मेरी बातें



  जनवरी में अमित भैया (अमित श्रीवास्तव) -निवेदिता भाभी (निवेदिता श्रीवास्तव) की  किताब कुछ ख्वाब कुछ ख्वाहिशें      प्रकाशित होकर आई. इस किताब के  विमोचन में मुझे भी शामिल होने का  सौभाग्य मिला था. तब से ही इस किताब के  ऊपर लिखना चाह रहा था लेकिन एक  फेसबुक के पोस्ट के अलावा कुछ नहीं  लिख पाया. मेरी इस गुस्ताखी के लिए कोई  माफ़ी नहीं है और भैया-भाभी इसके लिए  मुझे जो भी सजा देना चाहे कबूल होगी.  वैसे तो किताब प्रकाशित करवाने के लिए  हम न जाने कितने समय से इन दोनों को  कहते आ रहे थे लेकिन ये दोनों बस बेवजह किताब की बात को टाल रहे थे. ये टालना वैसे कुछ था नहीं, बस इन दोनों की साज़िश थी हमें गुमराह करने की. गुपचुप ये दोनों अपनी नयी किताब की तैयारी में कब से जुटे थे हमें पता ही नहीं चला और साल के शुरुआत में ही हमें इन दोनों ने इस किताब के जरिये एक प्यारा सा सरप्राइज़ दिया.

"कुछ ख्वाब कुछ ख्वाहिशें" अमित भैया और निवेदिता भाभी की युगल कविता संग्रह है. जहाँ तक मुझे पता है हिंदी के क्षेत्र में ये एक अनोखा प्रयास है. पति-पत्नी की जोड़ी की कोई युगल कविता संग्रह इससे पहले आई है या नहीं ये नहीं कह सकता लेकिन जहाँ तक मैं जानता हूँ, शायद अब तक नहीं आई. इस किताब के पहले हिस्से में निवेदिता भाभी की 45 कोमल कवितायें हैं तो दूसरे हिस्से में अमित भैया की 42 खूबसूरत कवितायें. शुरुआत करते हैं निवेदिता भाभी की कविताओं से - 

भाग १ - निवेदिता 

किताब की पहली कविता निवेदिता भाभी की है – अनकहे शब्द. ये एक छोटी सी लेकिन बेहद प्यारी कविता है. शायद हम सब की मन की बात कहती है ये कविता...

सोचती हूँ 
आज 
उन शब्दों को 
स्वर दे दूँ 
जो यूँ ही
मौन हो 
दम तोड़ गए 
और 
अजनबी से 
दफ़न हो 
सज रहे हैं
एक
शोख मजार सरीखे 
एहसासों के दलदल में 

भाभी की कविताओं की खासियत है कि ये कवितायें सरल शब्दों में कितनी गहरी बात कह जाती है, जैसा कि भाभी की ये कविता जिसका बड़ा ही मजेदार शीर्षक है “आइस क्रीम सी ज़िन्दगी”, लेकिन इस मजेदार शीर्षक के पीछे देखिये कितनी गहरी बात छुपी हुई है - 'जिंदगी भी तो आइसक्रीम जैसी ही है न, पल पल पिघल रही है. अब ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि इसके मजे ले ले या इसे व्यर्थ जाने दे' कविता में इसी भाव को कितनी खूबसूरती से पिरोया गया है.

जीवन अपना
एक आइसक्रीम जैसा
इसको तो पिघलना है
चाहे इसके छोटे टुकड़े कर के
मुहँ में रख लें, या फिर
हाथ में थामकर देखते रहें
और व्यर्थ जाने दें

इस किताब में भाभी की जहाँ दार्शनिक कवितायें हैं वहीं कुछ बेहद रूहानी सी कवितायें भी हैं इस किताब में जैसे एक कविता जो मुझे बेहद प्यारी लगी वो है ”तुम और मैं...”

तुम मेरा दक्षिण पंध बनो
मैं बनूँ पूर्व दिशा तुम्हारी
तुम पर हो अवसान मेरा
मैं बनूँ सूर्य किरण तुम्हारी
तुम तक जाकर श्वास थमे मेरी
इससे बड़ी अभिलाषा क्या मेरी..

माँ एक ऐसा विषय है जिसपर लिखी हर कविता दिल के बेहद करीब होती है, और हम बहुत आसानी से उससे रिलेट भी कर जाते हैं. माँ पर ही एक कविता भाभी ने भी लिखी है और इस कविता को पढ़ते ही पता चलता है कि ये कविता भाभी के दिल के कितने करीब होगी. माँ की गोद को याद करते लिखी गयी ये कविता “मैं सोना चाहती हूँ..” बेहद मर्मस्पर्शी है..

अरे, वो उजला साया तो है
माँ, बस तुम्हारे ही
दुलार बरसाते आँचल का साया
बहुत दिनों से जागी मेरी आँखें
अब तो बस थक गई हैं
सोना चाहती हैं
कभी न खुलने वाली नींद में
काश! कहीं मिल जाए
उन सुरीली लोरी की छाँव

भाभी की कविताओं में कुछ पंक्तियाँ आपको बड़े आसानी से अपनी ओर खींच लेती हैं जैसे "ख्यालों की उलझन" कविता में एक पंक्ति पर मैं जाने कितनी देर तक ठिठका सा रहा. कितनी बार पढ़ा इस खूबसूरत कविता को और इसकी इस पंक्ति को..हर बार दिल से बस 'वाह' निकला..

सफ़र फूलों का
बस इतना-सा ही है
उस शाख से
पूजा की डोली तक
और कभी
दुल्हन की डोली से
कदम बढ़ा
उस की अंतिम शय्या तक

एक और कविता "ख्वाब" में भी देखिये एक छोटी सी लेकिन कितनी सुन्दर और सच्ची बात कहा है भाभी ने... 

ख्वाब
हरदम सिर्फ
ख्वाब ही नहीं होते
ज़िन्दगी की
रेशा रेशा हकीकत भी होते हैं

इन सभी कविताओं में एक खूबसूरत कविता 'आज तुम्हारे जन्मदिन पर' है. वैसे भी जन्मदिन की कवितायें कम पढ़ने को मिलती हैं. जिस तरह के भाव दुष्यंत की "एक आशीर्वाद" कविता को पढ़ते हुए आती है, कुछ उसी तरह के भाव इस कविता को भी पढ़ने के बाद मन में आये थे -

हर ऊँचाई
चूमे कदम तुम्हारे
बस उन
ऊँचाइयों से
देख लेना
अपने अपनों को
और हाँ
दुनिया के सभी
जरूरतमंदों को भी

भाभी की एक और मासूम सी, रूहानी सी और बेहद ही कोमल सी कविता है "उसने कहा". मुझे तो बड़ी प्यारी लगी ये कविता. - 

उसने कहा
आँखें तुम्हारी
सीप-सी
और मैंने
मोती बरसा दिए

उसने कहा
आँखें तुम्हारी
गोमुख सी
लब लगाए
और पावन हो गए

एक और बेहद प्यारी रूमानी कविता जो मन भिगो जाती हैं वो है "सबसे अलग हो तुम". देखिये तो, कितने सुन्दर तरीके से भाभी कहती हैं 'सबसे अलग हो तुम'.. 

सबसे अलग हो तुम
जानते हो क्यों
सब देखते हैं
लबों पर थिरकती हँसी
स्वर में बोलते अट्टहास
पर तुम
तुम तो देख लेते हो
इन सबसे परे
मेरी आँखों में तैरती नमी...

अगर बात करूँ इस किताब में भाभी की लिखी सबसे बेहतरीन कविता की तो वो निसंदेह "सीता की अग्निपरीक्षा" है. किताब में ये भाभी की सबसे लम्बी कविता भी है. किताब के विमोचन के दौरान ये कविता स्वयं भाभी से सुनने का मौका मुझे प्राप्त हुआ था.ये  कविता इस समाज से सवाल करती है. रामायण को हुए युग बीत गए, लेकिन आज भी कहीं न कहीं सीता अग्नि परीक्षा से गुज़रती ही है. जब खुद सीता को समाज ने नहीं बख्शा तो एक आम नारी भला इस समाज से क्या अपेक्षा करेगी.,उसे कैसे समाज बक्शेगा? ये कविता एक गहरा प्रहार करती है हमारे समाज पर..

अग्निपरीक्षा क्यों दूँ मैं
जीवनसाथी से अलग
कहीं और रहना कारण है
शुचिता प्रभावित करने का
तो हाँ, ये पाप तो राम ने भी किया
तब भी अग्निपरीक्षा सिर्फ और सिर्फ सीता की!
तो हाँ, ये पाप तो राम ने भी किया
तब भी अग्निपरीक्षा सिर्फ और सिर्फ सीता की !

...

बहुत बार तुमने मुझको
कसौटी पर कसा
बहुत बार मुझको तुमने
अनायास ही त्याग दिया
आज मैं तुम्हारा परित्याग करती हूँ
जाओ फिर से मेरी स्वर्ण प्रतिमा बना साथ बिठाओ
मैं जनकपुर की धरती से उपजी
आज फिर धरती में ही समा जाती हूँ
माँगते रहो मुझसे अग्निपरीक्षा 
मैं
हाँ, मैं तुम्हारे हृदय में दावानल दे जाती हूँ.


वैसे तो इस किताब में भाभी की सभी कवितायें बेहद खूबसूरत हैं लेकिन इन सब के अलावा कुछ और कवितायें जैसे "तुम्हारी परछाई","एक छोटी सी गुल्लक और कुछ चाहतें","वंचित या वंचना", और "एक बरसात कुछ अलग सी" मुझे बेहद ख़ास लगी.

भाग २ - अमित 

किताब के दूसरे हिस्से में है अमित भैया की कवितायें. जहाँ भाभी की कविताओं में एक ठहराव है,  एक एकाकीपन है...किसी शांत झील सी बहती हुई कोमल सी कवितायें हैं वहीँ भैया की कवितायें एकदम मस्ती भरे अंदाज़ में लिखी मस्तमौला और बेहद रोमांटिक कवितायें हैं. पहली ही कविता से शमा बांध गया. पढ़िए आप भी

हर मुड़ा-तुड़ा कागज़ कचरा नहीं होता
आंसुओं संग बह जाए वह कजरा नहीं होता

मुड़े-टुडे कागज़ अक्सर होते हैं खत मोहब्बत के
लफ्ज़ जिसके हरेक जुगनू होते हैं “उन” नज़रों के

ऐसा ही टुकड़ा एक दबा रह जाता है अक्सर नीचे तकिये के
और कर देता है उस ओर मुझे ‘उनकी’ यादों के हाशिये के

एक "ईद" की कविता पर भी नज़र गयी, ये पढ़कर तो पहला रिएक्शन ये आया मेरा कि चलो एक खूबसूरसत कविता और मिली ईद के मौके पर चेपने के लिए, बड़ी सुन्दर सी कविता है, बेहद प्यारी..

इस जिसकी होती
बस दीद से तुम्हारे
चाँद-चाँद कहता वो
ढूँढता सबमें तुमको
छलकते आँसुओं से करता
वजू पाँचों वक़्त वो सारे
दुआ में तुमको माँगे
तुम्हारी दुआ वो चाह

..

थोड़ा तुम मुड़ के देखो
थोड़ा वो भी जी भर रो ले
यूँ ही नज़रें मिला लो
कभी उसकी भी ईद हो ले

"ईद" की खुमारी अभी उतरी भी नहीं थी कि भैया की एक और कविता ने अपने गिरफ्त में ले लिया..कविता का शीर्षक है "कुछ ख्वाबों ख्वाहिशों को नाम नहीं दिए जाते". बेहद प्यारी है ये कविता और गज़ब की रूमानियत है इसमें -

मोहब्बत मुझको वो करे न करें मर्जी उनकी
पर मेरी हिचकियों का हिसाब लेना जरूरी है

ख्वाब में है ख्वाहिश या ख्वाहिश उनके ख्वाब की
उनसे नज़र एक बार मिलाना भी तो जरूरी है

अकेले में वो ताबुस्सम लिए फिरते तो हैं होठों पे
इश्क हमी से है उनको तसदीक करना भी तो जरूरी है


भैया की कविताओं की बात करे तो ये कोटेशन का खज़ाना है. आपको जाने ऐसी कितनी ही पंक्तियाँ मिलेंगी जिन्हें आप जगह जगह कोट कर के किसी को इम्प्रेस कर सकते हैं....फिर चाहे वो ग्रीटिंग्स कार्ड हो या फेसबुक और ट्विटर के मेसेज, किसी ख़ास को समर्पित करने के लिए एकदम फिट बैठेगी इनकी कवितायें...वैलेंटाइन डे पर तो ख़ासतौर पर ये किताब बड़ी कारगर साबित होगी. यकीन न आये तो आप खुद देख लीजिये इन पंक्तियों को एक बार -

वो मुस्कुरा दे बस इतनी सी चाह है 
अपने आँसुओं से बचने की कहाँ कोई राह है 

वो पलकें उठा दें बस इतनी सी चाह है 
खुली आँखों से सपने देखने की यही एक राह है 

वो लब खोल दे, दो बोल बोल दें, बस इतनी सी चाह है 
सन्नाटे के शोर से बचने की यही एक राह है 

...

तुम तो एक फूल हो जिसमें खुशबु है बहुत
उस खुशबु से थोड़ा महकना चाहता हूँ 

मरना ही सच है गर ज़िन्दगी का 
झूलकर तेरी बाहों में मरना चाहता हूँ

...

और झाँका तुमने जब
अँधेरों को रोशनी मिल गई
गुमशुदा बैठे थे तन्हा
लम्हों को ताजगी मिल गई  

वैसे इस किताब में भैया की सबसे खूबसूरत कविता शायद "और गुनाह हो गया" है. कविता तो ख़ास है ही, लेकिन इस कविता को और ख़ास बनाती है ये बात कि खुद भैया के मुहँ से सुन चूका हूँ इसे मैं. वैसे मैंने गौर किया था कि भैया जब ये कविता हमें सुना रहे थे तो भैया की नज़रें भाभी पर ही जमी थी. आप तो फ़िलहाल बस ये कविता पढ़िए...

एक नज़्म-सी तुम
गुनगुना गया मैं
और गुनाह हो गया

पूरा चाँद सी तुम
बहक गया मैं
और गुनाह हो गया

मासूम ताबुस्सम सी तुम
अश्क मैं पीता गया
और गुनाह हो गया

इसके रोमांटिसिज्म से बाहार निकलने का मौका नहीं मिलता और तभी हमें एक और बेहद रोमांटिक कविता सामने दिखती है -

अशआर यूँ तो सारे पढ़ लिए मैंने तेरे
अल्फाज़ एक दो कह दो तो बात बने है

दीदार जाने कब हो रब ही जाने जब हो
तस्सवूर में आके न जाओ तो बात बने है

बदमान था तो यूँ भी कुछ और हो कर देखूँ
कुछ नाम तुम भी कर दो तो बात बने है

भैया की कविताओं में एक गज़ब का मस्तमौलापन है...जैसे ये कविता देखिये..."वह काला तिल.." पूरी की पूरी कविता ही जानदार..शानदार है...

कहना उनका, लिखते तो अच्छा हो
मैंने कहा, तुमने पढ़ा शायद
कमबख्त लिखा खुद सँवर गया.
..
खूबसूरत होना एक बात है
पर इत्ता खूबसूरत होना अलग बात है
...
गौर किया तो एक काला तिल
वहन भी गोर से गाल पर
गोया भँवरा हो
चाँदनी के फूल पर
..
टटोला मैंने
इस टिल पर दिल
तो बहुत मिटे होंगे
‘उहूँ’ कर बोले – मुझे क्या
अब मैं मान गया
खूबसूरत होना
और नकचढ़ा होना
दोनों एक ही बात है

है न एकदम कॉलेज के जमाने की लिखी कविताओं सी ये. इसी तरह की एक और मस्तीभरी कविता का एक अंश पढ़िए "कुछ तो है.."

बालियाँ बोलती हैं
बिंदिया बहकती है
आवाज़ महकती है
कनखियाँ घूरती हैं
कुछ तो है...

इस किताब की शायद सबसे रूमानी कविता में से एक है “स्मृति की एक बूंद मेरे काँधों पे”, जो मुझे बहुत ख़ास लगी..

उस रात
काजल लगी आँखों में
जो एक आँसू
टपका था तुम्हारा
मेरे काँधे पे
वक्त के साथ
आँसू तो सूख गया
पर काजल का वो एक कण
ठहरा हुआ है वहीं
अब भी मेरे काँधे पे

रोमांटिक कविता के अलावा भी अमित भैया की कुछ कविता जैसे फादर्स दे पर उनकी लिखी एक कविता और माँ के लिए उनकी लिखी कविता बेहद पसंद आई. इन सब के अलावा जहाँ "लालटेन सी ज़िन्दगी" एकदम अलग सी कविता लगी वहीँ "आलिंगन ज़िन्दगी का", "पैदाइश लफ़्ज़ों की...", "तिथियों से परे..", और "अलिखित से लिखित" भी मुझे काफी पसंद आई.

इस किताब में जहाँ पहली कविता निवेदिता भाभी की "अनकहे शब्द" थे तो वहीँ आखिरी कविता अमित भैया की "क्यों लिखूँ कविता" है..ये दोनों कविता अगर गौर कीजिये तो आपस में मिले जुले से लगते हैं. अमित भैया की कविता में एक कवि का दर्द है. बेइंतेहा दर्द से गुजरने के बाद कोई कवि एक कविता लिखता है, लेकिन इतना दर्द सहकर कविता लिखने का हासिल क्या है?

कविता लिखना शायद
होता है कीमोथेरपी जैसा
दर्द और बहुत दर्द के बीच
झूलती ज़िन्दगी
पर हाँ, उम्र मिल जाती है
थोड़ी साँसों को और
साथ-ही-साथ
उस कैंसर को भी
..

सब सोचता हूँ
निचोड़ता हूँ
निधारता हूँ
सीने में दर्द
बर्दाश्त करता हूँ
तब कविता
निकलती है
और खुद को
लिखती है
मेरे सफे पे
बहुत तकलीफ
होती है
तब बनती है कविता

इस किताब की सभी कवितायें बेहद ही शानदार हैं. गज़ब की मौलिकता है इनमें. भाभी के शब्दों में कहूँ तो ये किताब 'एक पोटली है खुशियों की'. आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भैया-भाभी की कवितायें दिल को सुकून देती है. भगवान से मेरी बस यही प्रार्थना है कि अमित भैया-निवेदिता भाभी के ये सारे ख्वाब, सारी ख्वाहिशें हमेशा पूरी हों और उनकी ये किताब जो पहले से ब्लॉकबस्टर साबित हो गयी है वो और सफलता की ऊँचाई चढ़ते जाएँ.

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद और इन प्यारी कविताओं का आनंद लेने के बाद किताब मँगवाने का दिल तो किया होगा आपका. तो आपके लिए ये लिंक है अमेज़न का. -

"कुछ ख़्वाब...कुछ ख्वाहिशें" on Amazon.in 

भीतर कहीं कुछ ‘झन्न’ से टूट गया...शायद दिल...। जैसे कोई शीशा हो...। हाथ से कोई सिरा छूट कर यथार्थ की ज़मीन से टकराया और अब उसकी नन्हीं-नन्हीं अदृश्य सी किरचें तन के साथ आत्मा तक में चुभ कर उसे लहुलुहान कर रही थी। तड़प कर उसने यादों के तहखाने में छुपने की कोशिश की पर वहाँ तो रोशनी की एक हल्की-सी किरन भी नहीं थी...। सुराखों से आती धूप की पतली-सी लकीर को भी घने अन्धेरे ने अपनी गिरफ़्त में ले रखा था। 

- [ झील में तैरती बत्तखें, अंजुरी भर | प्रेम गुप्ता 'मानी' ]

प्रेम गुप्ता ' मानी ' की किताब अंजुरी भर का कवर

“अँजुरी भर” एक बेहद संवेदनशील कहानियों का संग्रह है जिसे लिखा है ‘प्रेम गुप्ता मानी’ ने. लेखिका मेरी आंटी भी हैं तो स्वाभाविक है मैं उनका नाम लेने की बजाये इस पोस्ट में उन्हें आंटी कह कर ही संबोधित करूँगा. वो मेरी आंटी हैं इसका मतलब ये नहीं कि आप पोस्ट पढ़ने के पहले ही समझ जाएँ कि मैं बायस्ड  होकर किताब के बारे में लिखूंगा..और इस पोस्ट को आप किताब की समीक्षा भी न समझे. समीक्षा करना मुझे आता नहीं. बस जितनी कहानियाँ इस किताब में हैं उन्हें पढ़कर समझने की ये मेरी कोशिश है और हर कहानी  के बारे में मेरी पहली प्रतिक्रिया क्या रही वही इस पोस्ट के जरिये मैं बताने की कोशिश करूँगा. किताब के कहानियों के ज्यादा राज़ नहीं खोलूँगा मैं..कुछ तो मज़ा और उत्सुकता बनी रहनी चाहिए जब आप किताब पढ़ें...सब कुछ इसी पोस्ट में बता दूंगा तो मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा.

एनीवे, आपको अपनी बातों में और ज्यादा देर तक मैं घेरे नहीं रहूँगा, वरना बातें लम्बी होती जायेंगी. तो चलिए सीधा रुख करते हैं किताब की ओर.. -

इस किताब की हर कहानी बेहद संवेदनशील है, जो जाने कितना कुछ कहती है. समाज और लोगों को आईना दिखाती है. हर तरह के संघर्ष की कहानी है इस किताब में. जाने कितने घरों का सच भी दिखता है हमें इन कहानियों में. फेयरीटेल, रूमानियत और दिलकश बातों से दूर, ज़िन्दगी की क्रूर सच्चाइयों से नज़दीक मिलेगी इस किताब की कहानियां, जो ज़िन्दगी की उन तल्ख़ हकीकतों से हमें रूबरू करवाती है जिसे हम शायद कभी न कभी अनुभव कर चुके हैं या ना भी किया हो अनुभव तो अपने किसी नजदीकी को, आसपड़ोस में लोगों को देख चुके हैं जो जाने क्या कुछ सहते आये हैं अपनी ज़िन्दगी में. इस किताब की कहानियों के पात्रों के अकेलेपन को हम बेहद अच्छे से महसूस कर सकते हैं....कभी कभी लगता है कि पात्रों के दर्द को हम जानते हैं, वे हमारे अपने दर्द हैं...हम समझ सकते हैं उनके आँसुओं को. उनकी विवशता और तकलीफ हमें अपनी सी लगती हैं..


मैंने किताब की पहली कहानी पढ़ी थी “खुला हुआ आकाश”, जो एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे अपने शहर की गंदगी से नफरत है. उसे हर कुछ से नफरत है. शहर की गंदगी से लेकर मौसम से लेकर सरकार और यहाँ तक कि अपनी पत्नी और बच्चों से भी.. वो अपनी बीवी के फूहड़पन से नफरत करता है. वो चाहता है कि उसकी बीवी सलीके से रहे जबकि वो बिलकुल अस्त-व्यस्त सी रहती है. वहीँ वो अपने दफ्तर में काम करने वाली एक महिला के प्रति काफी आकर्षित है. लेकिन एक दिन जब उसकी बीवी सलीके से सज धज के उसके सामने आती है, तो वो उसपर निहाल हो उठता है और फिर बाद में जब वो अपने उसी फूहड़ रूप में आती है तो उसके प्रति उसका मन खीज से भर उठता है. यह शायद एक आम इंसानी प्रवृति है. शायद इसलिए भी होता है कि कुछ लोग दफ्तर में काम करने वाले खूब सज संवर के आने वाली स्त्रियों के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं, वहीँ अपनी बीवी को वो भाव नहीं देते. बेहद सीधी सादी सी ये कहानी जो हम अक्सर अपने आस पास देखते हैं या फिर हम खुद ऐसा अनुभव कभी न कभी करते ही हैं.

अगली कहानी किताब की जो मैंने पढ़ी उसका शीर्षक है “किस्सा बांके बाबु के जाने का” . जाने क्यों शीर्षक पढ़ कर शुरू में मैं इस उम्मीद में था कहानी कुछ नोस्टालजिक सी होगी और शायद पुरानी यादों के ऊपर लिखी होगी ये कहानी. मेरे इस उम्मीद की वजह एक दूसरी कहानी थी जो मैंने कई साल पहले पढ़ी थी जिसका शीर्षक कुछ इसी तरह का था. हालाँकि मेरी उम्मीद से उलट इस कहानी ने अन्दर तक झकझोर कर रख दिया मुझे. ये कहानी बाँकेबाबु नाम के एक ऐसे व्यक्ति के अंतिम समय की कहानी है जिसकी कोई औलाद नहीं है..उसने एक लड़के को अपना बेटा मान लिया है. भाई बहनों से उनकी कभी बनी नहीं..हमेशा ताव में रहने वाले बाँकेबाबु अपने अंतिम समय में इस कदर विवश थे कि उनके मरने की और जायदाद हड़पने की प्रतीक्षा करने वाले उनके भाई बहनों को वो कुछ कह भी नहीं सकते थे. कहानी की ये चंद लाइन कहानी के साथ साथ शायद हर इंसान की हकीकत बयां करती है – “अन्तिम समय में क्या हर आदमी इसी तरह अवश हो जाता है? अभी वे स्वस्थ होते तो क्या मज़ाल थी कि कोई उनकी किसी चीज को हाथ लगा पाता...” पैसे और जायदाद के लिए लोग किस तरह निर्दयी और जानवर सामान हो जाते हैं, ये कहानी वही बातें हमें सुनाती है.. ये एक सच्चाई है जो जाने कितने बाँकेलाल की हकीकत होगी. चुन्नीलाल जो भाई है बांकेलाल का, वो किस बेदर्दी से मृत्यु शय्या पर पड़े अपने भाई बाँकेलाल के उँगलियों से अँगूठी उतारता है. किस तरह से बाँकेलाल के मरने का बाद उनके शव को रखा जाता है और नरेश जिसे बाँकेलाल अपने बेटे की तरह मानते थे, वो ये सब देखता है और बेबस सा खड़ा रहता है एक कोने में. आखिर किस अधिकार से वो विरोध दर्ज करवाता...और बाँकेलाल के लालची भाई बहन क्या उसके विरोध को स्वीकार करते? इन्हीं सब अजीब रिश्तों की उलझन और लालच के ऊपर है ये कहानी. कहानी का अंत क्या होता है, बाँकेलाल के शव को, नरेश को और क्या क्या झेलना पड़ता है ये सब बातें कहानी खत्म होने के बाद भी आपको हांट करती हैं. नि:संदेह ये कहानी इस किताब की एक सशक्त कहानी है. कहानी का हर एक फ्रेम आपको जकड़ कर रखता है और थोड़ा डराता भी है.

“जंगल” एक ऐसी लड़की की कहानी है जो खुद के ही अँधेरे से लड़ रही है. अपने मन के अँधेरे के साथ साथ वह अपने चारो ओर की मुसीबतों, जिसमें उसके घरवाले भी शामिल हैं, सबसे अकेले लड़ रही है. उसकी दादी जो अब इस दुनिया में नहीं है, उनकी बातें ही उसका सबसे बड़ा सहारा है. वो अक्सर हैरान होती कि जो बातें दूसरे नहीं समझ पाते वो बातें दादी कैसे इतने अच्छे से समझ लेती है. दादी उसे हमेशा कहती “बेटा, किसी को डराने के लिए तो जंगल का बहाना चल जाता है, पर बेटा...किस-किस से डरोगी...? अब तो ये जंगल पूरी दुनिया में फैल गया है...अपने झाड़-झंखाड़ और काँटों के साथ...। जंगली जानवर भी यहाँ-वहाँ पसरे पड़े हैं...। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही है कि मानव-खोल में उनका असली चेहरा छिप गया है। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि उनके बीच रह कर तुम अपने को कितना सुरक्षित कर सकती हो..." वह लड़की हर पल इस कोशिश में है कि इस जंगल से वो बच सके, लेकिन एक ऐसे समाज में जहाँ हर तरफ जंगल पसरा हुआ है क्या ये संभव है? इस कहानी का अंत स्तब्ध करने वाला और थोड़ा डराने वाला भी. कहानी पढ़ते हुए आप जिस अंत को एक्स्पेक्ट करते हैं वो तो आता नहीं बल्कि इस जंगल रूपी समाज का एक बेहद क्रूर सच और एक गन्दा चेहरा आपके सामने आ जाता है जिससे आपको एकाएक घृणा होने लगती है. ये भी आप सोचने लगते  हैं जाने कितनी लड़कियां इस जंगल में फंसी हुई हैं और हर समय इस जंगल से निकलने की कोशिश करती हैं, क्या वो सफल हो पाती हैं या इसी जंगल में कहीं खो कर रह जाती हैं?

इस किताब की शीर्षक कहानी “अंजुरी भर” एक रिटायर व्यक्ति की कहानी है. यह रामदास की कहानी है जिसकी ज़िन्दगी एक समय सुख से कट रही थी और फिर बीवी के मरनें के बाद और उनके रिटायर होने के बाद वही सुखमय ज़िन्दगी अब नरक समान बन गयी है. रामदास रिटायर होने के बाद घर में अपनी बेटे बहुओं और पोतों के साथ रहता है. पहले की जो ठाट बाट थी उनकी, वो अब नहीं रही. रिटायर होने के बाद वही बेटे, बहुएं और पोते जो उनके आसपास मंडराते रहते थे और उनका खूब ख्याल रखते थे अब उन्हें बिलकुल नज़रंदाज़ कर एक कोने में पड़े रहने देते हैं...जो बहुएं कभी उनके हर छोटी से छोटी जरूरतों का ख्याल रखती थी वो अब उनके दर्द पर झाँकना तो दूर, और खरी खोटी सुना कर चल देती हैं. बद से बद्दतर ज़िन्दगी बन गयी थी उनकी. यह कहानी शायद बड़ी आम सी कहानी है जो न जाने कितने घरों की हकीकत है, कितने रामदास हैं जो ऐसी परस्थिति से आज भीं गुज़रते हैं. लेकिन इस कहानी में रामदास का दर्द जब असहनीय हो जाता है और हर तरफ से वो निराश और पस्त हो जाते हैं कि तभी अचानक से एक आशा की किरण बन कर उनके ज़िन्दगी में पूनम आती है. ये पूनम कौन है? और क्या होता है उसके आने के बाद? कहानी में इसी सवाल का जवाब आपको  मिलेगा. रामदास को यहाँ तो एक नयी आस मिलती है ज़िन्दगी में, लेकिन हमारे आसपास हमनें और आपने कितने ही ऐसे रामदास देखे हैं जिसे अंत तक कोई सहारा नहीं मिलता और वे अपने इसी दर्द, तकलीफ और अपनों की बेरुखी से घिर कर दुनिय से चले जाते हैं.

“अंजुरी भर” के अलावा “झील में तैरती बत्तखें” भी एक ऐसी कहानी है जिसे आप सुखान्त कह सकते हैं. ये ‘राजी’ की कहानी है जो अपने पति के गुजरने के बाद एक मकान में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती है. कहने को तो उसके दो बेटे भी हैं लेकिन वो उनसे अलग रहती है. उसके रिश्ते उसके बेटों के साथ अच्छे नहीं हैं. अपने बेटों के साथ उसके रिश्ते में कैसी तल्खियत है और क्यों है ये तल्खियत, इसका जवाब तो आपको कहानी में ही मिलेगा. हाँ, एक दोस्त भी है राजी का, जो उसके निर्दयी पति के गुजरने के बाद उसकी ज़िन्दगी में किसी ताजे हवा की झोंके की तरह आया. समाज हालाँकि उन दोनों की नजदीकियों को बेहद गंदे नज़रों से देखता है..समाज वैसे भी काफी चीज़ों को गंदगी भरे नज़रों से ही देखता है. रमाकांत जो उसका दोस्त है, वो उसे समझाता है - “जानती हो, इस छोटी झील के जैसे ही एक और बड़ी सी झील और है...जिसे हम दुनिया कहते हैं...। हम सब इसी झील में तैरने वाली बत्तखें हैं। लोगों द्वारा आरोपों-आक्षेपों का कंकड़ फेंकने के बावजूद हमें रुकने की कोई ज़रूरत नहीं...बिल्कुल इन बत्तखों की तरह...। देखोऽऽऽ...ये कैसे बस पल भर ठहर कर फिर आगे बढ़ गई...बग़ैर कुछ परवाह किए...।" इन्हीं उलझे रिश्तों की और उसे सुलझाने की कहानी है “झील में तैरती बत्तखें..” इस कहानी के अंत को आप सुखान्त कह सकते हैं, वैसे अंत इस कहानी का कोई अंत नहीं बल्कि एक नयी शुरुआत है राजी के लिए.. 

अगली कहानी “कब्रिस्तान”, कान्तिलाल की कहानी है जो एक दिन स्कूटर खराब होने की वजह से ऑफिस बस से जाने को मजबूर होता है. बस में उसके साथ झकझोर देने वाली एक घटना होती है जिससे उसके सोचने समझने का पूरा नजरिया ही बदल जाता है. उस एक घटना की वजह से बहुत उथल पुथल उसके मन में होने लगती है. एक सवाल उसे रह रह कर कचोटने लगती है कि क्या सच में हमारे सामाज में लोग बिलकुल संवेदनहीन हो गए हैं? उसकी बेटी जो शहर में हो रहे दंगों के वजह से कोचिंग से सही वक़्त पर घर नहीं पहुचती वो उसकी खोज में निकल पड़ते हैं, और खुद को बेहद बेबस महसूस करते हैं इन सब हालात के सामने. रास्ते भर उनको उनकी बेटी की चिंता सताती है और बेहद बुरे बुरे ख्याल मन में आते हैं. अपने बेटी को खोजने निकले कान्तिलाल रास्ते में अपने इस शहर की तुलना कब्रिस्तान से करने लगते हैं. वो सोचते हैं कि एक दिन ये पूरा शहर एक कब्रिस्तान में तब्दील हो जाएगा. “इस क़ब्रिस्तान के आसपास कुछ भी घटित हो...कितने भी लोग गुज़रें...या एक्सीडेण्ट में गुज़र जाएँ...वाहनों का कितना भी शोर हो...दंगे भड़क जाएँ...पर यह क़ब्रिस्तान ऐसे ही शान्त रहेगा...। मुर्दों को दूसरों से क्या लेना-देना...? वे तो अपनी-अपनी क़ब्रों में चैन की नींद सो रहे हैं...। एक ऐसी नींद जो ज़िन्दगी की सारी मुसीबतों से मुक्त करके सकून देती है...।  बहुत सारे सवाल ये कहानी खड़ा करती है आपके सामने. वे सवाल क्या हैं और आखिर क्या हुआ था बस में ऐसा कान्तिलाल के साथ जिससे उनकी सोच इस कदर बदल गयी, उनकी बेटी कहाँ फंसी रह गयी और क्या हुआ उनकी बेटी के साथ...ये सारे रहस्यों से भरे सवालों का जवाब कहानी में ढूँढिये और सोचिये क्या हमारा शहर सच में एक कब्रिस्तान में तब्दील होते जा रहा है?


“खाई” एक ऐसी औरत की कहानी है जो अपने एक सपने की वजह से बेहद डरी हुई है. वो डरावना सपना जिसमें वो किसी सुनसान सी पहाड़ी पर अकेले खड़ी है और नीचे उतरने का रास्ता नहीं तलाश पा रही, खाई में गिरने का डर उसे बेतरह बेचैन किये हुए है. वो अपना यह डर साझा करना चाहती है ताकि उसका मन हल्का हो सके, लेकिन किससे साझा करे वो यह डर? अपने पति से, अपने बेटे से या अपनी बहु से? लेकिन क्या वे सारे उनके अपने हैं? आखिर क्यों वो एक भरे पुरे घर में भी असहाय और अकेलापन सा महसूस करती है..? आखिर वो क्यों ऐसा सोचती है कि उस भयानक सपने में तो धक्का देने वाला सिर्फ़ एक ही हाथ था, पर यहाँ तो कई हाथ हैं क्या है बेचैनी उस औरत की, और क्या सच में अधिकतर औरत इसी तरह से अपने अकेलेपन और और मन की बेचैनियों में घिरी निःसहाय सी होती हैं? “खाई” जाने और क्या क्या सवाल पूछती है हमसे.


किताब की आखिरी कहानी अक्शीरा है. यह कहानी हिन्दू और मुस्लिम दंगे पर आधारित है. ये इस किताब की सबसे सशक्त कहानी है. लोगों को ये बात भी बता दूँ, कि इस किताब का नाम भी पहले “अक्शीरा” सोचा गया था जिसे बाद में कुछ कारणों से “अंजुरी भर” कर दिया गया. एक दंगा किसी के लिए कितना भयावह  हो सकता है कि वो उसके पूरे वजूद को ही बदल दे और उसके विश्वास को बिलकुल नेस्तानाबुत  कर रख देता है. दंगे में अपने परिवार को तबाह होते देख ‘अरशद’ कब वहशी हो जाता है वो ये जान भी नहीं पाता. अरशद चाहता है वो उन सब दंगाईयों से बदला ले जिन्होंने उसके पूरे परिवार को तबाह किया. आस पड़ोस के कितने लोगों से उसे और उसके परिवार को आशा थी कि वो उसे दंगों में मदद करेंगे..लेकिन क्या उनकी वो उम्मीद पर खरे  उतरे? क्या सच में अरशद इस भयानक दंगे का शिकार होकर पूरी तरह वहशी बन जाता है या अभी भी इतना कुछ सहने के बावजूद इंसानियत बाकी है उसमें? दंगो के बहुत से पहलु ये कहानी उठाती है. दंगों का दर्द और लोगों की कराहट आपको एक टीस सी देकर जाती है..लेकिन कहानी एक पॉजिटिव नोट पर खत्म होती है जो भरोसा दिलाती है हमें कि शायद अब भी बहुत कुछ बचा हुआ इंसानियत के रूप में लोगों में..

ये सभी कहानियाँ कितना कुछ कहती हैं हमसे, समाज को उसका ही एक गन्दा चेहरा भी दिखलाती हैं. सभी कहानियां आपके साथ लम्बे समय तक रहती हैं और कुछ कहानियां तो आपको हांट भी करती हैं. ये एक बेहतरीन कहानियों का संग्रह है. वैसे आंटी की किताब के ऊपर मैं किसी भी तरह की टिप्पणी  करूँ, मैं इसके लिए खुद को काबिल नहीं मानता. हाँ, लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि ये सभी कहानियां ख़ास हैं. मैं अपनी बात करूँ तो मुझे इस किताब की वैसे तो हर कहानियां बहुत अच्छी लगी लेकिन "किस्सा बाँकेबाबु के जाने का", "अक्शीरा" और "झील में तैरती बत्तखें" मेरी सबसे प्रिय कहानियां हैं. 

और हाँ, अंत में जाते जाते एक बात और कह दूँ, इस किताब के ऊपर लिखी गयी ये शायद पहली पोस्ट( या आर्टिकल कह लें या समीक्षा कह ले) है. और इसके लिए मुझे आंटी ने डंडे का डर नहीं दिखाया - कि लिखो तुम मेरी किताब की समीक्षा.बल्कि किताब पढ़ने के बाद मैंने खुद से ये पोस्ट लिखी है. देर हो गयी बहुत ये मानता हूँ, लेकिन वो कहावत है न - देर आये दुरुस्त आये..बस वही !
और हाँ, आंटी चाहे तो इस पोस्ट के बदले मुझे एक फाइवस्टार इनाम के रूप में दे सकती हैं. :) 

फ़िलहाल तो आप इस किताब को अपने अलमारी से निकालिए और पढ़िए. और यदि आपने अभी तक किताब नहीं खरीदा है (क्या सच में? ) तो जल्दी से नीचे दिए गए दोनों लिंक में से किसी एक पर जाकर किताब बुक करवाइए और पढ़िए और पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया बताइये....






P.S : इस साल के शुरुआत में और भी कई किताबें मैंने खरीदी हैं जो बेहतरीन हैं. उनके बारे में भी लिखना है, लेकिन धीरे धीरे. सभी किताबों के बारे में यहाँ बातें करूँगा. तब तक के लिए...Stay Tuned ! :) 

पहले के गर्मी के दिनों की बात ही कुछ और होती थी. हमारे लिए खूबसूरत मौसम होता था गर्मियों का. गर्मी परेशान तो करती थी लेकिन गर्मियों की छुट्टी का हम बेसब्री से इंतजार करते थे. कहीं घुमने जाना हो या घर पर ही बैठ कर टेपरिकॉर्डर में गाने सुनना, कॉमिक्स पढ़ना या फिर दिन भर घर में धमाचौकड़ी मचाना. एक डेढ़ महीने के लिए स्कूल की छुट्टी और हमारी सिर्फ मस्ती होती थी.

बचपन में हम नानी के घर रहते थे. दोपहर में हमें बाहर निकलने की सख्त मनाही थी. बच्चे गर्मी के दोपहर बाहर लू में न खेले और घर के अन्दर ही रहे, इसके लिए घरवाले जाने कैसी कैसी कहानियाँ बनाकर हम बच्चों को डरा देते थे. सबसे मजेदार जो धमकी मिलती थी घरवालों से वो ये.. “जाओ न, बहार जाकर खेलो..तुमको लकड़सुंघा आकर उठा कर ले जाएगा...”. ये जाने कितने बच्चों ने सुना होगा, हमनें तो सुना ही था.. कि बदमाशी करोगे तो लकड़सुंघा आएगा और लकड़ी सुंघा कर तुम्हें बोरा में बंद कर के ले जाएगा. और हम बच्चे इस बात को सच मान ले इसके लिए कितने उदाहरण हमें दिए जाते थे... “जानते हो उस मोहल्ले से उस बच्चे को उठा कर परसों ले गया था लकड़सुंघा...”. हम सच में डर जाते थे. कभी दोपहर में कोई भी अनजान व्यक्ति मोहल्ले में घूमते दिखाई देता और उसके हाथ में अगर कोई बोरा या थैला होता तो हम उसे शक की निगाहों से देखने लगते...जाकर घर में बोलते... “देखो बाहर लक्कड़सुंघा आया है..”. इस तरह की जाने कितनी बातें उन दिनों हम बच्चे लोग सुनते थे.

बाहर तो जाने की इजाज़त नहीं थी, तो हम गर्मियों की दोपहर घर में ही बंद रहते...सभी खिड़की दरवाज़े बंद कर, परदे वगैरह गिरा देते और कमरे में बिलकुल अँधेरा कर देते.. और जितने भी काम होते सब निपटाते एक के बाद एक. फिर चाहे वो स्कूल से मिला गर्मियों का होमवर्क हो या फिर भाई बहनों के साथ मिलकर कोई खेल खेलना, या कॉमिक्स, नंदन, चम्पक और नन्हें सम्राट पढ़ना, तो कभी ड्राइंग करना तो कभी अपने स्टाम्प कलेक्सन की तरफ ध्यान देना...और कुछ न समझ में आये अगर तो घोड़े बेच कर सो जाना..

मेरे लिए लेकिन गर्मियों की छुट्टियों की ज्यादा यादें अपने सरकारी कवार्टर की हैं, जहाँ हम 1994 में रहने आये थे. कवार्टर में गर्मी की दोपहर हमारे लिए बड़ी अच्छी और राहत वाली रहती थी. जाने क्या ख़ास बात थी हमारे कवार्टर की, कि बहार कितनी भी गर्मी हो, चाहे कितना भी लू चल रहा हो लेकिन हमें गर्मी का एहसास तक नहीं होता था. शायद उसकी दो प्रमुख वजहें थीं.. पहला तो हमारा कवार्टर ग्राउंड फ्लोर पर था और आसपास खूब पेड़ थे. घर के आगे अमलतास का विशालकाय पेड़ तो घर के पीछे आम का विशाल पेड़. हमारा कवार्टर राजवंशी नगर इलाके में था, जो कि गवर्नर हाउस और सचिवालय जैसे प्रमुख इलाकों से बिलकुल पास था, जिसकी वजह से बिजली की कटौती शायद ही कभी होती थी. गर्मी के दिनों में पूरे पटना में बिजली की चाहे जितनी भी लोड शेडिंग होते रहे, हमारे इलाके में कभी कभार ही बिजली जाया करती थी. इन सब वजहों से हमारा कवार्टर गर्मियों के दिन हमें राहत देता था. मेरा कमरा जहाँ बाबा आदम के ज़माने का लोहे का पंखा लगा था, वो खासकर बड़ा ठंडा रहता. उसकी वजह वही पंखा था, जिसके सामने बाकी के दो कमरे में लगे नए पंखे एकदम फीके थे. एकदम ठंडी हवा आती थी उससे. कवार्टर छोड़ते वक़्त मैंने तो बड़ी जिद की थी माँ से, कि ये पंखा साथ लेते चलते हैं. लेकिन माँ ये कहकर नकार दी, सरकारी सामान है..नहीं ले जा सकते.

कवार्टर में गर्मियों की छुट्टी में मेरा सबसे प्रिय काम में से एक था, अपने पुराने बिगड़े हुए मर्फी के टू-इन-वन को रिपेयर करने की कोशिश करना...जहाँ तक मुझे याद है मैंने ये काम 1995 की गर्मियों में शुरू किया था. घर में मैं, मेरी छोटी बहन मोना और सीमा दीदी, लगे रहते थे टू-इन-वन के पीछे. तरह तरह से इसे ठीक करते..कभी चलता तो कभी रुक जाता..लेकिन हम हार नहीं मानते थे. आखिर पूरे दिन का समय रहता था हमारे पास. माँ और पापा के ऑफिस जाते ही हम अपने काम में लग जाते, और फिर जब हमारी मेहनत की वजह से टेपरिकॉर्डर ठीक हो जाता तो एक अलग ही ख़ुशी होती थी.

अगले साल यानी 1996 में घर में दो शादियाँ थीं..एक तो मेरी मौसी की, और एक सीमा दीदी की, जिनके साथ मिलकर मैं टेपरिकॉर्डर ठीक करता था. दोनों शादियाँ मई के महीने में ही थी, दस पंद्रह दिनों के अंतराल पर, और पूरे महीने शादी में ही बीत गया था. शायद शादियों में डेक पर गाने सुनने की आदत लग गयी हो मुझे या जाने क्या सुरूर चढ़ा था, वापस आकर मैंने सबसे पहला काम किया था कि अपने टू-इन-वन को अच्छे से चेक करवाया और दुसरे बड़े दुकान में रिपेयरिंग के लिए दे दिया. उस दुकान वाले ने जाने क्या जादू किया था, टेपरिकॉर्डर बिलकुल अच्छा बजने लगा था. मेरी तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. उसी दिन मैंने उसी दुकान से एक नयी कैसेट खरीदी थी, जो मुझे आज भी याद है... ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ और ‘मासूम’ फिल्म का डुएट कैसेट था वो.

कुछ महीनों तक टू-इन-वन ठीक ठाक चला लेकिन फिर इसमें दिक्कतें आने लगी. लेकिन फिर भी खींच तीर कर अपने उस पुराने टू-इन-वन को मैंने तीन साल और चलाया. कभी कभी टेपरिकॉर्डर चलते चलते बंद हो जाता तो मैं खुद ही उसे ठीक करने बैठ जाता. 1999 तक मैंने गाने अपने मर्फी वाले टू-इन-वन में ही सुने, बाद में उसी साल हमारे पास बीपीएल का छोटा टेपरिकॉर्डर आ गया था.

शायद ये बीपीएल का ही टेपरिकॉर्डर था जिसके वजह से मेरी गाने सुनने की आदत लगी. इस टेपरिकॉर्डर के आने से पहले मुझे गाने सुनने में ख़ास दिलचस्पी नहीं रहती थी. साधन भी ख़ास नहीं था मेरे पास कि गाने सुनूँ. मर्फी का टेपरिकॉर्डर अपने मर्जी का मालिक था, कभी चलता तो कभी नहीं चलता. लेकिन नए टेपरिकॉर्डर के आने के बाद मेरी गानों में दिलचस्पी एकाएक से काफी बढ़ गयी.

हमारे कवार्टर का बरामदा, जहाँ हम गर्मियों
की दोपहर खेलते थे. तस्वीर में मेरी बहन निमिषा है 
कवार्टर में गर्मियों की दोपहर हम अपने बरामदे में भी खेलते थे. हमारा बरामदा ज्यादा बड़ा तो नहीं था, लेकिन फिर भी हम दोपहर को वहाँ कई सारे खेल खेलते, जिसमें सबसे ज्यादा प्रमुख थे कितकित, और क्रिकेट. उन्हीं दिनों मैंने नया बैट और नया डूज़ बॉल खरीदा था. हम दिन में बरामदे में ही क्रिकेट खेलते. बरामदा का फर्श जो पहले से ही जर्जर स्थिति में था, जहाँ-तहाँ फर्श टूटी हुई थी जिसके ऊपर सीमेंट और बालू का पैच लगा दिया गया था...और हमारे क्रिकेट खेलने की वजह से जाने कितने बार सीमेंट के पैच टूटते, और फिर अगले इतवार पापा फिर से फर्श बनवाते..लेकिन हम फिर भी बाज़ नहीं आते, और फिर से क्रिकेट खेलते, फर्श फिर से टूटता.

शायद गर्मी की दिनों में मेरा बरामदा और मेरा टेपरिकॉर्डर, मेरे लिए सबसे बड़ा सुकून था..शायद मुझे और कोई बात इतना नॉस्टैल्जिक नहीं करती जितना ये दोनों...नॉस्टैल्जिक करने की वैसी तो और भी बहुत सी वजहें हैं, कुछ तो यहाँ लिख चुका हूँ और कुछ शायद कभी अगले पोस्ट में शेयर करूँगा.

इनके अलावा, मुझे गुलज़ार साहब की ये नज़्म भी बड़ा नॉस्टैल्जिक सा फील देती है. लगता है जिस गर्मियों को हम जानते थे वो इसी नज़्म में है, अब कहाँ वैसी गर्मियों की दोपहर रही.


सन्नाटों में लिपटी वो दोपहर कहाँ अब
धुप में आधी रात का सन्नाटा रहता था

लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
'चार पाई' बुनने वाला जब,
घंटा घर वाले नुक्कड़ से,कान पे रख के हाथ,इक हांक लगाता था
"चार..पाई...बनवा लो..."
खस-खस की टटीयों में सोए लोग अंदाजा कर लेते थे...डेढ़ बजा है!

दो बजते बजते जामुनवाला गुजरेगा
"जामुन...ठन्डे..काले...जामुन"
टोकरी में बड के पत्तों पर पानी छिड़क के रखता था
बंद कमरों में....
बच्चे कानी आँख से लेटे लेटे माँ को देखते थे,
वो करवट लेकर सो जाती थी.

तीन बजे तक लू का सन्नाटा रहता था
चार बजे तक "लंगरी सोटा" पीसने लगता था ठंडाई
चार बजे के आसपास ही हापड के पापड़ आते थे
"लो..हापड़..के...पापड़..."
लू की कन्नी टूटने पर छिड़काव होता था
आँगन और दुकानों पर!

बर्फ की सील पर सजने लगती थी गंडेरियाँ
केवड़ा छिड़का जाता था
और छतों पर बिस्तर लग जाते थे जब
ठन्डे ठन्डे आसमान पर
तारे छिटकने लगते थे!
मैंने निर्मल वर्मा को पढ़ना बहुत बाद में शुरू किया. शायद सबसे बाद. 2008 का ही वो साल था जब मैंने पहली बार उनकी कोई कहानी पढ़ी थी. पहले भी कितने लेखकों को पढ़ते आया था, लेकिन शायद निर्मल वर्मा पहले ऐसे लेखक थे जिन्हें पढ़ने के बाद पहली बार मन किया कुछ लिखने का. आप कह सकते हैं मेरे लिए कुछ भी लिखने की प्रेरणा सिर्फ और सिर्फ निर्मल वर्मा ही रहे हैं. उनकी हर कहानी में खुद को कहीं न कहीं खोज ही लेता हूँ मैं. सबसे बड़ी खूबी होती है निर्मल वर्मा की कहानियों की कि आपको एक ऐसा माहौल मिलता है, एक ऐसा दृश्य जहाँ आप विश़ूअलाइज़ कर सकते हैं. खुद को वहाँ लेकर जा सकते हैं. जैसे “वे दिन”पढ़ते हुए लगता है कि आप भी प्राग की गलियों में घूम रहे हैं...

मेरे लेखन में मेरे लिए हमेशा से निर्मल वर्मा एकमात्र इन्सपिरेसन रहे हैं. आज भी जब कभी लगता है कुछ नहीं लिख पा रहा हूँ, या कभी मन बेहद व्यथित लगता है तो मैं निर्मल वर्मा को पढ़ लेता हूँ. मेरे बैग में हमेशा उनकी कोई न कोई किताब रखी मिलती है. जब भी दिल करता है उनकी कोई किताब उठाता हूँ और बीच बीच से कहीं भी कुछ पढ़ना शुरू कर देता हूँ..

बहुत लोग कहते हैं कि निर्मल वर्मा की कहानियां अवसाद और उदासी से भरी होती हैं. लेकिन जाने क्यों मुझे इनमें बड़ा सुकून महसूस होता है. इनकी कहानियों में खुद को बड़े आसानी से रिलेट कर लेता हूँ मैं. वो अवसाद और उदासी, पात्रों का वो अकेलापन मुझसे बातें करता है. निर्मल वर्मा की कहानियां मेरे जैसों को इस कदर पसंद आने के पीछे शायद बहुत सी वजहें भी हैं... उनकी कहानियों में अपने दुखों से जूझते..घर को याद करते..एक अजीब से व्याकुलता.. बेचैनी और तड़प से जूझते युवा हैं तो वहीँ एक तरफ उनकी कहानियों में चाहना भी है. एक सबसे बड़ी खूबी है निर्मल वर्मा की कहानियों की, कि ये लोगों के सुख और दुःख को पहचानना चाहती है. सुख क्या है और दुःख क्या है इसके बीच के अंतर को समझाती है. ना होते हुए भी होना, जब कोई नहीं होता है तो हम क्या करते हैं.. उस ऐब्सन्स को खोजती है इनकी कहानियाँ. आइसलेशन और विरह भी खूब अच्छे से दीखता है इनकी कहानियों में. एक अजीब टाइप की वीरानी भी महसूस होती है. लेकिन इन सब वीरानियों, आइसलेशन और दुखों के बावजूद निर्मल वर्मा की कहानियां बेहद शान्त, ठहरी हुई और कुछ सोचती हुई सी लगती है, जहाँ हम कहीं न कहीं सुकून पा लेते हैं, कहीं न कहीं खुद को खोज लेते हैं. एक अलग तरह की फ्रेशनेस महसूस होती है निर्मल वर्मा की कहानियों में, शायद सबसे अलग शैली में लिखी होती है इनकी कहानियाँ और यही वजह भी है कि सभी साहित्यकारों में निर्मल वर्मा बिलकुल अलग नज़र आते हैं..आज उनके जन्मदिन पर उनकी कुछ बातें शेयर कर रहा हूँ...

इस दुनिया में कितनी दुनियाएं खाली पड़ी रहती हैं, जबकि लोग गलत जगह पर रहकर सारी जिंदगी गंवा देते रहती हैं.  
अगर मैं दुःख के बगैर रह सकूँ, तो यह सुख नहीं होगा, यह दूसरे सुख की तलाश होगी, और इस तलाश के लिए मुझे बहुत दूर नहीं जाना होगा, वह स्वयं मेरे कमरे की देहरी पर खड़ा होगा, कमरे की खाली जगह को भरने..
"मैं कभी कभी सोचता हूँ, इंसान जिंदा किसलिए रहता है – क्या उसे कोई और बेहतर काम करने को नहीं मिला?" 
मुझे इश्वर में विश्वास नहीं है, फिर भी जाने कैसे एक विचित्र स्नेहिल-सी कोमलता मेरे अस्तित्व के गहनतम तल में भाप-सी उठने लगती है, जब मैं अपने लेखन में कभी 'इश्वर' का नाम लिखता हूँ! 

देखिए मुझे नहीं लगता कि मैंने समझ-बूझकर हिन्दी में लिखना तय किया । मेरे लिए उस भाषा में लिखना ही सहज था जिसमें मैं अपने परिवार वालों से बात करता था और फिर मेरी परवरिश भी इस तरह से हुई थी कि तमाम महत्वपूर्ण प्रभाव, मेरा धर्म और वे महत्वपूर्ण उत्सव जिनमें मैं भाग लेता था, सभी की जड़ें उस भाषा के परिवेश में गहरी गड़ी थीं जिसने मेरे भावनात्मक संसार को प्रभावित किया । इसलिए संसार को देखने के इन दो तरीकों से मुझे कोई विरोधाभास नहीं दिखा-एक तो उस अंग्रेजी के माध्यम से जिसमें मेरी शिक्षा-दीक्षा हुई और दूसरा उस हिन्दी के माध्यम से जिसमें अपनी गहन भावनाओं को व्यक्त करने का भारी दबाव मेरे अन्दर मौजूद था। तो चुनाव करने जैसी बात नहीं थी-
यदि कोई मुझसे पूछे कि मैं लिखने से क्या कहना चाह रहा हूँ तो मैं कहूँगा, कि मैं अपनी निजी, प्राइवेट अनुभूति को एक ऐसे चरम बिंदु तक खींच ले जाना चाहता हूँ, जहां वह 'सार्वजनिक कर्म' बने बिना भी, दुनिया की सतह पर एक प्रेत-छाया की तरह प्रकट होती रहे, कुछ-कुछ उन दिवास्वप्नों-सी, जिन्हें लोग सड़क पार करते हुए, बस की प्रतीक्षा करते हुए या सिर्फ़ अकेले में बैठे हुए देखते रहते हैं...

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि जिसे हम अपनी ज़िन्दगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते हैं, वह चाहे कितना भी यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उसमें हमें शान्ति मिलती है. वह चाहे कितना उबड़खाबड़ क्यों न रहा हो, हम उसमें एक संगती देखते हैं. जीवन के तमाम अनुभव एक महीन धागे में बिंधे जान पड़ते हैं. यह धागा न हो, तो कहीं कोई सिलसिला नहीं दिखाई देता, सारी जमापूँजी इसी धागे की गाँठ से बंधी होती है, जिसके टूटने पर सबकुछ धुल में मिल जाता है. उस फोटो अल्बम की तरह, जहाँ एक फोटो भले ही दूसरी फोटो के आगे या पीछे आती हो, किन्तु उनके बीच जो खाली जगह बची रह जाती है, उसे भरनेवाला "मैं" कब का गुज़र चूका होता है. वे हमारे वर्तमान के नेगेटिव हैं..सफ़ेद रौशनी में पनपनेवाले प्रेत...जिन्हें हम चाहें तो बंद स्मृति की दराज से निकालकर देख सकते हैं. निकालने की भी जरूरत नहीं..एक दृश्य को देखकर दूसरा अपने आप बहार निकल आता है, जबकि उनके बीच का रिश्ता कब से मुरझा चुका होता है.. 

"इन पहाड़ों के पीछे जाने क्या होगा?" जब हम छोटे थे, तो अपने घर के बरामदे में खड़े होकर अक्सर एक दूसरे से यह प्रश्न पूछा करते थे. उन दिनों छुट्टी लेकर पहाड़ों पर जाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी - वे हमेशा हमारे संग थे, हमारे खेलों में, हमारे सपनों में. तब पहाड़ों की शक्ल, उनकी भाव-भंगिमा बिलकुल अलग, दूसरे किस्म की थी, जैसे माँ की शक्ल जो बच्चों की आँखों में होती है, वह दूसरों के लिए नहीं होती. उसकी पहचान ही अलग होती है.                  शिमले का वह घर बरसों पहले छुट चूका है, उसके बाद न जाने कितने छोटे-बड़े हिल-स्टेशनों के होटलों में रहना पड़ा है, किन्तु आज भी जब किसी अकेली, निर्जन पगडण्डी पर चढ़ता हुआ घास के किसी अनजाने द्वीप पर साँस लेने ठिठक जाता हूँ, तो आँखें असीम विस्मय से भर उठती हैं. पहाड़ों की अलंघ्य, अभेद्य उचाईयों की तरह इस प्रश्न की रहस्यमयता आज भी वैसी ही बनी है, जैसे कभी बरसों पहले बचपन में थी. 

एक उम्र होती है जब आदमी एक औसत सुख के दायरे में रहना सीख लेता है. उसके परे देखने की फुर्सत उसके पास नहीं होती, यानी उस क्षण तक महसूस नहीं होती जब तक खुद उसके दायरे में...आपने अक्सर देखा होगा कि जिसे हम सुख कहते हैं वह एक ख़ास लम्हे की चीज़ है - यों अपने में बहुत ठोस है, लेकिन उस लम्हें के गुज़र जाने के बाद वह बहुत फीका और कुछ कुछ हैंगओवर सा धुंधला लगता है. किन्तु जिसे हम दुःख या तकलीफ या यातना कहते हैं, उसका कोई ख़ास मौका नहीं होता...मेरा मतलब है वह हुबहू दुर्घटना के वक़्त महसूस नहीं होती. ऐन दुर्घटना के वक़्त हम बदहवास से हो जाते हैं, हम उससे पैदाहोने वाली यातना के लिए कोई बना-बनाया फ्रेम नहीं ढूँढ पाते जिसमें हम उसे सही-सही फिट कर सके. किसी दुर्घटना का होना एक बात है...उसका सही सही परिणाम अपनी पूरी ज़िन्दगी में  भोगना  या भोग पाने के काबिल हो सकना - बिलकुल दूसरी बात. यह असंभव है..ऐसा होता नहीं. मेरा मतलब है..अपने को बार-बार दूसरे की स्थिति में रखकर उतने ही कष्ट के कल्पना करना, जितना दूसरे ने भोग था.    

उपन्यास लिखना एक तरह से आँखमिचौनी का खेल है, किंतु उसके नियम उस खेल से बिलकुल उलटे हैं जो हम बचपन में खेलते थे. लिखते हुए हम घंटों इधर-उधर भटकते रहते हैं, जो ढूँढ रहे हैं, वह कहीं दिखाई नहीं देता, फिर अचानक वह किसी झाड़ी की ओट में, किसी चट्टान के पीछे बैठा दिखाई दे जाता है, किन्तु यह वह नहीं है जिसे हम ढूँढ रहे थे, यह वह है जो हमारी तलाश में बैठा था...

कहानी लिखते समय महसूस होना कि तुम मृत्यु के इस ओर से ज़िन्दगी को देख रहे हो, इन समस्त खंडित टुकड़ों को याद करते हुए जिनसे तुम्हारी ज़िन्दगी की संरचना बनी है - उन्हें तरतीब देना, जो दरअसल जीने के क्षणों की तरतीब नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्राइवेट पैटर्न है, जो तुमसे पहले के चारों तरफ फैले संसार को एक अनूठी अर्थवत्ता में बाँधता है, एक आर्कीटाइप छविओं का जला, जिसे हर कहानी अपने भीतर तानती है. मैं उस जले के भीतर हूँ, जितना भीतर हूँ, उतना सच है. मेरा सच नहीं, उस कहानी का सच, जिसके भीतर मैं हूँ..


हर आदमी को अपनी ज़िन्दगी और अपनी शराब चुनने की आज़ादी होनी चाहिए..दोनों को सिर्फ एक बार चुना जा सकता है बाद में हम सिर्फ उसे दोहराते रहते हैं, जो एक बार पी चुके हों या एक बार जी चुके हैं... 




हैप्पी बर्थडे , निर्मल वर्मा..  

दो दिन पहले की एक घटना के बाद बिहार के बारे में काफी कुछ पढ़ने के बाद खुद भी कुछ लिखने की इच्छा हुई. हालांकि बहुत सी बातें हैं जो इस पोस्ट में मैं कवर नहीं कर पाऊंगा और बहुत कुछ फिर भी कहना बाकी रहेगा. लेकिन फिर भी इसे आप मेरी इंस्टेंट प्रतिक्रिया कह सकते हैं.

सबसे बड़ा सवाल आता है कि बिहार की ऐसी ख़राब छवि क्यों है? क्या सच में इतना भयानक है बिहार कि यहाँ आने से लोग डरे? क्या यहाँ सिर्फ लॉ-ब्रेकर्स ही भरे पड़े हैं? क्या सिर्फ पूरा जंगलराज है बिहार में? नहीं.. ऐसा कुछ नहीं. बिहार के बारे में कुछ निगेटिव बातें पढ़कर, कुछ लोगों की गलत हरकतें देखकर पूरे बिहार के लिए ये राय बना लेना कि बिहार का मतलब सिर्फ अपराध और जंगलराज है, उतना ही गलत है जितना `स्लमडॉग मिलानिअर’ देखकर बाहरी मुल्कों के कुछ लोगों का भारत के प्रति ये राय बनाना कि भारत में सिर्फ स्लम एरिया हैं. असल में बिहार उतना भी ख़राब या भयानक नहीं है जिस तरह की छवि उसकी बनाई गयी है. जिस तरह से किसी प्रदेश के किसी शहर में होती अपराध की घटनाओं से वो पूरा प्रदेश अपराधी नहीं हो जाता ठीक वैसे ही बिहार के लिए कह सकते हैं न. हमारे प्रदेश में भी कुछ अपराधी और गलत लोग हैं लेकिन यकीन मानिए उनसे कहीं ज्यादा तादाद में अच्छे लोग भरे पड़े हैं. लेकिन अच्छे लोगों की अच्छाई के परवाह किसे है? मीडिया भी कहाँ अच्छाई दिखाती है? बुराई जो कहीं भी हो उसे तो बहुत तवज्जो देकर दिखा देती है और अच्छाई दबी रहती है. बिहार के बारे में भी जाने कितने ऐसे भ्रम हैं लोगों में.

एक सबसे बड़ी वजह है जिससे लोग बिहार को भयानक बताते हैं, वो है यहाँ पर अपराध की घटनाएं. सबसे पहले यहाँ पर एक बात मैं क्लियर कर दूँ, कि बिहार सभी राज्यों में क्राइम रेट के मामले में चौबीसवें स्थान पर हैं. इसे यहाँ देखें. हाँ मैं मानता हूँ, बेशक यहाँ पर अपराध एक सबसे बड़ी चिंता की वजह है लेकिन क्या ये सिर्फ बिहार की समस्या है? बाकी सारे प्रदेश क्या पूरी तरह से शान्तिप्रिय हैं? सच तो ये है कि जितने क्रूर और जघन्य अपराधिक घटनाएँ  दूसरे प्रदेशों में होती रही हैं उतना शायद बिहार में कभी नहीं हुआ है. कुछ साल पहले तक बिहार में सही मायने में अपराध की घटनाएं बहुत ज्यादा थीं लेकिन इन पंद्रह बीस सालों में बहुत बदलाव आया है. लेकिन अब भी बहुत से लोग समझते हैं कि बिहार में वही बातें होती हैं. मीडिया के साथ साथ इस दुष्प्रचार में  बिहार के लोग भी शामिल हैं जो पंद्रह बीस साल पहले बिहार छोड़ कर दूसरी  जगह रहने चले गए हैं और मुड़ के देखा भी नहीं है बिहार की तरफ, लेकिन सोचते यही हैं आज भी कि बिहार में अब तक सिर्फ जंगलराज है. अरे सालों पहले तो हमारे भारत को भी जाने क्या क्या कहा जाता था..”लैंड ऑफ़ स्नेक चार्मर्स और न जाने क्या क्या. लेकिन बदलाव आया या नहीं आया? वैसे ही बिहार में भी  धीरे धीरे बदलाव आ रहा है और हालात तो पिछले कई सालों में काफी सुधर गए हैं. लेकिन लोग अभी भी वही पुराना बिहार  देखते हैं, कुछ कुछ ठीक वैसे ही जैसे `नमस्ते लन्दन' फिल्म में उस  अँगरेज़ के जेहन में वही पहले वाला भारत था.

मीडिया या किसी फिल्म में दिखाए जाने वाले अपराध सिक्के का सिर्फ एक पहलू है, जो हर जगह पर लागू होता है. पर अगर पूरी और सच्ची तस्वीर देखनी है तो सिक्के के दोनों पहलू देखे जाने बेहद ज़रूरी हैं. कभी कभी मुझे लगता है बिहार के मामले में `बद अच्छा, बदनाम बुरा’ की कहावत बिलकुल सटीक बैठती है. हम खुद पर मज़ाक बहुत अच्छे से लेते हैं, और शायद यही वजह है कि अपने इस `सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ के चलते हम खुद की कमियों पर सबके साथ हँसते हुए अपनी अच्छाइयों को जताना-दिखाना भूल जाते हैं. हम बिहार के पिछड़ेपन की बात करने वालों को कभी ये नहीं बता पाते कि बिहार में भी कितना कुछ नया हो रहा है या हो चुका है.

लोगों में एक और भय होता है कि बिहार में ट्रेन से यात्रा करना “सेफ” नहीं है. सही में समझ नहीं आता ऐसा क्यों है आखिर? हो सकता है लोगों को ये लगता हो कि बिहार में ट्रेन पर सफ़र करते समय कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है कभी भी. लोग जबरदस्ती रिजर्व्ड बोगी में घुस कर आपकी  सीट आपसे हथिया लेंगे और आपको डब्बे के बाहर फेंक देंगे. करीब पिछले पंद्रह सालों से मैं ट्रेन पर सफ़र कर रहा हूँ लेकिन कभी इस तरह की बातें ना ही तो मेरे मन में आई और नाहीं मुझे दिखाई दी हैं. बहुत पहले अगर कभी होता रहा होगा ऐसा तो उसकी जानकारी मुझे नहीं है. वैसे शुरू शुरू में मुझे याद है, मुझे घर वालों से और जान पहचान के लोगों से ये हिदायत उत्तर प्रदेश के लिए मिलती थी, कि रात में सोना तो खिड़की बंद कर के सोना.. हाथ में घड़ी पहन कर मत सोना. खासकर पटना-सिकंदराबाद ट्रेन में मिलती थी ये हिदायत..कि बक्सर से लेकर कटनी तक सावधान रहना. मैं भी शुरू में एक दो बार इन बातों का ध्यान रखता था फिर बाद में खुद ही लगने लगा ये क्या बेवकूफी है? हम थोड़े कोई डाकुओं के इलाकों के बीच से गुज़र रहे हैं.

कुछ लोगों को ये भी अखरता है कि जब बिहार से ट्रेन गुज़रती है तो यहाँ ट्रेन के डब्बों में लोकल पैसेंजर घुस जाते हैं. लेकिन इनमें से भी कोई लड़ाई-झगड़ा करने वाला व्यक्ति नहीं होता है. सभी ऑफिस जाने वाले कामकाजी व्यक्ति होते हैं जो डेली ट्रेन के माध्यम से ही ऑफिस आते जाते हैं. बिहार में लोकल ट्रेन लगभग नहीं होने की वजह से और ऑफिस समय पर पहुचने की जल्दबाजी की वजह से लोग ऐसा करते हैं, लेकिन ये भी आपसे मार पीट नहीं करते. ना ही आपकी सीट छीन कर वहाँ खुद बैठ जाते हैं. अक्सर बिहार जाते समय बक्सर से डेली पैसेंजर ट्रेन पर चढ़ना शुरू कर देते हैं. पर्सनली मैं अपनी बात करूँ तो मुझे आज तक कभी कोई दिक्कत नज़र नहीं आई इसमें. बल्कि अगर मैं सीट पर पैर पसार कर लेटा भी रहता हूँ और सामने से कोई डेली पैसंजर इधर उधर सीट खोजता नज़र आता है तो अपने पैर समेट लेता हूँ ताकि वो बैठ सके. ये मैं इसलिए नहीं करता कि मैं भी बिहार का हूँ और ये चढ़ने वाले भी वहीँ के, या मैं डरता हूँ, बल्कि इसलिए ऐसा करता हूँ कि मुझे भी लोगों ने पहले मदद की है सीट देकर. वैसे देखा जाए तो अक्सर तो ये डेली पैसेंजर जो बेहद पढ़े लिखे और अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं और काम के सिलसिले में जो हर रोज़ ट्रेन में सफ़र करते हैं उन्हें बाहरी प्रदेश के लोग किस तरह से ट्रेन में ट्रीट करते हैं, इसपर कोई शिकायत नहीं करता. खुद वे डेली पैसेंजर्स  भी नहीं शिकायत करते जिनके साथ बदसुलूकी होती है. यकीन मानिए आप जितना उदाहरण दे पाएंगे बिहार के लोगों के बदसुलूकी की, उससे ज्यादा मैं उदहारण दे सकता हूँ कि ट्रेन पर सो-काल्ड अनुशासित लोगों का क्या व्यवहार होता है. लेकिन क्या जरूरत है एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की? हाँ बहुत बार परीक्षार्थी हँगामा भी कर देते हैं, और कभी कभी एक्जाम के सीजन में स्टूडेंट्स बोगी में घुस कर जबरदस्ती सीट पर बैठ भी जाते हैं, लेकिन क्या ऐसा सिर्फ यहीं के परीक्षार्थी करते हैं? अगर आप ऐसा सोचते हैं तो बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है आपकी. एक बार बैंगलोर से मुम्बई जाने के क्रम में मैंने पूरी रात सीट पर बैठ कर बिताई थी, जबकि रिजर्व्ड सीट थी मेरी. ये महज एक उधाहरण है. आपको और चाहिए?

हाँ मुझे भी बहुत परेशानी भी हुई है खुद अपने ही प्रदेश के लोगों से, लेकिन अक्सर मदद भी मिली है. लेकिन मैं उन परेशानियों को क्यों याद रखूं? अच्छे लोगों ने जो मदद दी उन्हें क्यों नहीं याद करूँ? और मदद भी ऐसी वैसी नहीं. मुझे और मेरी बहन को हैदराबाद से हावड़ा जाना था. हमारे पास तत्काल का वेटिंग टिकट था जो कि अंतिम समय तक कन्फर्म नहीं हुआ था. जाना जरूरी था तो हम चढ़ गए ट्रेन पर. बैठते कहाँ लेकिन? इधर उधर जगह देख ही रहे थे कि कहाँ कुछ देर बैठा जाए, पूरा सफ़र तो फिर जागते हुए ही पूरा करना है, कि तभी सामने बैठे तीन लड़के जो बिहार के थे और देखने से आवारा किस्म के लग रहे थे, मुझसे पूछ बैठे..कौन सा नंबर बर्थ है आपका? मैंने हिचकते हुए कहा वेटिंग में है कन्फर्म नहीं है. उनमें से एक ने कहा तो बैठ जाइए न इधर ही. वहां आसपास के दूसरे सहयात्री जो थे, उन्होंने इस पर ऐतराज़ भी किया..लेकिन वे तीनों अड़े रहे हमारे लिए कि वेटिंग में टिकट है, थोड़ा मदद कर दीजिये. उन तीनों के तीन बर्थ नहीं थे बल्कि दो बर्थ थे और उन तीनों ने अपना एक बर्थ हमें दे दिया था, और बोले आप दोनों इस बर्थ पर आराम से सो जाइए . हमें सुलाकर वे तीनों एक बर्थ पर पूरी रात जाग कर बातें करते आये. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं मेरे पास, जैसे एक और कि जब हम पढाई करते थे और लगभग सभी दोस्तों का वेटिंग टिकट था, तब पूरे एक डब्बे के यात्रियों ने ना सिर्फ हमारे सामान का ख्याल रखा बल्कि जगह भी दी बैठने और सोने के लिए.

बहुत ज्यादा ट्रेन यात्राएं की हैं मैंने, बहुत से लोग तो ऐसे भी मिले हैं जो अपने सीट पर से टस से मस नहीं होते. ज़रा सा उनके सीट पर बैठ कर तो देखिये, ऐसा लगता है जैसे कितना बड़ा खजाना उनका लुट गया हो. ऐसी शक्ल बनाते हैं जैसे आपने उनके सीट पर बैठकर कितना बड़ा अपराध कर दिया हो. एक ख़ास राज्य है जहाँ के प्रति मुझे शुरू में ये लगता था कि लोग बहुत ज्यादा सेल्फिश और हद दर्जे के बदतमीज़ होते हैं इस मामलें में और सच में सिर्फ इस एक वजह से मैं उस पूरे राज्य से बहुत नफरत करने लगा था. दो इतने बुरे अनुभव मिले हैं मुझे, ऐसा सुलूक कि आज तक नहीं भूल पाता. और उनमें से एक बार तो मुझे और मेरे दोस्त सुदीप को उसी राज्य के लोगों की वजह से रात भर टॉयलेट के पास चादर बिछा के बैठ के आना पड़ा था. फिर बाद में जब सफ़र के दौरान कुछ अच्छे लोगों के अनुभव मिले तो बात समझ आई, कि हो सकता है ऐसा इत्तेफाक रहा हो मेरा कि जब भी सफ़र किया है अधिकतर उस राज्य के वैसे ख़राब यात्रियों से पाला पड़ा है. इसका मतलब ये तो नहीं कि पूरा राज्य ही वैसा है.

छोटी सी बात है, कभी अगर मेरी बात होगी किसी से, तो मैं अपने अनुभव में वो बुरे अनुभव को शामिल क्यों करूँगा? मैं तो अपने अच्छे अनुभव ही शेयर करूँगा लोगों से. हाँ, बुरे अनुभव की बातें बाद में भी होती रह सकती हैं लेकिन वो भी पोजिटिव तरीके में.. सिर्फ ये नहीं कि फलां जगह सिर्फ बुराइयां ही हैं. जाने क्यों लोग आज भी ज्यादा जोर देकर बुरे अनुभव शेयर करते हैं. क्या सच में जो बिहार में रहे हैं या कुछ दिनों के लिए थे यहाँ उन्हें सिर्फ बुरे अनुभव ही हुए हैं? कभी कोई अच्छा अनुभव नहीं हुआ? एक छोटी सी बात बताता हूँ.  जब शुरू शुरू में मैं  दिल्ली आया था, मुझे दिल्ली बिलकुल पसंद नहीं था. बैंगलोर से दिल्ली जब मुझे आना था, तो मेरे दो तीन बैंगलोर के दोस्तों ने मुझे ताकीद किया था, अरे दिल्ली जा रहे हो यार, बड़े “कमीने” किस्म के लोग रहते हैं दिल्ली में. बिलकुल यही  शब्द इस्तेमाल किया था उस लड़के ने जिसकी वजह से उस दिन मेरी बहुत बड़ी बहस हो गयी थी उससे. वो कभी दिल्ली आया नहीं तो सिर्फ सुनी सुनाई बातों पर ऐसे कैसे बोल सकता है दिल्लीवासियों के लिए? हाँ दिल्ली आने के बाद मुझे भी यहाँ के लोगों से  बहुत दिक्कतें हुई  थीं, बहुत शिकायतें भी मैं करता था शुरू में लेकिन बाद में रहते रहते यहाँ की अच्छाइयाँ भी दिखने लगीं और यहाँ ऐसे लोग भी मिलने लगे जिनका व्यवहार मेरे प्रति बहुत ज्यादा अच्छा रहा. मदद भी मिली उनसे. तो अब कभी अगर कोई बाहरवाला यहाँ आकर मुझसे दिल्ली की बातें करेगा , तो मैं उसे दिल्ली के बारे में बताने के क्रम में यहाँ की बुराइयाँ क्यों गिनाऊंगा?(जबकि दुनिया की हर जगह की तरह यहाँ भी लाखो बुराइयां हैं) बल्कि उसे यहाँ की अच्छी बातें बताऊंगा. यहाँ जो भी मुझे बुरे लोग मिले हैं उनकी बातें ही क्यों करूँगा मैं? यहाँ जो अच्छे लोग मुझे मिले हैं उनकी बातें सब से कहूँगा. अच्छाई और बुराई हर जगह, हर शहर, हर देश में होती हैं. हम उस निगेटिविटी में जाएँ ही क्यों कि सिर्फ बुराइयां ही हाईलाइट करें हम और अछाइयाँ छोड़ दें? जब आप देश से बाहर जाते हैं तो क्या जोर  देकर देश की बुराइयाँ गिनाते हैं, या यहाँ की जो अच्छाइयाँ हैं, वो गिनाते हैं?


मैं ये नहीं कहता कि मेरा बिहार सबसे अच्छा है, बहुत सी कमियां हैं हमारे प्रदेश में लेकिन कमियां कहाँ नहीं होती? लेकिन सिर्फ कमियों को ही क्यों उजागर करना? आज बिहार की एक ख़राब प्रदेश की जो ये छवि है , सच मानिए तो इसमें चार तरह के लोगों का बहुत हाथ है. पहला तो वे राजनेता जो अपनी घटिया राजनीति से बाज नहीं आते, दूसरा वो मीडिया जो पाजिटिविटी  के बजाये अक्सर निगेटिविटी  पर जोर देता है, तीसरा वे बिहारी जिनकी हरकतों से बिहार बदनाम होता है और चौथा वे बिहारी जो बिहार के तो हैं लेकिन बिहार के सन्दर्भ में हमेशा बुरी बातें ही करते हैं. उनके मुँह  से आप हमेशा शिकायत सुनेंगे यहाँ के प्रति. शिकायत तो फिर भी ठीक है, हमेशा तरह तरह की अफवाहें फैलाते भी रहते हैं यहीं के लोग. अपनी बात स्पष्ट करने के लिए एक छोटा सा उदाहरण  देता हूँ -इंजीनियरिंग के दिनों में जहाँ रहता था वहां शिल्पा सीडी स्टोर के नाम से एक दुकान थी . दो भाई चलाते थे दुकान. उन दोनों ने एक दिन यूँ हीं मुझसे पूछा “अच्छा भैया, आपके घर में कितनी  बन्दूकें रखते हैं आप लोग?” मैं एकदम हतप्रभ रह गया. ये कैसा सवाल था? मैंने कहा..आप ये क्या पूछ  रहे हैं भैया? उन्होंने कहा...हाँ बिहार में  तो लोग रखते हैं न बन्दूक घर में? मैंने थोड़ा तीखा जवाब दिया “बन्दूक घर में क्यों रखेंगे लोग? हम क्या डाकुओं से घिरे रहते हैं हमेशा? ये कहा किसने आपसे?”. उनका जवाब था, कि “मुझे आपके वे दोनों दोस्त (मेरे दो मित्र जिनका नाम मैं पब्लिक नहीं करना चाहता) बता रहे थे जब उनसे मैंने पूछा.. कहने लगे हाँ...हमारे घर में तो खूब बंदूकें हैं, सबके घर में रहना जरूरी है”. मैंने उसे आशवस्त किया कि ऐसा कुछ भी नहीं है, वे दोनों सिर्फ मजाक कर रहे थे. लेकिन बाद में मैं सोचने लगा क्या इमेज बना दी है इन दोनों ने बिहार के प्रति इस आदमी के मन  में. एक और बेहद अच्छे मित्र थे मेरे जो बिहार के ही थे लेकिन बचपन से बैंगलोर में ही रह रहे थे. उन्होंने मुझसे एक दिन पूछा था...अच्छा अब पटना के रोड कैसे हैं? अब तो दिक्कत नहीं होती न अब तो सड़कें भी बन गयी हैं? मेरा जवाब था...”अब कैसे हैं मतलब? ख़राब कब थे? पिछले पंद्रह सालों में एक बार भी गए हैं पटना आप? वहां जाकर देखिये फिर बातें कीजिये पटना के बारे में.


हम बिहारी बेहद मेहनती और ईमानदार लोग हैं. फिर चाहे वो दिल्ली और पंजाब में रिक्शा चलाने वाला या सब्जी बेचने वाला हो या फिर बैंगलोर में बैठा कोई सॉफ्टवेर इंजिनियर या फिर कोई आईएएस... हम चोरी चकारी कर के पेट नहीं भरते बल्कि मेहनत करते हैं, जहाँ भी जिस पोजीशन पर रहे. आप इस सोच से भी बाहर आईये कि बिहार सिर्फ गुंडे मवालियों का प्रदेश है..साहब हमारे यहाँ एंटी-सोशल एलिमेंट्स हैं ठीक वैसे ही जैसे विश्व के दूसरे जगह होते हैं, प्लीज इस बात के लिए हमें स्टीरियोटाइप मत कीजिये बल्कि इस बात को अब मान भी लीजिये कि बिहार एक तरह से भारत का टैलेंट कैपिटल है. शायद सबसे ज्यादा संख्या में IAS. IIT, IIM में बिहार के छात्र रहते हैं. बड़े कंपनियों में भी बड़े पोजीशन पर अक्सर बिहारियों को आप पाएंगे. ये किसी से छुपा नहीं है कि बिहार के लोग बहुत मेहनती होते हैं. कुछ एंटी-बिहारी को छोड़ कर, आप कर्णाटक या उधर के क्षेत्रों में पूछ कर देखिये बिहार के बारे में, लोगों की राय होती है कि बिहारी एक इंटेलिजेंट कम्युनिटी है. हम किसी भी माहौल में ढल जाते हैं. नए जगह जाकर वहाँ की बुराइयां नहीं करते. वापस घर आते हैं तो उस जगह की अनगिनत अच्छी बातें हम अपने परिवार वालों से, दोस्तों से करते हैं. हाँ, रोज़गार के सिलसिले में पढ़े लिखे से लेकर गाँव देहात में रहने वाले लोग पलायन कर के दूसरे शहरों में रहने आते हैं. लेकिन क्या ये स्थिति पहले भारत की नहीं थी? जाने कितने लोग पलायन कर के भारत के बाहर काम के सिलसिले में गए थे. फिर देश की हालत सुधरी या नहीं? ठीक वैसे ही अब बिहार में भी रोज़गार के अवसर मिल रहे हैं. वहाँ के लोग वहीँ रह कर अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं. धीरे धीरे ही सही अच्छा बदलाव आ तो रहा है. लेकिन आज के संचार क्रान्ति के युग में भी लोग बिहार की  इस बदलती छवि से अनजान हैं, या ये कहें वो जानना ही नहीं चाहते बिहार के इस बदलते रूप के बारे में

हम बिहारी बेहद मिलनसार और आत्मीय होते हैं. हम रिश्ते बनाना जानते हैं. शायद पूरी दुनिया में बिहारी लोग ही आपको ऐसे मिलेंगे जो कुछ दिनों के...और कई बार एक-दो बार के ही किसी आत्मीय से व्यवहार को एक रिश्ते की डोर में पूरी सहजता से बाँध लेंगे. हमें कोई हमसे बड़ा या छोटा दीखता है तो हमें उन्हें “जी” कहकर बुलाना अजीब लगता है. हम इसके बजाये उन्हें रिश्तों (दीदी, भैया, चाचा, चाची) में बाँध लेते हैं और हम सिर्फ़ रिश्तों की ऐसी डोर बाँधते ही नहीं है, बल्कि खुद को उसमे लपेट भी लेते हैं...कुछ इस तरह कि एक-दो हल्के-फुल्के झटकों से ये बँधन टूटने की बात तो छोडिये, ढीले भी नहीं होते. हमारे यहाँ रिश्तों में फोर्मलिटी नहीं होती, बेहद सिम्पल और सहज रिश्ते होते हैं. हमारे यहाँ दोस्तों को भी परिवार का दर्जा मिलता है. कॉलोनी में लोग आज भी एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल होते हैं. एक परिवार के तरह रहते हैं आज भी. मेरे घर के आसपास रहने वाले लोग पड़ोसी कम और परिवार ज्यादा लगते हैं. लोग अक्सर बिहारियों का मजाक उड़ाते हैं कि हममें तमीज नहीं होती. बहुत लोग ये सोचते हैं कि बिहारी सिर्फ गाली देकर बात करते हैं. तो उन्हें ये बताना चाहूँगा, नहीं साहब, हमनें कभी कोई गाली इन्वेंट नहीं की है. हैं लोग जो गुस्से में गाली देकर बात करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे दूसरे शहरों में. हाँ ये गलत है लेकिन सिर्फ बिहार के लोगों के प्रति ऐसा पक्षपात की सोच क्यों राखी जाती है? ऐसी सोच रखने वाले लोगों को ये भी बताना चाहूँगा, आज भी हमारे तरफ हम बड़ों के नमस्ते का जवाब उनके पावँ छू कर देते हैं. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला व्यक्ति रिश्तेदार है या कोई पड़ोसी या पापा के ऑफिस में काम करने वाला कोई साथी, बड़े बुजुर्ग के हम पावँ छूते हैं. इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि आप कहाँ हैं, भीड़-भाड़ वाली जगह में भी हम पाँव छूने में कभी शर्म महसूस नहीं करते बल्कि फख्र महसूस होता है कि हम ऐसा करते हैं.

लोग अक्सर बिहारियों की भाषा पर भी हँसते हैं, मजाक भी बनाते हैं. लेकिन सबकी अपनी अपनी अक्सेन्ट हैं..तमिल, पंजाबी और मलयाली..लेकिन फिर भी मजाक सिर्फ बिहारी भाषा का ही क्यों बनाया जाता है? जितनी कॉमेडी बिहार के भाषा की की जाती है, उतनी किसी और भाषा की नहीं होती. लोग ये नहीं समझते ये अक्सेन्ट एक प्रदेश का प्रतीनिथित्व करती है. हाँ, हमारा अक्सेन्ट थोड़ा अलग जरूर है लेकिन बुरा नहीं. हर किसी का अपना अक्सेन्ट अलग होता है, फिर चाहे वो मद्रासी हो, बंगाली या गुजराती.. कोई भी हिंदी बोले तो गौर कीजिएगा  उसके अक्सेन्ट पर. लेकिन मजाक सिर्फ बिहारियों का ज्यादा उड़ाया जाता है. मैं मानता हूँ कि बिहारी “मैं” नहीं बल्कि “हम’ कह कर बात करते हैं, “करो” की जगह “कीजियेगा” बोलते हैं. लेकिन ये सुनने में ज्यादा अच्छा नहीं लगता? एक पंजाबी या बंगाली अपने अक्सेन्ट में हिंदी कहता है तो किसी को तकलीफ नहीं होती लेकिन वहीँ अगर एक बिहारी अपने अक्सेन्ट में हिंदी कहता है तो वो वीयर्ड और फनी हो जाता है. क्यों? कैसे? यकीन मानिए बिहार के लोग हिंदी भी बहुत अच्छी बोलते हैं और अंग्रेजी भी. लेकिन अफ़सोस लोग आज भी समझते हैं भाषा के मामले में भी हम बिहारी पिछड़े हुए हैं. बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में बिहार के लोगों को आज भी बड़े गंदे नज़रों से देखा जाता है. बिहारियों को लॉ-ब्रेकरेस कहने वाले लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि जाने कितने सालों से आज तक सबसे ज्यादा रेसिज़म का शिकार बिहारी कम्युनिटी ही होती है. फिर चाहे वो मुंबई में बिहारियों के प्रति गुंडागर्दी हो या दिल्ली में बिहारियों के लिए “बिहारी” शब्द को गाली के रूप में इस्तेमाल करने की बात हो.

लेकिन दोस्तों बिहार के बारे में सुनी सुनाई धारणाओं से बाहर निकालिए. यकीन मानी, बिहार बहुत ही अच्छा प्रदेश है, और जैसा की मीडिया या कुछ लोगों ने फैला रखा है, उसके विपरीत रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम लोग बहुत ख़ुशी ख़ुशी और सुरक्षा से रहते हैं. आपको एक आश्चर्यजनक सच बताऊँ? बिहार में रहना आपके लिए शायद दिल्ली, नॉएडा, गुडगाँव से ज्यादा सुरक्षित है. यकीन नहीं आता आपको? आँकड़े यही बताते हैं. आपको ये लगता होगा अगर कि हम बिहार के लोग डरे दुबके से घर में बैठे रहते हैं. बाहर सड़कों पर गुंडाराज चलते रहता है तो इस धारणा को  तोड़िए. यहाँ दिन तो क्या रात में भी गोलियां नहीं चलती रहती हैं. कम से कम मैंने तो नहीं देखा है ऐसा. न पहले कभी नज़र आया और अब तो खैर पहले से काफी डेवेलपमेंट हुआ है बिहार में. खैर, ये बातें सब भी व्यर्थ जाने वाली हैं.. लेकिन बिहार के बारे में बातें करना जरूरी हैं. मन में और भी जाने बहुत सी बातें हैं...वो फिर कभी. .


फ़िलहाल एक बेहद अच्छा आर्टिकल जो मैंने कुछ महीने पहले Quora पे पढ़ा था, मुझे बड़ा पसंद आया. उसके कुछ भाग मैं शेयर कर रहा हूँ. समझने की कोशिश कीजियेगा इस आर्टिकल को और रिलेट करने की कोशिश कीजियेगा.

Ever heard people saying, “Bihari jaisi baat mat kar”? All the rickshawallah, Chaiwallah, Autowallah in Delhi has a generic name: “Bihari”. It’s a fashion in our country to abuse Bihar and Biharis. We have seen how Mumbai handled bhaiyas in recent times. In many parts of the country, people don’t have good reputation about Bihar and it is shown in their attitude. Ever thought why is it so? And more importantly, do Indians deserve to have such feeling about one state of their country. Let’s analyse few of the typical feelings about Bihar and Biharis: Bihar is poor, backward land of the cow belt Yes, Bihar is poor. It is a part of BIMARU states. But does India deserve to raise a finger? 
India has the largest number of people below poverty line in this world. India is at 127th place among all the countries in terms of HDI. We are better off than few countries in Sub Saharan Africa. The status of Bihar in India is somewhat comparable to the status of India in the world. Isn’t it? 
Ever seen the local trains passing through Bihar, it’s dirty. Most village and town in Bihar is dirty and unhygienic. But does India deserve to raise a finger? The cleanliness at Patna railway station is not worse than that at Delhi station. The civic sense of people in Pune is not better than that of people in Purnea. The road and traffic condition in Kolkata is even worse than that at Dhanbad. Collectively we Indians are worst in civic sense. We are good at claiming our rights but bad at exercising our duties.

The status of Bihar in India is somewhat comparable to the status of India in the world. Isn’t it? 
While in Germany, once I encountered a person, who actually felt good in making fun of India. Suddenly I recalled how people feel good in making fun of Bihar back there in India. They are poor. They are backward. They don’t work at home but once outside, they work hard. They are very intelligent individually, but collectively they are dumb. They always look for short cuts. They are arrogant. They don’t have civic sense. They don’t know how to behave..... Now try to replace “They” with “Indians” once and then with “Biharis”. You will be amazed.






आज सलिल वर्मा जो मेरे सलिल चाचा हैं, उनका जन्मदिन है. उनके जन्मदिन पर इस ब्लॉग पर पेश कर रहा हूँ उनके कुछ नज़म, कुछ कवितायें जो उन्होंने इधर उधर लिख कर रख दी थीं. दो तीन कवितायें उनके ब्लॉग से ली गयी है.


मेरी बहना

कबीर रोए थे चलती चाकी देख
खुश हूँ मैं, खुश होता हूँ हमेशा
इसलिए नहीं
कि चाकी पर गढे जाते हैं अनगिनत शिल्प,
इसलिए कि इसमें मुझे अपना परिवार दिखता है
एक धुरी
उसके गिर्द घूमता सारा कुटुंब
और बनते हुए खूबसूरत रिश्ते.
बहन है मेरी
दो भाइयों से छोटी और दो से बड़ी
एक धुरी की तरह बीच में
हम सब विस्थापित हो गए
बस वो टिकी है वहीं
कहीं नहीं जाती, बस इंतज़ार करती है
होली में, गर्मी की छुट्टी में, छठ में
सब आयेंगे तो बैठेंगे,
मिलकर शिकायत-शिकायत खेलेंगे.
फोन पर बात करते ही
समझ जाती है सिर्फ हेलो कहते ही
कि मैं आज बहुत उदास हूँ,
कि मैं आज बहुत खुश हूँ,
कि आज बहुत याद कर रहा हूँ उसे
बात करते करते रो देती है
और रोते रोते हंसने लगती है!
अब तो उम्र के साथ पीली पड़ गयी है
हमारे परिवार के रिश्तों की किताब
मगर उसमें आज भी खुशबू है उससे...
जब भी पलटता हूँ सफहे उस किताब के
उसका चेहरा दिखता है
बहनें ऐसी ही होती हैं!!


धूप छाँव का चक्कर 

ये धूप-छाँव का चक्कर भी अजब चक्कर है!
धूप सर्दी की बड़ी खुशनुमा होती है दोस्त
और गरमी में सुकूँ देता है साया-ए-दरख़्त
ग़मों को देखके डरना, ख़ुशी से इतराना
सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी नज़र का फेर है दोस्त
भूल जाओ कि खुशी साया है और दुःख है धूप
दोनों बस एक ही सिक्के के हैं जुड़वाँ पहलू
बात मेरी सुनो और ज़िन्दगी को जमके जियो

ये धूप-छाँव का चक्कर भी अजब चक्कर है!!

रस्साकस्सी 

देख लेना रात में कल मैच इक,
रस्साकसी का,
दर्मियाँ दो टीम के
सन् बीस दस और बीस ग्यारह साल की.
बात इक पक्की है लेकिन देख लेना
एक और एक मिलके जो होते हैं ग्यारह
जीत जाएँगे वही यह मैच
क्योंकि फिक्स है यह!!

चंदा मामा कोई कहता है जो तुझको
चाँद सी महबूबा कोई बतलाता है
मर्द है तू या औरत है अब तो बतला दे!!


कितनी सर्दी है 

दिन चढ आया
बाहर फिर भी अंधेरा था.
सूरज बाबू कहीं दिखाई नहीं दे रहे.
छत पर चढ़कर मैंने जब आवाज़ लगाकर उनसे पूछा
वो बोले, मैं लेटा हूँ बादल की तोशक के अंदर
चुपचाप दुबककर,
मुझको मत डिस्टर्ब करो तुम
जाकर तुम भी सो जाओ.
बाहर तो देखो,
बाहर कितनी सर्दी है!!

ख़्वाब सुबह के

ख़्वाब सुबह के सच होते हैं.
जग जाते हैं लोग मगर
सुबह को अक्सर
ख़्वाबों के आने से पहले.
मेरी आँखों में तो कोई सुबह नहीं
बस इक तवील सी रात पड़ी है
फैली है तारीक़ी सदियों से सदियों तक.
आओ मिलकर ख़्वाबों के सच होने का क़ानून बदल दें!!

की होल 


रात के स्याह अंधेरों के पीछे क्या है
इक दूर तलक ख़ामोश ख़लाओं के उस पार कहीं
दरवाज़ा है अंधियारे का,
चट्ख़नी लगाकर बंद किया.
"की होल" पे आज इस चाँद के आँख जमाकर देखो
हमसा कोई दिखता है उस पार कहीं?

डाउरी 


ब्याह बेटी का रचाने,
या अदा करने को कर्जा कोई
रात इस आसमाँ के गुल्लक में
चाँद के सिक्के जमा करती है
और फिर दिन के निकलते ही वो
भाग जाती है परबतों के परे.
कितना ग़ुस्सैल है सूरज
वो छीन लेगा सब!

मैच 

जाने कब हैं मैच की सब तारीखें पक्की 
जाने किसके बीच मैच खेला जाएगा टस किया है 
किसने ये आकाश की जानिब चाँद का सिक्का 
गिरे ज़मीं पर तभी तो कुछ मालूम पड़ेगा!!

चाँद की दुल्हन 

चाँद की दुल्हन,
जड़े हुये तारों की, सुरमयी चादर ओढे
घूँघट में शर्माती, झुककर आई ज़मीं पर
बर्फ के उजले बालों वाले
पेड़ों और पर्बत से मिलकर
पैरों को छूकर
लेने आशीष बुज़ुर्गों का धरती पर!

स्माईली

ये स्माईली भी बड़ी सख़्त जान है कम्बख़्त
ऐसा लगता है किसी शख्स ने कटोरे में
नम से दो क़तरे सजाकर उँडेल रक्खे हों...
अश्क़ हैं या जमी हुई शबनम??

ताजमहल
तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू
बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था
सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी
उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून
कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था
कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी.
आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल
दौलत-ए-दो जहाँ से बढके पोटली है मेरी
संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है
सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.
पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

रेलगाड़ी 


यही गाड़ी मुझे परिवार से अपने मिलाती है,
यही गाड़ी मुझे परिवार से फिर दूर करती है.
कभी अच्छा नहीं लगता है उनको छोड़कर आना
मगर ये नौकरी भी क्या करें मजबूर करती है!

और एक त्रिवेणी.. 

बातें करती आँखें 

चुप तुम थीं, चुप मैं भी तहस, दोनों चुप थे. 
झगडा था, और ख़ामोशी की शर्त लगी थी

उफ़, कितनी बातें करती हैं आँखें तेरी!


चलते चलते एक खूबसूरत शेर 


ज़ुबानें भी फिसल जाती हैं देखो देखकर उनको,
कोई 'सो स्वीट' कहता है, कोई 'नमकीन' कहता है!


जन्मदिन मुबारक हो चचा...हैप्पी बर्थडे !!

दिल्ली में रहने के जो थोड़े सुख हैं उन सब में ऑटो एक्सपो में भाग लेने का सुख सबसे बढ़कर है. जो नहीं जानते उनके लिए बता दूँ कि ऑटो एक्सपो हर दो साल पर लगने वाला एक मेला है जिसमें कारों की प्रदर्शनी लगाईं जाती है. दो बार से ये ऑटो एक्सपो ग्रेटर नॉएडा के एक्सपो मार्ट में लगाया जा रहा है. उसके पहले ये हर साल प्रगति मैदान में लगता आया था. जब तक प्रगति मैदान में प्रदर्शनी लगती थी, कोई दिक्कत नहीं होती थी. हर कुछ एकदम व्यवस्थित. लेकिन पिछले दो बार से जाने किस वजह से ऑटो एक्सपो को ग्रेटर नॉएडा स्थित एक्सपो मार्ट ले जाया गया. सब कुछ उधर एकदम अव्यवस्थित सा लगा मुझे. इस साल हालांकि पिछले साल की बहुत कमियों को दूर किया गया था लेकिन फिर भी व्यवस्थाओं में काफी कमियां दिखीं. लेकिन कमी चाहे जितनी भी हो व्यवस्थाओं में, अगर आपको गाड़ियों के प्रति लगाव है तो इन बातों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.

मेरे लिए इस ऑटो एक्सपो के कुछ ख़ास आकर्षण थे. सबसे पहला तो फोर्ड की मस्तंग का भारत में लांच होना. जब से गाड़ियों से लगाव हुआ है तब से ही मस्तंग के प्रति दीवानगी रही है. संयोग भी ऐसा कि हॉल में घुसते ही सबसे पहले फोर्ड के हॉल पर ही नज़र गयी. फोर्ड के पेवेलियन में मस्तंग को देखना किसी सुख से कम नहीं था. दिल तो काफी किया कि पास जाकर देखूं, गाड़ी के इंटीरियर को करीब से देख सकूँ. लेकिन इसकी इजाज़त नहीं थी. फोर्ड मस्तंग की लॉन्चिंग भी एकदम ग्रैंड तरीके से की गई थी . मस्तंग को भारत में लॉन्च  करना फोर्ड के लिए एक बड़ा कदम था. मस्तंग के साथ ही अमेरिकन मसल की पहली एंट्री हुई है भारत के मार्केट में. मस्तंग के ही बगल में डिस्प्ले पर लगी थी फोर्ड फिगो एस्पायर. अभी कुछ महीने पहले ही हमनें ये गाड़ी खरीदी है. ऐसे में एस्पायर को सेंटरस्टेज पर देखना भी किसी सुख से कम नहीं था. फोर्ड मस्तंग के अलावा ठीक उसके आगे के हॉल में शेवरले की गाड़ियाँ प्रदर्शित की जा रही थीं. शेवरले की गाड़ियों में मेरी ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रही है कभी.हाँ उनकी पुरानी गाड़ियों की बात ही कुछ और थी, लेकिन भारत में बिक रही  उनकी सभी नयी गाड़ियों के लुक ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया. ऑटो एक्सपो में शेवरले के पेवेलियन में मैं बस दो गाड़ियाँ देखने गया था. एक जो बचपन से मेरी पसंदीदा कारों की श्रेणी में रही है, कोर्वेट. और दूसरी शेवेरले कैमरो. शेवरले के पेवेलियन से ज्यादा आकर्षित मुझे हुंडई ने किया. खासकर 2025 ने. कमाल का इनोवेशन किया है हुंडई ने. हुंडई की एक और पेशकश जेनेसिस जी90 ने भी दिल जीत लिया. लगा कि हाँ हुंडई भी अब मर्सिडीज और जैगुआर को टक्कर दे सकती है.

हुंडई लेकिन भले उन गाड़ियों को टक्कर दे या तो मात भी दे दे, लेकिन भारत में कोई भी कार कंपनी मारुती सुजुकी को मात नहीं दे  सकता. कम से कम अभी तो नहीं. चाहे वो छोटी कारें हो या 4-मीटर सब कॉम्पैक्ट सिडान.. मारुती बहुत आगे है. वो भी ऐसे वैसे मार्जिन से नहीं बल्कि इतने ज्यादा मार्जिन से कि आने वाले कुछ सालों में ये गैप भर पाना दूसरी  कंपनियों के लिए नामुमकिन है. लेकिन मारुती सिर्फ नंबर एक पर ही खुश नहीं है, वो इस नंबर एक की पोजीशन को बरक़रार रखने के लिए काफी मेहनत कर रही है. मारुती ब्रेजा जो इस ऑटो एक्सपो में लांच हुई वो तो यही कहानी कहती है. मारुती ब्रेजा कॉम्पैक्ट एसयूवी की  श्रेणी में लांच हो रही है, एक ऐसी श्रेणी जिसमें अब तक मारुती की कोई गाड़ी नहीं थी. लेकिन ब्रेजा ने जैसे इस ऑटो एक्सपो में सबका ध्यान आकर्षित किया उससे साफ़ जाहिर है कि शायद जल्द ही मारुती इस श्रेणी में भी सबसे आगे बढ़ जाए.

अपने ही देश की कार कंपनी टाटा मोटर्स ने इस साल बहुत बड़े पैमाने पर अपना पेवेलियन बना रखा था. ऐसा लग रहा था जैसे पूरे एक हॉल पर वो कब्ज़ा जमाए बैठा है और साइड में मर्सिडीज, रेनो और फोल्क्स्वगें चुपचाप दुबके बैठे हैं. मैं टाटा मोटर्स के किसी भी गाड़ियों का कभी फैन नहीं रहा. परफोर्मेंस की बात नहीं करूँगा, लेकिन डिजाइन के मामले में अगर आप मेरी राय लें तो मुझे उनकी सभी गाड़ियाँ बेहद ख़राब लगती हैं. एकदम मोनोटोनस. हर गाड़ियाँ एक ही डिजाइन का एक्सटेंशन. लेकिन इस साल ऑटो एक्सपो में टाटा मोटर्स ने मुझे चौंका दिया. मेरे एक्सपेक्टेशन से कहीं बेहतर गाड़ियाँ लांच की टाटा मोटर्स ने. फिर वो स्टाइलिश हेक्सा हो या फिर काईट 5 या टाटा इंडिका को रिप्लेस करने के इरादे से उतारी गयी गाड़ी जीका. टाटा मोटर्स के अलावा जिस एक ब्रांड ने और मुझे चौंकाया और दिल भी जीता वो थी दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनी टोयोटा. टोयोटा की बेहद सफल कार इनोवा, मुझे कभी पसंद नहीं आई. असल में मुझे नफरत है इसकी लुक से. लेकिन इस साल के ऑटो एक्सपो में टोयोटा ने इनोवा को गज़ब का मेकओवर दिया है और एक नए नाम के साथ उसे बाजार में उतारा है. टोयोटा क्रेस्ता. फोर्ड मस्तंग के अलावा एक और गाड़ी जिसकी भारत में लांच होने की कब से ख़बरें आ रही थी, आख़िरकार टोयोटा ने उसे लांच कर ही दिया. टोयोटा प्रिउस, जो कि एक हाइब्रिड कार है और विश्व भर में काफी बिकने वाली गाड़ियों में से एक है.

इस ऑटो एक्सपो का एक और आकर्षण मेरे लिए था “जीप” ब्रांड का भारतीय बाजारों में प्रवेश. जीप से आप हमारे सड़कों पर चल रहे पुराने जीप से कन्फ्यूज मत हो जाइयेगा, ये वो जीप बिलकुल नहीं बल्कि प्रीमियम एसयुवी के क्षेत्र में ये एक आइकोनिक ब्रांड है. जीप की ऑफ़ रोड गाड़ियाँ मुझे पसंद आती थीं. जीप रैंगलर को देखना ऑटो एक्सपो में काफी सुखद रहा.

इस ऑटो एक्सपो में वैसे टाटा मोटर्स हो या मारुती या फोर्ड के पेवेलियन हो या फिर जीप और टोयोटा के भी पेवेलियन हो.. इनमें गाड़ियों को देखने की ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. बस आपको भीड़ से निपटना था. लेकिन खासकर तीन ब्रांड ऐसे थे जहाँ गाड़ियाँ देखने के लिए आपको आधे से लेकर एक घंटे तक लाइन में खड़े होकर इंतजार करना पड़ा था. इनमें बीएमडब्लू, ऑडी और मर्सिडीज की गाड़ियाँ थी. ऑडी और बीएमडब्लू अपने पवेलियन में सभी को प्रवेश नहीं दे रहे थे. उन्होंने एक कतार बनाई थी  और एक बार में अपने पेवेलियन में दस से पंद्रह लोगों को ही जाने की  इजाज़त दे रहे थे फिर जब वे वहां से हट रहे थे तब ही अगले दस को अन्दर जाने दिया जा रहा था. इस वजह से भी इन दोनों गाड़ियों के पेवेलियन में बस घुसने के लिए मुझे लाइन में काफी इंतजार करना पड़ा. बीएमडब्लू में करीब 20 मिनट और ऑडी में करीब 40 मिनट. लोग इरिटेट भी हो जा रहे थे कतारों में खड़े खड़े लेकिन मुझे ये सिस्टम बहुत ज्यादा पसंद आता है हर बार. ठीक है, आपको आधे पौन घंटे इंतजार करना पड़ा कतार में लेकिन जब आप गाड़ी को इत्मिनान से देख पाते हैं, अन्दर के इंटीरियर को नज़दीक से देखते हैं, स्पेसिफिकेशन और फीचर्स इत्मिनान से पढ़ते हैं तो बड़ा संतोष सा आता है मन में. तब लाइन में उतनी देर लगना अखरता भी नहीं. इस बार भी सबसे अच्छी तरह जिन ब्रांड्स की  गाड़ी देख पाया था वो बी.एम.डब्लू और ऑडी ही की गाड़ियाँ थीं. हालाँकि ऑडी से बड़ी निराशा हाथ लगी. मैं ये सोच कर गया था ऑडी की बहुचर्चित गाड़ी ऑडी सिक्यूरिटी a8 को नज़दीक से देखने का मौका मिलेगा. लेकिन ये ऑडी के पेवेलियन में दिखी ही नहीं. बाद में पता चला कि इसे पेवेलियन के पीछे बस कुछ ख़ास दर्शकों के लिए लगाया गया था. मर्सिडीज में भी लोग कतार में लगे थे लेकिन वहां भीड़ इतनी अनियंत्रित हो गयी थीं कि गाड़ियों को देख पाना लगभग असंभव सा हो गया था. मर्सिडीज के अधिकारी भी भीड़ पर वैसा नियंत्रण नहीं कर पाए थे जितनी ऑडी और बीएमडब्लू के अधिकारियों ने कर रखा था.

कुछ गाड़ियों ने तो सच में होश उड़ा दिए थे चाहे वो अपनी फोर्ड मस्तंग हो, मर्सिडीज की S500 हो या Maybach.ऑडी की Prologue हो या All Road Quattro. बीएमडब्लू की i8 हो या जैगुआर की XE. रेंज रोवर हो या Izsu Dmax. टोयोटा की Mirai हो या हौंडा की नयी Accord. हुंडई की N2025 हो Genesis...सभी गाड़ियों ने दिल जीता. वैसे तो इन प्रीमियम गाड़ियों के श्रेणी में हुंडई ने भी अपनी नयी Genesis लांच की है लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि वे टिक पाते हैं या नहीं इस श्रेणी में. प्रीमियम लक्जरी में आज भी मर्सिडीज का एकछत्र राज चलता है, और दूसरे नंबर पर हमेशा जैगुआर, बीएमडब्लू और ऑडी में भिंडत होती रहती है. इस ऑटो एक्सपो में रेसिंग गाड़ियाँ, कांसेप्ट और हाइब्रिड गाड़ियों को देखना भी मुझे खूब पसंद आया.

इस ऑटो एक्सपो में लेकिन जिस एक बात से दिल काफी दुखा, वो थी विंटेज गाड़ियों की प्रदर्शनी. विंटेज गाड़ियाँ हॉल नंबर सोलह में थी जो एक्सपो मार्ट में सबसे आखिरी कोने में था. एकदम एक कोने में वो हॉल उपेक्षित  सा पड़ा था. लोगों की भीड़ भी ना के बराबर थी वहां. गाड़ियों के रख रखाव में भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा था. जहाँ आज की नयी गाड़ियों को एकदम चकाचक लाइट में रखा गया था, हर पल वहां कोई न कोई था जो धूल का एक कण ना होने के बावजूद गाड़ियों को पोछे ही  जा रहा था. लेकिन इन गाड़ियों पर लगी धूल को साफ़ करने वाला भी कोई नहीं था. वहां वे गाड़ियाँ तमाम लाइमलाइट में थी , मीडिया से लेकर हर बड़े लोग मौजूद लेकिन इन गाड़ियों को किसी ने भी कवरेज नहीं दिया. हर साल ऐसा ही सलूक किया जाता है इन गाड़ियों के साथ. मैं ख़ास तौर पर विंटेज कारों को ही देखने आता हूँ. इस बार वैसे विंटेज गाड़ियों में भी कुछ रेगुलर गाड़ियाँ जो लगती हैं वो नहीं थी. कैडिलैक या रौल्स रॉयस के विंटेज कलेक्शन  देखने को नहीं मिलें इस बार. विंटेज गाड़ियाँ HMCI के सौजन्य से लगाईं जाती हैं. उन्हें हर बार दिल से धन्यवाद देता हूँ ऐसी गाड़ियों को यहाँ प्रदर्शित करने के लिए. विंटेज गाड़ियों के सेक्शन  के पास ही एक बॉलीवुड मोटर्स नाम से दिलचस्प स्टाल था जहाँ बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल की जाने वाली कुछ गाड़ियाँ और बाइक डिस्प्ले पर लगाई गयी थीं.

ऑटो एक्सपो में एक बात बड़ी चुभती है. नफरत भी होती है उससे. कारों के साथ खड़ी मुस्कराती खूबसूरत मॉडलों को लोग ऐसे घूरते हैं जैसे वो किसी दूसरे ग्रह की प्राणी हों. उनपर अक्सर लोग कमेन्ट भी कर देते हैं. ये बात बहुत बुरी लगती है. कुछ लोग तो मॉडल्स के साथ अपनी सेल्फी भी लेते दिख जाते हैं. वे गाड़ियों की कम और मॉडलों की तस्वीरें ज्यादा लेते हैं. गुस्सा आता है ऐसे लोगों पर. कुछ ऐसे लोग भी होते हैं एक्सपो में जिन्हें कारों से कोई मतलब नहीं होता, वो बस अपनी फोटो हर कार के साथ खिंचवाना चाहते हैं. ऐसा करने में वो ये नहीं सोचते कि बाकी के जो लोग कारों को सही मायने में देखने और सराहने आये हैं उन्हें दिक्कत होती है.

इस ऑटो एक्सपो में फिर से एक बार दुनिया के दूसरे बड़े ब्रांड ने खुद को इस शो से दूर रखा. जिनमें से फेरारी, एश्टन मॉर्टिन, लैंबोर्घिनी, पॉर्श, मसेरती जैसी कम्पनियाँ हैं. कुछ लोगों का ये भी तर्क होता है कि इस ऑटो एक्सपो में वही गाड़ियाँ प्रदर्शित की जाती हैं जिनकी देश में बिक्री है या भारतीय मार्केट में मौजूदगी है. लेकिन इन सारे ब्रांड्स के शोरूम भारत में पहले से मौजूद हैं और इनकी कारें दिखती भी हैं सड़कों पर लेकिन फिर भी इस ऑटो एक्सपो में इनमें से किसी कार ने हिस्सा नहीं लिया. दिलीप छाबरिया की गाड़ियाँ DC मोटर्स भी इस ऑटो एक्सपो में नहीं दिखी, डीसी की कारें हर ऑटो एक्सपो में मौजूद रहती हैं. भारत की पहली सुपरकार अवन्ती को डीसी ने पिछले ऑटो एक्स्पो  में लांच किया था. उम्मीद है कि अगले साल डीसी समेत बाकी सभी टॉप कंपनियों की गाड़ियाँ दिखेंगी ऑटो एक्सपो में.

ये कुछ छोटी बड़ी कमियों के बावजूद इस साल का ऑटो एक्सपो खूब पसंद आया मुझे. आखिर कितनी गाड़ियाँ देखने को मिल जाती हैं इस एक्सपो में. अब अगले बार के ऑटो एक्सपो से खूब सारी उम्मीदें हैं. देखते हैं अगले साल कौन कौन सी गाड़ियाँ आती हैं मेले में..

ऑटो एक्सपो की एक रिपोर्ट जो दो तीन भाग में है उसे आप मेरे ब्लॉग कार की बात पर पढ़ सकते हैं. अभी कुछ दिन तक ऑटो एक्सपो की रिपोर्ट वहाँ आते रहेंगे.  - ऑटो एक्सपो रिपोर्ट - १ 


दूसरे देशों की किताबें 
विश्व पुस्तक मेले में शनिवार का मेरा दिन कुछ अलग तरह से शुरू हुआ. आम तौर पर मेट्रो से आता था मैं, लेकिन शनिवार को बस से आया. इसके बहुत फायदे हुए. इन दिनों मैं सिर्फ हॉल नंबर बारह ही घूम पा रहा था, बाकी के हॉल के स्टाल देख ही नहीं पाया था. हाँ, सोमवार को जरूर सुशील भैया के साथ घूमा था लेकिन कुछ भी ध्यान से नहीं देख पाया था. शनिवार के दिन की शुरुआत मैंने हॉल नंबर छः से की, जो कि  गेट नंबर तीन के ठीक सामने था. गेट नंबर तीन के पास बस स्टॉप भी है, तो मुझे बड़ी आसानी हो गयी आने में. इस हॉल में ज़्यादातर कम्पटीशन की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स की किताबें थीं. अमेज़न ने भी किंडल के लिए एक अलग स्टाल लगाया हुआ था. इस हॉल में ज्यादातर कॉलेज स्टूडेंट्स की भीड़ दिखी. हॉल नंबर छः से निकलने पर ही सामने हॉल नंबर सात था, जहाँ अतिथि देश चीन और बाकी के देशों की किताबें लगायी गयी थी. 

चीन के सांस्कृतिक धरोहर 
थीम प्रस्तुति में सांस्कृतिक कार्यक्रम 
हॉल नंबर सात के तीन भाग थें, एक में जहाँ सिर्फ और सिर्फ चीन का साहित्य देखा जा सकता था. कुछ चीनी भाषा की किताबें जो हिंदी में अनुवाद होकर आई थी वो भी यहाँ लगाईं गयी थीं. इन किताबों की बिक्री भी हो रही थी या सिर्फ प्रदर्शनी के लिए लगायी गयी थी ये मालूम नहीं चल सका. चीन के कुछ प्राचीन धरोहर भी यहाँ प्रदर्शनी के लिए लगाये गए थे जिनमें टाइपसेटिंग और वहां के कुछ पांडुलिपियाँ प्रमुख थे. इन्हें देखना और समझना सच में अच्छा लगा. दूसरे भाग के फॉरेन पेविलन में बाकी देशों के स्टाल लगे थे जिनमें पोलैंड, जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, यूऐई और इंडोनेशिया के स्टाल प्रमुख थे. लेकिन हॉल नंबर सात का मुख्य आकर्षण जो यहाँ का था वो विविध भारती द्वारा आयोजित थीम प्रस्तुति था. यहाँ भारत के हर एक क्षेत्र जैसे दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और पूर्व क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासत प्रदर्शनी में संजोये  गए थे. हर क्षेत्र के कुछ प्रमुख साहित्यिक किताबें भी लगाईं गयी थीं. इस हॉल के बीचो-बीच एक स्टेज भी बना था जिसमें लगातार कोई न कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे थे. दो दिन में मैंने कुछ बेहतरीन संगीत कार्यक्रम का आनंद लिया यहाँ. आज दोपहर में बंगाल का लोक संगीत का एक लाजवाब कार्यक्रम था. इस हॉल में हर क्षेत्र के साहित्यिक मैनुस्क्रिप्ट भी प्रदर्शनी में लगायी गयी थीं. महाभारत और रामायण की  हस्तलिखित प्रति भी यहाँ देखने को मिली. आज कल के 'सेल्फी' के चलन को देखते हुए यहाँ एक 'सेल्फी' कोर्नर भी बनाया गया था और एक सेल्फी स्टाल भी, जहाँ आप कीओस्क के सामने खड़े होकर अपनी सेल्फी खींच कर उसे उसी समय फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट कर सकते हैं.

महाभारत, मेघदूत, श्रीमद भगवद


हॉल नंबर सात के ठीक सामने झील थी. मुझे पुराने दिन याद हो आये पुस्तक मेले के. पुराने दिन से मेरा मतलब २०१२ का पुस्तक मेला था, जब मैं दिल्ली में नया आया था. दो ख़ास दोस्तों के साथ अधिकतर दिन यहाँ बीते थे. वरुण और अनिल. पूरे दिन यहाँ बैठकर हमारी महफ़िल जमती थी. दोस्तों के साथ कितने यादगार पल बीते थे यहाँ. सलिल चचा की भी याद आई. उस साल पुस्तक मेले में पहला दिन उनके साथ ही तो बीता था. राजेश उत्साही जी के किताब के विमोचन में शामिल होने मैं यहाँ आया था. वैसे तो इस पुस्तक मेले में बहुत से दोस्त मिले लेकिन साथ घूमने वाले दोस्त में सुशील भैया के अलावा और कोई दूसरा नहीं मिला. यहाँ सोचा भी कि अगर सलिल चचा आज दिल्ली में होते तब तो उन्हें जबरदस्ती हर रोज़ खींच कर यहाँ ले आता. एक किताब तो उन्होंने मुझे तोहफे में दी थी, वो होते तो जितने किताबें खरीदता बिल उनको थमाते जाता. शिखा दीदी को भी बहुत ज्यादा मिस किया. पिछले साल लगभग तीन-चार दिन यहाँ आया था, और उनके साथ ही आवारागर्दी की थी. 

हॉल नंबर सात के आगे झील के पास आज बहुत देर तक बैठा रहा. मुझे बहुत पुराने दिन भी याद हो आये थे. पटना के पुस्तक मेले के पुराने दिन. वे दिन भी जब हम छोटे थे, और पापा के साथ जाया करते थे पुस्तक मेले में. और बाद में दोस्तों के साथ. मुझे अब तक याद है, अपने पहले पुस्तक मेले में मैंने टैगोर की और प्रेमचंद की कहानियां खरीदी थी. पटना के गांधी मैदान में पुस्तक मेले का आयोजन होता था. जब दसवीं में गया तब पहली बार पुस्तक मेले में अकेले गया था. जो किताब मैंने खुद से खरीदी थी वो थी अटल बिहारी वाजपेयी की `मेरी इक्यावन  कवितायें'. तब ज्यादा साहित्य का ज्ञान नहीं था. ज्ञान तो ज्यादा अब भी नहीं लेकिन उस समय बहुत लेखकों के नाम से भी मैं अनजान था. तो सेल्फ हेल्प, कैरिअर की किताबें ज्यादा आकर्षित किया करती थीं. हाँ गुलज़ार साहब के नज्मों से मोहब्बत उसी समय के आसपास हुई थी  और उनकी एक किताब खरीदी भी थी मैंने. दसवीं के बाद दो तीन साल तक दोस्तों के साथ पटना के पुस्तक मेले में जाता रहा था, वे सबसे मधुर याद हैं पुस्तक मेले के. उसके बाद इंजीनियरिंग में दाखिला हो गया. इंजीनियरिंग के बाद बैंगलोर में ही रहा. दिल्ली सीधे आया था 2012 में तो करीब तेरह-चौदह साल बाद मैं किसी भी पुस्तक मेले में गया था. शायद इसलिए भी 2012 का पुस्तक मेला सबसे यादगार रहेगा मेरे लिए. इत्तेफाक की बात ये भी रही कि वे सारे दोस्त जिनके साथ पटना में पुस्तक मेला जाया करता था, २०१२ के पुस्तक मेले में भी उन्हीं का साथ रहा था. 

खैर, मैं सामने अंग्रेजी किताबों वाले हॉल के सामने देखने लगा. और सोचने लगा कि यही सब पुरानी बातें याद करते रहूँगा तो शाम  हो जायेगी और कुछ भी घूम नहीं पाऊंगा. इंग्लिश वाले हॉल में वैसे तो सुशील भैया के साथ आया था लेकिन इत्मिनान से कुछ भी देख नहीं पाया था. लगभग सभी पब्लिकेशन के स्टाल यहाँ लगे हुए थे. इंग्लिश किताबों के हॉल में हिंदी वाले से ज्यादा भीड़ हमेशा रहती है. वैसे भी आज के समय में हिंदी से कहीं बड़ा पाठक वर्ग इंग्लिश का है. मैं यहाँ स्टाल देखकर बड़ा खुश हुआ. बड़े अच्छे और यूनिक तरीके से स्टाल सजाये हुए थे. कुछ स्टाल पर लोगों की मदद के लिए टच स्क्रीन कंप्यूटर या टैबलेट भी लगाये गए थे जहाँ से उस पब्लिकेशन का कैटलोग लोग देख सकें और अपनी मनपसंद किताब सर्च कर सकें. ये सच में एक बेहतरीन तरीका लगा मुझे. इंग्लिश वाले हॉल में आकर तो आँखें  जैसे चौंधिया सी जा रही थीं. हर तरफ बड़े आकर्षक कवर और रंग वाली किताबें थीं. यहाँ से कुछ खरीदना तो था नहीं, बजट की समस्या थी. लेकिन एक बात जो मैं लगभग हर पुस्तक मेले में सोचता हूँ वो कि इंग्लिश साहित्य के बारे में मुझे बहुत ही कम मालूम है. मैंने ज्यादा पढ़ी नहीं किताबें. हाँ, जो कॉलेज के समय में पढ़ी थी बस वही लेकिन उसमें भी जेफ्री आर्चर, सिडनी शेल्डन. डैन ब्राउन और मिल्स एंड बूंस टाइप किताबें ही अधिकतर पढ़ी हैं. क्लासिक शायद चार-पांच ही. हर बार पुस्तक मेले में सोचता हूँ कि  अब अंग्रेजी के किताबों की तरफ भी रुख करना चाहिए. पढ़ना चाहिए इन्हें भी. लेकिन हर बार बस सोचते ही रह जाता हूँ. हिंदी में तो लगभग सभी लेखकों के बारे में पता है, जो अभी लिख रहे हैं और पुराने लेखक भी. सभी का लिखा कैसा होता है, क्या लिखते हैं इसकी समझ है, लेकिन वो समझ अंग्रेजी की किताबों की नहीं है. देखता हूँ, इस साल सोच तो रहा हूँ कि अंग्रेजी की कुछ अच्छी किताबें पढ़ा जाएँ, लेकिन शुरुआत कहाँ से करूं ये प्रश्न है. 

मुझे हैचेट पब्लिकेशन का भी बड़ा सा स्टाल दिखा तो अन्दर जाने की इच्छा हुई. एक तरह से थोड़ा पुराना नाता जुड़ा हुआ है इस पब्लिकेशन हाउस से. बैंगलोर में शुरुआत के कुछ दिन, डेढ़ दो महीने इसी ग्रुप के लिए काम किया है. कुछ ख़ास बच्चों के मैगजीन ढूँढने थे, लेकिन वे मिले नहीं. शायद अब नहीं आते होंगे. इस हॉल में मुझे इंजीनियरिंग किताबों के भी स्टाल दिखे जिसमें जाने से खुद को नहीं रोक पाया. कॉलेज की लगभग सभी किताबें मिल गयी जिसको पढ़ा करते थे. एक हल्का नोस्टाल्जिया सा फील हुआ उन किताबों को दोबारा हाथ में लेते हुए.आज शायद नोस्ताल्जियाने का ही दिन है. एक तो पुराने किस्से याद आये वो अलग, हैचेट पब्लिकेशन ने भी कुछ याद दिलाया और अब इंजीनियरिंग के टेक्स्ट बुक देखकर कॉलेज के पुराने दिन याद आ गए थे. 

हॉल नंबर ग्यारह जिसमें अंग्रेजी किताबों के स्टाल थे, वहां से निकलने के बाद मैं सीधा हॉल नंबर चौदह की तरफ चला गया. सामने तो वैसे हॉल नंबर बारह था लेकिन वहां जाने का मतलब था पूरा समय वहीँ बीत जाना. हर कोने पर कोई न कोई जान पहचान का मिल ही जाता था हॉल नंबर बारह में. चौदह नंबर हॉल में सिर्फ बच्चों की किताबें थीं. यहाँ सच पूछिये तो मुझे ज्यादा आनंद आया. बच्चों के लिए टैगोर, भगत सिंह, लाल बहादुर शास्त्री  की किताबें थीं. इनके अलावा नर्सरी से लेकर दसवीं तक के बच्चों के लिए किताबें, सॉफ्टवेयर और सीडीज दिखीं. यहाँ भी एक मंच था, अंग्रेजी या हिंदी के हॉल में जो लेखक मंच था उससे अलग यहाँ बच्चों के लिए एक मंच था, जहाँ बच्चों के कार्यक्रम का आयोजन हो रहा था. मुझे बाकी हॉल के लेखक मंच के कार्यक्रम ने ज्यादा आकर्षित नहीं किया लेकिन यहाँ के मंच पर हो रहे कार्यक्रम में तो आनंद आ गया. शनिवार और आज के दिन भी मैं यहाँ एक बार चक्कर लगाने गया था. 

इस पुस्तक मेले में किताबों के अलावा बहुत दोस्तों से भी मिलना हुआ. पुस्तक मेले के पहले दिन ही अंजुले से मुलाकात हुई. वो जब भी दिल्ली आते हैं उनसे मुलाकात होती ही है. असल में पहले दिन उन्होंने ही फ़ोन कर के मेले में बुलाया था. पहले दिन तो अंजुले के अलावा कोई और दोस्त मिला नहीं था, हाँ पूजा उपाध्याय से एक छोटी मुलाकात जरूर हुई थी. संतोष त्रिवेदी जी से भी एक नमस्ते वाली मुलाकात हुई थी. उसके अलावा अपने दोस्त प्रकाशक शैलेश जी से और अंजनी जी से मुलाकात हुई. अंजनी जी की और मेरी खूब जमी इस पुस्तक मेले में. दूसरे दिन हमारे प्रिय मित्र सुशील भैया से मिलने का प्लान बना. मिलने का क्या, साथ पुस्तक मेले में घूमने का प्लान बना. सुशील भैया के साथ इधर दो तीन सालों से मैं पुस्तक मेले में घूम रहा हूँ. उनके साथ घूमने का एक सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि उनके साहित्य की समझ और किताबों की जानकारी का लाभ मुझे मिल जाता है. और मेले में घूमते हुए अपनी बातें लगातार होती रहती हैं सो अलग. सुशील भैया के साथ ही घूमते हुए मुलाकात हुई गौतम राजरिशी भैया से. इनसे मुलाकात तो एक सुखद आश्चर्य था. एकदम अचनाक से ही मुलाकात हो गयी भैया से. हालाँकि बस दस मिनट ही उनसे बात हो पायी, लेकिन बड़ा अच्छा लगा उनसे यूं अचानक मिल जाना. उन्होंने भी अब वादा किया है दिल्ली आने पर मिलेंगे मुझसे. 

यादगार दिन 

जो दिन पुस्तक मेले का मेरे लिए ख़ास था वो था तेरह जनवरी का दिन, जब प्रियंका दीदी और आंटी(प्रेम गुप्ता मानी) की किताबें आने वाली थी और अमित भैया-निवेदिता भाभी की पहली युगल-कविता संग्रह का विमोचन होना था. इस दिन कई दोस्तों से मुलाकात हुई. पूरे दिन तो भैया और भाभी के साथ ही बीता और इस बीच लगातार दोस्तों से मिलना होता रहा था. भैया-भाभी, आशीष राय जी के साथ आये थे. उनसे इसके पहले भी पिछले साल के पुस्तक मेले में मिलना हुआ था. भैया-भाभी के साथ बहुत ही मधुर और यादगार समय बीता. भाभी को तो बहुत कहा एक दिन और रुक जाईये लेकिन वो मानी ही नहीं. हम हिन्दयुग्म के स्टाल पर ही अड्डा जमाये बैठ गए थे. वहीँ दोस्त आते गए और मुलाकात होती गयी. निशांत मिश्रा  भैया से भी उसी दिन, वहीँ पर अचानक मुलाकात हुई. निशांत भैया से तो मुलाकात का ऐसा है कि पहले के पुस्तक मेले में कभी भी तय प्लान के मुताबिक मुलाकात नहीं हो पायी, जब भी मुलाकात हुई ऐसे ही अचानक मुलाकत हुई है. उनसे बात करना हमेशा बड़ा सुखद होता है. राजेश उत्साही जी भी उसी दिन अचानक ही मुलाकात हो गयी. वे हिन्दयुग्म के स्टाल पर कुछ किताबें देख रहे थे और मैंने उन्हें तुरंत पहचान लिया. राजेश उत्साही जी से जब से जान पहचान हुई है, हमारे मिलने का प्रोग्राम कभी नहीं बन पाया, और इस पुस्तक मेले में अचानक ही मिलना हो गया. वंदना अवस्थी जी से भी मिलना वैसा ही सुखद अनुभव था. वो एक दिन पहले पुस्तक मेले में आयीं थीं, ये बात मुझे रश्मि दीदी से मालूम चली थी. लेकिन उस दिन एक काम में फंसे होने की वजह से मैं पुस्तक मेले में जा नहीं पाया था. मुझे तो उम्मीद भी नहीं थी कि उनसे मुलाकात होगी, लगा था वो वापस चली गयी होंगी. लेकिन कुछ देर के लिए उनसे मुलाकात की. एक यादगार मुलाकात रही वो. रचना जी से भी तेरह तारीख को ही पहली बार मिलना हुआ था. ब्लॉग के माध्यम से ही उनको जानते आया था लेकिन मुलाकात या बातचीत कभी नहीं हुई थी. पहली बार रचना जी से मिलना काफी सुखद रहा. मुकेश कुमार सिन्हा भैया से भी उस दिन मुलाकात हुई. मुकेश भैया से तो वैसे किसी न किसी कार्यक्रम में मुलाकात इधर होते ही रही है. एक नए मित्र भी मिले तेरह तारीख को, गणेश राव जी. उनसे आज फिर एक छोटी सी मुलाकात हुई. उसी दिन शाम में एक यादगार मुलाकात व्योमा दीदी से हुई. उन्हें हालाँकि दोपहर में ही आना था, लेकिन वो देर शाम पुस्तक मेले में पहुंची. व्योमा दीदी से बड़े दिन से मिलने का मन था. आख़िरकार इस पुस्तक मेले में उनसे मिलना हुआ. काफी देर हमनें बात की, और बड़ा अच्छा वक़्त बीता उनके साथ. इन सब के अलावा भी बहुत से लोगों से उस दिन पहली मुलाकात हुई. शाम में प्रियंका दीदी और आंटी की किताबें आ जाने से और भैया-भाभी की किताब का विमोचन होने से शाम और यादगार बन गयी थी. इस पुस्तक मेले में तेरह तारीख सच में एक ख़ास दिन रहेगा मेरे लिए. 

किशोर जी से हर पुस्तक मेले में मुलाकात होती है, इस पुस्तक मेले में शुरुआत के दिनों में उनसे मुलाकात नहीं हो पायी थी. वो आये ही नहीं थे. शनिवार को उनसे मुलाकात हुई. उनसे मिलना हमेशा बड़ा अच्छा होता है. अच्छी बातें होती हैं हमारी. लेकिन इस बार ज्यादा बातें नहीं हो पायीं उनसे. आज भी एक छोटी सी मुलाकात हुई किशोर जी से. इन सब के अलावा, एक पुराने दोस्त नितीश से भी एक छोटी मुलाकात हुई. पहले दिल्ली में एक वो भी शामिल होता था हमारे दोस्तों की महफ़िलों में, लेकिन आजकल थोड़ा व्यस्त हो गया है. अनु दीदी से भी मिलना हुआ, लेकिन बातें उनसे भी ज्यादा नहीं हो पायीं. शिखा दीपक, जिनके नाम से पहले से वाकिफ तो था, लेकीन उनसे कोई पहचान नहीं थी. वो बड़ी देर तक हिन्दयुग्म के स्टाल पर बैठी थीं. उन्हें शुरू में पहचान नहीं पाया था मैं. बहुत थोड़ी सी बात उनसे भी हुई. 

आज पुस्तक मेले के आखिरी दिन एक बेहद खूबसूरत मुलाकात सोनरूपा जी से हुई. बहुत समय से उनसे परिचित हूँ, उनके गजलों और कवितायें हमेशा पसंद आती हैं, लेकिन कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई थी. एक छोटी लेकिन बेहद अच्छी मुलाकात उनसे भी हुई. पुस्तक मेले में आखिरी तस्वीर आज की हिन्दयुग्म के अंजनी जी के साथ ली. इस बार के पुस्तक मेले में इनसे काफी बात हुई और काफी अच्छा लगा इनके साथ वक़्त बिताना. 

कुल मिलकर ये पुस्तक मेले की ख़ास बातें मेरे लिए यही चंद यादें हैं. लेकिन सबसे ख़ास बातें इस पुस्तक मेले की प्रियंका दीदी और आंटी की किताबों का मेले में आना रहा. `अंजुरी भर' और `बुरी लड़की' ने खासतौर पर ये पुस्तक मेला मेरे लिए बहुत ख़ास कर दिया है.