिसमें खूब मस्ती होती थी. "लोगो" हमारे लिए एक तरह से कंप्यूटर ड्राइंग जैसा था जिसमें कुछ कमांड्स लिख कर तरह-तरह के शेप्स बनाते थे हम. 

उन दिनों विंडो 3.0 चलन में था. मुझे इस बात की जानकारी तो बिलकुल नहीं थी कि विंडो का कौन सा वर्शन नया आया था, लेकिन मुझे विंडो 3.0 के बारे में कुछ-कुछ पता था और एक छठी क्लास के बच्चे के लिए विंडो का नाम जानना ही उस समय बड़ी बात थी. 

मेरे पूरे परिवार में सिर्फ मेरे मंझले मामा कंप्यूटर के जानकार थे. उन्होंने कंप्यूटर का कोर्स कर रखा था और उनके पास कई किताबें थीं जिसमें उनिक्स, लिनक्स, लेट अस सी, और विंडो 3.0 की किताब थीं. सी, उनिक्स और लिनक्स की किताबें मुझे एलियन लगती थीं और उन्हें मैं छूता भी नहीं था, लेकिन विंडो 3.0 की किताब मुझे काफी इंटरेस्टिंग लगती थी. रंगबिरंगे विंडो के स्क्रीनशॉट थे जिसे छठी क्लास का एक बच्चा बड़े आराम से पढ़ और समझ सकता था. जहाँ तक मुझे याद है किताब की भाषा भी बहुत ही सिम्पल अंग्रेजी में थी और धीरे धीरे मैंने वो पूरी किताब पढ़ डाली. मेरे लिए वो किताब एक मैगज़ीन की तरह हो गया था जिसे जब भी मौका मिलता मैं पढ़ डालता. इस किताब के साथ ही साथ मामा के पास कई फ्लॉपी भी मौजूद थे, जो मुख्यतः लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के फ्लॉपी थे. मुझे याद है, मामा के कमरे के सबसे उपरी रैक पर ये किताबें और फ्लॉपी रखे होते थे और जिन्हें मैं टेबल पर चढ़ कर किसी खजाने की तरह उतारता था और समझ में ना आने के बावजूद मैं किताब के पन्ने पलटता रहता था.  

विंडो 3.0 का एक स्क्रीनशॉट. कुछ ऐसा ही स्क्रीनशॉट किताब में रहता था. Image: ComputerHope
मामा की किताब पढ़ने का फायदा मुझे अगले साल ही मिला जब मैं सातवीं क्लास में गया था और जो मेरे कंप्यूटर सीखने की पहली सीढ़ी थी. लैब में जब टीचर हमें विंडो 3.0 के बारे में बताते तो मुझे काफी बातें जानी पहचानी लगती थी. मुझे भी कंप्यूटर सीखने में मन लगने लगा था. लेकिन मेरे कंप्यूटर सीखने में ब्रेक तब लग गया जब आठवीं क्लास में मेरा दाखिला दुसरे स्कूल में हो गया था. ऐसा माना जाता था कि पढ़ाई के मामले में ये नया स्कूल पहले स्कूल से बेहतर था लेकिन कंप्यूटर शिक्षा के मामले में मेरा पहला स्कूल काफी ज्यादा प्रोग्रेसिव था और नए स्कूल में कंप्यूटर शिक्षा को एहमियत नहीं दी जाती थी. वैसे उस समय ज़्यादातर पेरेंट्स भी कंप्यूटर शिक्षा का महत्त्व नहीं जानते थे और उनके लिए ये कोई बहुत बड़ी प्रायोरिटी नहीं थी. 

आठवीं से लेकर दसवीं तक कंप्यूटर शिक्षा ना के बराबर ही रही मेरी. दसवीं का इम्तिहान देने के बाद करीब डेढ़-दो महीनो का वक़्त होता है रिजल्ट आने में, और मैं इस वक़्त का सही इस्तेमाल कर सकूँ, इसके लिए मेरे मँझले मामा ने अपने दोस्त के पास मेरी कंप्यूटर ट्यूइशन रखवा दी. मैं हर सुबह मामा के दोस्त के घर पर जाता था कंप्यूटर सीखने. करीब एक महीने में मैंने ईमेल, वर्ड, पॉवरपॉइंट और भी बहुत कुछ सीखा. बारहवीं में जब गया मैं तो वहाँ भी मेरा ऑप्शनल सब्जेक्ट कंप्यूटर ही था, लेकिन वो बस नाम का था. जितना मैंने डेढ़ महीने में  ट्रेनिंग हासिल की थी, उसका आधा भी हमें स्कूल में नहीं बताया जाता था.

शायद शुरू से कंप्यूटर के हलके संपर्क में रहा था इस वजह से मैंने इंजीनियरिंग में भी कंप्यूटर साइंस ही चुना. इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के बाद सबसे पहली जरूरत जो हुई थी वो थी एक डेस्कटॉप की. सही पूछिये तो उस समय बहुत ज्यादा जरूरत नहीं थी डेस्कटॉप खरीदने की, लेकिन एक शौक था कि अब इंजीनियरिंग में आ गए हैं तो एक डेस्कटॉप चाहिए.

हम कर्णाटक के बसव्यकल्याण में थे और वहाँ के लोकल मार्केट में डेस्कटॉप की कीमत बहुत ज्यादा थी. कॉलेज के कुछ सीनियर्स और प्रोफेसर ने राय दी कि हमें कंप्यूटर खरीदने हैदराबाद जाना चाहिए. हम तीन दोस्त थे जिन्हें डेस्कटॉप खरीदना था - मैं आशीष और समित. हम तीनों ने तय किया कि हम हैदराबाद जाकर ही डेस्कटॉप खरीदेंगे.

एटीएम या कार्ड स्वाइप करने की व्यवस्था तो उस वक़्त थी नहीं और लोगों ने बताया कि हैदराबाद कंप्यूटर मार्केट में 'चेक' भी नहीं स्वीकार करते हैं, सिर्फ कैश लेते हैं. ये एक अलग समस्या थी. हम तीनों ने चालीस-चालीस हज़ार रुपये बैंक से निकाले और हैदराबाद के लिए चल दिए.

पूरे रास्ते एक धुकधुकी लगी थी कि करीब सवा लाख रुपये हमारे पास हैं और इतने रुपये के लिए कोई हमारे साथ कुछ भी कर सकता है लेकिन मेरी इस चिंता का निवारण समित के डांट से हुआ. उसनें झिड़कते हुए कहा, तुमनें चलने के पहले लाउडस्पीकर पर अनाउन्स्मेन्ट करवाई थी क्या कि हमारे पास इतने पैसे हैं? अगर नहीं तो चुपचाप चलो, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा कि हमारे पास कैश हैं या नहीं.

समित के डांट के बावजूद मन में चिंता तो थी ही. हैदराबाद के पार्क लेन स्थित चेनॉय ट्रेड सेण्टर में पहुँच कर आख़िरकार मैं थोड़ा निश्चिंत हुआ, कि चलो अब मंजिल तक तो पहुँच गए हैं. वहाँ हमारा एक दोस्त मंगलम, जो हैदराबाद का ही निवासी था, पहले से हमारा इंतजार कर रहा था. उसनें एक दूकान रेकमेन्ड किआ हमें जहाँ से हमनें कंप्यूटर खरीदे. कंप्यूटर खरीदते हमें रात हो गयी थी और रात के वक़्त तीनों कंप्यूटर को बसव्यकल्याण ले जाना हमें उचित नहीं लगा. मंगलम के घर पर ही हमनें रात बिताई और अगली सुबह एक जीप भारे पर किया और कॉलेज के लिए निकल गए.

कॉलेज में दोस्तों को हमनें बता रखा था कि हम रात तक वापस आ जायेंगे. मोबाइल तो था नहीं उस समय जो कॉलेज में दोस्तों को खबर करते कि हम रात हैदराबाद में रुक गए हैं. दोस्त भी इतने नालायक कि हमारे न आने पर उन्होंने समझा कि हमें लूट लिया गया है या किडनैप कर लिया गया है इस लिए हम हैदराबाद से वापस नहीं आये और वो बड़े निश्चिंत से हो गए थे. हालाँकि अगली सुबह जब हम पहुँचे तो वो थोड़े हैरान और निराश जरूर हुए होंगे कि हम सही सलामत थे.

हॉस्टल में अपने कमरे में डेस्कटॉप इंस्टाल करने का बाद का मंज़र कमाल का था. सारे लड़के मेरे कमरे में जुट गए थे और डेस्कटॉप के ऑन होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. मेरे पास कुछ फिल्म के सीडी पहले से मौजूद थे, तो मैंने सबसे पहले एक फिल्म अपने कंप्यूटर पर लगा दी. मेरा छोटा सा कमरा एक विडियो हॉल बन गया था जहाँ लड़के खचाखच भरे थे और फिल्म देख रहे थे. तीन कंप्यूटर हमारे एक हॉस्टल के तीन कमरे में था और सारे लड़के की भीड़ हमेशा इन्हीं तीनों कमरे में रहती थी.

हम तीनों अपने बैच के पहले ऐसे स्टूडेंट थें जिनके पास खुद का डेस्कटॉप था. देखते ही देखते हमारे हॉस्टल के बिल्डिंग के पॉपुलैरिटी बढ़ गयी थी.

इंजीनियरिंग के तीसरे साल की तस्वीर. तब तक ये डेस्कटॉप पुराना हो चुका था. हमारे पास उस वक़्त कैमरा नहीं था इसलिए पहले दो साल की एक भी तस्वीर नहीं है. ये तस्वीर भी एक दोस्त के कैमरा से खींची गयी थी जिसे हमनें एक शाम के लिए उधार लिया था. लेकिन पूरे इंजीनियरिंग ये डेस्कटॉप, टेबल और चेयर मेरी आदत बन चुके थे. 
हैदराबाद के जिस दूकान से हमनें कंप्यूटर खरीदा था, उस दूकान से चलने के पहले दूकान के मालिक के साथ मेरी खूब अच्छी और लम्बी बात हुई थी. उन दिनों हमारे सामाज में सो-कॉल्ड मॉडर्निज़्म नहीं आया था और दूकानदार भी अच्छे कस्टमर्स को याद रखते थे. इसका प्रमाण बस दो तीन महीनों के बाद ही मुझे मिल गया था.

दुर्गा पूजा की छुट्टियों के बाद मैं वापस  कॉलेज लौट रहा था. कॉलेज जाने के लिए हैदराबाद तक ट्रेन से आना पड़ता था और वहाँ से कॉलेज के लिए बस लेनी पड़ती थी. मैंने सोचा अब जब हैदराबाद में हूँ तो उस दूकान के चक्कर लगाता चलूँ, कुछ चीज़ें जो सस्ती मिलेंगी और काम की होंगी उन्हें खरीद भी लिया जाएगा. उस समय तक मैंने उस दूकानदार से जान पहचान बढ़ाने के बारे में सोचा भी नहीं था.

मुझे बेहद आश्चर्य तब हुआ जब दूकान में घुसते ही उस दूकानदार ने मुझे पहचान लिया और बाकायदा डेस्कटॉप की खैरियत पूछने लगा, कि आपका डेस्कटॉप सही तो चल रहा है न. उतने बड़े दूकान का मालिक एक साधारण से कस्टमर को याद रखे ये मेरे लिए हैरान करने वाली बात थी.

मैं वहाँ कुछ ख़ास खरीदारी करने नहीं गया था लेकिन फिर लगने लगा कि अब जब यहाँ आ गया हूँ तो कुछ खरीद ही लूँ. कुछ ब्लांक सीडी, और छोटे मोटे अक्केसोरिएस खरीद कर मैं वहाँ से चला आया.

उसके बाद की कहानी कुछ ऐसी हुई कि मेरे कॉलेज में मेरे बैचमेट के साथ ही साथ मेरे कुछ सीनियर्स जिन्हें भी डेस्कटॉप खरीदना होता, मुझे अपने साथ लेकर हैदराबाद जाते थे और मैं हर बार उन्हें उसी दुकान में ले जाता था. एक साथी को बड़ी हैरानी हुई जब दूकानदार ने हमें चाय और नास्ता करवाया था. उसनें इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि हैदराबाद का कोई कंप्यूटर शोरूम का मालिक मेरी इतनी इज्जत करेगा.

बाद में जब मैंने पहला मोबाइल फोन खरीदा था, तो उस दूकानदार को भी मैंने अपना नंबर दे दिया था. वो भी महीने दो महीने में मुझे कॉल कर के जरूर पूछता था कि कुछ आवश्यकता है या नहीं आपको. अब सोचता हूँ तो लगता है कि ये उस दूकानदार की मार्केटिंग टैक्टिस हो सकती है लेकिन उन दिनों तो इसी बात से ख़ुशी मिलती थी कि कोई आपको एहमियत दे रहा है.

उस दुकान में जब भी जाता था, कुछ न कुछ नया जरूर सीख कर आता था मैं. कोई भी नया आया कंप्यूटर पेरिफरल हो या ऐक्सेसरीज़, वो दूकानदार मुझे बड़े अच्छे से उसके बारे में बताता था.

उस कंप्यूटर शोरूम से खरीदा हुआ डेस्कटॉप ने भी मेरा खूब साथ दिया.अभी जितना कुछ जानता हूँ, उसी डेस्कटॉप ने सिखाना शुरू किया था. और वही डेस्कटॉप था जिसपर मैंने ब्लॉग्गिंग शुरू किया था. इस ब्लॉग को भी उसी कंप्यूटर से मैंने लिखना शुरू किया था. मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में मेरे पहले कंप्यूटर का स्थान सबसे अहम् था.

मेरी छोटी बहन माही और मेरा डेस्कटॉप जिसे इंजीनियरिंग के बाद मैंने घर पर रख दिया था. घर के बच्चे से लेकर बड़ों तक ने इस डेस्कटॉप पर अपना हाथ साफ़ किया है. 
इंजीनियरिंग के बाद जब मैंने अपना पहला लैपटॉप खरीदा, उस डेस्कटॉप को घर पर रख आया था. घर पर भी बहन, पापा और माँ ने भी उसका खूब इस्तेमाल किया. मैं जब भी घर वापस जाता तो अपने उस कंप्यूटर को झाड़-पोछ कर उसी पर काम करता था. वो डेस्कटॉप मेरे घर में एक सदस्य की तरह रह रहा था.

लेकिन जैसा अक्सर होता है, मशीन आख़िरकार एक मशीन ही हैं. उसमें भी धीरे-धीरे खराबी आने लगी थी और आख़िरकार हम सब ने उसे बेचने का कड़ा फैसला  लिया.

आखिर के दिनों में उस डेस्कटॉप का कोई भी इस्तेमाल नहीं करता था. वो बस एक कोने में पड़ा रहता था, लेकिन जिस दिन डेस्कटॉप को बेचा अचानक से घर का वो कोना बड़ा खाली खाली सा लगने लगा. धीरे धीरे उस डेस्कटॉप को हम भूल भी गए. 

इधर कुछ दिनों से मुझे काम के सिलसिले में एक लैपटॉप के अलावा एक और कंप्यूटर की आवश्यकता थी. तय किया कि लैपटॉप के बजाये इस बार एक डेस्कटॉप लिया जाएगा. बजट में भी फिट आएगा और काम भी ज्यादा हो सकेगा उससे.

नया डेस्कटॉप 
परसों दिल्ली के नेहरु प्लेस मार्केट से जाकर मैंने एक नया डेस्कटॉप खरीद लिया. मजेदार बात ये हुई कि उसे खरीदते वक़्त पुरानी बातें, हैदराबाद और बासवकल्याण के दिन याद आ रहे थे जिनका मेरे इस डेस्कटॉप से कोई मतलब नहीं था, लेकिन जाने क्यों मैं नेहरु प्लेस और चेनॉय ट्रेड सेण्टर को रिलेट करने लगा था. घर में जब टेबल पर इस डेस्कटॉप को मैंने असेम्बल किया तो लगा जैसे मेरा वही पुराना साथी एक नया अवतार लेकर वापस घर में आया है....

3 comments:

  1. सच में कई बार निर्जीव चीजों से भी बड़ा प्यार हो जाता है...। जब हमने अपना डेस्कटॉप बेचा था, तब भी बहुत दिनों तक उस जगह को देख के खालीपन का अहसास होता रहा था...। लैपटॉप से भी दोस्ती होने में थोड़ा टाइम लगा, पर आखिरकार हो ही गई दोस्ती...।
    हमेशा की तरह नोस्टाल्जिया से भरी एक बेहद प्यारी पोस्ट है तुम्हारी...loved it...

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  2. 3.0 से 10 तक की जर्नी यानि पास मार्क से अव्वल दर्ज़ा पाने का सफ़र... माधुरी की हम आपके 'हैं कौन से लेकर कम्प्यूटर के साथ अपनी ग्रोथ स्टोरी... मज़ा आ गया!

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन शुभकामनायें प्रथम अंतरिक्ष यात्री को : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

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