विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली - मेरी नज़र से (1)

हर साल की तरह इस साल भी विश्व पुस्तक मेला का दिल्ली में आयोजन हुआ है. बीच में ऐसी बातें सुनने में आई थी कि इस साल का पुस्तक मेला ग्रेटर नॉएडा के एक्सपो मार्ट में लगेगा, क्योंकि प्रगति मैदान के आधे हिस्से में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है. लेकिन जब ये सुना कि पुस्तक मेला का आयोजन हर साल की तरह इस बार भी प्रगति मैदान में होगा, तो थोड़ी राहत हुई. प्रगति मैदान सेंट्रल दिल्ली में है, और यहाँ आना दिल्ली के किसी भी कोने से बहुत आसान है. प्रगति मैदान में ये उम्मीद तो रहती है कि रोज़ कुछ घंटों के लिए यहाँ के चक्कर लगा सकते हैं, ग्रेटर नॉएडा में अगर आयोजित होता पुस्तक मेला तो एक दिन के बाद दुसरे दिन जाने की हिम्मत नहीं होती.

लेकिन इस बार प्रगति मैदान में आयोजित होने के बाद भी पुस्तक मेला की रौनक बड़ी फीकी फीकी सी रही. बहुत से किताबों के स्टाल नहीं मिले जो हर साल दिखते थे. लोगों के उत्साह में भी बहुत कमी दिखी, और ना ही उस तादाद में लोग इस मेले में दिखे. प्रगति मैदान में बड़े स्तर पर कंस्ट्रक्शन का भी काम चल रहा है, इससे भी पुस्तक मेला में बहुत बाधा आई. सबसे बड़ी निराशा ये देखकर हुई कि प्रगति मैदान का फ़ूड कोर्ट को पूरी तरह से तोड़ दिया गया था. हॉल नंबर 12 और 12A के ठीक सामने जो फ़ूड कोर्ट और पार्क था, वो पूरी तरह से उजाड़ दिया गया था, और उस तमाम एरिया की घेराबंदी कर दी गयी थी और वहाँ कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था.

मेरे हिसाब से पुस्तक मेले की रौनक में चार चाँद लगाने का काम वो फ़ूड कोर्ट और वो छोटा सा पार्क भी करता था. जाड़े के धुप में लोग उस पार्क में किताबें लेकर बैठते, पढ़ते, किताबों पर चर्चाएँ करते, चाय कॉफ़ी और छोले भठूरे खाते और खूब गप्पे लड़ाते. ये माहौल इस बार नहीं दिखा पुस्तक मेला में, और मुझे तो इस माहौल की कमी इस साल सबसे ज्यादा खली.

बहुत से हमारे दोस्त भी नहीं आये थे इस पुस्तक मेले में, उनकी कमी भी खूब खली. लेकिन सब की कमी को प्रियंका दीदी ने आकर पूरा कर दिया. प्रियंका दीदी पिछले साल भी पुस्तक मेले में दिल्ली आयीं थी और इस साल भी. इस बार आंटी(प्रेम गुप्ता मानी) की किताब "बाबूजी का चश्मा" का विमोचन होना था, उसी मौके पर प्रियंका दीदी तीन दिनों के लिए पुस्तक मेले में आई थीं. हर बार मेरे साथ मेरी कोई न कोई दीदियाँ रहती ही हैं पुस्तक मेले में, और मुझे उनके साथ घूमना पड़ता है, उनकी किताबें संभालना और ढोना पड़ता है. लेकिन साथ ही साथ मेरे लिए एक काम की बात ये हो जाती है, कि मेरी सभी दीदियाँ बड़ी सेलेब्रिटी टाइप हैं, मतलब ऐसा कि आम से लेकर ख़ास लोग उन्हें पहचानते हैं और इस वजह से उन सब आम और ख़ास लोगों से मेरी भी जान पहचान हो जाती है.

पहले दिन जब इस पुस्तक मेले में दीदी के साथ मैं गया था, तो उस दिन खूब लोग मिले. हमारे चाचा(सलिल वर्मा) जो कि पहले से ही एक सेलेब्रिटी और स्थापित ब्लॉगर हैं, वो भी वहाँ उपस्थित थें, और साथ ही कुछ अन्य मित्र भी वहाँ उस दिन मिले. सलिल चचा से हम हमेशा कुछ न कुछ सीखते ही हैं, तो इस तस्वीर में भी हम दोनों भाई बहन पुस्तक मेला में घूमते हुए, जब थक गए तो हॉल के एक कोने में बैठ कर सलिल चचा से कुछ ज्ञान की बातें सीखने लगे थे.


प्रियंका दीदी की वजह से इस बार शंभूनाथ शुक्ल (शंभूनाथ अंकल) से भी मुलाकात हुई, जो कि छोटी सी थी, लेकिन बहुत यादगार. हम सब की सेल्फी ली प्रियंका दी के बेटे चुनमुन ने. चुनमुन ने इस पुस्तक मेले में सब कि तस्वीरें बड़ी अच्छी ली हैं.


मुकेश भैया(मुकेश कुमार सिन्हा) से भी पुस्तक मेले में मुलाकात हुई. इनसे हमेशा मुलाकात हो ही जाती है पुस्तक मेले में. मुकेश भैया की नयी किताब "लाल फ्रॉक वाली लड़की" का भी विमोचन उसी दिन हुआ था.

हर बार की तरह इस बार के पुस्तक मेले की शुरुआत हमारी "हिन्द युग्म" के स्टाल से ही हुई थी. यहाँ पर हमारे कई दोस्त अक्सर घूमते टहलते मिल जाते हैं, और बहुत दोस्तों की किताबें भी यहीं से प्रकाशित हुई हैं. यहीं हमें किशोर साहब भी मिल गए थे, जिन्होंने अपने गुरु से भी हमारा परिचय करवाया. किशोर चौधरी हमारे प्रिय लेखक हैं, मुकेश भैया ने हम सब की एक सेल्फी वहीँ हिन्द युग्म के स्टाल पर ही ले ली


हिन्द युग्म से ही मेरी दो दीदियों की किताब भी प्रकाशित हुई थी, मैंने बिना देरी किये उनकी किताबों के साथ अपनी तस्वीर भी खिंचवा ली, ताकि दीदियाँ इस तस्वीर को प्रमोशनल पिक्चर के तौर पर इस्तेमाल कर लें.


हिन्द युग्म के साथ साथ पहली बार पुस्तक मेला में "कविताकोश" का स्टाल देखकर अच्छा लगा. कविताकोश ने बड़ा ही अनोखा प्रयोग करते हुए हिंदी के महाकविओं की पंक्तियों के साथ एक वाल कैलेंडर और एक टेबल कैलेंडर निकाला था, जो कि मुझे बड़ा ही आकर्षक लगा. हमनें भी बिना मौका गंवाए, कैलेंडर ले ली.


पुस्तक मेले में मैं तीनों दिन गया था. आज तीसरे दिन आंटी(प्रेम गुप्ता मानी) की किताब "बाबूजी का चश्मा" का भी विमोचन अयन प्रकाशन के स्टाल पर हुआ था. हम सब इस विमोचन के दौरान मौजूद थे.


अयन प्रकाशन के स्टाल पर ही आराधना जी से मुलाकात हुई. आराधना जी ख़ास तौर से प्रियंका दी से मिलने आई थी, और हमनें फोटो भी खिंचवाई. खूब मस्ती भरी बातें भी हुई हमारी. तस्वीर में देखिये, हँसी तो किसी की रुक ही नहीं रही.


दोस्तों से और परिचितों से मुलाकात करने में अक्सर किताबों के स्टाल पर घूमना रह जाता है, लेकिन मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि सभी स्टाल को अच्छे से देखू. बहुत बार कुछ नायब या अच्छी किताबें यूहीं स्टाल पर घूमते हुए हाथ लग जाती है. इन तीन दिनों क्या क्या देखा स्टाल में, वो सब यहाँ बताने की कोशिश कर रहा हूँ.

बच्चों की किताबों के लिए बहुत से स्टाल दिखें, जिनमें ये तीन स्टाल सबसे ज्यादा पसंद आये मुझे. पहला स्टाल संख्या S/11 में संस्कार प्रकाशन का छोटा सा स्टाल, जहाँ बच्चों के काम की किताबें, कवितायेँ और बाकी जानकारियां बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत की गयी थीं. खूब प्यारे स्केच और अच्छी प्रिंटिंग से इनकी किताबें बड़ी सुन्दर दिख रही थी. कुछ किताबों में बच्चों के थोड़े नायब विषय भी देखने को मिले. बस एक बात जो यहाँ नहीं अच्छी लगी, वो थीं इनके किताबों की कीमत. थोड़ी महंगी दिखी किताबें इनकी. यहाँ एक नायब किस्म का हिंदी महीनों का कैलेंडर भी दिखा, जिसमें हर महीनों के पन्ने पर कुछ प्यारी पंक्तियाँ भी लिखी हुई थीं.


हॉल नंबर बारह के शुरुआत में ही एकलव्य प्रकाशन का स्टाल है, जहाँ बच्चों के लिए खूब अच्छी जानकारी वाली किताबें मौजूद हैं. यहाँ छोटे बच्चों से लेकर बड़े बच्चों तक की किताबें उपलब्ध हैं. साथ ही साथ शिक्षकों के लिए भी कुछ किताबें मौजूद हैं. यहाँ, इनके स्टाल पर ही बच्चों के पज़ल वाले खिलौने भी दिखे जो मुझे अच्छे लगे. एकलव्य प्रकाशन के स्टाल पर हमेशा ऐसी ज्ञानवर्धक किताबें मिलती ही हैं.


बच्चों की बात करे, तो एक और स्टाल दिखा हमें जहाँ बच्चों के ऐसे खिलौने दिखे जो बच्चों का मनोरंजन करते हैं और साथ में ही ज्ञान भी देते हैं.


हॉल नंबर 12A के स्टाल नंबर 389 पर दिखा "मैथिलि मचान" का स्टाल, जहाँ मैथिलि साहित्य की किताबें थीं. यहाँ हम रुक गए. अगर आप मिथिला से हैं और मैथिलि समझते हैं, तो इस स्टाल पर एक बार जरूर जाइए. यहाँ आपको खूब अच्छी किताब भी मिल जायेंगी. इन्होने एक कैलेंडर "मैथिलि के मूर्धन्य" के नाम से भी निकाला है, जिसमें मैथिलि भाषा के साहित्यकारों की तस्वीरें हैं.


एक बात जो मैंने गौर की इस पुस्तक मेले में, कि ऐसे कैलेंडर खूब मिल रहे हैं अलग अलग प्रकाशन से जो हिंदी साहित्य से जुड़े हैं. वाणी प्रकाशन में भी हिंदी साहित्य के ही थीम पर एक डेस्क कैलेंडर दिखा हमें, लेने की ईच्छा थी लेकिन कीमत ज्यादा थी तो छोड़ दिया मैंने. वाणी प्रकाशन के स्टाल पर सबसे बड़ा हाईलाइट मेरे लिए जो था वो थी निर्मल वर्मा की सभी किताबें जो एक साथ लगायी हुई थी. हालाँकि फिर से मुझे इस बार भी निर्मल वर्मा की किताब "धुंध से उठती धुन" की कमी दिखी, जो पिछले तीन पुस्तक मेले से मैं खोज रहा हूँ और मुझे मिली नहीं है. प्रकाशक कहते हैं कि ये किताब आउट ऑफ़ स्टॉक है. मेरे पास निर्मल की सभी किताबें हैं, सिर्फ "धुंध से उठती धुन" को छोड़कर.


वाणी प्रकाशन में ही दिखी बच्चों के लिए कुछ अच्छी किताबें, फिल्मों से सम्बंधित कुछ अच्छी किताबें और गुलज़ार साहब के किताबों का कलेक्शन. वाणी प्रकाशन वैसे तो हर साल अपने स्टाल पर अच्छी किताबें रखते हैं, इस साल लेकिन हमें इनका स्टाल ज्यादा पसंद आया.


वाणी के अलावा राजकमल प्रकाशन में एक अच्छी बात दिखी, यहाँ पर किताबों का एक कोना ऐसा भी था जहाँ दो किताबें लेने पर आपको एक किताब मुफ्त दी जा रही थी. मुझे ये तरीका पसंद आया. अमूमन देखा जाता है जहाँ ऐसा कोई ऑफर रहता है वहाँ किताबें आप छाँट नहीं सकते हैं, लेकिन इनके ऑफर वाले स्टाल पर बड़े लेखकों की अच्छी किताबें उपलब्ध थी. मैंने यहाँ से फणीश्वर नाथ रेनू, भगवती चरण वर्मा और राही मासूम रजा की किताबें ली.


हॉल नंबर 12A में ही वाग्देवी प्रकाशन का स्टाल था, जहाँ से मैं अक्सर किताबें लेता हूँ. यहाँ मुझे सबसे अच्छी बात लगती है कि इनकी किताबें खूब सस्ती और अच्छी होती हैं. निबंध से लेकर इतिहास से लेकर कवितायेँ और कहानियों की किताबें भी यहाँ मिल जाती हैं और बेहद सस्ते दामों पर.


पिछले साल कुश भाई के रुझान प्रकाशन के स्टाल पर हमें "ख्वाब तनहा कलेक्टिव" के भी पोस्टर्स, टी-शर्ट्स और झोले देखने को मिले थे, जिन्होंने हमें बेहद प्रभावित किया था. मशहूर शायरों के थीम को लेकर इन्होने खूब अच्छे टी-शर्ट्स, और पोस्टर्स डिजाईन किये हैं. इस बार इनका पता राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर है. कीमतें थोड़ी बढ़ी हुई हैं पिछले साल के तुलना में, लेकिन ये डिजाईन इतने नायब हैं, कि कीमत अखरती नहीं. डिज़ाइनर कॉफ़ी मग भी इस बार इनके स्टाल पर उपलब्ध है.



पुस्तक मेले की बातें तो अभी और भी बहुत सी हैं, बहुत से स्टाल पर गए थे हम, लेकिन सब स्टाल का विवरण देना संभव नहीं, तो कोशिश रहेगी कि अगली रिपोर्ट में पुस्तक मेले के कुछ और रंग आपके सामने हम लेकर आयें. फ़िलहाल के आज के पोस्ट में इतना ही. अगला भाग बहुत जल्द..

5 comments:

  1. इन तीन दिनों की ढेरों यादें ताज़ा कर दी तुमने 😀

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व हिन्दी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बहुत बढ़िया रिपोर्ट! पूरा नज़ारा नज़र के सामने से गुज़र गया! लेकिन नीचे जो लिंक दिया है तुमने उसमे 900 साल आगे का साल लिख दिया है तुमने... पुस्तक मेला 2918.
    भगवान करे तुम 2918 के पुस्तक मेला की रिपोर्टिंग भी इसी जीवंतता से करो! अफसोस हम न होंगे!!

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  4. इस बार का पुस्तक मेला फीका होना ही था ...एक तो हम नहीं थे, दूसरा फ़ूड कोर्ट नहीं था :/

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  5. अच्छा लगा तुमसे व प्रियंका जी से मिलना :)

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

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