दुर्गा पूजा - कुछ पुरानी यादें, कुछ नयी


दुर्गा पूजा के समय मौसम को कुछ तो जरूर हो जाता है. एक अलग तरह का नास्टैल्जीआ महसूस होने लगता है. सप्तमी पूजा के आते ही बचपन के वो दिन याद आ जाते  हैं जब हम पटना के दुर्गा पूजा मेले में घुमने निकलते थे. पटना में दुर्गा पूजा का एक अलग ही रंग होता है. बहुत अरसे से पटना के दुर्गा पूजा मेले में घुमने का मौका नहीं मिल पाया है. पटना में दुर्गा पूजा का मेला सप्तमी से शुरू हो जाता है. "या देवी सर्वभूतेषु रक्षा रुपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:" के मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच  दुर्गा माँ का पट खुलता है और पूजा पंडालों में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है. दुर्गा पूजा एक ऐसा समय है जब अपने शहर की खूब याद आती है. पिछले कई सालों से पटना के दुर्गा पूजा के दर्शन नहीं हो पाए हैं. इसके दो मुख्य वजह हैं.. पहली तो ये कि दुर्गा पूजा और दिवाली दोनों त्यौहार आसपास ही होते हैं तो ऐसे में दोनों त्यौहार में घर जा पाना मुमकिन नहीं हो पाता और अगर आप किसी तरह अपने शिड्यूल में दोनों त्यौहार में पटना जाना अजस्ट कर पाए तब टिकट नहीं मिल पाती. मैं बस कॉलेज के दिनों में ही दुर्गा पूजा के अवसर पर मैं पटना में था, उसके बाद दुर्गा पूजा के समय पटना कभी नहीं गया. कॉलेज में भी दुर्गा पूजा में पटना चले जाने की मुख्य वजह होती थी दोस्तों का साथ. उन दिनों कॉलेज के मेरे सभी दोस्त दुर्गा पूजा के अवसर पर ही घर जाते थे, हमें दिवाली की छुट्टी नहीं मिल पाती थी लेकिन दुर्गा पूजा में चार पाँच दिनों की छुट्टी आसानी से मिल जाया करती थी.

कॉलेज में तो हर साल दुर्गा पूजा के मौके पर पटना गया मैं, फिर जब बैंगलोर आया तब पहला साल था जब मैं दुर्गा पूजा के मौके पर पटना में नहीं था. बड़ा ख़राब लग रहा था मुझे. दुर्गानवमी के शाम किसी काम में दिल नहीं लग रहा था, अपने कमरे में बैठा मैं लैपटॉप पर पटना के दुर्गा पूजा की तस्वीरें देख रहा था कि तभी किसी दोस्त से पता चला कि बैंगलोर के आर.टी.नगर स्थित बिहार भवन में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है. बस फिर क्या था.. उसी वक़्त निकल पड़े हम सब बिहार भवन की तरफ.. वहाँ जाकर जो माहौल देखा वो तो कुछ और ही था. चारो ओर दुर्गा पूजा की धूम थी. बड़े पंडाल लगे थे, सड़कें रंग बिरंगी लाइट से जगमगा रही थी..कुछ पल के लिए तो लगा ही नहीं कि हम बैंगलोर में है, लगा जैसे पटना के ही किसी इलाके में हम घूम रहे हैं. बहुत देर तक बिहार भवन में ही हम बैठे रहे. वहाँ से निकलने का दिल ही नहीं कर रहा था. बिहार भवन में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं, वैसे तो ये कार्यक्रम छोटे स्तर पे ही किये जाते हैं लेकिन फिर भी मुझे इस कार्यक्रम में बड़ा आनंद आता था...जब तक बैंगलोर में रहा मैं हर साल ये कार्यक्रम देखने जाता था.


साल 2007 की तस्वीर, बिहार भवन दुर्गा पूजा समिति 
बैंगलोर में रहते रहते ये भी पता लगा कि दुर्गा पूजा का आयोजन कुछ और जगहों पर भी होता है..उल्सूर लेक और पैलेस ग्राउंड में बड़े स्तर पे दुर्गा पूजा का आयोजन होता है.. पैलेस ग्राउंड जाकर तो लगता है ऐसा कि जैसे बंगाल के किसी दुर्गा पूजा के पंडाल में आप पहुँच गए हैं. खूब अच्छी व्यवस्था होती है वहाँ और वहाँ वक़्त बिताना मुझे बड़ा अच्छा लगता था लेकिन दुर्गा पूजा का ये माहौल और नशा बस उस ग्राउंड तक ही सीमित होता था जहाँ दुर्गा पूजा का आयोजन हो रहा होता है, वहाँ से बहार निकलने पर बड़ी अजीब सी बोरियत और उदासी वाली फीलिंग आती थी.

दिल्ली आने पर मुझे उम्मीद थी कि यहाँ दुर्गा पूजा के मौके पर खूब अच्छी व्यवस्था देखने को मिलेगी, लेकिन इस शहर ने भी थोड़ा निराश किया था मुझे. यहाँ भी दुर्गा पूजा का आयोजन उस स्तर पर नहीं होता जैसा हमारे तरफ किया जाता है. लेकिन अगर मैं बैंगलोर से तुलना करूँ, तो वहाँ के मुकाबले दिल्ली के दुर्गा पूजा का आयोजन बहुत बड़े स्तर पर होता है. चित्तरंजन पार्क कॉलोनी जिसे मिनी बंगाल भी कहा जाता है, वो पूरा इलाका दुर्गा पूजा के रंग में रंगा मिलता है. खूब सुन्दर माहौल होता है वहाँ का, वहाँ से लौटने का तो देर तक मन नहीं करता. जहाँ एक तरफ माँ दुर्गा की मनमोहक मूरत के दर्शन करने का अवसर मिलता है वहीँ मेले का आनंद भी आता है. चाट समोसे और पकौड़ियों के ठेले जगह जगह सी.आर पार्क में लगे दिख जाते हैं. बच्चे से लेकर बड़ों तक सभी इस मेले का खूब आनंद लेते हैं. इस इलाके में कुछ पंडाल जैसे मेला ग्राउंड और काली मंदिर ऐसे हैं जहाँ आधे किलोमीटर तक लम्बी लाइन लगती है दुर्गा माँ के दर्शन के लिए.

चित्तरंजन पार्क की सड़कें ऐसे ही मेले में सजी रहती हैं...
चित्तरंजन पार्क में घूमना मतलब सीधे पटना या बंगाल पहुँच जाना होता है. कुल पाँच या छः जगह इस इलाके में दुर्गा पूजा का आयोजन होता है और एक के बाद एक सभी पंडाल के दर्शन करने आपको पैदल ही चलना पड़ता है. पटना के जैसे ही यहाँ भी बहुत सी सड़कों पर गाड़ियों के आने जाने पर रोक लगा दी जाती है. ये अच्छा भी है, मेला का असली मज़ा गाड़ी में नहीं बल्कि पैदल घुमने में आता है. दिल्ली में मैं हर साल दुर्गानवमी के अवसर पर चित्तरंजन पार्क जाता हूँ. इस साल दुर्गा पूजा में मेरी बहन और मेरा भांजा दोनों मेरे साथ थे.

तय तो ये था कि हम चित्तरंजन पार्क आज यानी दुर्गानवमी के दिन घूमेंगे लेकिन आज मेरी बहन को एक हफ्ते के लिए दिल्ली से बहार जाना है तो हमनें कल ही यानी दुर्गाअष्टमी के दिन चित्तरंजन पार्क घूम लिया. ये पहली बार था कि दिल्ली में मैं परिवार के साथ मेले में घूम रहा था और उसमें भी अपने भांजे के साथ. सी आर पार्क के मेला ग्राउंड में जाते ही मेरा भांजा मेरी गोद से उतर कर इधर उधर जहाँ भी दुकानें लगी थी वहाँ भागने लगा. भांजे को वैसे भी जिस भी दूकान में कोल्ड ड्रिंक, चिप्स या चॉकलेट्स दिख जाते हैं वहाँ ये लड़का टिक जाता है. बड़े से 'मखाना मैन' को देखकर ये बड़ा खुश हुआ और उससे हाथ भी मिलाया.


पहले मैं मेले में अक्सर बच्चों के खिलौने की दुकानों के सामने से गुज़र जाता था लेकिन इस बार खड़े रहकर खिलौने देखने पड़े. मेला ग्राउंड के गेट के पास खिलौने वाले भैया जो बच्चों के खिलौने बेचते हैं वहाँ से भांजे के लिए एक सीटी और एक बाँसुरी खरीदा तो अपने बचपन के दिन एकदम से याद आ गए.

पूरे मेले के दौरान मेरा भांजा अपने मामा यानी मेरे गोद में ही रहा. ऐश थी बाबु की. चलने की जरूरत नहीं हुई और पूरा मेला घूम लिया बच्चे ने. इसे गोद में लेकर घूमते हुए एक बड़ा बचकाना वाला ख्याल भी मन में आया, कि काश ऐसी कोई व्यवस्था हमारे लिए भी होती, बिना थके पूरा मेला घूम लेते हम. भांजे को गोद में लेकर घुमने में थकान तो हुई लेकिन मेला का आनंद इतना था कि थकान वैसी महसूस नहीं हो रही थी.

मामा-भांजा 
नव्पाली दुर्गा पूजा 
मेला ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति 
सी.आर पार्क में इस साल वैसी रौनक नहीं थी जैसी पहले देखने को मिलती थी. मेला ग्राउंड में भी सब थोड़ा फीका सा ही लगा. नव्पल्ली दुर्गा पूजा समिति, जो सी.आर पार्क के पॉकेट चालीस में है, और जहाँ मैं हर साल जरूर जाता हूँ वहाँ की रौनक अच्छी थी. पॉकेट चालीस के पार्क के सामने वाली सड़क पर रंगोली बनाई गयी थी जो बड़ी अच्छी दिख रही थी. एक शिकायत बस सी.आर पार्क के कोआपरेटिव ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति से रही कि कल शाम में इन्होने अपना गेट बंद कर दिया था ये कह कर कि अन्दर सफाई चल रही है. दो तीन सौ मीटर तक लोगों की लम्बी लाइन गेट के बाहर लग गई थी, और उस वक्त शाम के छः बज रहे थे. सफाई ही करवानी थी तो दोपहर में सफाई करवा देते, शाम में पंडाल बंद रखने का कोई मतलब नहीं. कोआपरेटिव ग्राउंड की दुर्गा पूजा काफी मशहूर है, लेकिन यहाँ कल दर्शन नहीं हो पाए.

वापस लौटने में थोड़ी दिक्कत जरूर हुई क्योंकि टैक्सी आसानी से नहीं मिल पा रही थी, लेकिन मेले में घुमने से दुर्गा पूजा का असली आनंद आ गया. आप भी अगर दिल्ली में हैं तो आज शाम हो आइये चित्तरंजन पार्क और मेले का लुत्फ़ उठाइये.

चलते चलते, 
हमारे प्यारे भांजे के प्ले स्कूल में एक दशहरा का एक उत्सव हुआ था, वहाँ हमारे भांजे राजा के रूप में गए थे. ये देखिये तस्वीरें - 


4 comments

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सुन्दर संस्मरण!
ये वर्णन पढ़कर पूजा के उमंग को जीने सा आभास साकार हुआ! :)

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आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हास्य अभिनेता महमूद अली और विश्व हृदय दिवस - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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दुर्गा पूजा की हमारी भी बचपन की अच्छी यादे है , लेकिन मुंबई में मेरी बिल्डिंग के ठीक निचे पंडाल सजता है वो भी ११ दिनों के लिए उसके बाद का सुबह और दिन रात का वो लाउडस्पीकर का शोर अब उसे बुरा अनुभव बना रहा है |

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

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