अंजुरी भर

Saturday, May 28, 2016
भीतर कहीं कुछ ‘झन्न’ से टूट गया...शायद दिल...। जैसे कोई शीशा हो...। हाथ से कोई सिरा छूट कर यथार्थ की ज़मीन से टकराया और अब उसकी नन्हीं-नन्...
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