गली क़ासिम में आकर

Saturday, December 27, 2014
गली क़ासिम में आकर , तुम्हारी ड्योढ़ी पे रुक गया हूँ मिर्ज़ा नौशा तुम्हे आवाज़ दूँ , पहले , चली जाएँ ज़रा , परदे में उमराव , तो फिर अंदर कदम र...

कविताएँ ही नहीं, खूबसूरत रिश्ते भी रचती हो तुम...

Saturday, December 20, 2014
वैसे तो बहुत सी बातें हैं लेकिन एक बात ख़ास तौर पर है जो शिखा दीदी को और मुझे जोड़ती है. वो है ये दिसंबर का महीना. मेरे लिए तो दिसंबर ख़ास रहा...
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