जिंदगी से कौन संतुष्ट हुआ है..

खुद से तो आजकल एक लड़ाई चल ही रही है, कभी किसी बात पे ज्यादा सच लेता हूँ कभी किसी छोटी सी बात भी दिल पे लग जाती है.काम-सम्बंधित कुछ परेशानी भी है और थोड़ी चिंता भी रहती है आजकल.ये सब तो चलता ही रहता है, जिंदगी किसी के मन मुताबिक को चली नहीं है आजतक तो मैं ये कैसे उम्मीद करूँ की जैसा मैंने सोच रखा है, जिंदगी वैसी ही चले.हर कोई अपने आने वाले कल के लिए न जाने कितने सपने देखता है..कभी वो सपने बड़े बेदर्दी से रोंदे भी जाते हैं, पुरे भी होते हैं लेकिन पुरे होने की गुंजाइश थोड़ी कम ही रहती है.

हर कोई जिंदगी से ज्यादा की उम्मीद लगाये बैठा है.कोई किसी बात से जिंदगी से खफा है, तो किसी को किसी और बात की नाराजगी है.कुल मिलाकर ये देखा जा सकता है की कोई अपनी जिंदगी से संतुष्ट नहीं है.अभी कुछ दिन पहले की एक घटना सुनाता हूँ.शायद ये छोटी सी बात आपपे कोई असर न करे लेकिन मैं काफी कुछ सोचने पे विवश हो गया था.
अभी कुछ दिन पहले दिल बहलाने के लिए घूमने गया था.छुट्टी थी, सन्डे का दिन था..तो सोचा कहीं घूम आऊं...रोज रोज ऑफिस फोर्मल ड्रेस में जाने से मन उब जाता ही है...तो सन्डे को थोड़ा कैश़ूअल ड्रेस में बाहर निकला,बैंगलोर स्टेट लाइब्रेरी के आस पास पार्क जैसा या कहिये छोटा सा जंगल जैसा माहौल है...वहां बैठना अच्छा लगता है कुछ देर, इस बार सन्डे को वहीँ गया था.साथ में एक किताब ले लिया था."शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय जी" की विराज बहु..इसमें कहानी के जो मुख्य किरदार हैं विराज और नीलाम्बर..दोनों एक अच्छा छाप छोड़ जाते हैं मन में किताब पढ़ने के बाद..मैं ऐसे ही किसी सोच में बैठा हुआ था..देखा शाम ज्यादा हो आई है, तो वापसी के लिए बस स्टैंड के तरफ बढ़ा..वहीँ कुछ दुरी पे एक जवान लड़का खड़ा दिखाई दिया, १६-१७ साल का होगा, चेहरे से बिलकुल संस्कारों वाला और अच्छे परिवार का दिख रहा था, हालांकि आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर भी दिख रहा था.वो भी मेरे साथ बस में चढ़ा..हम दोनों आमने सामने बैठे थे..फिर यकायक मैंने गौर किया तो देखा वो मुझे कुछ अजीब नज़रों से देख रहा है..शायद वो मेरे कपड़ों को देख रहा हो या फिर आँखों पे चढ़े फास्टट्रैक के गागल्ज़ को या फिर कानो पे लगे इअरफोन को..उसकी आँखों से पता चल रहा था की वो ये सोच रहा हो की काश उसके पास भी इतने पैसे होते की कुछ अच्छा कपड़ा पहन सके.. गागल्ज़ लगा सके...उसके मन में यही बात चल रहो होगी की इसे देखो, सब कुछ है, पहनने को अच्छे कपड़े,पैसे ..और एक मैं हूँ जिसके पास पैसे की इतनी तंगी है की एक ढंग की शर्ट नहीं खरीद सकता. ,...वहीँ  जब बस स्टैंड पे मैं खड़ा था और उसे देख रहा था तो मैं ये सोच रहा था, कितना अच्छा लड़का है..बिलकुल बेफिक्र ज़माने के टेंसनों से, मस्ती में पढ़ता होगा, मस्त रहता होगा...काश मैं भी इतना ही मस्त रह सकता...

कहने का तात्पर्य बस इतना है की हम दूसरे को देख के ये सोचते हैं की दूसरे लोग कितने खुश हैं, आबाद हैं...हकीकत चाहे कुछ भी हो...मैंने जो बात कही, इसमें भी वही देखने को मिलता है, वो लड़का ये सोच रहा था मेरे बारे में की मुझे ज़माने की कोई फ़िक्र नहीं, अपनी जिंदगी मजे से जी रहा हूँ.... वो मन ही मन मेरे जैसी जिंदगी की कल्पना भी करने लगा होगा, सच्चाई कुछ भी हो, भले इधर मेरे पास अच्छे कपड़े,गागल्ज़ हो लेकिन मन के अंदर जो लड़ाई चल रही है, उससे तो बाहर वाले बिलकुल अपरिचित है,...तो उस लड़के ने भी बाहरी दशा देख ये सोचा की मुझे किसी भी बात का कोई गम नहीं..

हम अक्सर इंसान की बाहरी रूप, हंसी को देख के ये समझ लेते हैं की ज़माने में उस इंसान को कोई तकलीफ नहीं, सच्चाई चाहे कुछ भी रहे, भले ही वो इंसान ग़मों के पहाड़ पे बैठा हो, बाहर वालों को तो वो हमेशा हँसते खेलते दिखाई देता है और लोग इस नतीजे पे पहुच जाते हैं की उस इंसान के पास ज़माने भर की सारी खुशियाँ हैं..

(पता नहीं मैं जो कहना चाह रहा था, अपने पोस्ट के जरिये कह पाया या नहीं...दुविधा में था आप सब से ये शेयर करूँ की नहीं...फ़िलहाल पोस्ट करने जा रहा हूँ) 

8 comments

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बिलकुल सच कहा है ..दूर से घास हरी ही दिखती है ,और परे पत्तर का भात हमेशा ज्यादा अच्चा लगता है .इंसानी प्रवर्ती है.

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hii
मैं तो समझ गयी आप क्या कहना चाह रहे हैं,,,,
सही कहें आप.
अभिषेक जी... आपके ब्लॉग पे कितने दिनों बाद आये हम...बहुत कुछ पढ़ना बाकी है अभी :-)

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सही में ये तो इंसानी प्रवर्ती ही है

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तो फ़ास्टट्रैक का गागल्स पहनते है बबुआ जी.. बढिया है..

ये तो होता है न.. काफ़ी कम लोग होते है जिन्हे पता होता है कि उन्हे ज़िन्दगी से क्या चाहिये..

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Because caring and understanding people are very few.

A bigger lot is selfish.

Sabhi ko apne gam pahaad jaise lagte hain....Lekin Abhishek...kuchh log dusron ka dukh samajhte hain....bina kahe bhi...kyonki wo humare apne hote hain.....jo humse pyar karte hain aur hume khush dekhna chahte hain.

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ज़िन्दगी से अगर संतुष्टि मिल जाए तो फिर आगे जीने का मन ही नहीं करेगा न... :) एक नया नजरिया है सोचने का... संतोषी प्रवृत्ति के लोग कुछ नया नहीं कर पाते...

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बिलकुल सही बात कही ही तुमने...पूर्णतया सहमत हूँ...|
पर ये बार-बार गॉगल्स पढ़ कर भी कुछ नास्टैल्जिया गए हम..:P

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया

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