ट्रेन नोट्स - अयांश बाबु की शैतानियों के चिट्ठे

मेरे भांजे अयांश बाबू की बदमाशियां दिन ब दिन बढ़ते जा रही है. जैसे जैसे ये बड़ा होते जा रहा है, वैसे वैसे इसकी बदमाशियां भी बड़ी होती जा रही हैं. पहले ये लड़का ट्रेन से सफ़र करने वक़्त बड़ा रोता था, यहाँ तक कि जब डेढ़ साल पहले दिल्ली आया था तो मेट्रो में भी बड़ा तंग करता था ये. बंद जगह में रहना इसे बिलकुल पसंद नहीं था. मुझे याद है, दो साल पहले जब मैं और मेरी बहन नासिक से पटना आ रहे थे तो भी इसनें काफी तंग किया था.खूब रोया था ये.. पूरे ट्रेन पर मैं इसे लेकर इधर से उधर टहलता ही रहा था. मैंने अपनी बहन से कहा, "ये मॉडर्न बच्चा है. इसे बस फ्लाइट से ही ट्रेवल करवाओ, घर जल्दी पहुँच भी जाओगी और बच्चा तंग भी ज्यादा नहीं करेगा.." 

यूँ देखा जाए तो फ्लाइट में भी बंद जगह वाली ही व्यवस्था है, लेकिन फिर भी अयांश फ्लाइट में कभी तंग नहीं किया. इसकी एक वजह भी हो सकती है, ये नेक्स्ट जनरेशन का बच्चा है न. आँख खुलते ही फ्लाइट से आने जाने लगा. हमारे जैसे थोड़े ही है, जो अब जाकर फ्लाइट में चढ़ने का सपना पूरे किये. हमारे बचपन में फ्लाइट में चढ़ना मतलब सीधे करोड़पति हो जाने वाला हिसाब किताब था. हम तो यही समझते थे बचपन में कि जो फ्लाइट से आ जा रहा है, वो जरूर करोड़पति होगा. वरना आम परिवार वाले तो ट्रेन में एसी डब्बों में भी नहीं, स्लीपर में चलते हैं. 

ये बात हमारी थी, पर हमारे ये भांजे साहब आज के बच्चे हैं. इसलिए ये फ्लाइट में ज्यादा कम्फ़र्टेबल रहते हैं. लेकिन जैसे जैसे ये बड़ा होते जा रहा है, वैसे वैसे शायद अब ये भी ट्रेन के सफ़र को एन्जॉय करने लगा है. आज सुबह यूहीं मोबाइल में तस्वीरों के गैलरी देखते हुए कुछ दिनों पहले खींची ट्रेन पर के एक सेल्फी पर नज़र गयी. ये भांजे के साथ ली गयी सेल्फी थी, जो पटना जाते वक़्त ट्रेन पर मैंने ली थी. तस्वीर देखते ही चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी. अयांश की ट्रेन की शैतानियाँ याद आई. मैं, अयांश और मेरी बहन पटना जा रहे थे. हमारा दो बर्थ था, अपर और लोअर. मोना और अयंश लोअर बर्थ पर थे और मैं अपर बर्थ पर. लेकिन इस लड़के को नीचे वाले बर्थ पर चैन ही नहीं आ रहा था.ये बार बार मेरे साथ अपर बर्थ पर आने को बेचैन था. अपर बर्थ पर आने की वजह सिर्फ बदमाशी करना था. 

अपर बर्थ पर भांजे साहब ने ऐसा उधम मचाया कि क्या कहे..इधर से उधर कूदते रहा. एक पल तो लगा, आज ये बर्थ गया काम से. ऐसा कूद रहा था ये. स्टंट देने की भी कोशिश बार बार कर रहा था. ये चाह रहा था कि अपर बर्थ से सामने के अपर बर्थ पर चले जाए, और एक दो बार वैसा करने का ट्राई भी मार चूका था ये लड़का. मोना को ऊपर से झाँक कर देख रहा था, और दो दिन बार तो कोशिश किया इसनें की सीधे नीचे वाले बर्थ पर कूद ही जाए. डर तो गिरने पड़ने से है नहीं इसे अभी. 

इस बदमाश लड़के को पता नही इस लाइट से क्या फैसनेशन था. बर्थ के ऊपर लगे लाइट के तो पीछे ही पड़ गया था ये. बार बार ऑन ऑफ खेल रहा था. लाइट पर अपनी उंगली रख कर देख रहा था और जब बल्ब की रोशनी पड़ते ही उंगली का रंग लाल हो जाता तो इसे खूब अच्छा लगता. मुझे भी उस वक़्त अपने बचपन की बातें याद आ गयी, जब हम टोर्च जलाकर उसके ऊपर ऊँगली रख देते थे, और ऊँगली टोर्च की रौशनी में लाल हो जाती थी. अयांश को भी ऐसा करना खूब पसंद है. मुझे लगता है कि लगभग सभी बच्चों में आदतें एक सी ही होती हैं.

ट्रेन पर जब जब भी चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स बेचते हुए हॉकर गुज़रते, हमारे भांजे साहब उन्हें देखकर एकदम बेचैन हो जाते थे. सब कुछ खरीदवाने की जिद करने लगते हैं भांजे साहब. चिप्स या कोल्ड ड्रिंक खरीदवाने की एक नयी बदमाशी इसनें सीख ली है. सामने बर्थ पर एक व्यक्ति सफ़र कर रहे थे, उनके हाथ में चिप्स का पैकेट देखते ही ये साहब उस पैकेट पर एकदम जोर से झपटे. हमनें तुरंत इसे अपने पास खींचा और इसे पकड़ कर तब तक अपने पास रखा जब तक दोबारा हॉकर नहीं आया, और हमनें फिर से इसे चिप्स खरीद कर नहीं दी. इस तरह के ट्रिक्स ये अब हर सफ़र में करता है. सामने वाले यात्री जो भी खाए, इसे बिलकुल वही चीज़ चाहिए होती है. 

पिछली बार हम रात में सफ़र कर रहे थे. तो खाने पीने का सारा सामान साथ रखे थे. भांजे साहब ने देखा सामने वाले यात्री ने रात के डिनर का एक मील्स पैक खरीदा. भांजे साहब तुरंत उसपर झपट पड़े. हमें मजबूरीवश एक मील्स पैक खरीदना पड़ा. लेकिन इस बार भांजे साहब अड़े रहे, उनको सामने वाले यात्री का ही पैकेट चाहिए था, जबकि हमनें भी वही पैकेट खरीदा था. लेकिन भांजे साहब किसी कीमत पर मानने वाले नहीं थे. अंत में सामने वाले यात्री ने ही भांजे साहब के जिद को देखते हुए उसे अपना वो पैकेट थमा दिए, और हमारा वाला वो ले लिए. भांजे साहब हमारे खुश हो गए.. लेकिन बस उनकी जिद वो पैकेट हथियाने तक ही थी. पैकेट खुलने के बाद उसमें का एक चीज़ उन्होंने खाया नहीं.

सफ़र में ये एक बड़ी दिक्कत हो जाती है अयांश  के साथ. आप खाने पीने का कितना भी सामान अपने साथ बाँध कर ले जाए, लेकिन ये लड़का सिर्फ और सिर्फ चिप्स, बिस्किट, केक और चॉकलेट्स से ही अपनी भूख मिटाता है. इसके अलावा कुछ भी नहीं खाना चाहता ये लड़का. 

वैसे, अब धीरे धीरे जैसे जैसे बड़े होते जा रहा है, ट्रेन की खिडकियों से बाहर देखकर खुश भी होता है. पहले ये ट्रेन पर तंग करता था, रोता था. लेकिन अब ये ट्रेन पर बदमाशी करता है. इतनी जोर जोर से काउंटिंग और 'ए फॉर एप्पल बी फॉर बॉल' पढ़ता है, कि आगे पीछे सभी कम्पार्टमेंट के यात्री समझ जाते हैं कि कोई बहुत बड़ा पढ़ाकू बच्चा कम्पार्टमेंट में है.  

फ़िलहाल अभी ये क्रिसमस के छुट्टियों में जालंधर जाने वाला है, और फिर से ट्रेन से ही सफ़र करने वाला है. अब देखते हैं ये इस सफ़र में क्या नयी बदमाशी करता है. इस बार मैं तो रहूँगा नहीं, मेरी बहन के साथ ही जाएगा ट्रेन से..देखते हैं, इसके बदमाशियों में और कितने चैप्टर्स जुड़ते हैं, वो सब यहाँ सबूत के साथ पेश होते जायेंगे... :) 

4 comments:

  1. बहुत अच्छा लगता है न बच्चों के साथ बच्चा बनकर!
    अयांश बाबु को शुभाशीष व प्यार

    ReplyDelete
  2. इब्तिदा-ए-बदमाशी है, रोता है क्या
    आगे आगे देखना मामू, होता है क्या 😀

    ReplyDelete
  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, वेटर का बदला - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  4. अयांश की कृष्णलीला की तो अभी शुरुआत है .....
    अगले सफर के वृतांत का इन्तजार है ......

    ReplyDelete

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

Powered by Blogger.