हँसिए कि आप भैया भाभी के घर में हैं

बड़ा नोस्टैल्जिक कर देने वाला मौसम है ये. पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही होता है या दूसरे लोगों के साथ भी कि गर्मियों की शाम मुझे बड़ी नोस्टैल्जिक लगती है. आज भी शाम कई बातें याद आ रही हैं, पटना की, मेरे गाँव की और कल्याण के दिनों की बातें. लेकिन जिस याद का हैंगओवर अभी ताज़ा है, अब तक चढ़ा है जिसका नशा वो है, वो दिन, वो खूबसूरत दिन जब हम सब मिले थे अमित भैया और निवेदिता भाभी के घर पर. जहाँ उस दिन के मुलाकात का हैंगओवर अब भी है वहीँ मुझे इस बात की हैरानी भी है कि जितने लोग मिले थे सभी पाँच ब्लॉगर थे. सभी के अपने ब्लॉग हैं, लेकिन फिर भी अब तक कोई रिपोर्टिंग नहीं आई. चलिए मान लिया मैं और अमित भैया छोटे ब्लॉगर ठहरे, लेकिन हमारे बीच थी तीन सेलेब्रिटी ब्लॉगर - शिखा दी(शिखा वार्ष्णेय), प्रियंका दी(प्रियंका गुप्ता) और निवेदिता भाभी(निवेदिता श्रीवास्तव), और इनमें से भी दो प्रियंका दी और शिखा दी, ‘अवार्ड विनिंग लेखिका’ ठहरी. लेकिन फिर भी कहीं किसी के भी ब्लॉग पर उस दिन की मुलाकात की एक भी पोस्ट नहीं आई? हैरानी की बात नहीं है ये? घोर हैरानी की बात है ये. खैर, अब किसी ने नहीं लिखा तो ना सही. सबसे छोटा मैं हूँ सब में, तो सारे लोगों के इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत की भरपाई मैं ही करता हूँ.

लेकिन लिखूं क्या?? कहाँ से शुरुआत करूँ उस मुलाकात की ये सोच रहा हूँ...

चलिए, सबसे पहले शुरुआत करता हूँ हमारे वीआईपी रिसेप्शन की. लखनऊ पहुँचते ही हमें एकदम वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया. हम सब के लिए अलग अलग आलिशान एम्बेसडर गाड़ियाँ खड़ी थी. मैं तो एम्बेसडर गाड़ियाँ देखते ही खुश हो गया था, हालाँकि ये बताने का मौका ही नहीं मिला अमित भैया को कि मुझे एम्बेसडर गाड़ियाँ कितनी पसंद है. इतना कि पिछले साल जब एम्बेसडर गाड़ियों के प्रोडक्शन बंद करने की खबर आई थी तो मैं दुःखी हो गया था. एनीवे, वो दूसरा किस्सा है. तो हमारा रिसेप्शन ही ऐसा था कि एकदम ये फील आ रहा था जैसे हम किसी सेलेब्रिटी के घर जा रहे हों. वो कहते हैं न लिफाफा देखकर खत का मजमून भाँप लेने वाली बात. ठीक वैसे ही अपने इस शाही वेलकम से ही हम समझ गए थे कि ये दिन भी ऐसा ही एकदम शाही अंदाज़ में बीतने वाला है...एकदम रॉयल.

घर पहुँचते ही भाभी ने हमारा स्वागत किया, हम बैठ गए खूबसूरत से ड्राइंग रूम में. हमें ड्राइंग रूम में बिठा कर भाभी गायब हो गयीं, और जब सामने आई तो हाथ में भाभी के था एक विशालकाय ट्रे. जिसपर खाने के जाने कितने किस्म की  चीज़े रखी थीं. मैंने मन में सोचा, पहले हमारा रॉयल वेलकम, और अब ये...रॉयल नाश्ता. हम्म...मज़ा आ गया.

रॉयल नाश्ता 
सच कहूँ तो नाश्ते की ट्रे को देखकर मैं कुछ और समझ लेता अगर भाभी ने मेरे मन का ये कन्फ्यूजन दूर न किया होता कि ये लंच नहीं बल्कि नाश्ता है. नाश्ता कर लो फिर हम लंच करेंगे, भाभी ने कहा. लेकिन मेरे मन में फिर से एक सवाल उठ रहा था, अगर इतना अभी ही खा लेंगे तो खाना क्या खायेंगे? हालांकि इस सवाल को मैंने अपने मन में ही रहने दिया वरना भाभी और दोनों दीदियाँ मिलकर मुझे ही गुस्से से खा जातीं. शायद. शायद नहीं, पक्का. 

उस समय तक मुझे कुछ भी अंदाज़ा नहीं था कि हम सब के साथ क्या होने वाला है. मुझे लगता है भाभी ने कुछ मिला दिया था इस नाश्ते में या फिर कॉफ़ी में, क्यूंकि उस समय से ही जो हँसी का दौरा सब को पड़ा, जब तक उनके घर में रहे, वो दौरा बरक़रार रहा था. जो खास सेलिब्रिटी थीं उस दिन की, हमारी शिखा दीदी. जिन्हें पुरस्कार मिलने वाला था लखनऊ में, शुरुआत भी नाश्ते का उन्होंने ही किया. लेकिन मुझे लगता है कि उस दिन उस नाश्ते के समय मेरे साथ कुछ नाइंसाफी की गयी थी. शायद मेरे मन में जो सवाल था(कि इतना नाश्ता  करने के बाद खाने का दिल किसका  करेगा) उसे सब ने भाँप लिया हो और बदला ले लिया सबनें मेरे से.. सबके प्लेट में जितना नाश्ता था, उससे दुगुना मेरे प्लेट में रखा गया था, और तो और, धमकी देकर मुझे दोबारा भी नाश्ता लेने पर मजबूर किया गया. और मेरी मजबूरी ये थी कि मैं इन सब बातों का विरोध भी नहीं कर सकता था. भाभी और दीदियों की बातों का विरोध करने का मतलब समझते हैं न आप? हाँ, बस इसलिए. 

नाश्ते के साथ साथ बातों का सिलसिला भी चला. अमित भैया और भाभी ने अपना खूबसूरत घर दिखाया हमें. मैंने तो उस समय साफ़ कह दिया, इतना सुन्दर घर है आपका, मेरा बस चले तो मैं यहीं परमानेंटली अपना डेरा डाल दूं. भैया भाभी तो उस समय बड़े उत्साह से बोले, हाँ कोई बात नहीं..आ जाओ. भाभी, भैया, सोच लीजिये.. इस बात पर मैं बेहद गंभीरता से सोच रहा हूँ. भैया ने उस वक़्त हमारी तस्वीर खींची, और जाने क्या सोचकर फेसबुक पर इस कैप्शन के साथ फोटो अपलोड की..."शिष्ट मंडल पहुंचा मेरे घर". भैया, अपने इस ब्लॉग के लिए आपका ही वो कैप्शन मैं उधार ले रहा हूँ.

शिष्ट मंडल पहुंचा भैया-भाभी के घर : शिखा दीदी, निवेदिता भाभी,
प्रियंका दीदी और मैं. 
हम सब फिर ड्राइंग रूम में आकर बैठ गए. बातें बहुत सी चली, 'शिखा द सेलिब्रिटी राईटर' की बात, 'प्रियंका द सेलिब्रिटी राईटर' की बात और 'निवेदिता द पोएटेस' की बात. हमनें अपनी मांग भी भाभी भैया के सामने रखी कि भाभी की किताब आनी चाहिए. उम्मीद है भैया, भाभी हमारी  उस माँग को गंभीरता से ले रहे होंगे.

बातों के ही बीच जाने कब कहाँ से किस बात से शुरुआत हुई ये याद नहीं...लेकिन सब लोगों के टारगेट पर अचानक एक ही शख्स आ गया था. बताने की जरूरत नहीं कि वो कौन था. सब मेरे पर ऐसे टूट पड़ी जैसे सब इस मौके की ही तलाश में रही हों. मुझे तो ये पक्का यकीन है कि ये सोची समझी साजिश थी मेरे खिलाफ, पहले से शायद इन लोगों ने आपस में प्लान बना लिया होगा मुझे टारगेट पर लेने का. हाँ बीच बीच में टारगेट शिफ्ट होते भी गया, कभी अमित भैया, तो कभी निवेदिता भाभी तो कभी प्रियंका दीदी तो कभी हमारी सेलब्रिटी शिखा दीदी. लेकिन फिर भी जिस इन्सान को मुख्य रूप से टारगेट किया गया था वो मैं ही था. अब मेरी हालत कैसी थी वहाँ ये बताने के लिए आपको एक उदाहरण देता हूँ, इससे आपको एक परफेक्ट तस्वीर मिल सकती है. 

ज़रा सोचिये कैसा हो अगर बैटिंग क्रीज पर वेंकटेश प्रसाद बैटिंग कर रहा हो और दूसरे छोर  से डोनाल्ड, मैकग्रथ और वाल्श जैसे बॉलर गेंद फेंक रहे हों. बेचारे वेंकटेश प्रसाद को ये समझ थोड़े आएगा कि गेंद कान के पास से निकल रही है या सर के ऊपर से. बाउंसर फेंका जा रहा है या सीधे योर्कर. उसपर से भी ये नियम कि तुम चाहे कितनी बार भी आउट हो जाओ, तुमको वहीँ क्रीज पर ही खड़े रहना है, पवेलियन वापस जाने का कोई स्कोप ही नहीं.

ठीक वैसी ही हालत मेरी थी. भाभी दीदियों के डेडली बाउंसर एक के बाद एक आ रहे थे, और मैं एकदम क्लूलेस था कि इन बाउंसर को कैसे खेलना है? लगातार मैं क्लीन बोल्ड हुए जा रहा था. हाँ, क्रीज के दूसरे तरफ अमित भैया मौजूद तो थे, लेकिन वो भी कोई सचिन तेंदुलकर थोड़े थे, कि इन सब बाउंसर को खेलने का तरीका बताते वो, वो भी इन सब बाउंसर पर उतने ही क्लूलेस थे और उतने ही बार क्लीन बोल्ड हुए जा रहे थे जितनी बार मैं. 

ऋचा 
भाभी और दीदियों के बाउंसर से कुछ पल की राहत मुझे तब मिली जब ऋचा आयीं. हाँ, ऋचा को भी मैंने वहाँ बुला लिया था. अब लखनऊ एक दिन के लिए ही गया था, तो सोचा ऋचा को भी वहीँ बुला लूँ, ऋचा को भी उन सब सेलेब्रिटी से मिलने का मौका मिल जाएगा जिनके बारे में वो अब तक सिर्फ पढ़ते आयीं थीं. ऋचा के आते ही माहौल थोड़ा सम्हला, बस लेकिन कुछ ही पल के लिए. दोनों दीदी और भाभी किचन में अन्दर गयी, खानें का इंतजाम करने और ड्राइंग रूम में मैं और ऋचा अपनी पुरानी आदत से बाज नहीं आये. उस दो मिनट की फुर्सत में भी हम जाने कहाँ से गुलज़ार साहब पर चर्चा करने लगे. ऋचा, इट्स क्रेजी यू नो, जब भी मिले हैं हम हमारी बातों का एक मुख्य केंद्र वही रहे हैं. याद है न आपको.

खैर, हम बात ही कर रहे थे कि उधर से अमित भैया पिच किचन रिपोर्ट लेकर आये. रिपोर्ट थोड़ा हैरान करने वाली और डराने वाली थी. भैया ने आकर जानकारी दी कि एक रोटी बनाने के लिए तीनों लगी हैं. पहले तो सोचने पर मैं मजबूर हो गया कि ये कैसी रोटी बन रही है कि एक रोटी के लिए तीन लोगों की जरूरत पड़ी? मुझे ये बात सुनकर उस फिल्म की याद आ गयी जिसकी कहानी सात लेखकों ने मिलकर लिखी थी और पूरे फिल्म में ये पता भी नहीं चला कि फिल्म में कोई कहानी भी थी. लेकिन यहाँ बात दूसरी थी, भले तीन लड़कियों ने मिलकर रोटी बनाई हो, लेकिन रोटी बहुत अच्छी बनी थी. प्रियंका दीदी, शिखा दीदी, और भाभी..अगर आपको तकलीफ न हो तो कृपया कर के बताएं यहाँ कि तीन लोग मिलकर एक रोटी कैसे बनाते हैं?

किचन रिपोर्ट के साथ ही भैया ने ये तस्वीर भी निकाल ली. किचन की ये तस्वीर भ्रमित करने वाली हो सकती हैं, कि ये किस तरह के खाने की तैयारियां हो रही हैं, लेकिन विश्वास रखिये खाना लाजवाब बना था. और उसका क्रेडिट ना तो ये सब्जी को पकड़ के पोज देते हुए प्रियंका दी को जाता है, और ना ही सब्जी काटने का पोज देते हुआ शिखा दी को. ये पूरा क्रेडिट हमारी भाभी को जाता है. 

खाना नहीं बन रहा बल्कि पोज है ये 
खाने की मेज पर भी भाभी की भाभीगिरी चलती रही. हमें डांट डांट कर खाना खिला रही थी वो. मैं तो क्या ऋचा भी इस भाभीगिरी से बच नहीं सकी. वो बेचारी एक दो बार कहने की कोशिश की कि मैं लंच कर के आई हूँ, लेकिन भाभी के आगे किसी की चलती है क्या जो ऋचा की चलती? ऋचा का ऑफिस भैया भाभी के घर के ही मोहल्ले में है. तो मैंने ऋचा को दोनों के तरफ से परमानेंट इनवीटेशन दे दिया है, कि यदि आपको ऑफिस में बोरियत लगे, लंच टाइम हो और कुछ अच्छा खाने का दिल करे, कॉफ़ी चाय पीना हो तो बेतकल्लुफ आप इस घर में आकर इसे अपना घर समझ सकती हैं और भाभी से मनचाही  फरमाइश कर सकती हैं. ऋचा आप इस इनवीटेसन को सिरिअसली लीजिये.

भाभी में या उनके घर में या उनके घर में आये हुए लोगों में सच में कोई जादू था शायद, ऋचा थोड़े देर में ही माहौल में पूरी तरह घुल मिल गयी थीं. ऋचा को शाम में किसी हास्य-कवि सम्मलेन में जाना था, लेकिन ऋचा के मुताबिक वो इस घर में ही इतना हँस चुकी थी कि अब हास्यकवि-सम्मलेन में जाने की जरूरत ही नहीं थी. सिर्फ ऋचा ही नहीं, हम सब शायद अपने एक साल के हँसने का कोटा उस एक दिन में पूरा कर लिए थे. 

ऋचा के जाने के बाद थोड़ी सुस्ती सब में आ गयी थी. हँसते हुए भी तो लोग थकते हैं न. सबके जबड़े दुखने लगे थे. लेकिन फिर भी किसी कि हँसी रुक नहीं रही थी. मेरे पर या अमित भैया पर भी किसी तरह का रहम नहीं किया जा रहा था. वैसे मुझे खुद पर किसी रहम की उम्मीद थी भी नहीं. रहम और वो भी भाभियों और दीदियों से? आप ही बताइये...क्या संभव है ये?

किस बात पर कौन क्यों और किस लिए हँस रहा था ये पता ही नहीं चल पा रहा था. तीनो लड़कियों पर हँसी का दौरा चढ़ा हुआ था. कम से कम इस तस्वीर से तो ऐसा ही कुछ मालूम चल रहा है. बात इधर निकली नहीं उससे पहले इनकी हँसी निकल जा रही थी..


और हम दो लोग जो एक कोने में बैठे थे, और जो उन तीन लड़कियों के हँसी और मजाक का टारगेट थे, हम भी समय समय पर मुस्किया दे रहे थे. कुछ भी बोलना वहाँ खतरे से खाली नहीं था. इधर कोई भी बात मेरे मुहँ से निकली कि उधर उन तीनों देवियों की हँसी निकली, और हँसी भी ऐसी वैसी नहीं, वो ऊपर के तस्वीरों वाली हँसी. 



शिखा दी के मुताबिक़ इस घर में कुछ ऐसा चमत्कारिक गुण है जिससे हम सब को हँसी के दौरे पड़ते रहते हैं. शिखा दी, आपकी इस बात से मैं भी पूरी तरह सहमत हूँ. भैया भाभी के घर में हम पूरे साल का हँसी का कोटा उस चंद घंटों में ही पूरा कर चुके थे. मेरा बस चले, तो जैसे डॉक्टर किसी बीमारी को भगाने के लिए दवा प्रीस्क्राइब्ड करते हैं, वैसे ही उदासी को भगाने के लिए और हँसी और ख़ुशी पाने के लिए मैं भैया भाभी का ये घर प्रीस्क्राइब्ड कर दूं लोगों को, ऑफ़कोर्स, अगर भैया भाभी को कोई ऐतराज़ न हो तभी.  :) 

इसके बीच बीच जब जिसे वक़्त मिल रहा था, पल पल की खबर फेसबुक पर रिपोर्ट हो रही थी. इस काम में ये तीन लोग सबसे आगे रहे थे, सबूत है ये तस्वीर.


कुछ देर बाद जब हंसने से हालत संभली तो बाहर घूमने का प्लान बना. शिखा दी को खासकर के कुछ खरीददारी करनी थी, तो हम हजरतगंज चले आये. अमित भैया और शिखा दी हमारी अगवाई कर रहे थे कि किस दुकान में जाना है. और हम तीनों मैं, निवेदिता भाभी और प्रियंका दीदी बस उन दोनों के पीछे पीछे चल रहे थे. शिखा दी के शॉपिंग स्किल को देखते हुए भाभी ने एक कमाल का आईडिया दिया, कि हम सब को भी सीखना चाहिए कैसे शॉपिंग करते हैं. भाभी ने कहा, हम तीनों शिखा को आब्जर्व करेंगे, और आज कुछ सीखने की कोशिश करेंगे. इस तस्वीर को देखिये ज़रा, कैसे दोनों कितने गौर से शिखा दी को खरीदारी करते हुए देख रही हैं और कुछ सीखने की कोशिश कर रही हैं. इनकी हँसी पर मत जाइए. भाभी और प्रियंका दीदी दोनों बहुत सिरअसली शॉपिंग  करना सीख रही हैं इनसे. मुझे तो लगता है अगर कोई नोटबुक होता तो ये दोनों इम्पॉर्टन्ट पॉइंट भी नोट कर लेती.


शिखा दी जरूर थोड़े आश्चर्य में थी कि ये तीनो उन्हें देखकर ऐसे हँसते क्यों जा रही हैं, वो भी बिना बात. लेकिन हमने भी उस रहस्य से पर्दा नहीं उठाया और उनको वैसे ही कन्फ्यूज्ड रहने दिया. 

दरअसल हम तीनों उन दोनों(अमित भैया और शिखा दी) के शॉपिंग स्किल के कायल हो गए थे. हाँ, सिर्फ शिखा दी ही नहीं, अमित भैया को भी देख उनसे हम सीखने की कोशिश कर रहे थे. असल में दोनों ने शॉपिंग स्किल गज़ब के हैं. आप देखिये ज़रा इस तस्वीर में कैसे शिखा दी और अमित भैया, कंपनी की  सेल्सगर्ल को ही सामान की विशेषताएं समझा रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे ये दोनों ही मिलकर उसे बेल्ट बेचने की कोशिश कर रहे हों. इस बात पर हँसने की जरूरत नहीं है, बल्कि हमनें सच में कुछ सीखना चाहिए भैया, दीदी से.  



बहुत कुछ तो हम सीख भी लिए थे, शिखा दी को पता लगे बगैर. कुछ और बातें भी सीख लेते अगर प्रियंका दी और निवेदिता भाभी थोड़ा भी सिरिअस होती. जितना सीख नहीं रही उससे ज्यादा इन दोनों की हँसी छूट रही थी. भाभी और प्रियंका दीदी, ज़रा देखिये कितनी गंभीरता से शिखा दीदी सामान को जाँच परख रही हैं खरीदने से पहले. हमें सच में सीखना चाहिए, सिर्फ हँसना सही नहीं...



शॉपिंग कर के और शिखा दी के जानकारी के बिना उनसे ट्रेनिंग लेकर जब हम वापस आये तो शाम छत पर बिताने का मन हुआ. भैया भाभी का टेरेस काफी खूबसूरत है. वहीं हमारी महफ़िल जमी थी. महफ़िल क्या जमी थी, सब को कॉफ़ी पीना था, और टारगेट पर फिर से मुझे लाना  था. शिखा दी का एक लॉजिक अलग से है. हालांकि अनजाने में ये तीर एक बार सही निशाने पर लग चुका है. पिछले बार जब आयी थी वो तब देवांशु ने कॉफ़ी बना कर हमें पिलाई थी, और फिर कुछ ही महीनों बाद उसकी शादी पक्की होने की खबर आई. बस तब से शिखा दी का ये लॉजिक लग गया, कि जिसनें ट्रे उठायी, उसकी हो गयी शादी. यही लॉजिक मेरे पर लगाया गया. और इस बार ट्रे मैं उठा  लाया था, तो शिखा दी के लॉजिक के मुताबिक़ मैं भी नहीं बचने वाला ज्यादा दिन.


शिखा दीदी को मैंने एक कमाल का सुझाव दिया, कि आप एक कन्सल्टन्सी खोल लीजिये, और जिन लड़कों की शादी नहीं हो रही, उन्हें कॉफ़ी बनाकर पिलाने कहिये. आपका ये काम जबरदस्त चलेगा. इंडिया आने पर आप इतने डिमांड में रहेंगी, कि आपका शेड्यूल ओवरबुक्ड होगा. शिखा दी, इस सुझाव पर गंभीरता से सोचियेगा. इस काम में मैं आपका मैनेजर बनने के लिए तैयार हूँ.

हाँ, इन सब के बीच हम एक गाँव में भी गए. गाँव बोले तो शहर के एक गाँव में. जहाँ हमनें सबनें फिर से और शिखा दी ने पहली बार लिट्टी चोखा खाया. उस रेस्टुरेंट का नाम तो याद नहीं, लेकिन बहुत ही खूबसूरत रेस्टुरेंट था वो. पूरा गाँव के परिवेश में. शहर के इस गाँव में जाकर दोनों दीदी भी बेकाबू हो गयी, और हुक्के पर टूट पड़ी. देखिये ज़रा,


वहाँ के स्टाफ की मेहरबानी से हम सब के साथ की तस्वीर भी निकल आई थी, इस शाही टेबल पर सभी शाही लोगों बीच बैठा मैं.



दिन की आखिरी महफ़िल फिर उसी ड्राइंग रूम में लगी जहाँ हम बैठे थे दोपहर को, और हम सब को प्रियंका दी ने दो खूबसूरत गाने अपनी आवाज़ में सुनाये - “लग जा गले कि फिर ये हंसी शाम हो न हो.” और “तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई”. निवेदिता भाभी को प्रियंका दी का गाना इतना पसंद आया, कि उन्होंने कह दिया, “बच्चों के शादी का सिंगर फिक्स हो गया अब तो..”. आप भी इस पोस्ट के आखिर में चंद सेकंड का वो विडियो देखिये, पूरा विडियो अपलोड करने की हिम्मत नहीं है मेरी, तो फ़िलहाल इसी विडियो से काम चलाइये. और अगर आपको भी लगता है कि एक टैलेंटेड सिंगर की आपकी तलाश यहाँ खत्म हो गयी है तो तुरंत प्रियंका दी से संपर्क किया जाए.




कुल मिलाकर एक बेहद यादगार दिन था वो. बहुत बहुत समय तक जिसका हैंगओवर बना रहेगा. निवेदिता भाभी और अमित भैया का घर सच में बेहद ख़ास है, हँसी और ख़ुशी का खजाना है इनके घर में.  हम वापस तो वहाँ से आयें लेकिन साथ ही बेशुमार प्यार अपनापन और कई खूबसूरत पल साथ लेकर आये हैं. ये करीब एक महीने पहले की बात है, लेकिन आज भी उस दिन की हर एक बात मन में बिलकुल ताज़ा है. ये हैंगओवर अभी आने वाले कई दिनों तक कायम रहेगा. शायद तब तक जब फिर हम अगली बार इसी जगह नहीं मिलते. भैया, भाभी, प्रियंका दीदी, शिखा दीदी, एक बेहद खूबसूरत दिन के लिए आप सब का शुक्रिया.

अब चलिए, कम से कम कुछ शर्म कीजिये छोटा भाई ब्लॉग लिख दिया, अब तो कुछ लिखिए. :)

21 comments:

  1. पागल समझे हो का हमें जो इतनी मजेदार...लाजवाब पोस्ट पढने के बाद हम कुछ लिखने की हिम्मत कर के लिखाडी के रूप में अपनी बची-खुची इज्ज़त का भजिया-पाव करेंगे...???
    आज तो इसको पढ़ते-पढ़ते फिर से वैसी ही हँसी का दौरा पड़ गया...गज्ज़ब...| बेचारी ऋचा...:P
    भाभी तो लाजवाब कुक हैं...और एक बेहतरीन मेजबान भी...| उनका प्यार सब पर भारी...<3
    और शिखाजी को तो हम माफ़ न करेंगे...लास्ट में ताली बजा दी, पर ई विडियो में हमरे गाने के बीच में फेसबुक देख रही थी...अगली बार मिलने दो...लगातार दस-बीस गाने सुना के पगला न दिए तो तुम्हारा (अपना काहे बदले जी...:P ) नाम बदल देंगे रे अभिषेक बाबू...:D
    और रही रोटी की बात...तुमको अच्छी लगी न...??? तो बस्स...तुम रोटी से मतलब रक्खो न रे...उसका बेलन-चकले से तुमको का लेने -देना...??? ज़्यादा सवाल-जवाब करोगे न कि कईसे बनी तो अगली बार तुमसे ही बनवा देंगे...:P
    अब सब यहीं गरिया दे का तुमको...???
    anyways...ऑन अ सीरियस नोट...लव यू भैय्यू...:*

    ReplyDelete
    Replies
    1. गाना कानों से सुनते हैं प्रियंका, आँखों या उंगलियों से नहीं :p .

      Delete
    2. प्रियंका दिदु,
      ठीक है जी..ठीक है..सवाल जवाब नहीं करेंगे...खुश? :)
      तुम लोग से सवाल जवाब करना....पागल समझी हो क्या?

      Delete
    3. शिखा जी...लाख सफाई दे डालिए, आपको तो हम अपने दस-बीस गाने सुना कर ही दम लेंगे...:P
      वैसे भी उस दिन देख आई न सबके साथ...दम लगा के हईशा...तो अब झेलिएगा...:d :P

      Delete
  2. अभिषेक सब तुम्हारे कारण , देखो शिखा जी को तो आना ही था पर तुम भी आये और अपने संग प्रियंका जी और ऋचा जी को भी मिला दिया हम लोगों से । सच बहुत अच्छा समय रहा तुम सब के संग और हाँ प्रियंका दीदी तुम्हारी गाना सचमुच अच्छा गाती हैं ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. अब बस भैया, फिर से दोबारा ऐसा ही समय बिताने का मौका जल्दी आये, यही दुआ है ! :)

      Delete
    2. अमित भैया...छोटी बहन के नाम के साथ `आप' या `जी' अच्छा नहीं लगता...:)

      Delete
    3. अमित भैया...छोटी बहन के नाम के साथ `आप' या `जी' अच्छा नहीं लगता...:)

      Delete
  3. मोबाइल से इत्ता लंबा कमेंट किया था.....न जाने कहाँ गया :-(
    खैर बात का सार इतना है कि अभि तुमसे और शिखा से मिल लिए ये तसल्ली रही हाँ दिल खोल ने न बात हुई ना हंस पाए.....
    प्रियंका से और अमित जी और निवेदिता से भी फोन पर ही बातें हुईं है....काश कि सबसे मिलना हो पाए कभी.....
    दुआ है कि वो घर सदा हँसी से भरा रहे.....
    प्रियंका की आवाज़ सच्ची बहुत प्यारी है....एक पूरा गाना sound cloud में डालने की ज़िम्मेदारी अब तुम्हारी....हमारी खातिर...प्लीईssssज......
    शिखा और तुम तो प्यारे हो ही....
    काश कभी कोई ऐसी पोस्ट बने जिसमें हमारा भी ज़िक्र हो :-)
    बिना जले कह रहे हैं...सच्ची.....
    ढेर सा प्यार सबको....

    अनु

    ReplyDelete
    Replies
    1. साउंडक्लाउड पर देखते हैं दीदी...वादा नहीं कर सकते...लेकिन I will try surely :)
      और आप आईये तो सही फिर से दिल्ली, मिलकर बैठेंगे और ऐसा ही टाइम बिताएंगे फिर पोस्ट लगायेंगे इधर :)

      Delete
    2. अनु जी...ये आप सबका प्यार ही है जो हम जैसे बेसुरे को भी झेलने की हिम्मत कर रही...:P
      और आप से भी यूँ ही मिल-बैठ कर खूब सारी मस्ती भरी यादें संजोने का दिल तो मेरा भी बहुत है...शायद ख्वाहिश जल्दी पूरी भी हो...:)

      Delete
  4. हम्म । एक बार फिर से हंसी के दौरे से गुजर कर आ रही हूँ। यह साबित करता है कि इनके घर में ही नहीं, इनसे जुड़ीं हर बात में (पोस्ट में) भी हंसी के पर्याप्त किटाणू है । तो बालक सुनो, एक यह भी कारण है कि हमने पोस्ट नहीं लिखी। अब मतलब हँसते या लिखते ?।
    दूसरी बात- FB पर लाइव टेलीकास्ट तभी चल रहा था तस्वीरों के साथ। तीसरी बात यह कि लिखने के लिए इतने सुन्दर शब्द कहाँ से लाते, जितना अच्छा समय हमने बिताया। चौथी बात - अगर हम लिख देते तो तुम लिखने में अलसा जाते और फिर हमें इतनी सुन्दर पोस्ट पढ़ने को नहीं मिलती।
    तो भाई जनहित में ही हममें से किसी ने नहीं लिखा :) :p
    बाकि बातें प्रियंका ने लिख ही दी हैं।
    मैंने तो बस यह पोस्ट सहेज ली है।हम सब की यह दोस्ती भी यूँ ही बनी रहे..आमीन।
    can't thank enough to Amit Nivedita so better not to say anything :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. अब फिर से आप ये सब कह रही हैं, ना लिखने के बहाने खोज रही हैं...ठीक है, बड़ी बहन हैं आप...मानना पड़ेगा ही आपकी बात..No other choice :)
      और हाँ,
      हामारी ये दोस्ती बनी रहे....आमीन!!
      We are a family! :)

      Delete
  5. बहुत सुन्दर पल साझा किये आपने ।कितना अच्छा लगता होगा ना यूँ सभी से मिलकर

    ReplyDelete
  6. Bahut behtereen...! Nashta toh ek number hai, gujiya bhi dikh rha hai... baki sab photos aur moments bhi bahut pyare cature kiye hai aapne

    ReplyDelete
  7. अभिषेक , समय को शब्दों से पकड़ना तो कोई आपसे सीखे . इतना लम्बा प्रसंग एक सांस में पढ़ डाला और पूरा आनंद लिया . सचमुच बहुत ही खूबसूरत पल जिए हैं आप सबने . हम तो पढ़ पढ़कर ही ललचाते रहे .

    ReplyDelete
  8. आहा..........एकदमै आनन्दिया गये हम तो.... खूब मस्त रिपोर्टिंग है अभिषेक. एक एक दृश्य उभर आया सामने.

    ReplyDelete
  9. बहुत बढ़िया जबरदस्त मस्त-मस्त मेल मुलाकात ....

    ReplyDelete
  10. क्यूंकि उस समय से ही जो हँसी का दौरा सब को पड़ा1 जहां अभी हो वहां ये दौरा पडना ही था 1ाउर जहां अभी हो तीन देवियां भी खाना बनाने के लिये कम हैं क्यों कि तुम्हें नाश्ता करते हुये तो देख ही लिया1 बहुत बदिया पोस्ट्1

    ReplyDelete
  11. यादगार लम्हों को शब्दों से सजाना आता है तुम्हे अभिषेक !!
    गोड

    ReplyDelete
  12. यादगार लम्हों को शब्दों से सजाना आता है तुम्हे अभिषेक !!
    गोड ब्लेस !!

    ReplyDelete

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

Powered by Blogger.