देखते देखते दिनों का बीत जाना - निमिषा के लिए

पिछले सप्ताह मेरी छोटी बहन निमिषा की शादी  थी. निमिषा जिसे  मैं अक्सर "निम्मो" कह कर बुलाता हूँ, वो मेरी सबसे प्यारी बहन है. उसके प्यारे दुलारे से किस्से आप यहाँ मेरे ब्लॉग पर लगातार पढ़ते आये हैं. निमिषा की शादी थी, तो कुछ ऐसा तो उसे  तोहफे के रूप में देना था जो उसे  याद रह जाए. निमिषा के शादी में "संगीत" का भी कार्यक्रम आयोजित किया गया था. निमिषा जाने कितने महीनों से मुझे धमकाए हुए थी, "भैया, तुम्हें मेरे संगीत कार्यक्रम में डांस करना है, या तो गाना गाना है".  मुझसे भला डांस या गाना कहाँ से हो पाता? और निमिषा को ना बोलने का सवाल भी नहीं था. एक तो वो गुस्सा हो जाती, और दुसरा मुझे भी  अच्छा नहीं लगता उसके इतने प्यारे से धमकी को ना मानना. तो मैंने बीच का एक रास्ता निकाला..

मैंने निमिषा को कहा, कि तुम्हारे संगीत के अवसर पर मैं तुम्हारे लिए एक कविता लिख दूंगा. कविता का नाम सुनते ही निमिषा का चेहरा खिल उठा. एक कविता जो सिर्फ उसको डेडीकेट हो, उसके लिए बहुत बड़ी और ख़ुशी की बात थी. पहले भी जब मेरी एक पुरानी पोस्ट राखी इ अवसर पर अखबार में छपी थी, और उस पोस्ट में निमिषा का नाम था.. वो महीनों खुश रही थी इस बात से कि "मेरा नाम भी अखबार में छपा है". उसनें तो मुझे कहना भी शुरू कर दिया था, "भैया, तुम ऐसे ही मेरे बारे में लिखते रहो.. बहुत फेमस हो जाओगे..देखना तुम.."

निमिषा की इन्हीं प्यारी हरकतों और बातों को इस कविता में लिखने की कोशिश की है. कविता लिखना मेरे बस की बात नहीं है, कविता लिखने में कविता के मीटर और उसके पैमानों की धज्जियाँ उड़ा देता हूँ, लेकिन ये निमिषा के लिए थी.. बस मेरे दिल में जो भी था वो बातें इस कविता में आ गई हैं.. तो पढ़िए निमिषा के लिए एक कविता -

देखते देखते दिनों का बीत जाना
सपनों में भी तुम्हारा बचपन याद आना

मेरे चिढ़ाने पर-मैं बड़ी हो गई हूँ-
कह के वो तेरा इतराना
तेरे मस्त किस्सों कोबचपने से भरे हिस्सों को
मेरी कहानियों का हिस्सा बनाना

गुलज़ार की शायरी का तेरा वो बैंड बजाना
और फिर मासूमियत से- 'सुई गालों में कैसे पिचकेगा'-
पूछ पूछ के मेरा दिमाग़ खाना

सरस्वती पूजा के दिन को
सरस्वती माँ का बर्थडे समझना,
और बड़ी भोली शक्ल बनाकर,
तुम्हारा मुझसे पूछना,
भैया, आज तो सरस्वती माता का हैप्पी बर्थडे है,
तो फिर आज केक क्यों नहीं खाते हैं?
इस बात पर चिढ़ाने पर वो तुम्हारा रूठ जाना
और फिर एक बच्चे की तरह
चॉकलेट के नाम पर झट मानमुस्कराना

जिद कर के मुझे ऑनलाइन चैट पर बुलाना
और फिर सब बहनों के साथ
चैट पर ही अन्ताक्षरी खेलना
मेरे डांटने-डपटने पर
इतरा के तुम्हारा कहना  -
तुम उतनी दूर चले गए भैया
तो क्या अब तुम्हें तंग करने का,
मुझे अधिकार नहीं है?
और ये कहते हुए
तुम्हारा फिर से रूठ जाना...
रूठे हुए ही,
तुम्हारा फिर से मुझे धमका देना -
आओ तुम जनवरी में पटना, भैया  
तुम्हें बताएँगे तंग करना किसी कहते हैं..
और मेरा तुमसे सच में डर जाना
और तुम्हें मनाने लगना
जाने कितने ऐसे मस्त किस्सों से,
बचपने से भरे हिस्सों से
मेरी यादें सजी हुई हैं..

मेरी लिखी कहानियाँ 
तुम्हें समझ आती नहीं थी कभी,
फिर भी याद है,
तुम्हारा बड़े गौर से मेरी कहानियों को सुनना,
और फिर बड़ी मासूमियत से कहना,
'भुइया', तुम किस प्लानेट से आये हो
ज़रा ये बताना,
इतनी बकवास बातें तुम्हारी
कौन लोग पढ़ते हैं, कैसे पढ़ लेते हैं?
ट्राफिक के इतने शोर में तो,
कोई मन की बात की बात कैसे सुन सकता है?
हमें तो बस गाड़ी की आवाजें ही सुनाई देती है...

बारिश के दिन में याद है निम्मो?
जब मेरे घर से लौट रही थी तुम,  
बारिश में हमें चिंता थी, रेलवे स्टेशन जाने की,
पर तुम्हें फ़िक्र इस बात की थी, 
कि ट्रेन भींग गया बारिश में तो उसे बुखार आ जाएगा..
और फिर उसी दिन, जब ट्रेन बहुत लेट हो चुकी थी,
तुमनें कहा था,
भैया, ट्रेन चलते चलते थक गया होगा..
कहीं सुस्ताने रुक रुक गया
हमें उसे ग्लूकोस पिलाना होगा,
उसके तबियत को ठीक करवाना होगा

इन्हीं सब इलाजिकल बातों पर
मेरा तुम्हें, ‘तुम अभी बच्ची हो’ कह देने पर
तुम्हारा तरह तरह से
अपने बड़े होने का तर्क देते हुए कहना  
कि देखो, कॉलेज का अपना काम खुद करती हूँ,
अकेली आती जाती हूँ,
एग्जाम ख़राब जाने पर रोती नहीं हूँ,
ग्रेज्युट हो गयी हूँ मैं
तो हुई न बड़ी अब...
और तुम्हारे इन सब तर्कों का
मेरा सिरे से खारिज कर देना
और फिर तुम्हारा वो गुस्से में चिढ़ जाना मुझसे...
तुम्हें यूँ चिढ़ता हुआ देखते हुए मेरा मुस्कुराना
और फिर मन ही मन ये दुआ माँगना
कि इसका बचपना सलामत रखना...

कितने किस्सेकितनी यादें
मेरे तेरे मीठे रिश्ते की शैतानियाँ
हर ऐसे पल को याद करते हुए
हमारी आँखें और दिल भर आना

पर देखो तोवक़्त का पहिया घूमता रहा
और अब सपनों के काँधे पर सवार
तुम चल दी अपने नए घर द्वार 

निम्मोओ मेरी प्यारी निम्मो
बहुत याद आओगी तुम क्योंकि,
तुम तो बस तुम ही हो

हम सब की ज़िन्दगी का एक मुस्कराता नजराना...

सच में - 
 देखते देखते दिनों का बीत जाना
सपनों में भी तुम्हारा बचपन याद आना

मैं और मेरा भाँजा - १

पिछले कुछ महीनों से मेरा भांजा और मेरी बहन दिल्ली में मेरे साथ रह रहे हैं. ये समय मेरे लिए बेहद सुखद है. स्कूल की पढ़ाई के बाद जब कॉलेज में दाखिला लिया तब से अब तक लगभग अकेले ही रहा हूँ, तो ऐसे में अचानक परिवार का साथ आ जाना सुखद लगता ही है. अकेले रहने में एक सबसे बड़ी कमी जो मुझे महसूस होती थी वो था की वीकेंड हमेशा यूँहीं बर्बाद हो जाता था. मुझे क्राउड बहुत ज्यादा पसंद नहीं इसलिए वीकेंड को घर पर ही रहता था. वीकेंड पर हर कॉफ़ी शॉप और मॉल खचाखच भरे होते हैं, तो ऐसे में मैं आमतौर पर वीकडे ही आउटिंग के लिए पसंद करता था. लेकिन अब जब से बहन और भांजा आ गए हैं, आउटिंग वीकेंड पर होने लगी है .

पहले मेरे लिए तो इतवार भी कोई मायने नहीं रखता था. मेरा लगभग सारा काम घर से ही (फ्रीलांस के जरिये) होता है, तो ऐसे में इतवार बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था मेरे लिए. लेकिन जब से बहन और भांजा रहने आये  हैं मेरे साथ, इतवार ख़ास हो गया. छुट्टी का एक दिन..जैसे बचपन में होता था कि इतवार को हम देर से सो सकते थे, और घूमते थे. वैसे ही अब भी होने लगा है. मेरे भांजे का स्कूल बंद रहता है इतवार को और हम कहीं न कहीं घुमने निकल ही जाते हैं. हाँ, ये अलग बात है कि मेरे भांजे को घुमने के मामले में मेरे शौक को झेलना पड़ता है. बच्चों के पार्क में न ले जाकर उसे मैं कभी पुराना किला घुमाने के लिए ले जाता हूँ तो कभी क़ुतुब, कभी दिल्ली का दिल कनौट प्लेस और कभी पुरानी दिल्ली.

भांजे साहब को भी घूमना खूब पसंद है, और वो खूब एन्जॉय करते हैं, बस ये है कि घुमने के दौरान ये साहब इधर उधर भागते फिरते हैं और मुझे भी भगाते फिरते हैं अपने पीछे. कई बार तो दौड़ने के मामले में ये मुझे भी पीछे छोड़ देते हैं. लेकिन फिर भी अच्छा लगता है इसके पीछे यूँ भागना भी..

घुमने जाने पर तो भांजे साहब पोज देने में भी उस्ताद हैं. खूब पोज देते हैं और तस्वीरें खिंचवाना इसे बहुत पसंद है. देखिये पिछले कुछ आउटिंग की तस्वीरें..

ये है शाहरुख़ खान वाला पोज 
मैं तो भाग रहा हूँ, मामू मुझे पकड़ो अब 

पोज मैं हर जगह दे सकता हूँ...पुराने किले के सामने भी :)


मम्मा और मैं 
मामू, तुम मेरे से सीखो पोज देना 
ये देखो, ऐसे देते हैं पोज 
और ऐसे भी देते हैं पोज 

और ऐसे भी 
और इसे कहते हैं स्टाइल..
और इसे भी...
और अब मामू तुम भी सीख रहे हो पोज देना 
मामू, तुम नहीं बताओ..मैं खुद पढ़ लूँगा पुराने किले के बारे में 
मैं थक गया हूँ बहुत, अब मद्रास कॉफ़ी हाउस की कोल्ड कॉफ़ी की बारी..

और बाकी की बातें हम अगले पोस्ट में करेंगे..चलते हैं..टाटा..बाय बाय..

1965 के जंग के दौरान ली गयी लाल बहादुर शास्त्री की कुछ तस्वीरें

जय जवान जय किसान का नारा देने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की आज 114वीं जयंती है. लाल बहादुर शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए भी ईमानदारी और सादगी की नयी परिभाषा गढ़ी. वो करोड़ो भारतवासियों के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं और ईमानदारी के प्रतिक हैं. आज शास्त्री जी के जन्मदिन पर कुछ ख़ास तस्वीरें पोस्ट कर रहा हूँ जो कि 1965 के भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान ली गयी थीं(जिसे दो साल पहले दिल्ली में एक प्रदर्शनी में लगाया गया था) और साथ ही उनके सादगी और ईमानदारी के कुछ किस्से. 1965 की जंग में भारत ने पाकिस्तान को बहुत ज़बरदस्त मात दी थी. भारत के उस जीत का सबसे बड़ा श्रेय लाल बहादुर शास्त्री को जाता है.

लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय सेना का जबरदस्त नेतृत्व किया और उनके मनोबल को बढ़ाया. उनकी बातों ने भारतीय सैनिकों को एक नयी प्रेरणा दी  



लड़ाई के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री 11Corps गए तो वहाँ पाकिस्तान  के Paton Tank पर चढ़कर तस्वीर खींचवाने की तमन्ना जाहिर की उन्होंने. लेफ्टिनेंट जेनरल जे.एस.ढिल्लोन ने शास्त्री जी की मदद की टैंक पर चढ़ने में..


लाल बहादुर शास्त्री  64 Air Defense के पोस्ट पर..
लेफ्टिनेंट जेनरल जे.एस.ढिल्लोन के साथ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री 

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री लाहोर सेक्टर में सैनिकों का हौंसला बढ़ाते हुए 


पाकिस्तान के पैटन टैंक के कब्रगाह को देखकर लाल बहादूर शास्त्री ने कहा: "मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी इतनी टूटी हुई बैलगाड़ियाँ नहीं देखी"
प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में सैनिकों का हाल चाल लेते हुए 



ताशकेंत समझौता जिसके बाद शास्त्री जी का देहांत हो गया था 
चलते चलते लाल बहादुर शास्त्री के कुछ किस्से जो कि उनके सादे व्यक्तित्व की कहानी बयां करते हैं - 


  • भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. पैसे की भी दिक्कत थी और खाने पीने के सामान की भी दिक्कत थी. लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से अपील की कि वह हफ्ते में एक बार व्रत रखें. लोगों से अपील करने के पहले उन्होंने खुद व्रत रखना शुरु कर दिया था.

  • आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए शास्त्री जी ने लोगों से अपील की कि वह खर्च कम कर दे. शास्त्री जी ने खुद के खर्चों में भी बेहद कमी कर दी थी. उन्होंने घर में आने वाली बाई को आने से मना कर दिया और खुद ही कपड़े धोने शुरू कर दी है. यही नहीं, वह घर की सफाई भी खुद ही करते थे. शास्त्री जी ने उस समय अपना वेतन लेना भी बंद कर दिया था. एक बार शास्त्री जी को खुद के लिए एक धोती खरीदने की जरूरत पड़ी तो उन्होंने धोती खरीदने से इंकार कर दिया और अपनी पत्नी से कहा कि वह उनकी फटी हुई धोती को सिल दे.  

  • जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तो उनके परिवार ने उन्हें गाड़ी खरीदने की सलाह दी. गाड़ी थी फिएट की जो उस समय 12000 रुपए में आती थी. शास्त्री जी के पास ₹7000 थे और इतने में गाड़ी आती नहीं, इसलिए उन्होंने गाड़ी खरीदने के लिए ₹5000 का बैंक लोन अप्लाई किया था पंजाब नेशनल बैंक से. वह गाड़ी आज भी शास्त्री मेमोरियल, नई दिल्ली में रखी हुई है.

  • ऑफिस के कामकाज के लिए शास्त्री जी के पास शेवरले की इंपाला गाड़ी थ. एक बार उनके बेटे उस गाड़ी से कहीं चले गए. जब शास्त्री जी को ये बात पता चली तो उन्होंने पहले ये पता लगाया की गाड़ी कितनी दूर चली है और उतना किराया उन्होंने सरकारी अकाउंट में जमा करवा दिया. 

  • एक बार श्री लाल बहादुर शास्त्री ट्रेन में सफर कर रहे थे. वह उस वक्त रेल मंत्री थे. उन्होंने प्रथम श्रेणी के डब्बे में टिकट लिया. उन्होंने वहाँ देखा कि उनके जैसे ही कद-काठी का एक मरीज था. उस मरीज को उन्होंने अपनी सीट पर लिटा दिया और खुद उस मरीज की सीट पर चले गए जो कि तृतीय श्रेणी में था और वह चादर ओढ़ कर सो गए.  कुछ देर के बाद टी.टी आया और वहां उसने मरीज को सोता हुआ देखा उसे बुरा भला कहने लगा. शोर सुनकर शास्त्री जी की नींद खुल गई. उन्होंने टीटी को अपना परिचय पत्र दिया, तब टी.टी हक्का बक्का रह गया. उसनें घबरा कर कहा कि सर आप यहां क्यों बैठे हैं? चलिए मैं आपको आपकी सीट पर पहुंचा देता हूं. शास्त्री जी ने मुस्कुराते हुए उससे कहा उन्होंने कि भैया मुझे नींद आ रही है. तुम क्यों मेरी मीठी नींद में खलल डाल रहे हो?  इतना कहकर वह चादर ओढ़ कर फिर से सो गए. 

  • बात उन दिनों की है जब शास्त्रीजी लोक सेवा मंडल के सदस्य बने थे. वह थोड़े संकोची स्वाभाव के थे. अखबारों और मैगजीन में अपना नाम छपवा कर प्रशंसा पाने के इच्छुक वो बिलकुल नहीं थे. एक दिन किसी मित्र ने उनसे पूछा कि आप अखबारों में अपना नाम छपवाने से से परहेज क्यों करते हैं? उनकी बात सुनकर शास्त्री जी बोले - लाला लाजपत राय ने लोक सेवा मंडल के कार्य की सीख देते हुए मुझसे कहा था कि ताज महल में दो तरह के पत्थर लगे हुए हैं एक संगमरमर के जिसकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं और दूसरे पत्थर वह हैं जो ताज महल की नीव में लगे हुए हैं और वही पत्थर ताजमहल का असली आधार है. उनके वह सीख मुझे आज भी याद है इसलिए मैं नीव का पत्थर रहने में ही खुश हूं. 

दुर्गा पूजा - कुछ पुरानी यादें, कुछ नयी


दुर्गा पूजा के समय मौसम को कुछ तो जरूर हो जाता है. एक अलग तरह का नास्टैल्जीआ महसूस होने लगता है. सप्तमी पूजा के आते ही बचपन के वो दिन याद आ जाते  हैं जब हम पटना के दुर्गा पूजा मेले में घुमने निकलते थे. पटना में दुर्गा पूजा का एक अलग ही रंग होता है. बहुत अरसे से पटना के दुर्गा पूजा मेले में घुमने का मौका नहीं मिल पाया है. पटना में दुर्गा पूजा का मेला सप्तमी से शुरू हो जाता है. "या देवी सर्वभूतेषु रक्षा रुपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:" के मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच  दुर्गा माँ का पट खुलता है और पूजा पंडालों में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है. दुर्गा पूजा एक ऐसा समय है जब अपने शहर की खूब याद आती है. पिछले कई सालों से पटना के दुर्गा पूजा के दर्शन नहीं हो पाए हैं. इसके दो मुख्य वजह हैं.. पहली तो ये कि दुर्गा पूजा और दिवाली दोनों त्यौहार आसपास ही होते हैं तो ऐसे में दोनों त्यौहार में घर जा पाना मुमकिन नहीं हो पाता और अगर आप किसी तरह अपने शिड्यूल में दोनों त्यौहार में पटना जाना अजस्ट कर पाए तब टिकट नहीं मिल पाती. मैं बस कॉलेज के दिनों में ही दुर्गा पूजा के अवसर पर मैं पटना में था, उसके बाद दुर्गा पूजा के समय पटना कभी नहीं गया. कॉलेज में भी दुर्गा पूजा में पटना चले जाने की मुख्य वजह होती थी दोस्तों का साथ. उन दिनों कॉलेज के मेरे सभी दोस्त दुर्गा पूजा के अवसर पर ही घर जाते थे, हमें दिवाली की छुट्टी नहीं मिल पाती थी लेकिन दुर्गा पूजा में चार पाँच दिनों की छुट्टी आसानी से मिल जाया करती थी.

कॉलेज में तो हर साल दुर्गा पूजा के मौके पर पटना गया मैं, फिर जब बैंगलोर आया तब पहला साल था जब मैं दुर्गा पूजा के मौके पर पटना में नहीं था. बड़ा ख़राब लग रहा था मुझे. दुर्गानवमी के शाम किसी काम में दिल नहीं लग रहा था, अपने कमरे में बैठा मैं लैपटॉप पर पटना के दुर्गा पूजा की तस्वीरें देख रहा था कि तभी किसी दोस्त से पता चला कि बैंगलोर के आर.टी.नगर स्थित बिहार भवन में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है. बस फिर क्या था.. उसी वक़्त निकल पड़े हम सब बिहार भवन की तरफ.. वहाँ जाकर जो माहौल देखा वो तो कुछ और ही था. चारो ओर दुर्गा पूजा की धूम थी. बड़े पंडाल लगे थे, सड़कें रंग बिरंगी लाइट से जगमगा रही थी..कुछ पल के लिए तो लगा ही नहीं कि हम बैंगलोर में है, लगा जैसे पटना के ही किसी इलाके में हम घूम रहे हैं. बहुत देर तक बिहार भवन में ही हम बैठे रहे. वहाँ से निकलने का दिल ही नहीं कर रहा था. बिहार भवन में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं, वैसे तो ये कार्यक्रम छोटे स्तर पे ही किये जाते हैं लेकिन फिर भी मुझे इस कार्यक्रम में बड़ा आनंद आता था...जब तक बैंगलोर में रहा मैं हर साल ये कार्यक्रम देखने जाता था.


साल 2007 की तस्वीर, बिहार भवन दुर्गा पूजा समिति 
बैंगलोर में रहते रहते ये भी पता लगा कि दुर्गा पूजा का आयोजन कुछ और जगहों पर भी होता है..उल्सूर लेक और पैलेस ग्राउंड में बड़े स्तर पे दुर्गा पूजा का आयोजन होता है.. पैलेस ग्राउंड जाकर तो लगता है ऐसा कि जैसे बंगाल के किसी दुर्गा पूजा के पंडाल में आप पहुँच गए हैं. खूब अच्छी व्यवस्था होती है वहाँ और वहाँ वक़्त बिताना मुझे बड़ा अच्छा लगता था लेकिन दुर्गा पूजा का ये माहौल और नशा बस उस ग्राउंड तक ही सीमित होता था जहाँ दुर्गा पूजा का आयोजन हो रहा होता है, वहाँ से बहार निकलने पर बड़ी अजीब सी बोरियत और उदासी वाली फीलिंग आती थी.

दिल्ली आने पर मुझे उम्मीद थी कि यहाँ दुर्गा पूजा के मौके पर खूब अच्छी व्यवस्था देखने को मिलेगी, लेकिन इस शहर ने भी थोड़ा निराश किया था मुझे. यहाँ भी दुर्गा पूजा का आयोजन उस स्तर पर नहीं होता जैसा हमारे तरफ किया जाता है. लेकिन अगर मैं बैंगलोर से तुलना करूँ, तो वहाँ के मुकाबले दिल्ली के दुर्गा पूजा का आयोजन बहुत बड़े स्तर पर होता है. चित्तरंजन पार्क कॉलोनी जिसे मिनी बंगाल भी कहा जाता है, वो पूरा इलाका दुर्गा पूजा के रंग में रंगा मिलता है. खूब सुन्दर माहौल होता है वहाँ का, वहाँ से लौटने का तो देर तक मन नहीं करता. जहाँ एक तरफ माँ दुर्गा की मनमोहक मूरत के दर्शन करने का अवसर मिलता है वहीँ मेले का आनंद भी आता है. चाट समोसे और पकौड़ियों के ठेले जगह जगह सी.आर पार्क में लगे दिख जाते हैं. बच्चे से लेकर बड़ों तक सभी इस मेले का खूब आनंद लेते हैं. इस इलाके में कुछ पंडाल जैसे मेला ग्राउंड और काली मंदिर ऐसे हैं जहाँ आधे किलोमीटर तक लम्बी लाइन लगती है दुर्गा माँ के दर्शन के लिए.

चित्तरंजन पार्क की सड़कें ऐसे ही मेले में सजी रहती हैं...
चित्तरंजन पार्क में घूमना मतलब सीधे पटना या बंगाल पहुँच जाना होता है. कुल पाँच या छः जगह इस इलाके में दुर्गा पूजा का आयोजन होता है और एक के बाद एक सभी पंडाल के दर्शन करने आपको पैदल ही चलना पड़ता है. पटना के जैसे ही यहाँ भी बहुत सी सड़कों पर गाड़ियों के आने जाने पर रोक लगा दी जाती है. ये अच्छा भी है, मेला का असली मज़ा गाड़ी में नहीं बल्कि पैदल घुमने में आता है. दिल्ली में मैं हर साल दुर्गानवमी के अवसर पर चित्तरंजन पार्क जाता हूँ. इस साल दुर्गा पूजा में मेरी बहन और मेरा भांजा दोनों मेरे साथ थे.

तय तो ये था कि हम चित्तरंजन पार्क आज यानी दुर्गानवमी के दिन घूमेंगे लेकिन आज मेरी बहन को एक हफ्ते के लिए दिल्ली से बहार जाना है तो हमनें कल ही यानी दुर्गाअष्टमी के दिन चित्तरंजन पार्क घूम लिया. ये पहली बार था कि दिल्ली में मैं परिवार के साथ मेले में घूम रहा था और उसमें भी अपने भांजे के साथ. सी आर पार्क के मेला ग्राउंड में जाते ही मेरा भांजा मेरी गोद से उतर कर इधर उधर जहाँ भी दुकानें लगी थी वहाँ भागने लगा. भांजे को वैसे भी जिस भी दूकान में कोल्ड ड्रिंक, चिप्स या चॉकलेट्स दिख जाते हैं वहाँ ये लड़का टिक जाता है. बड़े से 'मखाना मैन' को देखकर ये बड़ा खुश हुआ और उससे हाथ भी मिलाया.


पहले मैं मेले में अक्सर बच्चों के खिलौने की दुकानों के सामने से गुज़र जाता था लेकिन इस बार खड़े रहकर खिलौने देखने पड़े. मेला ग्राउंड के गेट के पास खिलौने वाले भैया जो बच्चों के खिलौने बेचते हैं वहाँ से भांजे के लिए एक सीटी और एक बाँसुरी खरीदा तो अपने बचपन के दिन एकदम से याद आ गए.

पूरे मेले के दौरान मेरा भांजा अपने मामा यानी मेरे गोद में ही रहा. ऐश थी बाबु की. चलने की जरूरत नहीं हुई और पूरा मेला घूम लिया बच्चे ने. इसे गोद में लेकर घूमते हुए एक बड़ा बचकाना वाला ख्याल भी मन में आया, कि काश ऐसी कोई व्यवस्था हमारे लिए भी होती, बिना थके पूरा मेला घूम लेते हम. भांजे को गोद में लेकर घुमने में थकान तो हुई लेकिन मेला का आनंद इतना था कि थकान वैसी महसूस नहीं हो रही थी.

मामा-भांजा 
नव्पाली दुर्गा पूजा 
मेला ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति 
सी.आर पार्क में इस साल वैसी रौनक नहीं थी जैसी पहले देखने को मिलती थी. मेला ग्राउंड में भी सब थोड़ा फीका सा ही लगा. नव्पल्ली दुर्गा पूजा समिति, जो सी.आर पार्क के पॉकेट चालीस में है, और जहाँ मैं हर साल जरूर जाता हूँ वहाँ की रौनक अच्छी थी. पॉकेट चालीस के पार्क के सामने वाली सड़क पर रंगोली बनाई गयी थी जो बड़ी अच्छी दिख रही थी. एक शिकायत बस सी.आर पार्क के कोआपरेटिव ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति से रही कि कल शाम में इन्होने अपना गेट बंद कर दिया था ये कह कर कि अन्दर सफाई चल रही है. दो तीन सौ मीटर तक लोगों की लम्बी लाइन गेट के बाहर लग गई थी, और उस वक्त शाम के छः बज रहे थे. सफाई ही करवानी थी तो दोपहर में सफाई करवा देते, शाम में पंडाल बंद रखने का कोई मतलब नहीं. कोआपरेटिव ग्राउंड की दुर्गा पूजा काफी मशहूर है, लेकिन यहाँ कल दर्शन नहीं हो पाए.

वापस लौटने में थोड़ी दिक्कत जरूर हुई क्योंकि टैक्सी आसानी से नहीं मिल पा रही थी, लेकिन मेले में घुमने से दुर्गा पूजा का असली आनंद आ गया. आप भी अगर दिल्ली में हैं तो आज शाम हो आइये चित्तरंजन पार्क और मेले का लुत्फ़ उठाइये.

चलते चलते, 
हमारे प्यारे भांजे के प्ले स्कूल में एक दशहरा का एक उत्सव हुआ था, वहाँ हमारे भांजे राजा के रूप में गए थे. ये देखिये तस्वीरें - 


इवनिंग डायरी ५ - ब्लॉगर नास्टैल्जीआ

आज से नौ साल पहले जब मैंने हिन्दी में ब्लॉग लेखन की शुरुआत की थी तब ये सोचना भी नामुमकिन था कि इस ब्लॉगिंग के चलते हम कभी इतने नॉस्टैल्जिक हो सकेंगे जैसे अब हो जाते हैं. महज एक हैशटैग( हिन्दी ब्लॉगिंग) के ट्रेंड करने से और लोगों के उत्साह को देखकर ब्लॉगिंग के वे पुराने दिन ठीक वैसे ही याद आ जाते हैं जैसे हम अपने बचपन या कॉलेज के दिनों को याद करते हैं. बाकी लोगों के साथ ये होता होगा या नहीं, मुझे नहीं पता लेकिन ब्लॉगिंग के उन सुनहरे दिनों को याद करने से मुझे वैसी ही ख़ुशी मिलती है जैसे अपने बीते हुए सबसे प्यारे दिनों को याद कर के ख़ुशी मिलती है.

Blog Nostalgia Blogging Nostalgia

मेरे लिए तो खास तौर पर ब्लॉगिंग के वे सुनहरे दिन बहुत अहम रहे हैं. जाने कितने रिश्ते बने हैं यहाँ. कुछ बेहद अच्छे दोस्त मिले तो कुछ ऐसे नए रिश्ते बने जिन्होंने मेरी ज़िन्दगी को ही बदल के रख दिया. उन दिनों मेरी बुरी हालत थी, दोस्त कुछ अजीब से वजह से दूर हो गए थे, तब मैंने ब्लॉगिंग का रुख किया था. मुझे मालूम भी नहीं था कि ये ब्लॉगिंग मेरी ज़िन्दगी बदलने वाला है. बहुत लोगों को ये विश्वास करना मुश्किल होगा कि महज ब्लॉगिंग कैसे किसी की भी ज़िन्दगी बदल सकता है? ब्लॉग पर तो लोग अपनी राय  लिखते हैं, अपने सामाजिक और पोलिटिकल ओपिनियन लिखते हैं, कवितायेँ और कहानियाँ लिखते हैं. लेकिन इन सब के इतर ब्लॉगिंग मेरे लिए हमेशा से बेहद पर्सनल चीज़ रही है, ये मेरे लिए एक बड़े घर जैसा रहा है, किसी जॉइंट परिवार की तरह जहाँ मेरे दोस्त, दीदियाँ, भाई, भाभी, चाचा, चाची, बुआ रहते हैं और मैं बेझिझक अपने मन की वो सब बातें यहाँ कह डालता हूँ जिसे शायद किसी से भी नहीं कहा था कभी. तभी तो जितने भी संस्मरण मैंने यहाँ लिखे हैं उन सब को लिखने के पहले मैंने किसी को वो सारी बातें कभी नहीं सुनाये थे. किसके पास इतना वक़्त है कि बैठकर पुराने किस्से कहानियाँ सुनाता रहे. 

मैं अगर खुद की बात करूँ तो मुझे संस्मरण लिखना बहुत अच्छा लगता है, शायद इसलिए कि इस भागती दौड़ती दुनिया में मैं शिद्दत से चाहता हूँ कि वक़्त का पहिया ज़रा पीछे घूम जाए और उन दिनों में हम वापस पहुँच जाएँ जहाँ सुकून और चैन था. मुझे लगता है कि तब की ज़िन्दगी कितनी आसान और खूबसूरत थी. कोई कोम्प्लेक्सिटी थी ही नहीं. शायद इसलिए मुझे उन बीते दिनों की बातें लिखना खूब पसंद है. बीते दिनों के किस्सों की बात करूँ तो मैंने अपने से बड़े लोगों के पुराने दिनों के किस्से बहुत कम सुने हैं. मतलब परिवार में या तो पापा या माँ या फिर कभी कभी नानी, यही तीन ऐसे थे जो अपने पुराने दिनों के किस्से मुझे सुनाते थे और मुझे बेहद मज़ा आता था उनकी यादों को सुनकर, लेकिन इनके अलावा ना तो मेरे रिश्तेदार कोई, न मोहल्ले में और ना जान पहचान में किसी से मैंने उनके बीते दिनों की बातें सुनी हैं. और जब भी मैं फिल्मों में देखता था ऐसा कोई सीन जहाँ किसी लड़के को कोई अपने बीते दिनों की कहानियाँ सुना रहा है तो मैं बड़ा मिस करता था कि यार मेरी ज़िन्दगी में ऐसा कोई क्यों नहीं है जो मुझे ऐसी कहानियाँ सुनाये. ये बातें थोड़ी वीयर्ड लग रही हैं न आपको? मेरी ऐसी विश?हैं भी वीयर्ड.  शायद ही कोई नार्मल इंसान इस तरह से सोचता हो. 
खैर, यहाँ ब्लॉग पर मुझे नए रिश्ते मिले, मुझे दीदियाँ मिलीं, खूब सारे बड़े और छोटे भाई मिले, चाचा और चाचियाँ मिलीं, बुआ मिलीं और एक बेहद प्यारी भाभी मिलीं. इन सब की बातों को पढ़कर, इनके बीते दिनों की यादें पढ़कर, इनके संस्मरण पढ़कर मुझे अच्छा लगने लगा. जब ये कोई हैप्पी मोमेंट शेयर करते, मुझे लगता इनके साथ साथ मैं भी इनके उस मोमेंट से जुड़ा हूँ. जब ये अपने पोस्ट में किसी अपने को याद करते तो लगता मैं भी साथ साथ उनके अपनों को याद कर रहा हूँ. मुझे ऐसा लगने लगा कि जिस चीज़ को मैं मिस करता था वो शायद अब पूरी होने लगी है. मुझे लगा कि इस ब्लॉग के अलावा और कहाँ कोई दूसरा माध्यम ऐसा है जहाँ मैं लोगों के ऐसे अनुभव, उनके बीते दिनों की कहानियाँ सुन पाता?

मुझे अक्सर लगता है ऐसा कि ब्लॉग हमारा कोई मोहल्ला जैसा ही है. पहले के ज़माने में मोहल्ला हुआ करता था न(अब के समय में तो सिर्फ कॉलोनियां होती हैं, मोहल्ले तो खत्म हो गए). शाम में दफ्तर से घर वापस आने के बाद कैसे लोगों की टोलियाँ जमा हो जाती थीं एक दुसरे के घर के सामने या मोहल्ले के किसी चाय दुकान पर. औरतों की महफ़िल अलग लगती थीं. मुझे ब्लॉगिंग के वे सुनहरे दिन कुछ कुछ वैसे ही लगते हैं. दिन भर की परेशानियों को भूल कर हम शाम में ब्लॉग पर अपने दिल की सभी बातें बिनाझिझक लिख जाते थे..ऐसे कि जैसे बाकी साथी दोस्त को अपने दिल की वे बातें सुनानी हैं. दोस्त भी ब्लॉग पर आने में ज्यादा देर नहीं लगाते थे, यहाँ पोस्ट लिखी गयी नहीं कि दोस्तों की महफ़िल उस पोस्ट पर लगनी शुरू हो गयी.  लोगों को कुछ दिक्कत भी हुई, तो दुसरे लोग तुरंत समस्या का समाधान लेकर ब्लॉग पर ही उपलब्ध हो जाते थे. किसी को किसी की बात पर कोई अपनी बात याद आई, तो वो उसके पोस्ट के जवाब में अपने कुछ पुराने किस्से लिख देते थे, ठीक वैसे ही जैसे हम परिवार में एक दुसरे से बात करने के दौरान किस्सों के जवाब में किस्से सुनाते हैं. हँसी-मजाक भी खूब हुई ब्लॉग पर और लड़ाई-झगड़े भी खूब हुए, जैसे कि अक्सर परिवार में होता है, लेकिन फिर भी सब एक दुसरे के साथ रहे. इन सब के अलावा ख़ास कर उन लोगों के लिए ब्लॉगिंग बहुत अहम रहा है जो अकेलेपन के शिकार रहे हैं. उन्हें उनके डिप्रेसिव मूड से बाहर निकलने में ब्लॉग ने बड़ी मदद की है. ब्लॉग के माध्यम से ही सही, उन्हें भी ये लगा कि शायद उन्हें एक परिवार मिल गया है, एक ऐसी जगह मिली है जहाँ वे अपने मन की बातें कह सकते हैं और लोग उनकी बातें सुनेंगे. शायद इन्हीं सब वजहों से हम हमेशा 'हिंदी-ब्लॉग' में एक शब्द और जोड़ देते हैं और कहते हैं इसे हिंदी ब्लॉग परिवार. 

ये ब्लॉगर मेरे लिए उसी पुराने मोहल्ले जैसा था कि जहाँ कुछ देर घूम कर, दोस्तों से बातें कर के, उनकी बातें सुन कर..उनके किस्से पढ़कर..तस्वीरें देखकर, विचलित मन भी एकदम शांत हो जाता था. इन सब के अलावा  ब्लॉग के वजह से ही किताब पढ़ने की मेरी आदत बढ़ गयी. किताबें मैं पहले भी पढ़ता था लेकिन समय के साथ साथ किताबें पढ़ना मेरा कम होता गया. ब्लॉगिंग में आने के बाद, यहाँ दोस्तों ने लेखकों की, उनकी कहानियों की, उपन्यासों की बातें करनी शुरू की..उनकी बातें इतनी दिलचस्प लगने लगीं कि मेरा भी मन करने लगा फिर से किताबों के प्रति रुख करने का, और शायद इसलिए ब्लॉगिंग शुरू करने के बाद बड़े तेज़ रफ़्तार से मैंने कई किताबें निपटाई हैं.  

लेकिन समय के साथ साथ जैसे जैसे दुसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का चलन शुरू हुआ, लोग अपने इसी परिवार के प्रति उदासीन होते चले गए. ठीक वैसे ही जैसे नयी मॉडर्न कॉलोनी में शिफ्ट होने के बाद लोग अपने पुराने मोहल्ले को भूल जाते हैं. 

इधर दो दिनों से फेसबुक और ट्विटर पर दोस्तों ने हिन्दी ब्लॉगिंग के हैशटैग को ट्रेंड करवाने का काम शुरू किया है और इस वजह से आज सभी पुराने ब्लॉगर अपने ब्लॉग पर लगा ताला खोल कर उसे फिर से शुरू करने में लगे हैं. जहाँ कुछ लोग अभी भी हैं जो ब्लॉगिंग लगातार कर रहे हैं वहीँ बाकी लोग लगभग ब्लॉगिंग छोड़ चुके हैं. ऐसे में यहाँ ये देखना होगा कि इस हैशटैग के ट्रेंड करने के बाद क्या लोग वाकई ब्लॉगिंग के तरफ फिर से आते हैं या ये बस एक दिन की बात बन के रह जायेगी.

आज जबकि लोग आज  हिंदी ब्लॉग दिवस मना रहे हैं, ऐसे में एक गाना मैं यहाँ शेयर कर रहा हूँ, "आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम..गुज़रा ज़माना बचपन का" आप इस गाने में थोड़ा बचपना कर के देखिये, 'बचपन' की 'ब्लॉगिंग' गा के देखिये. बड़ा अच्छा लगेगा :) 


सुखदेव और राजगुरु



शहीद दिवस पर सिर्फ भगत सिंह का नाम अकेले नहीं लिया जाता. जितने सम्मान और आदर के साथ हम भगत सिंह का नाम लेते हैं उतने ही सम्मान और आदर के साथ हम सुखदेव और राजगुरु का भी नाम लेते हैं. शहादत के इतने वर्षों बाद भी ये तीनों आज भी हमारे दिलों में धड़कते हैं. सुखदेव और राजगुरु भगत सिंह के निकटतम सहयोगी और खूब अच्छे मित्र थे.आईये आज देखते हैं सुखदेव और राजगुरु के जीवन की कुछ झलकियाँ

सुखदेव का पूरा नाम था सुखदेव थापर. सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को पंजाब में लुधियाणा के नौघरा में हुआ था. उनके पिता का नाम रामलाल और माता का नाम राल्ली देवी था. सुखदेव के पिता की जल्द ही मृत्यु हो गयी थी और इसके बाद उनके चाचा लाला अचिंत्रम ने उनका पालन पोषण किया था.

सुखदेव हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और पंजाब में विविध क्रांतिकारी संगठनो के वरिष्ट सदस्य थे. वो नेशनल कॉलेज, लाहौर में पढ़ाया करते थे और वहीं उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना इस उद्देश्य से की थी कि ब्रिटिशो का विरोध कर आज़ादी के लिये संघर्ष कर सके. बाद में सुखदेव हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और पंजाब के कुछ क्रांतिकारी संगठनो में शामिल हुए

HSRA ने अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ अपनी मुहीम शुरू कर दी थी. सुखदेव अपने बाकी साथी भगत सिंह, राजगुरु, बटुकेश्वर बत्त और चंज्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेज सरकार की नींव हिलाकर रख दी थी. 1928 में ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन के अंडर एक कमीशन का निर्माण किया, जिसका उद्देश्य उस समय भारत की राजनितिक स्थिति का जाँच करना और ब्रिटिश पार्टी का गठन करना था लेकिन भारतीय राजनैतिक फलों ने इस कमिसन का विरोध किया. उस विरोध का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे. लेकिन लाला लाजपत राय के अहिंसात्मक शांति मोर्चा को ब्रिटिश पुलिस ने हिंसात्मक घोषित किया और जेम्स स्कॉट ने पुलिस अधिकारी को विरोधियो पर लाठी चार्ज करने का आदेश दिया जिसमें विशेषतः लाला लाजपत राय को निशाना बनाया गया. उस लाठीचार्ज में लाला जी का देहांत हो गया. सुखदेव और भगत सिंह इस खबर से बुरी तरह आहात थे. उन्होंने बदला लेने का फैसला किया. इस सारी योजना के सूत्रधार सुखदेव ही थे. सेंट्रल एसेंबली के सभागार में बम और पर्चे फेंकने और फिर गिरफ़्तारी की घटना और अन्य योजनाओं को भले ही भगत सिंह समेत दूसरे क्रांतिकारियों ने अंजाम दिया हो लेकिन इतिहासकार कहते हैं कि सुखदेव इस युवा क्रांतिकारी आंदोलन की नींव और रीढ़ थे।

इतिहासकार ये भी बताते हैं कि एसेंबली में बम फेंकने का जिम्मा पहले भगत सिंह को नहीं दिया गया था. पुलिस को पहले से भगत सिंह की तलाश थी और क्रन्तिकारी साथी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह पकड़े जाए. लेकिन सुखदेव भगत सिंह के नाम पर अड़ गए. उनका कहना था कि भगत सिंह अदालत से अपने विचारों और लेखों के जरिये लोगों में जागृति पैदा कर सकते हैं. सुखदेव का तर्क सुनने के बाद भगत सिंह को भी उनकी बात सही लगी.

सुखदेव गांधी को गांधी जी की अहिंसक नीति पर जरा भी भरोसा नहीं था. उन्होंने महात्मा गांधी को जेल से एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए लिखा था “मात्र भावुकता के आधार पर की गई अपीलों का क्रांतिकारी संघर्षों में कोई अधिक महत्व नहीं होता और न ही हो सकता है।” उन्होंने आगे लिखा “आपने अपने समझौते के बाद अपना आन्दोलन (सविनय अवज्ञा आन्दोलन) वापस ले लिया है और फलस्वरूप आपके सभी बंदियों को रिहा कर दिया गया है, पर क्रांतिकारी बंदियों का क्या हुआ? 1915 से जेलों में बंद गदर पार्टी के दर्जनों क्रांतिकारी अब तक वहीं सड़ रहे हैं। बावजूद इस बात के कि वे अपनी सजा पूरी कर चुके हैं। मार्शल लॉ के तहत बन्दी बनाए गए अनेक लोग अब तक जीवित दफनाए गए से पड़े हैं। बब्बर अकालियों का भी यही हाल है। देवगढ़, काकोरी, महुआ बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र केस के बंदी भी अन्य बंदियों के साथ जेलों में बंद है। एक दर्जन से अधिक बंदी सचमुच फांसी के फंदों के इंतजार में हैं। इन सबके बारे में क्या हुआ?”

सुखदेव का ये पत्र उनके शहादत के कुछ दिन बाद यंग इंडिया में छपा था.

राजगुरु 


शहीद राजगुरू का असल नाम शिवराम हरि राजगुरू था. उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे ज़िले के खेड़ गाँव में हुआ था. उस गाँव का नाम अब बदल कर राजगुरु नगर कर दिया गया है. राजगुरु के पिता का नाम श्री हरि नारायण और उनकी माता का नाम पार्वती बाई था. वीरता और साहस उनमें बचपन से भरा था, इसके साथ साथ राजगुरु खूब मस्तमौला इंसान भी थे. बचपन से ही भारत माँ से उन्हें प्रेम था और अंग्रेजों से घृणा. वीर शिवाजी और लोकमान्य तिलक के वो बहुत बड़े भक्त थे. पढाई लिखाई में उनका ज्यादा मन नहीं लगता था, इसलिए अपने घरवालों का अक्सर तिरस्कार सहना पड़ता था उन्हें.

एक दिन रोज़ रोज़ के तिरस्कार से तंग आकर, अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए वो घर छोड़ कर चल दिए. उन्हूने सोचा कि अब जब घर के बंधनों से मैं आज़ाद हूँ तो भारत माता की सेवा करने में अब कोई दुविधा नहीं है.

बहुत दिनों तक वो अलग अलग क्रांत्तिकारियों से मिलते रहे, साथ काम करते रहे. एक दिन उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आज़ाद से हुई. राजगुरु की असली क्रन्तिकारी यात्रा चन्द्रशेखर आज़ाद से मिलने के बाद ही शुरू हुई. राजगुरु 'हिंदुस्तान सामाजवादी प्रजातान्त्रिक संघ' के सदस्य बन गए. चंद्रशेखर आज़ाद इस जोशीले नवयुवक से बहुत प्रभावित थे, और खूब मन से उन्होंने राजगुरु को निशानेबाजी और बाकी शिक्षा देने लगे. जल्द ही राजगुरु आज़ाद जैसे एक कुशल निशानेबाज बन गए. इनके मस्तमौले अंदाज़ और लापरवाही की वजह से अक्सर चन्द्रशेखर आज़ाद राजगुरु को डांट भी देते थे, लेकिन राजगुरु आज़ाद को बड़े भाई मानते थे और उनके डांट का कभी उन्होंने बुरा नहीं मन. बाद में आज़ाद के ही जरिये राजगुरु की मुलाकात भगत सिंह और सुखदेव से हुई थी.

राजगुरु के मस्तमौले अंदाज़ और वीरता के खूब किस्से हैं. एक बार आगरा में चंद्रशेखर आज़ाद पुलिसिया जुल्म के बारे में बता रहे थे तो राजगुरु ने गर्म लोहे से अपने शरीर पर निशान बना कर देखने की कोशिश की थी कि वो पुलिस का जुल्म झेल पाएंगे या नहीं. बात बात पर वो अंग्रेजो से भिड़ने और उन्हें मारने के लिए तैयार हो जाते थे. राजगुरु के मस्तमौला अंदाज़ का भी एक किस्सा खूब मशहूर है - लाहौर में सभी क्रांतिकारियों पर सांडर्स हत्याकाण्ड का मुकदमा चल रहा था. मुक़दमे को क्रांतिकारियों ने अपनी फाकामस्ती से बड़ा लम्बा खींचा. सभी जानते थे की अदालत एक ढोंग है. उनका फैसला तो अंग्रेज़ हुकूमत ने पहले ही कर दिया था. राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव जानते थे की उनकी मृत्यु का फरमान तो पहले ही लिखा जा चूका है तो क्यों न अपनी मस्तियों से अदालत में जज को धुल चटाई जाए. एक बार राजगुरु ने अदालत में अंग्रेज़ जज को संस्कृत में ललकारा। जज चौंक गया उसने कहा- "टूम क्या कहता हाय"? राजगुरु ने भगत सिंह की तरफ हंस कर कहा कि- "यार भगत इसको अंग्रेज़ी में समझाओ। यह जाहिल हमारी भाषा क्या समझेंगे". सभी क्रांतिकारी राजगुरु की इस बात पर ठहाका मारकर हसने लगे.

‘लाहौर षड्यंत्र’ के मामले ही ब्रिटिश अदालत ने राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को मौत की सजा सुनाई. तीनों वीर क्रन्तिकारी को ब्रीटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को फाँसी पर चढ़ा दिया था. फांसी पर चढ़ने के समय भगत सिंह, सुखदेव की उम्र २३ साल थी और राजगुरु की उम्र २२ साल.

भगत सिंह ने घर वालों को जो ख़त लिखे




भगत सिंह की कलम से लिखा गया  पहला खत अपने दादा के नाम था जो उन्होंने तब लिखा था जब वे छठी कक्षा में पढ़ते थे. कार्ड उर्दू में है लेकिन उसपर कोई तारीख नहीं लिखी गयी है, पर लाहौर के डाकखाने  की मुहर में 22 जुलाई 1918 और खटकडकलां के डाकखाने की मुहर में 23 जुलाई 1918 है. ये ख़त एक कार्ड के रूप में अब तक सुरक्षित है.

श्रीमान पूज्य बाबा जी,
नमस्ते

अर्ज ये है की खत आपका मिला - पढ़कर दिल को ख़ुशी हासिल हुई. इम्तिहान के बाबात ये है की मैंने पहले इस वास्ते नहीं लिखा था, की हमें बताया नहीं था. अब हमें अंग्रेजी और संस्कृत का बताया है. उनमें मैं पास हूँ. संन्स्कृत में मेरे 150 नंबरों में से 110 नंबर हैं. अंग्रेजी  में 150 में से 68 नंबर हैं, जो 150 नंबरों में से 50  नंबर ले आवे वो पास होता है. नंबर 68 से अच्छा पास हो गया हूँ.

किसी किस्म की फ़िक्र न करे. बाकी नहीं बताया और छुट्टियाँ 8 अगस्त को पहली छुट्टी होगी. आप कब आयेंगे, तहरीर फरमावें.


डाकखाने की मुहर के अनुसार भगतसिंह ने यह पत्र 14 नवम्बर 1921 को लाहौर से अपने दादा जी को लिखा था. 

मेरे पूज्य दादा साहब जी 
नमस्ते

अर्ज यह है कि इस जगह खैरियत है और आपकी खैरियत श्री परमात्मा जी से नेक मतलूब हूँ. अहवाल ये है कि मुद्दत से आपका कृपा पत्र नहीं मिला. क्या सबब है? कुलबीरसिंह, कुलतारसिंह की खैरियत से जल्दी मुत्तला फरमावें.बेबे साहबा अभी मोरावाली से वापस नहीं आयीं. बाकी सब खैरियत है. 

आपका ताबेदार 
भगतसिंह 

(कार्ड की दुसरी तरफ) 

माताजी को नमस्ते. चची साहबा को नमस्ते. मांगी चमार अभी तक तो नहीं आया. मैंने एक पुराणी किताब मोल ले ली थी, जो कि बहुत सस्ती मिल गई थी. 

(कार्ड के लाईनों के बीच उलटे रुख)

आजकल रेलवे वाले हड़ताल की तैयारी कर रहे हैं. उम्मीद है कि अगले हफ्ते के बाद जल्द शुरू हो जायेगी. 


(पिता जी के नाम पत्र जिसमें उन्होंने घर को अलविदा कहा  )


पूज्य पिता जी,
नमस्ते।

मेरी जिन्दगी मकसदे आला(उच्च उद्देश्य) यानी आज़ादी-ए-हिन्द के असूल(सिद्धांत) के लिए वक्फ(दान) हो चुकी है. इसलिए मेरी जिन्दगी में आराम और दुनियावी खाहशात(सांसारिक इच्छाएँ) बायसे कशिश(आकर्षक) नहीं हैं.

आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया है. लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ.

उम्मीद है आप मुझे माफ फरमाएँगे.

आपका ताबेदार
भगत सिंह 

( अपने भाई को लिखा भगत सिंह का पत्र  )

सेन्ट्रल जेल , लाहौर 
16 सितम्बर 1930

ब्रादर अजीज कुलबीर जी,
सतश्रीअकाल 

आपको मालुम होगा कि बमूजिब अहकाम अफसरान बाला मेरी मुलाकातें बंद कर दी गई हैं. अन्दरिन हालात फ़िलहाल मुलाकात न हो सकेगी और मेरा ख्याल है की अनकरीब ही फैसला सुना दिया जाएगा. इसलिए 
किसी दिन जेल में आकर मेरी कुतब, दीगर कागजात, जेल के डिप्टी सूपरन्टेन्डन्ट के दफ्तर में भेज दूंगा, आकर ले जाना. न मालूम मुझे बार बार यह ख्याल क्यों आ रहा है की इसी हफ्ता के अन्दर अन्दर या ज्यादा से ज्यादा इसी माह में फैसला और चालान हो जाएगा. इन हालातों में अब तो किसी दुसरी जेल में मुलाकात हो तो हो, यहाँ तो उम्मीद नहीं. 

वकील को भेज सको तो भेजना. मैं प्रिवी कैंसिल के सिलसिले में एक जरूरी बात दरयाफ्त करना चाहता हूँ. वालिदा साहबा को तसल्ली देना, घबराएं नहीं. 

आपका भाई 
भगतसिंह


सेन्ट्रल जेल, लाहौर 
25 सितम्बर 1930

ब्रादर अजीज कुलबीर जी,
सतश्रीअकाल

मुझे यह मालूम करके कि एक दिन आप वालिदा को साथ लेकर आये और मुलाकात की इजाज़त न मिलने पर मायूस लौट गए, बड़ा अफ़सोस हुआ. आखिर तुम्हें तो मालूम हो चूका था की जेल वाले मुलाकात की इजाज़त नहीं देते. फिर वालिदा को क्यों साथ लाये? मैं जानता हूँ वो इस वक़्त सख्त घबराई हुई हैं, मगर इस घबराहट और परेशानी का फायदा? नुकसान जरूर है, क्योंकि जब से मुझे मालूम हुआ है कि वो बहुत रो रही हैं, मुझे खुद भी बेचैनी हो रही है. घबराने की और कोई बात नहीं, और इससे कुछ हासिल भी नहीं. सब हौसला से हालात का मुकाबला करो. आखिरी दुनिया में दुसरे लोग भी तो हजारों मुसीबतों में फंसे हुए हैं, और फिर लगातार एक साल मुलाकातें कर तबियत सेर नहीं हुई, तो  दीगर मजीज़ मुलाकातों से भी तसल्ली न हो सकेगी. 
मेरा ख्याल है कि फैसला और चालान के बाद मुलाकातें खुल जायेगी, लेकिन अगर फर्ज किया जाए कि मुलाकात की इजाज़त न मिले तो घबराने का क्या फायदा 

तुम्हारा 
भगत सिंह



भगत सिंह के बाकी पत्र  

हमें फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ाया जाए




भगत सिंह और उनके दोनों साथियो को फांसी लगने ही वाली है. यह सबकी राय थी. उसे किसी तरह कुछ दिन के लिए रोकना चाहिए जिससे व्यापक रूप में उन्हें फांसी से बचाने का प्रयत्न हो सके. यह 'लाहौर षडयंत्र डिफेन्स कमिटी' के कानून विशारदों की राय थी. इसका एक ही उपाए था कि भगत सिंह और उनके साथी गवर्नर से दया की प्रार्थना करे, पर भगत सिंह कभी भी इसके लिए तैयार नहीं हो सकते, यह सब जानते थे.

प्राणनाथ मेहता एडवोकेट की बात भगत सिंह मानते थे. उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों से घुमा फिराकर 'मर्सी पिटिसन' (दया प्रार्थना) की बातहीर विश्वास दिलाया की यदि आपग 'हाँ' कर दे तो हम पिटिसन की भाषा ऐसी कर देंगे कि उससे आपका ज़रा भी सम्मान कम न हो. दुसरे दोनों साथी तो इससे नाराज़ हुए, पर भगत सिंह ने इसे मान लिया और कहा - अच्छी बात है, तुम तैयार कर लाओ 'मर्सी पेटिसन'.

श्री प्राणनाथ ख़ुशी खुशी लौटे और कई कानून-विशारदों के साथ रात भर मर्सी-पिटिसन का ड्राफ्ट बनाते रहे. दुसरे दिन २० मार्च १९३१ को जब वे जेल गए तो भगतसिंह ने कहा - हमने तो भेज भी दिया गवर्नर पंजाब को अपना मर्सी-पिटिसन ,और उन्होंने निम्नलिखित पत्र उनके हाथ पर रख दिया

हमें फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ाया जाए

प्रति, गवर्नर पंजाब, शिमला
महोदय,

उचित सम्मान के साथ हम नीचे लिखी बातें आपकी सेवा में रख रहे हैं -
भारत की ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च अधिकारी वाइसराय ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहौर षड्यंत्र अभियोग की सुनवाई के लिए एक विशेष न्यायधिकरण (ट्रिब्यूनल) स्थापित किया था, जिसने 7 अक्तूबर, 1930 को हमें फाँसी का दण्ड सुनाया।हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया है कि हमने सम्राट जार्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है।
न्यायालय के इस निर्णय से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं-
पहली यह कि अंग्रेज जाति और भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा है। दूसरी यह है कि हमने निश्चित रूप में इस युद्ध में भाग लिया है। अत: हम युद्धबंदी हैं।
यद्यपि इनकी व्याख्या में बहुत सीमा तक अतिशयोक्ति से काम लिया गया हैं, तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि ऐसा करके हमें सम्मानित किया गया है। पहली बात के सम्बन्ध में हम तनिक विस्तार से प्रकाश डालना चाहते हैं। हम नहीं समझते कि प्रत्यक्ष रूप मे ऐसी कोई लड़ाई छिड़ी हुई है। हम नहीं जानते कि युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या है? परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हैं और साथ ही इसे इसके ठीक संदर्भ में समझाना चाहते हैं ।

हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूँजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नही पड़ता। यदि आपकी सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के मुखियों पर प्रभाव जमाने में सफल हो जाए, कुछ सुविधायें मिल जाये, अथवा समझौते हो जाएँ, इससे भी स्थिति नहीं बदल सकती, तथा जनता पर इसका प्रभाव बहुत कम पड़ता है। हमें इस बात की भी चिंता नही कि युवको को एक बार फिर धोखा दिया गया है और इस बात का भी भय नहीं है कि हमारे राजनीतिक नेता पथ-भ्रष्ट हो गए हैं और वे समझौते की बातचीत में इन निरपराध, बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गए हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु मानते हैं, क्योंकि उनके विचार में वे हिंसा में विश्वास रखते हैं, हमारी वीरांगनाओं ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया है। उन्होंने अपने पतियों को बलिवेदी पर भेंट किया, भाई भेंट किए, और जो कुछ भी उनके पास था सब न्यौछावर कर दिया। उन्होंने अपने आप को भी न्यौछावर कर दिया परन्तु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही समझती है। आपके एजेण्ट भले ही झूठी कहानियाँ बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और पार्टी की प्रसिद्धी को हानि पहुँचाने का प्रयास करें, परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा।

हो सकता है कि यह लड़ाई भिन्न-भिन्न दशाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करे। किसी समय यह लड़ाई प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलती रहे, कभी भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर युद्ध जारी रहे और कभी यह घटना इतनी भयानक हो जाए कि जीवन और मृत्यु की बाजी लग जाए। चाहे कोई भी परिस्थिति हो, इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा। यह आप की इच्छा है कि आप जिस परिस्थिति को चाहे चुन लें, परन्तु यह लड़ाई जारी रहेगी। इसमें छोटी -छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। बहुत सभव है कि यह युद्ध भयंकर स्वरूप ग्रहण कर ले। पर निश्चय ही यह उस समय तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि समाज का वर्तमान ढाँचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन या क्रांति समाप्त नहीं हो जाती और मानवी सृष्टि में एक नवीन युग का सूत्रपात नही हो जाता।

निकट भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जाएगा और यह युद्ध निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद व पूँजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारम्भ ही किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा। हमारी सेवाएँ इतिहास के उस अध्याय में लिखी जाएंगी जिसको यतीन्द्रनाथ दास और भगवतीचरण के बलिदानों ने विशेष रूप में प्रकाशमान कर दिया है। इनके बलिदान महान हैं। जहाँ तक हमारे भाग्य का संभंध है, हम जोरदार शब्दों में आपसे यह कहना चाहते हैं कि आपने हमें फाँसी पर लटकाने का निर्णय कर लिया है। आप ऐसा करेंगे ही,आपके हाथों में शक्ति है और आपको अधिकार भी प्राप्त है। परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला सिद्धान्त ही अपना रहे हैं और आप उस पर कटिबद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हमने कभी कोई प्रार्थना नहीं की और अब भी हम आपसे किसी प्रकार की दया की प्रार्थना नहीं करते। हम आप से केवल यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है। इस स्थिति में हम युद्धबंदी हैं, अत: इस आधार पर हम आपसे माँग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबन्दियों-जैसा ही व्यवहार किया जाए और हमें फाँसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाए।
अब यह सिद्ध करना आप का काम है कि आपको उस निर्णय में विश्वास है जो आपकी सरकार के न्यायालय ने किया है। आप अपने कार्य द्वारा इस बात का प्रमाण दीजिए। हम विनयपूर्वक आप से प्रार्थना करते हैं कि आप अपने सेना-विभाग को आदेश दे दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली भेज दी जाए।