बैंगलोर डायरी : ४


वैसे तो अभी दिल्ली सैंतालीस डिग्री तापमान में फ्राई हो रही है, और आने वाले दिनों में क्या पता पारा पचास के पार पहुँच जाए...लोग सुबह से लेकर रात तक यहाँ की गर्मी में रोस्ट हो रहे हैं, वहीँ दूसरी तरफ मेरे पुराने शहर बैंगलोर में हर दिन बारिश हो रही है और ए.सी तो छोडिये, लोग अपने पंखे भी बंद कर के सो रहे हैं..ऐसे में बैंगलोर को याद करना तो लाज़मी ही है...वहां के खुशगवार मौसम का और बारिश का मजा ना ले पाने का दुःख तो हर दिन होता है.दोस्तों ने मुझे छेड़ने में भी कोई कसर नहीं बाकी रखा...दो दिन से मुझे बैंगलोर के नाम पर ऐसे छेड़ रहे हैं जैसे कोई किसी की प्रेमिका का नाम लेकर उसे छेड़ता है.हाँ, पिछले दो तीन दिनों से मुझे भी बैंगलोर की बहुत याद आ रही है...लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं की मौसम की वजह से मैं बैंगलोर को याद कर रहा हूँ तो आप गलत हैं..सिर्फ मौसम ही अगर एकमात्र कारण होता तो मैं ये पोस्ट नहीं लिखता.आज की इस पोस्ट का बैंगलोर के मौसम से कोई सम्बन्ध नहीं है.

बेल रोड की चार तस्वीरें...अगल अलग सालों की..
परसों रात काफी देर तक मैं जागा रहा था.पता नहीं कौन कौन सी बातें दिमाग में चल रही थी.नींद जब बहुत देर तक नहीं आई तो मैंने एक पुराना डायरी खोला..वो डायरी जो मेरी बहन का था और जिसे मैंने उससे छीन कर अपने पास रख लिया था..लाल रंग के उस डायरी में बैंगलोर की अनगिनत यादें दर्ज हैं.उस समय की यादें जब दोस्तों का दिन रात खूब साथ होता था और हमारी मस्ती खूब होती थी..देर रात तक डायरी को पढ़ता रहा और बैंगलोर को छोड़ने के फैसले के बारे में सोचता रहा..सोचने लगा की उस शहर को छोड़ते ही मेरा कितना कुछ पीछे छुट गया है..खुद से सवाल किया...क्या मैंने बैंगलोर छोड़कर कोई गलती की? जवाब आया "शायद नहीं". जब मैं बैंगलोर में था तब कभी नहीं सोचा था की मैं ये शहर छोड़कर किसी दुसरे शहर में जा सकूँगा..फिर एक दिन पता नहीं क्या हुआ मैंने एकदम से फैसला कर लिया की मैं दिल्ली में रहूँगा.वैसे ये कहना गलत होगा की दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला रेंडमली लिया गया था, बहुत समय से दिमाग में ये बात थी की दिल्ली पटना से नज़दीक है, वहां चल के रहा जा सकता है.मैं चाहता था की मैं घर से नज़दीक रहूँ ताकि घर आने जाने में सुविधा हो..और वैसा ही हुआ भी...बैंगलोर में रहते साल में दो बार ही घर जा पाता था और अभी जब से दिल्ली में हूँ, पिछले एक साल में मैं करीब पांच-छः बार घर जा चूका हूँ.दिल्ली में रहने की ये एक ऐसी सुविधा है जो बैंगलोर में उपलब्ध नहीं थी.इस लिहाज से देखता हूँ तो मेरा दिल्ली आने का फैसला सही लगता है.

बेल रोड की ये तस्वीर मेरी पसंदीदा है..बारिशों की..
खूबसूरती बढ़ जाती है बारिशों में बेल रोड की..
ऐसे देखूं तो अभी सिर्फ एक ही साल हुआ है मुझे दिल्ली आये हुए लेकिन फिर भी लगता है जैसे एक अरसा हो गया बैंगलोर से बिछड़े हुए.कभी कभी तो मन में भयंकर टीस उठती है और लगता है वापस भाग कर वहीँ चला जाऊं.कभी सोचता हूँ तो लगता है बैंगलोर से जो दिल्ली आया कितनी मेरी आदतें वहीँ छुटी रह गयीं.कितना कुछ तो भूल सा गया हूँ मैं..हर शाम घूमते टहलते मंदिर जाना तो इंजीनियरिंग के दिनों से ही एक नियम सा बन गया था जो तब तक कायम रहा जब तक मैं बैंगलोर में था.दिल्ली आया तो जिस इलाके(बदरपुर) में घर लिया वहां एक भी ऐसा मंदिर नहीं दीखता जो थोड़ा स्वच्छ और ठीक अवस्था में हो..इलाका भी ऐसा की शाम को बाज़ार भी निकलना होता है तो तुरंत घर वापस आने की जल्दी होती है..इतना भीड़ और पोल्युसन की आप चाह कर भी शाम सड़कों पर टहल कर नहीं बिता सकते हैं.वहीँ बैंगलोर में मेरी पूरी शाम ही बीतती थी बेल रोड(B.E.L Road) पर टहलते हुए.बैंगलोर के वन ऑफ़ द मोस्ट हैपनिंग प्लेसेस में से बेल रोड का इलाका आता है, वैसा सुन्दर इलाका तो दिल्ली में अब तक मुझे दिखा नहीं...और अगर है भी तो इतना महंगा होगा की वहां घर लेकर रहना बस की बात नहीं होगी.जब था बैंगलोर में तो एक आदत सी बन गयी थी..शाम को निकलता था घर से..राघवेन्द्र बेकरी पर चाय पी कर बेल रोड की तरफ टहलने निकलता था..रास्ते में ही बजरंग बली का एक छोटा लेकिन बेहद स्वच्छ मंदिर आता है, जहाँ मैं हर दिन जाता और वहां प्रणाम कर के ही मैं आगे बेल रोड की तरफ बढ़ता था.मैं तब तक बेल रोड घूमते रहता था जब तक पूरी तरह थक न जाऊं.जाने कैसे कैसे गलियों और नए रास्तों को मैंने युहीं खोज निकाला था जिसकी जानकारी बाद में मेरे वहां के मित्रों के बड़े काम आयी.

बेफिक्री के दिन...शाम की चाय @राघवेन्द्र बेकरी 
देर शाम जब घर लौटना होता था तो वहीँ बेल रोड पर ही स्थित अयंगर बेकरी पर मैं रुकता था और वहां से हमेशा कुछ न कुछ खरीद ही लेता था.जिस दिन उस दूकान से बिना कुछ खरीदे गुज़रता तो दूकान से राजू आवाज़ लगा कर पूछ लेता था "सर आज कुछ लेना नहीं है क्या?".मैं ना कहता और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाता.ऐसे राह चलते टोकने की आदत दो दुकानवालों को थी...एक अयंगार बेकरी के राजू को दुसरे राघवेन्द्र बेकरी के राघवेन्द्र को.राघवेन्द्र बेकरी हम सभी दोस्तों का अड्डा हुआ करता था..जहाँ हम चाय पीते थे, सुबह और शाम का नाश्ता करते थे.अक्सर जब बेकरी पर कोई ग्राहक होता नहीं था और राघवेन्द्र मुझे दूकान के आसपास से गुज़रते देख लेता तो एक आवाज़ जरूर लगा देता था.एक दिन का किस्सा बड़ा मजेदार रहा..मैं उसके दूकान के सामने से गुज़र रहा था की उसने आवाज़ लगाकर मुझे बुलाया.मुझे पहले तो लगा की शायद वो कुछ कहना चाहता है...शायद मेरे दोस्तों तक वो सन्देश पहुचना चाहता हो की उनका बकाया पैसा है, वो हमेशा इस तरह के सन्देश मेरे जरिये ही भेजवाता था..लेकिन उस दिन उसने मुझे ये सन्देश देने के लिए भी नहीं बुलाया था.मैं जब उसके बुलाने पर बेकरी में गया..तब उसने बड़े दोस्ताना अंदाज़ में कहा..."कहाँ चले जा रहे हो यार...आओ चाय वाय पीयो".मैंने भी हँसते हुए कहा..."भैया आप इस तरह अपना ग्राहक बनाते हो...रास्ते से बुला बुला कर चाय पिलाते हो".हम दोनों हँसने लगे.मेरा तो चाय पीने का इरादा नहीं था लेकिन अब जब उसने मुझे यूँ दूकान पर बुला लिया था तो मुझे भी एक कप चाय में कुछ बुराई नहीं दिखी.नहीं, इसका मतलब आप ये हरगिज़ न सोचे की उसने मुझे मुफ्त की चाय पिलाई. उस दिन चाय के चार रुपये मुझे ही देने पड़े थें.भले प्योर बिजनेस माईंड वाला इंसान हो राघवेन्द्र लेकिन बड़ा नेक इंसान है वो..सोचता हूँ की वहां के ज़्यादातर दुकानदार कितने साफ़ दिल के होते हैं और अच्छी बोली बोलते हैं..और एक यहाँ के दुकानदार हैं जिनमे अच्छी बोली बोलने वाले तो कम अधिकतर तो पता नहीं किस ऐटिटूड में डूबे रहते हैं..



मुझे जिस दिन बैंगलोर से दिल्ली आना था, उस समय कई लोगों के फोन आये थे मुझे...लेकिन तीन लोगों के फोन ऐसे थे जो मुझे अभी तक याद रह गए.मेरी दोस्त स्तुति और शिखा के फोन, दोनों में से किसी ने भी अन्य मित्रो की तरह बैंगलोर छोड़कर दिल्ली जाने की बात पर मुझे छेड़ा नहीं था बल्कि उनसे बात करने के बाद मुझे बहुत अच्छा लगा था.दोनों ने अमेरिका से कॉल किया था, इसलिए दोनों के कॉल का महत्त्व भी और था.तीसरा फोन आया था प्रवीण भैया का..उन्हें मैंने ईमेल से बताया था की मैं दिल्ली जा रहा हूँ.उन्होंने तब मुझे कॉल किया था और बड़े मजेदार अंदाज़ में उन्होंने कहा "जाने के पहले इस वीकेंड घर आओ, तुम्हे विदा करना है..तुम्हारा विदाई समारोह मनाएंगे हम".यूँ तो वीकेंड को कुछ दोस्तों ने और कई प्लान रखे थे लेकिन मैं टॉप प्रायोरिटी देते हुए प्रवीण भैया के घर चला गया था.

मैं, विवेक भैया, प्रवीण भैया 
उस दिन प्रवीण भैया के घर विवेक भैया सपरिवार आये हुए थे.काफी अच्छा और मजेदार दिन था वो..यूँ तो विवेक और प्रवीण भैया से मैं कई बार मिल चूका था लेकिन दोनों परिवार एक साथ पहली बार मिल रहे थे..दोनों ने मिलकर मुझे सलाह दिया था की मैं अपना भी परिवार शुरू कर लूँ ताकि अगली बार तीनो के परिवार साथ रहे(दोनों को बता दूँ की दोनों के इस सलाह पर सोच-विचार अभी जारी है).हमारी महफ़िल जो दोपहर को शुरू हुई थी, शाम तक चली.शाम को मैं दोनों से विदा लेकर घर की तरफ बढ़ा.अगले दिन शाम में मुझे दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़नी थी तो मैं घर जल्दी लौटने के मूड में नहीं था..थोड़ा शहर घूमना चाह रहा था.प्रवीण भैया के घर से मैं मजेस्टिक बस स्टैंड(बैंगलोर का बस स्टैंड) पैदल ही निकल गया.जैसे ही मैं एस.सी रोड पहुंचा तो कपाली थिएटर के पास आकर रुक गया..ज़माने बाद मैं इस कपाली थिएटर के पास से गुज़र रहा था...मुझे एकाएक कुछ याद आ गया.कई साल पहले जब पहली बार बैंगलोर आया था अपने पापा के साथ..इंजीनियरिंग एंट्रेसं देने तब हम दोनों इस इलाके में खूब घुमे थे.मुझे इस थिएटर का नाम इस वजह से भी याद रह गया की पापा के परिचित(जिनके यहाँ हम रुके थे) ने कहा था की कपाली थिएटर के सामने से एक सब-वे जाता है जो सीधा मेजेस्टिक बस स्टैंड को निकलता है.

वहीँ कपाली थिएटर के आसपास के दुकानों से हमने कुछ चीज़े खरीदी थीं..जैसे बहन के लिए एक टेडी बिअर...एक मोमबत्ती स्टैंड और मेरा पहला गैजेट..डिजिटल डायरी(जिसे खरीद मैं बहुत खुश हुआ था).मुझे ये सोच बेहद आश्चर्य होता है आज भी इतने साल गुज़र जाने के बाद भी वे सारी की सारी चीज़ें वैसे ही हमारे घर में रखी हुई हैं..उन्हें देखने पर कोई यकीन भी नहीं करेगा की ये उस वक़्त की खरीदी हुई है.मैं उस कपाली थिएटर के आगे कुछ देर खड़े रहता हूँ और कोशिश करता हूँ याद करने की की हमने वो सामन किन दुकानों से खरीदा था...लेकिन कुछ भी याद नहीं आता..मैं पास की दूकान में चाय पीने चला जाता हूँ.चाय पीते हुए मैं याद करने की कोशिश करता हूँ की जब पहली बार बैंगलोर आया था पापा के साथ तो मैं कहाँ कहाँ गया था...याद आता है..पैलेस ग्राउंड,राजाजी नगर,ऐ.ई.सी.एस लेआउट,इस्कॉन,इंदिरानगर महालक्ष्मी लेआउट....मैं एकाएक महालक्ष्मी लेआउट पर आकर रुक जाता हूँ..सोचने लगता हूँ की यहाँ रहे इतने सालों में एक महालक्ष्मी लेआउट को छोड़कर बाकी सारे जगह मैं कई बार जा चूका हूँ लेकिन महालक्ष्मी लेआउट(जहाँ पापा के परिचित का घर था और जहाँ हम रुके थे)जाना कभी नहीं हुआ..मैं घडी देखता हूँ..सात बज रहे होते हैं और मैं सोचता हूँ की अभी बहुत वक़्त है मेरे पास...मैं घर जाने वाली बस न पकड़कर महालक्ष्मी लेआउट की बस पकड़ लेता हूँ.

हालांकि महालक्ष्मी लेआउट पहुँचने के बाद सिर्फ मुझे वहां का बस स्टैंड के आसपास का ही कुछ इलाका जाना पहचाना सा लगता है, और बाकी बहुत कुछ बदल गया था..इतने सालों में तो बदलाव स्वाभाविक है..लेकिन वहां टहलते हुए मुझे कुछ रास्ते याद आने लगते हैं...लेकिन पक्के तौर पर कुछ याद नहीं आता...मैं उन रास्तों पर आगे बढ़ बढ़ कर कुछ खोजने की कोशिश करता हूँ...शायद वो घर जहाँ हम रुके थे...मैं वहीँ आसपास के इलाके में कुछ देर तक टहलता हूँ और जब कुछ पल्ले नहीं पड़ता तो फिर वापस घर लौट आता हूँ..

घर आने के बाद भी वो पूरी रात मुझे नींद नहीं आई थी..आधी रात रवि जी से बात करते हुए कटी थी और बाकी की रात पता नहीं क्या सोचते हुए.बैंगलोर से दिल्ली आये मुझे एक साल हो गया लेकिन अब भी अक्सर मुझे जब कभी वहां बिताये हुए दिनों की याद आती है तो एक गहरी टीस सी उठती है मन में..सोचता हूँ की जल्द ही कोई मौका निकालकर फिर से कुछ दिनों के लिए वहां घुमने चला जाऊं..ये भी सोचने लगता हूँ की अगर सब कुछ एज पर प्लानिंग चला तो संभव है अपने शहर फिर से लौट ही जाऊं...अपना डेरा फिर से वहीँ बसा लूँ..लेकिन उसके लिए अभी एक लम्बा इंतजार करना पड़ेगा, तब तक मेरी ये बैंगलोर डायरी ही शायद थोड़ी बहुत राहत पहुंचाए मुझे..

बैंगलोर डायरी 

16 comments:

  1. एक बेहद खूबसूरत शहर की खूबसूरत यादें साझा करने का आभार। मुझे भारत के अनेक छोटे-बड़े शहरों में रहने का अवसर मिला लेकिन बैंगलोर का स्थान सबसे अलग है। दिल्ली तो खैर महाराष्ट्र के छोटे से गाँव से भी बहुत कुछ सीख सकती है, लेकिन बैंगलोर तो बैंगलोर ही है ...

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    1. बिलकुल अनुराग जी!!!

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  2. Shuruati padha...ise mujhe 3/4 kishton me padhna hoga....adhik der baith nahee patee hun...

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    1. आप आराम से पढ़िए क्षमा जी...अपने सेहत का पहले ध्यान रखिये!!

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  3. जब से गये हो, बंगलोर दुखी है, पिछले पाँच दिनों से रोज रात मूसलाधार रोती है और ठिठुरती है।

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    1. यहाँ की गर्मी से परेसान दिल्ली वाले आपका ये कमेन्ट देखें अगर की "बैंगलोर ठिठुर" रही है तब तो वे और जल भुन कर राख हो जायेंगे :)

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  4. भाई, बदरपुर में रह के दिल्ली की बुराई ना करो, दिल्ली भी बेहद खूबसूरत है... :)

    आपकी चाय वाली बात से मुझे एक किस्सा याद आया.. बेरसराय में एक मोमोज वाले से हम अक्सर मोमोज लेते थे... एक दिन जब उसे पता चला कि मेरे पति का जन्मदिन है, तो उसने हमें हाफ़ प्लेट अपनी तरफ़ से खिलाया, फ़िर लौटते समय हम भी उसके लिए पेस्ट्रीज लेकर आये... :)

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    1. वाह..अच्छा किस्सा था :)
      वैसे गायत्री जी इसमें कोई शक नहीं की दिल्ली बहुत खूबसूरत है...लेकिन बैंगलोर दिल्ली से थोड़ा ज्यादा सुन्दर तो है ही..वैसे जो भी रह चुके हैं बैंगलोर में वो ये मानेंगे ही की बैंगलोर का स्टाईल बाकी सभी शहरों से थोड़ा डिफरेंट है. :)

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  5. जो बीत जाता है उसकी याद हमेशा दिल में बस जाती है और फिर वो गाहे बगाहे बाहर आती रहती है ... मेरा दावा जब आप दिल्ली छोडेंगे(भगवान न करे कभी जाना पड़े) तो ये यादें भी उतना ही परेशान करने वाली हैं ...

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    1. आप सही कह रहे हैं..जहाँ ज्यादा समय बीत जाता है वहां से लगाव हो ही जाता है!

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  6. अभिषेक ,बैंगलोर की ये खूबसूरत यादें आपकी मूल्यवान् पूँजी है । और ऐसी यादें कहीं की भी हों अमूल्य ही होतीं हैं ।संवेदनशील मन एक पौधे की तरह ( मेरी कविता ) होता है जो जहाँ रमता है पौधे की तरह जमता है । जब उखाडा जाता है तो भी जड का कोई टुकडा तो छूट ही जाता है । वह पल्लविता होता रहता है ऐसे संस्मरणों के रूप में । बधाई । मैं भी आजकल बैंगलोर में ही हूँ । दो-तीन दिन से खूब बारिश हो रही है । याद नही आ रहा कि लू कैसी होती है ।

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    1. बिलकुल ठीक कहा आपने!!और अच्छा लगा की इधर की गर्मी को न झेल कर आप बैंगलोर में बारिश का आनंद ले रहीं हैं :)

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  7. दिल में जो सच्ची चाहत होती है वो जरुर पूरी होती है . यदि तुम पूरे बैंगलोर के हो तो वही जरुर रहोगे..हाँ! तब तक ये डायरी और उसकी यादें हमसे बाँटते रहो..

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  8. एक बार जहां मन लग जाये तो बस वहीं का होकर रह जाता है। फिर आप चाहे कहीं भी रहलो मन उन्हीं पूरानी यादों में जाने और भटकने को किया करता है। :)

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  9. अब तुमको ये तो नहीं बताएँगे कि तुम्हारी इस तीन साल पुरानी पोस्ट पर हम आज क्यों और कैसे आ गए, पर जब आ ही गए तो पढ़ना भी बनता ही था न :P
    ये पढ़ते समय हमको अपना पिछला साल याद आ गया । क्या क्या याद आया, वो तुम फुरसत में पूछ लेना। बाकी तो कुछ टाइम तक इस पोस्ट का हैंगओवर बना रहने वाला है 💝

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  10. अब तुमको ये तो नहीं बताएँगे कि तुम्हारी इस तीन साल पुरानी पोस्ट पर हम आज क्यों और कैसे आ गए, पर जब आ ही गए तो पढ़ना भी बनता ही था न :P
    ये पढ़ते समय हमको अपना पिछला साल याद आ गया । क्या क्या याद आया, वो तुम फुरसत में पूछ लेना। बाकी तो कुछ टाइम तक इस पोस्ट का हैंगओवर बना रहने वाला है 💝

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

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