देखते देखते दिनों का बीत जाना - निमिषा के लिए

पिछले सप्ताह मेरी छोटी बहन निमिषा की शादी  थी. निमिषा जिसे  मैं अक्सर "निम्मो" कह कर बुलाता हूँ, वो मेरी सबसे प्यारी बहन है. उसके प्यारे दुलारे से किस्से आप यहाँ मेरे ब्लॉग पर लगातार पढ़ते आये हैं. निमिषा की शादी थी, तो कुछ ऐसा तो उसे  तोहफे के रूप में देना था जो उसे  याद रह जाए. निमिषा के शादी में "संगीत" का भी कार्यक्रम आयोजित किया गया था. निमिषा जाने कितने महीनों से मुझे धमकाए हुए थी, "भैया, तुम्हें मेरे संगीत कार्यक्रम में डांस करना है, या तो गाना गाना है".  मुझसे भला डांस या गाना कहाँ से हो पाता? और निमिषा को ना बोलने का सवाल भी नहीं था. एक तो वो गुस्सा हो जाती, और दुसरा मुझे भी  अच्छा नहीं लगता उसके इतने प्यारे से धमकी को ना मानना. तो मैंने बीच का एक रास्ता निकाला..

मैंने निमिषा को कहा, कि तुम्हारे संगीत के अवसर पर मैं तुम्हारे लिए एक कविता लिख दूंगा. कविता का नाम सुनते ही निमिषा का चेहरा खिल उठा. एक कविता जो सिर्फ उसको डेडीकेट हो, उसके लिए बहुत बड़ी और ख़ुशी की बात थी. पहले भी जब मेरी एक पुरानी पोस्ट राखी इ अवसर पर अखबार में छपी थी, और उस पोस्ट में निमिषा का नाम था.. वो महीनों खुश रही थी इस बात से कि "मेरा नाम भी अखबार में छपा है". उसनें तो मुझे कहना भी शुरू कर दिया था, "भैया, तुम ऐसे ही मेरे बारे में लिखते रहो.. बहुत फेमस हो जाओगे..देखना तुम.."

निमिषा की इन्हीं प्यारी हरकतों और बातों को इस कविता में लिखने की कोशिश की है. कविता लिखना मेरे बस की बात नहीं है, कविता लिखने में कविता के मीटर और उसके पैमानों की धज्जियाँ उड़ा देता हूँ, लेकिन ये निमिषा के लिए थी.. बस मेरे दिल में जो भी था वो बातें इस कविता में आ गई हैं.. तो पढ़िए निमिषा के लिए एक कविता -

देखते देखते दिनों का बीत जाना
सपनों में भी तुम्हारा बचपन याद आना

मेरे चिढ़ाने पर-मैं बड़ी हो गई हूँ-
कह के वो तेरा इतराना
तेरे मस्त किस्सों कोबचपने से भरे हिस्सों को
मेरी कहानियों का हिस्सा बनाना

गुलज़ार की शायरी का तेरा वो बैंड बजाना
और फिर मासूमियत से- 'सुई गालों में कैसे पिचकेगा'-
पूछ पूछ के मेरा दिमाग़ खाना

सरस्वती पूजा के दिन को
सरस्वती माँ का बर्थडे समझना,
और बड़ी भोली शक्ल बनाकर,
तुम्हारा मुझसे पूछना,
भैया, आज तो सरस्वती माता का हैप्पी बर्थडे है,
तो फिर आज केक क्यों नहीं खाते हैं?
इस बात पर चिढ़ाने पर वो तुम्हारा रूठ जाना
और फिर एक बच्चे की तरह
चॉकलेट के नाम पर झट मानमुस्कराना

जिद कर के मुझे ऑनलाइन चैट पर बुलाना
और फिर सब बहनों के साथ
चैट पर ही अन्ताक्षरी खेलना
मेरे डांटने-डपटने पर
इतरा के तुम्हारा कहना  -
तुम उतनी दूर चले गए भैया
तो क्या अब तुम्हें तंग करने का,
मुझे अधिकार नहीं है?
और ये कहते हुए
तुम्हारा फिर से रूठ जाना...
रूठे हुए ही,
तुम्हारा फिर से मुझे धमका देना -
आओ तुम जनवरी में पटना, भैया  
तुम्हें बताएँगे तंग करना किसी कहते हैं..
और मेरा तुमसे सच में डर जाना
और तुम्हें मनाने लगना
जाने कितने ऐसे मस्त किस्सों से,
बचपने से भरे हिस्सों से
मेरी यादें सजी हुई हैं..

मेरी लिखी कहानियाँ 
तुम्हें समझ आती नहीं थी कभी,
फिर भी याद है,
तुम्हारा बड़े गौर से मेरी कहानियों को सुनना,
और फिर बड़ी मासूमियत से कहना,
'भुइया', तुम किस प्लानेट से आये हो
ज़रा ये बताना,
इतनी बकवास बातें तुम्हारी
कौन लोग पढ़ते हैं, कैसे पढ़ लेते हैं?
ट्राफिक के इतने शोर में तो,
कोई मन की बात की बात कैसे सुन सकता है?
हमें तो बस गाड़ी की आवाजें ही सुनाई देती है...

बारिश के दिन में याद है निम्मो?
जब मेरे घर से लौट रही थी तुम,  
बारिश में हमें चिंता थी, रेलवे स्टेशन जाने की,
पर तुम्हें फ़िक्र इस बात की थी, 
कि ट्रेन भींग गया बारिश में तो उसे बुखार आ जाएगा..
और फिर उसी दिन, जब ट्रेन बहुत लेट हो चुकी थी,
तुमनें कहा था,
भैया, ट्रेन चलते चलते थक गया होगा..
कहीं सुस्ताने रुक रुक गया
हमें उसे ग्लूकोस पिलाना होगा,
उसके तबियत को ठीक करवाना होगा

इन्हीं सब इलाजिकल बातों पर
मेरा तुम्हें, ‘तुम अभी बच्ची हो’ कह देने पर
तुम्हारा तरह तरह से
अपने बड़े होने का तर्क देते हुए कहना  
कि देखो, कॉलेज का अपना काम खुद करती हूँ,
अकेली आती जाती हूँ,
एग्जाम ख़राब जाने पर रोती नहीं हूँ,
ग्रेज्युट हो गयी हूँ मैं
तो हुई न बड़ी अब...
और तुम्हारे इन सब तर्कों का
मेरा सिरे से खारिज कर देना
और फिर तुम्हारा वो गुस्से में चिढ़ जाना मुझसे...
तुम्हें यूँ चिढ़ता हुआ देखते हुए मेरा मुस्कुराना
और फिर मन ही मन ये दुआ माँगना
कि इसका बचपना सलामत रखना...

कितने किस्सेकितनी यादें
मेरे तेरे मीठे रिश्ते की शैतानियाँ
हर ऐसे पल को याद करते हुए
हमारी आँखें और दिल भर आना

पर देखो तोवक़्त का पहिया घूमता रहा
और अब सपनों के काँधे पर सवार
तुम चल दी अपने नए घर द्वार 

निम्मोओ मेरी प्यारी निम्मो
बहुत याद आओगी तुम क्योंकि,
तुम तो बस तुम ही हो

हम सब की ज़िन्दगी का एक मुस्कराता नजराना...

सच में - 
 देखते देखते दिनों का बीत जाना
सपनों में भी तुम्हारा बचपन याद आना

9 comments:

  1. सच मे रे, देखते देखते दिनों का बीत जाना और जाने कितना कुछ याद आना...💝😘

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  2. बहुत सुंदर। :)

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  3. इत्ती लम्बी कविता पढ़ के तो अब निमिषा कई सालों तक तुमसे कोई शिक़ायत न करेगी :)

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  4. निमिषा जी को अशेष शुभकामनाएं!

    आपने बड़ी प्यारी कविता लिखी है !

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  5. Awww...super cute...super awsum!!
    Nimisha is so lucky...ki tumhare jaisa bhai hai..
    A PERFECT WEDDING GIFT

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  6. Prachi Pathak20 December, 2017

    शुक्रिया अभिषेक जी, इतनी अच्छी कविता पढ़वाने के लिए.
    आपका और आपकी बहन का स्नेह सदैव बना रहे ये कामना है...

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  7. काफी दिनों बाद आपको पढ़ा है अभि जी! बहुत ही प्यारी कविता है..
    कृपया लगातार लिखते रहें|

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  8. Ek bhai ke liye behan ki shaadi khushi ki ke sath sath bahut hi udaas karne wala waqt bhi hota hai. Aakhir us din uske bachpan ki aur har dukh sykh ki sathi us-se dor ja rahi hoti hai. Aapne apni kavita mein iss cheez ko achhe se dikhaya hai.

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