खुद से बातें करते लोग भी अजीब होते हैं

"Talk to yourself at least once in a day otherwise you may miss a meeting with an Excellent person in this world."
यह बात स्वामी विवेकानंद ने एक बार कही थी. स्वामी विवेकानंद उस वक़्त भी खुद से बात करने की एहमियत जानते थे. 'आत्मालाप' या 'सेल्फ टॉक' करते हुए आपने कई लोगों को देखा होगा. हमारे आसपास ऐसे लोग आसानी से दिख जाते हैं जो खुद से बातें करते दीखते हैं. कुछ तो ऐसे भी हैं जो जोर जोर से खुद से बातें करते हैं. लेकिन हम अक्सर ऐसे लोगों को पागल या सनकी कह कर साफ़ तौर से इग्नोर कर देते हैं.

मैं उन्हीं लोगों के केटेगरी में आता हूँ जो अक्सर खुद से बातें करते हैं.अक्सर मेरे आसपास के लोगों को लगता है कि ये कोई अच्छी आदत नहीं है, और मुझे अपने इस आदत पर काबू पानी चाहिए. जब मुझे भी इस बात की और सेल्फ-टॉक के एहमियत की जानकारी नहीं थी, तब अक्सर मैं भी सोचता था कि शायद ये आदत सही में बुरी आदत है. थोड़ा संकोच भी मुझे होने लगा था और मैंने इस आदत से छुटकारा पाने की भी खूब कोशिश की.

फिर कुछ साल पहले एक शाम एक वेबसाइट में निकले एक रिसर्च रिपोर्ट को मैंने पढ़ा, उस रिपोर्ट को पढ़ने पर मुझे सेल्फ टॉक के बारे में जाने कितनी अहम् बातें जानने को मिली. उस रात मैंने आधी रात तक इस टॉपिक पर बहुत पढ़ा और फिर लगा कि मेरी आदत में कोई खराबी नहीं है, बल्कि बहुत से लोग अभी तक इस एक टर्म से अनजान हैं.

तो आईये सबसे पहले जानते हैं कि सेल्फ टॉक है क्या?

रोजमर्रा के काम के दौरान खुद से लगातार बातें करना, खुद को समझाना, इंस्ट्रक्शन देना, मोटीवेट करना और खुद से एक दोस्त की तरह बातें करने को हम सेल्फ टॉक या आत्मालाप कहते हैं. आज दुनीया भर के एक्सपर्ट्स और मेडिकल जानकार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि खुद से बात करना कितना जरूरी है. लगातार भागती और बेहद कम्पेटटिव इस दुनिया में सेल्फ-टॉक एक ऐसा ताकतवर हथियार है  जो आपके सेल्फ-कॉन्फिडेंस को बूस्ट करता है, आपके नेगेटिव इमोशन पर काबू पाता है और आपको लगातार मोटीवेट करता है.
जब तक मुझे इस विषय के बारे में जानकारी नहीं थी, मैं अक्सर लोगों के द्वारा टोके जाने पर बेहद शर्मिंदगी महसूस करता था. लेकिन बाद में तस्वीर साफ़ हो गयी. मैं समझ ही नहीं पाता था कि, खुद से बात करना एक बुरी आदत क्यों  है? खुद से कुछ कहने में या खुद को किसी चीज़ के बारे में समझा देने के बाद मैं महसूस करता था कि दिमाग की उलझनें खत्म हो गयी हैं.  मानिये कि कोई काम है जो मेरे मन मुताबिक नही हुआ और उसके एन्ड रिजल्ट को लेकर मैं काफी फ्रस्ट्रेट हूँ. ऐसे में खुद से बातें करने और खुद को समझा देने पर मैंने एक हल्कापन महसूस किया है. कभी कुछ गलत कर देता हूँ तो खुद को ज़ोर से डांटता हूँ, “यार क्या पागलपन कर रहे हो तुम? ये काम ऐसे होता है क्या? ठीक ढंग से काम करो..” और अगले ही पल मैं उस काम के प्रति संभल जाता हूँ और फोकस हो जाता हूँ . 

अमेरिका स्थित University of Michigan के साइकोलॉजी प्रोफेसर एथन क्रोस ने अपने एक लेख में कहा है, “Beyond motivational self-talk, talking to yourself out loud in an instructional way can speed up cognitive abilities in relation to problem-solving and task performance.So, for example, when you’re searching for that item you just can’t find at the grocery store, talking to yourself out loud may help you find it faster. This is because of the feedback hypothesis
Instructive self-talk can be useful beyond finding your lost car keys or picking out a friend in a crowd.

एथन क्रोस ने एक और उधाहरण बास्केटबॉल के खेल का दिया है. एक एक्सपेरिमेंट के रिसर्च के दौरान ये मालूम लगा कि एक खिलाड़ी जब खुद को जोर से बोल कर इंस्ट्रक्शन देता है और मोटीवेट करता है तब वो ज्यादा बेहतर शॉट मार सकता है और ज्यादा बेहतर पास दे सकता है. इस रिसर्च स्टडी का नतीजा ये निकला कि खुद से बातें करना वैसे कामों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होता है जिसमें फोकस, स्पीड, एक्यूरेसी और ताकत की जरूरत होती है.

दुनिया में आज सारे बड़े एक्सपर्ट और डॉक्टर्स इस बात पर जोर देते हैं कि आप खुद से बातें करें. ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक और लेखिका एनी विल्सन का कहना है कि वो अपने सभी क्लाइंट्स को ख़ुद से बातें करने की सलाह देती हैं. जब कोई ऐसा मरीज़ उनके पास आता है जिसे खूब गुस्सा आता है, तो वो अक्सर उन्हें सेल्फ-टॉक करने को कहती हैं. एनी विल्सन का मानना है कि ऐसा करने से मसले का हल निकल आता है और गुस्सा ग़ायब हो जाता है.

एनी विल्सन इस बात को आगे समझाते हुए कहती हैं, कि हम अक्सर बहुत सी खूबियाँ जो दुसरे व्यक्ति के पास हैं उनसे प्रभावित होते हैं, लेकिन वो सारे खासियतें हम अपने अंदर ही हासिल कर सकते हैं. कोई भी इंसान ख़ुद सबसे बेहतर जानता है. जब हम ख़ुद से बाते करने लगते हैं तो बहुत हद संभव है हम वो सब खासियतें जो दुसरे में खोजते हैं वो हमें खुद में ही पा लें.

वो ब्रिटेन के ही “यूजीन गैम्बल” की मिसाल देती हैं. युजिन बरसों तक दांतों के डॉक्टर थे. एक दिन उन्होंने फैसला किया कि अब डॉक्टरी छोड़कर कुछ दूसरा काम शुरू करूँगा. लेकिन दिक्कत ये थी कि उस काम का उन्हें कोई तजुर्बा नहीं था. इस वजह से यूजीन को कई बार नाकामी मिली. उन्होंने आख़िरकार एक बिज़नेस कोच की मदद ली. उस बिजनेस कोच ने उन्हें सबसे पहली सलाह ख़ुद से बात करने की ही दी और युजिन को सच में इसका फायदा हुआ. आज जब युजिन बिज़नेस की कोई प्रेज़ेन्टेशन देते हैं तो वो सबसे पहले ख़ुद अपने आपसे बात करते हैं और अपनी प्रेज़ेन्टेशन को तेज़ आवाज़ में पढ़ते हैं. वो कहते हैं कि ऐसा करने पर वो अपने आइडिया पर ज़्यादा फोकस कर पाते हैं और अपनी प्रेज़ेन्टेशन को अच्छी तरह याद रख पाते हैं.

हम सभी के लिए लेकिनं दुखद बात ये है कि अक्सर समाज में ख़ुद से बातें करने वाले को पागल करार दिया जाता है. इसीलिए कई लोग चाहकर भी ख़ुद से बातें नहीं कर पाते. एनी विल्सन सेल्फ टॉक के टॉपिक पर ही आगे कहती हैं,
You don’t know everything you’re going to say – you can even surprise yourself
एक और डॉक्टर हैं ‘पलोमा मेरी-बेफा’ जो न्यूरॉसाइकॉलजी ऐंड कॉगनेटिव साइकॉलजी की लेक्चरर भी हैं और इस टॉपिक पर हो चुके एक शोध से जुड़ी हैं. उनके अनुसार जब हमारा ध्यान अपने काम पर लगा हो और हम बोलकर खुद से बात कर रहे हों, खुद को इंस्ट्रक्शन दे रहे होते हैं या खुद को डांट रहे होते हैं तो यह इस बात का प्रतीक है कि हमारा पूरा फोकस अपने काम पर है.

डॉक्टर पलोमा कहती हैं कि हम सभी को वक़्त-बेवक्त मोटिवेशन की जरुरत होती है. लेकिन हर बार किसी दुसरे व्यक्ति से ये उम्मीद करने के बजाये कि कोई आकर हमें मोटीवेट करें, हम खुद को मोटीवेट कर सकते हैं. वो कहती हैं ऐसे में खुद से मोटिवेशनल बातें करना चाहिए. ऐसा करने से अपने लक्ष्य को पाने में आसानी मिलती है.

अगर मैं अपनी ही बात ले लूँ, तो अक्सर मैं किसी काम के न पूरा होने पर खूब चिढ़ता भी हूँ और उदास भी हो जाता हूँ. लेकिन अगले ही पल मैं खुद से बातें करता हूँ. खुद को समझाता हूँ, “ठीक है यार हो जाएगा..थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन देखना ये काम पूरा अवश्य होगा.” और मैं अगले ही पल बहुत हल्का महसूस करता हूँ.

साइकॉलजी के एक्सपर्ट बताते हैं कि जब आपके हाथ में कोई काम हो और आपको पता न हो कि इसे कैसे पूरा किया जाए तो अपने आपसे बोलिए, आपको मदद जरूर मिलेगी. एक्सपर्ट्स के मुताबिक ‘सेल्फ-टॉक’ से बातें करने पर याद्दाश्त तेज़ होती है और आत्मविश्वास तो बढ़ता है ही. अमेरिका स्थित विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर गेरी लुपयन कहते हैं कि तेज़ आवाज़ में ख़ुद से बात करना दूसरे लोगों को अजीब लग सकता है लेकिन ये आपके कॉन्फिडेंस और कामयाबी के लिए बेहद जरूरी है.

प्रोफेसर गेरी लुपयन ने इसी सिलसिले में एक एक्सपेरिमेंट किया. कुछ लोगों को उन्होंने कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिठा दिया. आधे लोगो को उन्होंने कुछ चीज़ें सिर्फ़ देखने को कहा और आधे लोगों को तेज़ आवाज़ में उनका नाम पुकारने को. प्रोफेसर ने ये अब्ज़र्व किया कि जिन लोगों ने तेज़ आवाज़ में उन चीज़ों का नाम लिया, वो स्क्रीन पर उन चीज़ों को ज़्यादा जल्दी पहचान पाए और जो लोग सिर्फ़ स्क्रीन को देख रहे थे, उन्हें वही चीज़ें पहचानने में थोड़ा समय लगा.

प्रोफेसर ने आपने रिसर्च में एक और उदाहरण दिया है, एक ग्रोसरी स्टोर का. उनके स्टडी के मुताबिक, अगर आपको किसी सुपरमार्किट में केला खरीदना है, और यदि आप सिर्फ मन में ही उस बात को रखे हुए हैं कि मुझे केला खरीदना है, तो संभव है कि आपको ढूँढना पड़ेगा. लेकिन वहीँ अगर आप केले का नाम बोलकर पुकारते हैं, तो आपको केला को जल्दी स्पॉट कर सकते हैं.

प्रोफेसर गैरी का कहना है कि जब हम किसी चीज़ का नाम अपनी ज़ुबान से तेज़ आवाज़ में लेते हैं तो उसकी तस्वीर हमारे ज़हन में बन जाती है. हमारा दिमाग़ ख़ुद-ब-ख़ुद ज़रूरत पड़ने पर उसे हमारे ज़हन में ज़िंदा कर देता है.

खुद से बातें करना अच्छा तो है, लेकिन इसमें कई सावधानी की जरूरत है. खुद से लगातार ये पूछते रहने की जरूरत है कि क्या आप खुद से सही तरीके से बात कर रहे हैं. कहीं आप खुद को नेगेटिव सेल्फ टॉक की तरफ तो नहीं ले जा रहे हैं? नेगेटिव सेल्फ टॉक यानी रूमिनैशन, इसके बारे में भी जानने की सख्त जरूरत है हमें.

रूमिनैशन या नेगेटिव सेल्फ-टॉक क्या है?
एक बहुत छोटा और मामूली का उदाहरण देता हूँ. आपने देखा होगा कई लोगों को जो अपने चेहरे को आईने के सामने देख कर अक्सर कहते हैं, “यार कितनी अजीब शक्ल है तुम्हारी..”, या कोई अपने आप को आईने के सामने देखता हुआ कहता है, “बड़े मोटे हो गए हो तुम तो यार..” ये सब नेगेटिव सेल्फ टॉक की निशानी है. खुद को कोसना, या खुद को गालियाँ देना ये नेगेटिव सेल्फ-टॉक माने जाते हैं.

हम लेकिन एक ऐसी सोसाइटी में रहते हैं जहाँ पॉजिटिव सेल्फ टॉक को सनक कहा जाता है और नेगेटिव सेल्फ-टॉक को नार्मल. हम अक्सर बड़े आसानी से अपने आसपास, अपने घर में या दोस्तों में ऐसे लोगों को देख सकते हैं जो नेगेटिव सेल्फ टॉक तो करते हैं लेकिन पॉजिटिव सेल्फ टॉक करने से उन्हें परहेज है.

नेगेटिव सेल्फ-टॉक और पॉजिटिव सेल्फ टॉक में क्या अंतर है?

इस बात को ऐसे समझिये – मान लीजिये मुझे अंग्रेजी में कम अंक आये हैं. तो नेगेटिव सेल्फ टॉक वाले इंसान अक्सर ऐसा कहेंगे, “यार इतने कम अंक आये हैं मेरे, लगता है अंग्रेजी मेरे बस की बात नहीं है..” वहीँ पॉजिटिव सेल्फ-टॉक वाले इन्सान इस बात को ऐसे कहेंगे “इस बार कम अंक आये हैं अंग्रेजी में, अगली बार थोड़ा और मेहनत करूँगा मैं...” एक और उधाहरण देखिये - मानिए कि यदि आपने कोई  बिजनेस प्रेज़न्टेशन दिया हो और यदि आपका वो प्रेज़न्टेशन अच्छा नहीं गया तो ऐसे में नेगेटिव सेल्फ टॉक वाले लोगों का अंदाज़ कुछ ऐसा होगा, “यार इतना अच्छा मौका था, मैंने प्रेज़न्टेशन की बैंड बजा दी..मेरा तो कुछ भी नहीं हो सकता..” वहीँ एक पॉजिटिव सेल्फ टॉक वाला इंसान कुछ ऐसे खुद से बात करेगा - “मैं इससे और बेहतर कर सकता हूँ. देखता हूँ किसी से मदद लेनी पड़ी तो लूँगा, ट्रेनिंग लूँगा लेकिन मैं इससे बेहतर कर के दिखाऊंगा”.

हमें ये दो तरह के सेल्फ-टॉक के बीच के अंतर को समझना बहुत जरूरी है. हमें अपने आसपास नेगेटिव सेल्फ टॉक के बहुत से उधाहरण देखने को मिलेंगे. एक छोटी सा उदाहरण और देखिये - मानिए कि आपको किसी ने कोई काम सौंपा है जो आपको एक सप्ताह में करना है. आपने ऐसा बोलते हुए अक्सर लोगों को सुना होगा न “कैसे होगा यार एक सप्ताह में इतना काम..पॉसिबल ही नहीं है.." वहीँ पॉजिटिव सेल्फ टॉक वाले लोग खुद से कुछ इस अंदाज़ में बातें करेंगे - “एक एक कर के शांत मन से कम करूँगा तो एक सप्ताह में ये सारे काम पूरे जरूर हो जायेंगे..."

साइकॉलजी के एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सेल्फ टॉक के लिए बेहद जरूरी है कि आप अपने नेगेटिव इमोशन पर काबू पाए और अपने मन को पॉजिटिव सोच की तरफ ले जाएँ. हॉस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ब्रेन ब्राउन का कहना है, कि सिर्फ इन सब बातों को ही नहीं बल्कि इस बार पर भी ध्यान देना चाहिए कि आप खुद को कैसे संबोधित करते हैं. उनका मानना है कि खुद से कभी “मैं” कर के बातें न कीजिये. खुद से “तुम” या अपना नाम लेकर बातें कीजिये. इस बात से भी आपके सेल्फ-टॉक पर फर्क पड़ता है. उनका कहना है कि इसके अलावा एक और बात जो सबसे ज्यादा अहम् है वो ये कि खुद पर ज्यादा सख्ती न करें. एक अच्छे दोस्त की तरह खुद से बातें करें आप.

ब्रेन ब्राउन का कहना है कि अक्सर खुद को मोटीवेट करने के लिए आप अपने द्वारा किये काम के लिए खुद को शाबासी भी दें. इससे आपके आत्मविश्वास को बल मिलता है.

खुद को शाबाशी देने वाली बात तो मैं भी मानता हूँ. जितना सुकून आपको खुद के शाबाशी से मिलेगा उतना शायद किसी और के शाबाशी से नहीं मिलेगा. इस सन्दर्भ में मैं खुद का ही एक उधाहरण देता हूँ - जब कहानियां लिखनी शुरू की थी मैंने, तो इक दफे एक कोरियाई फिल्म से इन्स्पाइअर्ड होकर मैंने एक छोटी कहानी लिखी थी. सिर्फ करैक्टर और शहर मेरे थे, बाकी प्लाट से लेकर इमोशन और मोमेंट्स तक उस फिल्म से इन्स्पाइअर्ड थी. मेरी उस कहानी की बड़ी तारीफ हुई और मुझे अच्छा भी ख़ूब लगा. तारीफें किसे पसंद नहीं? लेकिन जाने क्यों मैं अंदर से संतृष्ट महसूस नही कर रहा था. कुछ समय बाद मैंने उस कहानी को डिलीट कर दी और फिर दोबारा एक दूसरी कहानी लिखी, जो कि एक ख़त के रूप में था. पूरे शिद्दत से और दिल से मैंने उस कहानी को लिखा था. मैंने उसे शाम के वक़्त पब्लिश किया था लेकिन सुबह तक उसपर कोई कॉमेंट नही आये थे. ब्लॉग्गिंग के उस सुनहरे दौर में पूरी रात निकल जाए औए कमेंट न आये तो इसका एक मतलब निकल सकता है कि किसी को आपका लिखा पसंद नहीं आया है.

सुबह मैंने वो कहानी दुबारा पढ़ी, और फिर तिबारा. उसके बाद मैं बाथरूम में शेविंग करने चला गया. शेविंग करने के दौरान शीशे में खुद को देखते हुए मेरे मुहँ से अचानक निकल गया, “यार क्या पोस्ट बनी है ये, कमाल है भाई... एकदम गज़ब”. फिर अगले ही पल खुद से काउंटर सवाल भी किया. “झूठ तो नहीं बोल रहे हो न? सही में अच्छी है? जवाब आया – “यार एकदम मस्त...हर कुछ बेहद खूबसूरत है पोस्ट में. मैं बहुत खुश हो गया. मुझे अब किसी और की तारीफ या कॉमेंट की जरूरत नही थी. मैं जानता था कि मैंने एक अच्छी कहानी लिखी है. 

कुल मिलालर इन बातों का मतलब सिर्फ इतना है कि आप खुद को धोखा नही दे सकते. कभी भी नही. आप अगर खुद को शाबासी दे रहे हैं यानी आपने सही में वो काम अच्छा किया है. यकीन मानिए कोई भी व्यक्ति कुछ बुरा किये काम के लिए खुद को शाबासी नहीं दे सकता. सेल्फ टॉक के मैकेनिज्म से जुड़ी ये बात बहुत अहम् है, कि आप अच्छे काम के लिए खुद को शाबाशी जरूर दें.

इस सेल्फ टॉक के विषय में दुनिया भर में हजारों तरह के एक्सपेरिमेंट हुए हैं. और लगभग सभी एक्सपर्ट मानते हैं कि सेल्फ-टॉक बेहद जरूरी है. बहुत से स्कूल तो ऐसे हैं जहाँ बच्चों को अभी से सेल्फ-टॉक की शिक्षा दी जाती है. लेकिन आज भी हम अपनी सोसाइटी में सेल्फ-टॉक को एक मानसिक बीमारी मानते हैं, जब कि बड़े बड़े मैनेजमेंट और सेल्फ-हेल्प गुरु जोर शोर से सेल्फ-टॉक की तरफदारी करते हैं. 

लेकिन आप यदि उन लोगों में से हैं जो खुद से बातें करते हैं, तो आप एक अच्छी और जरूरी आदत के आदि हैं जो कि एक अच्छी बात है. जो खुद से बातें करते हैं, वह चुप होकर काम करने वाले लोगों की तुलना में अपने काम पर ज्यादा अच्छे तरीके से फोकस कर पाते हैं और ज्यादा कॉंफिडेंट होते हैं. शायद इसलिए दुनिया भर के बड़े बड़े स्पोर्ट्स आइकॉन अपने खेल के दौरान खुद से तेज़ आवज़ में कहते हैं - 'कम-ऑन'!

1 comment:

  1. सच कह रहे हो, लोग बहुत मज़ाक उड़ाते हैं हमारे समाज मे ऐसे लोगों का...पर हमको लगता है कि इस तरह का सेल्फ टॉक कई लोग मन ही मन मे भी कर जाते हैं, अनजाने ही...। बाकियों का तो पता नहीं, पर हम खुद को उदास मनस्थिति से निकालने के लिए अक्सर सेल्फ टॉक करते हैं, पर हाँ... ये बातचीत और समझावन बुझावन मन के अंदर ही होता है...। आखिर हम किसी और को क्यों पता चलने दें कि हमारे कितने बुलंद इरादे हैं :P :)

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